व्यक्तिपरकता क्या है | व्यक्तिपरकता की परिभाषा किसे कहते है ? Subjectivity in hindi meaning

By   December 13, 2020

Subjectivity in hindi meaning definition व्यक्तिपरकता क्या है | व्यक्तिपरकता की परिभाषा किसे कहते है ?

 शब्दावली
समरूपता: एक सिद्धांत जो पूँजीवादी प्रगति के रूप में समान औद्योगिक समाजों पर अपना प्रभाव डालता है।
जनसांख्यिकी: यह जनसंख्या से संबंधित है। इसकी वृद्धि दर तथा अनेक अन्य पहलू जैसे की जीवन प्रत्याशा।
व्यक्तिपरकता: व्यक्ति के अंतर्वैयक्तिक व्यवहारों पर निर्भर करता है।

व्यक्तिपरक घटक
इससे पहले हम विभिन्न विचारधाराओं के माध्यम से सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाले वस्तुपरक विभिन्न घटकों के बारे में चर्चा कर चुके हैं। आइए अब हम व्यक्तिपरक घटकों के संबंध में जानकारी प्राप्त करें अर्थात वे घटक जो लोगों को गतिशीलता के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यहाँ पर हम यह स्पष्ट रूप से उर्ध्व गतिशीलता के लिए आकांक्षा वाले तत्वों की चर्चा करेंगे। अनेक मामलों में गतिशीलता अपनी इच्छा से नहीं होती जैसे कि अनेक व्यवसायों के स्तरों के नवीन स्तरीकरण में होता है। लेकिन कुछ व्यक्तियों में से एक जैसे हालातों में कोई व्यक्ति गतिशीलता के लिए प्रेरित होता है और कोई नहीं। इसलिए आइए अब हम सामाजिक गतिशीलता के कुछ व्यक्तिपरक घटकों के संबंध में जानकारी प्राप्त करें। हम यह आसानी से मान सकते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपने स्तर से ऊपर के स्तर को प्राप्त करने की इच्छा रखता है, न कि निम्न स्तर की ओर जाने की। इस संबंध में वेबलेन की पुस्तक ‘द थ्योरी ऑफ लेजयर क्लास‘ में कहा है कि प्रत्येक स्तरीकरण पद्धति स्वतः गतिशीलता का स्रोत तथा साधन है। यह इसलिए होता है कि किसी का भी अपने बारे में व्यक्तिगत अनुमान मुख्य रूप से अन्य लोगों के मूल्यांकन पर निर्भर होता है और कोई भी व्यक्ति अपने साथियों की दृष्टि में हमेशा अच्छे लगने वाले विचारों के अंतर्गत ही सोचेगा। अतः वे लोग ऐसी स्थितियों की अभिलाषा करेंगे जो समाज में लाभप्रद मानी जाती हैं। इसलिए संस्कृतिकरण की प्रक्रिया वास्तव में जाति प्रथा के मूल्यों की प्रतिबद्धता को दर्शाती है जो गतिशीलता के लिए प्रेरणा या आकांक्षा का साधन होती है।

अभ्यास 2
किसी प्रकार की सामाजिक गतिशीलता अपनाने वाले अपने जानकार लोगों में व्यक्तिपरक घटक जानने का प्रयास कीजिए। अपने निष्कर्षों पर अध्ययन केंद्र में अन्य विद्यार्थियों से चर्चा कीजिए।

परंतु बेटीली ने संकेत दिया है कि जब इच्छुक समूह उच्च समूह में शामिल होने का प्रयास करता है और उसमें वे शामिल भी हो जाते हैं तो वे उसी स्थिति में हमेशा के लिए बने रहना चाहते हैं। अतः जाति प्रथा के मामले में शामिल होना और उससे अलग होना दोनों प्रक्रियाएँ बराबर एक-साथ चलती रहती हैं। यह विचार वेबर के द्वारा प्रयोग किए गए सामाजिक सम्बद्धता के समान है।

परंतु अब हमें अपने मुख्य तर्क की ओर आना चाहिए। हम सामान्य रूप से यह कह सकते हैं कि मूल्यों की व्यवस्था, उनके प्रति प्रतिबद्धता दोनों ही अपने आप में गतिशीलता के लिए आकांक्षाओं को पैदा करती हैं अर्थात् गतिशीलता स्वयं ही आरंभ हो जाती है।

मर्टन ने सामाजिक व्यवहार को निर्धारित करने में लक्ष्य समूह के महत्व के संबंध में लिखा है। उन्होंने कहा है कि कोई व्यक्ति अपने स्वयं के समूह की अपेक्षा अपने लक्ष्य समूह, जिसका वह सदस्य नहीं है, की ओर गतिशील होता है। उस स्थिति में वह जो नियम अपनाता है वे उसके वर्ग से संबंधित नहीं होते। इस प्रकार, वह अपने वर्ग के नियमों से विचलित हो जाता है। उसने इस प्रक्रिया को ‘पूर्वभाषित समाजीकरण‘ का नाम दिया है। वे लोग जो अनेक कारणों से अपने समूह की परिधि से बाहर जाते हैं वे लोग इसी प्रकार के पूर्वभाषित समाजीकरण की प्रक्रिया से गुजरते हैं। इसलिए संस्कृतिकरण की प्रक्रिया को हम फिर से एक बार इस उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं जहाँ व्यक्ति ऊँची जाति की परंपराओं और उसकी जीवन-शैली का पालन करने लगता है और एक समय के बाद वह जाति के क्रम में अपने लिए ऊँची जाति की मान्यता प्राप्त करने का प्रयास करता है।

सामाजिक गतिशीलता एवं सामाजिक परिवर्तन
अब तक की गई चर्चा में हमने सामाजिक गतिशीलता का विभिन्न घटकों पर आधारित होने के रूप में और सामाजिक संरचना को स्वतंत्र रूप में देखा है। तथापि मार्क्स के उपर्युक्त विचार को संक्षिप्त रूप से उल्लेख कर सकते हैं कि गतिशीलता या गतिशीलता की कमी अपने आप में व्यवस्था परिवर्तन का एक साधन है। अतः वस्तुपरक बनाम व्यक्तिपरक विशिष्ट अलग-अलग घटकों के स्थान पर हमें इसकी संरचना तथा माध्यम और परस्पर इनके अंतःसंबंधों के रूप में देखना चाहिए। गिड्डेन्स ने गतिशीलता की परंपरागत परिचर्चाओं की आलोचना की है जो इसे निर्धारित श्रेणियों के उन वर्गों के रूप में देखती हैं जिनमें विभिन्न समयों में विभिन्न प्रकार के लोग शामिल हो सकते हैं। सकम्पटर इसे एक ऐसी बस के रूप में उद्धृत करता है जिसमें अलग-अलग श्रेणी के यात्री विभिन्न समय में यात्रा करते हैं। यहाँ पर दो प्रकार की समस्या खड़ी होती है। पहली, कोई भी व्यक्ति गतिशीलता की चर्चा को उन घटकों से अलग नहीं कर सकता जो सामान्यतः वर्ग संबंधों की संरचना करते हैं। तथा दूसरा, गतिशीलता की पूरी प्रक्रिया स्तरीकरण की पद्धति में परिवर्तन ला सकती है।

मर्टन ने सामाजिक संरचना और इसकी भिन्नताओं के बारे में लिखा है जिसमें उन्होंने कुछ और अधिक प्रकाश डाला है। उन्होंने सामाजिक रूप से स्वीकृत लक्ष्य और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के साधनों को अलग-अलग परिभाषित किया है। ये लक्ष्य समाज के मूल्यों को दर्शाते हैं। जो लोग इन लक्ष्यों को और इनको प्राप्त करने के साधनों को स्वीकार करते हैं वे समाज का अनुसरण करने वाले होते हैं। परंतु इनमें से कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो इन लक्ष्यों को मंजूर न करें अर्थात् जैसे मूल्यों और उसी तरह से उन्हें प्राप्त करने के साधनों को स्वीकार ही न करें। इस तरह के लोग हो सकता है सामाजिक जीवन को छोड़ दें, निवर्तनवाद, या समाज के विरुद्ध विद्रोह कर लें और बागी बन जाएँ। जैसा कि पहले बताया गया है, बागी या विद्रोही विद्यमान संरचना में प्रगति करने के स्थान पर समाज पर नई सामाजिक संरचना की अभिधारण करने लगते हैं।

मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट स्थिति व्यवस्था परिवर्तन की ओर ले जाती है जिससे नई स्थितियों की उत्पत्ति होती है और इस प्रकार गतिशीलता होती है। इसलिए वस्तुपरक तथा व्यक्तिपरक घटकों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग करना बहुत ही कठिन है। सामाजिक संरचना अपने आप ही विसंगतियों को पैदा करती है।

बोध प्रश्न 2
सही उत्तर पर टिक () का निशान लगाएँ-
1) पूँजीवाद में मार्क्स ने माना है:
क) गरीबीकरण होगा।
ख) अधोमुखी गतिशीलता होगी।
ग) धुवीकरण की तरफ झुकाव होगा।
घ) उपर्युक्त सभी।
2) सामाजिक गतिशीलता में कुछ व्यक्तिपरक घटकों को पाँच पंक्तियों में लिखिए।

बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 2
1) ग
2) वेबर के अनुसार प्रत्येक स्तरीकरण की पद्धति गतिशीलता का स्रोत होती है। यह इसलिए होता है क्योंकि स्व-मूल्यांकन अन्य व्यक्ति के मूल्यांकनों पर आधारित होता है। इसके लिए व्यक्तिपरक घटक एक अच्छा उदाहरण है जो संस्कृतिकरण की प्रक्रिया है जिसमें गतिशीलता के लिए जाति प्रथा एक प्रेरक स्रोत है।

सारांश
हमने इस चर्चा में कुछ मुख्य संरचनाओं के साथ सामाजिक गतिशीलता को प्रभावित करने वाले व्यक्तिपरक घटकों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसके साथ ही, हमने उन घटकों का विश्लेषण करने का भी प्रयास किया है जिनके कारण सामाजिक गतिशीलता होती है। इसमें हमने विभिन्न सिद्धांतों, विचारधाराओं को भी प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है जिससे विद्यार्थी अपनी विश्लेषणात्मक प्रवृत्ति एवं समझ विकसित कर सके। इसके अतिरिक्त, और अध्ययन करने के लिए संदर्भ पुस्तकों की संक्षिप्त सूची उपलब्ध कराई गई है। दुर्भाग्य से भारत में गतिशीलता पर पश्चिमी विकसित देशों की तुलना में प्रमुख शोध । कार्य यानी तुलनात्मक अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है। फिर भी, हमने प्रयास किया है कि विद्यार्थियों को समुचित पक्षों की विस्तृत जानकारी हो जाए।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
गोल्ड थोर्प, जे.एच (1967), सोशल स्ट्रेटिफिकेशन इन इंडस्ट्रियल सोसाइटी, इन बैन्डिक्स -एंड लिपसेट, प्रकाशक, क्लास, स्टेट्स एण्ड पॉवर, लंदन, रोटलेज एंड केगन पॉल।
लिपसेट, सीमोर एंड बैन्डिक्स, रीनहार्ड (1959), सोशल मोबिलिटी इन इंडस्ट्रियल सोसाइटी, बरेकली, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया प्रेस।

सामाजिक गतिशीलता के घटक एवं शक्तियाँ
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
जनसांख्यिकीय घटक
प्रतिभा एवं योग्यता
कुलीन सिद्धांत
सामाजिक वातावरण में परिर्वतन
औद्योगीकरण एवं गतिशीलता
उपलब्ध रिक्त स्थान
कानूनी प्रतिबंध
पद और स्थिति
समरूप परिकल्पना
अधोमुखी गतिशीलता
गतिशीलता के अवरोधक
मार्क्सवादी विचारधारा
व्यक्तिपरक घटक
सामाजिक गतिशीलता एवं सामाजिक परिवर्तन
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आप:
ऽ गतिशीलता को प्रभावित करने वाले घटकों को समझ सकेंगे, और
ऽ इसपर आप अपने विभिन्न विचार प्रस्तुत कर सकेंगे।