संरचनात्मक पतन और असंगतियाँ क्या है | समाज की संरचनात्मक पतन किसे कहते है structure decline of society

By   December 31, 2020

structure decline of society in hindi Societal collapse meaning definition संरचनात्मक पतन और असंगतियाँ क्या है | समाज की संरचनात्मक पतन किसे कहते है ?

संरचनात्मक पतन और असंगतियाँ
निम्नलिखित दो अवधारणाएँ संरचनात्मक रूपांतरण और सामाजिक समस्याओं के बीच में संबंधों को समझने में सहायक होंगी:
ऽ संरचनात्मक विगठन, और
ऽ संरचनात्मक असंगतियाँ।

संरचनात्मक विगठन की अवधारणा का प्रयोग टालकॉट पारसन्स द्वारा किया गया है। उनके अनुसार इसका अभिप्राय प्रणाली जन्य ऐसी कठोरता से है जो सामाजिक रूपांतरण का प्रतिरोध करने या उसमें बाधा डालने का प्रयास करती है। इससे प्रणाली विगठन उत्पन्न होता है। तीसरी दुनिया के देशों में स्वातंत्र्योत्तर काल में आधुनिकीकरण के प्रति बढ़ती हुई ललक रही है। इन देशों ने अर्थव्यवस्था, औद्योगीकरण, आधुनिकी प्रविधि, साक्षरता और विवेकशीलता, नागरिक संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संरचनात्मक आधार के बिना ही संसदीय लोकतंत्र, वयस्क मताधिकार, आधुनिक संविधान की अवधारणाओं को पश्चिम से उधार लेकर अपनाया। परिणामस्वरूप उन देशों में लोकतंत्र सफल न हो सका जो पहले उपनिवेश रहे चुके थे। नृजातीय, सांप्रदायिक, जनजातीय, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ इन देशों में इतनी शक्तिशाली हो चुकी हैं कि वे लोकतंत्र, आधुनिक राष्ट्र राज्य और नागरिक समाज की आधारभूत संरचना का भी क्षरण कर रही हैं। ऐसा भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और अफ्रीका के अन्य देशों में स्पष्ट रूप से
दृष्टिगत हो रहा है। भारतीय समाज में सामाजिक रूपांतरण का प्रभाव निम्नलिखित रूप में दिखाई देता है:
ऽ एक ओर तो रूपांतरण के तीन प्रतिमानों ने सामंजस्य की नई समस्याएँ पैदा की हैं जिनकी चर्चा पहले की जा चुकी है।
ऽ वहीं दूसरी ओर समय-समय पर सामाजिक रूपांतरण की प्रक्रिया का प्रतिरोध भी हुआ है। इस संदर्भ में हम अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की अर्ध सामाजिक गतिशीलता की आकांक्षा के प्रतिरोध, महिलाओं के अधिकार के समुचित दावों की अस्वीकृति एवं सही अथवा गलत किसी तरह से भी भूमि सुधार के कार्य में बाधा उत्पन्न करने के उदाहरण दे सकते हैं।

भारतीय संदर्भ में संरचनात्मक असंगतियाँ भी दिखाई देती हैं। ये सामाजिक विघटन और सामाजिक समस्याओं के लक्षण और कारण दोनों हैं। असंगतियों का अर्थ यह है कि एक ही संरचना के अंतर्गत दो विपरीत उप संरचनाओं का होना, जो कि एक दूसरे के संगत न हों। एक ओर तो भारत में अतिपरिष्कृत और आधुनिक महानगरीय उच्च तथा उच्च मध्यम वर्ग हैं जो उपभोक्तावाद से प्रभावित है। दूसरी ओर, भारत में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। जहाँ आसानी से पहुँचा भी नहीं जा सकता और जिन्होंने रेलगाड़ी तक भी नहीं देखी होगी। भारतीय समाज का एक छोटा वर्ग जेट युग में रहता है जबकि भारत की एक बड़ी जनसंख्या आज भी बैलगाड़ी पर निर्भर है। यह स्थिति धनी और निर्धन, ग्रामीण और नगरीय लोगों के बीच अंतर होने का स्पष्ट सूचक है जिससे विभिन्न समूहों और स्तरों के बीच खाई पैदा होती है। ये संरचनात्मक असंगतियाँ भारतीय समाज में विद्यमान गरीबी, असमानता, दुर्गमता तथा वंचकता की सूचक हैं।

 सामाजिक कारक और सामाजिक समस्याएँ
सामाजिक समस्या एक ऐसी स्थिति है जो किसी समाज विशेष में वस्तुपरक रूप में विद्यमान रहती है और वह समाज आंतरिक रूप से उस समस्या को वांछनीय मानता है। अतः सामाजिक समस्या समाज सापेक्ष है या उसका एक सामाजिक संदर्भ होता है। इसलिए सामाजिक समस्याओं के अध्ययन के लिए उनके सामाजिक संदर्भो को समझना अपेक्षित है।

सामाजिक संदर्भ पर चर्चा ऐतिहासिक या संरचनात्मक परिप्रेक्ष्य में की जा सकती है। इससे पहले हमने यह स्पष्ट किया है कि भारत में विभिन्न ऐतिहासिक अवस्थाओं में किस प्रकार से विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। अब हम विभिन्न समस्याओं से जुड़े प्रमुख सामाजिक कारकों को समझने का प्रयास करेंगे।

 प्रमुख सामाजिक कारक
भारत की सामाजिक समस्याओं – भारतीय समाज में उनके उत्पन्न होने तथा बने रहने के अध्ययन के लिए भारत की उन सामाजिक स्थितियों को समझना अपेक्षित है जिनमें उन समस्याओं का अस्तित्व बना रहता है। जहाँ तक सामाजिक समस्याओं का संबंध है, भारत में सामाजिक संदर्भ के अंग बनने वाले कुछ प्रमुख कारक निम्न प्रकार हैं:
ऽ भारतीय जनसंख्या की विजातियाँ,
ऽ सांस्कृतिक तत्व,
ऽ अर्थव्यवस्था, निर्धनता और शिक्षा,
ऽ राज्य और राजनीतिक व्यवस्थाए
ऽ नगरीकरण और औद्योगीकरण।

सामाजिक रूपांतरण और सामाजिक समस्याएँ
हम इस पाठ्यक्रम की इकाई 1 में सामाजिक रूपांतरण और सामाजिक समस्याओं के बीच सैद्धांतिक संबंधों पर चर्चा कर चुके हैं। इस इकाई में, इस संबंध को भारत के विशेष संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया है।

इस संदर्भ में सामाजिक रूपांतरण और उनका सामाजिक समस्याओं से संबंधों के निम्नलिखित पहलुओं को ध्यान में रखना होगा:

ऽ ऐतिहासिक, और
ऽ सरंचनात्मक।

सामाजिक रूपांतरण और उसका सामाजिक समस्याओं के संबंधों के इतिहासगत बोध को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है:
ऽ विभिन्न ऐतिहासिक कालों अर्थात प्राचीन, मध्ययुगीन और आधुनिक (19वीं शताब्दी तक) काल के माध्यम से सामाजिक समस्याओं की समझ,
ऽ समकालीन सामाजिक समस्याएँ।

 सामाजिक समस्याएँ: ऐतिहासिक चरण
भारतीय समाज एक प्राचीन सभ्यता का अंग होने के कारण, विभिन्न ऐतिहासिक कालों से होकर गुजरा है। भारत में वैदिक काल ने भारत में एक ऐसी सभ्यता का बीज बोया जिसकी विशेषता अत्यंत समुन्नत दर्शन, ज्योतिष विज्ञान और औषधि विज्ञान हैं। इसका संस्थागत आधार वर्णाश्रम और जाति, धार्मिक अनुष्ठानों पर जोर, अनुष्ठानकर्ताओं की अन्य लोगों की तुलना में उच्च स्थिति तथा पशुओं की बलि चढ़ाने के इर्द-गिर्द केंद्रित था। भारतीय सभ्यता के आरंभिक चरण में प्रमुख सामाजिक समस्याएँ निम्नलिखित थीं:
ऽ दो प्रमुख सामाजिक समूहों अर्थात आर्य और दास अथवा दस्यु के बीच पारस्परिक संघर्ष जैसा कि वैदिक ग्रंथों में वर्णित है।
ऽ सामाजिक वर्गीकरण के पालन पर जोर।
ऽ अनुष्ठान सम्पन्न करने पर बल ।
ऽ पशुओं की बलि चढ़ाना।

जैन धर्म और बौद्ध धर्म इन प्रथाओं के विरोध में उभरे थे। यह ध्यान देने योग्य बात है कि वैदिक और उत्तर वैदिक युग में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति काफी ऊँची थी। इस युग में बाल विवाह आमतौर पर नहीं होते थे।

भारत का इस्लाम से संपर्क संघर्ष, क्रमिक अभियोजन, बढ़ता समन्वय और सांप्रदायिक वैमनस्य की पुनरावृत्ति के विभिन्न चरणों से होकर गुजरा है। मुस्लिम शासन के अभ्युदय के साथ भारत में दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती हैं:

प) पहली प्रवृत्ति बढ़ती हुई अंतर्मुखनिता तथा अन्य लोगों के प्रति दूरी बनाए रखने की थी।

इससे शुचिता और प्रदूषण की धारणा तथा छुआछूत की प्रथा को बल मिला। इस युग में समुद्र यात्रा पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए। फलस्वरूप भारतीयों में सर्वप्रथम तो उद्यम तथा साहसिक कार्य की भावना में कमी आई। द्वितीय स्तर पर बाहरी विश्व के साथ भारतीयों का संपर्क भी कम हुआ।

पपद्ध आक्रमणों और संघर्षों के प्रारंभिक चरण में हिंदुओं में सती प्रथा और बाल विवाह की शुरुआत एक प्रकार से आत्म सुरक्षात्मक विधि के रूप में हुई। मुस्लिम जनसंख्या का केवल थोड़ा-सा भाग अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की और अरब देशों से भारत में आप्रवासित हुआ था। शेष वे स्थानीय लोग थे जिन्होंने इस्लाम को स्वीकार कर लिया। हिंदुओं के संपर्क में आने तथा धर्म परिवर्तन के कारण भारत में मुसलमानों पर जाति प्रथा का प्रभाव पड़ा। इस प्रकार सामाजिक ऊंच-नीच विभाजन भारत के मुसलमानों में भी शुरू हो गया।

पपप) दूसरे प्रकार की प्रवृत्ति अभिजनों तथा ऊँची जाति के हिंदुओं के एक वर्ग द्वारा मुसलमान शासकों के रीति-रिवाजों का अनुकरण के रूप में दिखाई पड़ती है। इसे उत्तर भारत में ऊँची जाति की महिलाओं में परदा प्रथा को प्रोत्साहन मिला।

मध्ययुग में भक्ति आंदोलन ने समता का संदेश देकर तथा धार्मिक कर्मकाण्डों, जाति प्रथा एवं छुआछूत के विरुद्ध आवाज उठाकर भारतीय सभ्यता के मानवतावादी तत्वों को फिर से बलशाली किया। छुआछूत, बाल विवाह, सती प्रथा और शिशु हत्या, संगठित रूप से ठगी जैसी प्रथाओं में भारतीय समाज में विशेषकर मुगल साम्राज्य के पतनोन्मुख काल में भरपूर वृद्धि हुई। धार्मिक विश्वासों ने भी तंबाकू, गांजा और अफीम के नशे को भारत के कुछ हिस्सों और वर्गों में प्रोत्साहित किया।

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल तक भारत में औपनिवेशिक शासन पूर्णतः स्थापित हो चुका था। 1820 के बाद इस शासन ने सुधारवादी रुख अपनाया। इस अवधि में बड़े पैमाने पर प्रचलित सती और ठगी प्रथाओं के उन्मूलन के लिए अनेक सामाजिक सुधार कार्यक्रम तैयार किए।

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में सती, विधवा विवाह, आधुनिक शिक्षा का प्रसार, बाल विवाह तथा छुआछूत की बुराइयों जैसी सामाजिक समस्याओं से संबंधित प्रश्न समाज सुधारकों द्वारा उठाए गए।

उन्नीसवीं शताब्दी में चार प्रमुख सुधार आंदोलन चलाए गए।
ऽ राजा राममोहन राय के नेतृत्व में चलाया गया ब्रह्म समाज,
ऽ स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा प्रतिपादित आर्य समाज,
ऽ महादेव गोविंद रानाडे द्वारा चलाया गया प्रार्थना समाज,
ऽ रामकृष्ण परमहंस की प्रेरणा से स्वामी विवेकानंद द्वारा चलाया गया रामकृष्ण मिशन।

इन सुधार आंदोलनों ने छुआछूत, सती, शिशु हत्या जैसी प्रथाओं का विरोध किया तथा विधवा पुनर्विवाह और आधुनिक शिक्षा का प्रचार किया। राजा राममोहन राय के अथक प्रयासों से सती प्रथा को सन् 1829 में कानूनी तौर पर समाप्त कर दिया गया। आर्य समाज ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाति प्रथा की कठोरता को कमजोर करने तथा छुआछूत की प्रथा को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्रार्थना समाज के कार्यकलाप मुख्यतया बंबई प्रेसीडेंसी तक ही सीमित थे। रामकृष्ण मिशन ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया।

सामाजिक समस्याएँ: समकालीन चरण
आज के भारत की सामाजिक समस्याएं हैं। हालांकि इन्हें सामाजिक समस्याएं कहा जाता है परन्तु कुछ समस्याएं सामाजिक सांस्कृतिक हैं तो कुछ आर्थिक और वैधानिक। इसलिए समकालीन सामाजिक समस्याओं को निम्नलिखित कोटियों में विभाजित किया जा सकता है:

प) सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएः साम्प्रदायिकता, अस्पृश्यता जनसंख्या विस्फोट,बाल शोषण, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग, महिलाएं, यद्यपान और नशापान की समस्याएं।
पप) आर्थिक समस्याएः गरीबी, बेरोजगारी, काला धन ।
पपप) वैधानिक समस्याएंः अनाचार, हिंसा और आतंकवाद ।

यह वर्गीकरण केवल समझाने की सुविधा के लिए किया गया है। ये सब एक दूसरे से गहरे रूप में जुड़े हुए हैं। गरीबी आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक समस्या भी है। इसी प्रकार समुदायवाद का भी आर्थिक कारकों से गहरा रिश्ता है। अपराध और अनाचार वैधानिक मामले हैं परंतु ये सामाजिक और आर्थिक कारकों से भी जुड़े हैं।

भारतीय समाज में पहले भी विलिना चरणों में सामाजिक समस्याओं के खिलाफ सामाजिक आंदोलन आयोजित किए जाते रहे हैं। इसी प्रकार आज भी समुदायवाद, जातिवाद, छुआछूत, निरक्षरता मद्यपान और नशापान के खिलाफ सामाजिक और आर्थिक आंदोलन चलाए जा रहे हैं। 1919 में गांधी जी राष्ट्रीय आंदोलन के नेता बनकर उभरे। उन्होंने हरिजनों आदिवासियों और महिलाओं को ऊपर उठाने के लिए रचनात्मक कार्यक्रम बनाया। उन्होंने शिका और ग्रामीण उद्योग को भी पुनर्संगठित करने का प्रयास किया। उन्होंने समुदायवाद छुआछूत और मद्यपान के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

समकालीन युग में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़ी जातियों और मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन चलाए गए। पर्यावरण हास, नशे की लत और भारत में बच्चों के शोषण के खिलाफ कई स्वयंसेवी संस्थाएं काम कर रही हैं।

 संरचनात्मक रूपांतरण और सामाजिक समस्याएँ
संरचनात्मक रूपांतरण के संदर्भ में भारतीय सामाजिक समस्याओं को समझने के कतिपय प्रयास किए गए हैं। भारतीय संदर्भ में रूपांतरण के तीन रूप उपलब्ध हैं।
ऽ संस्कृतिकरण,
ऽ पश्चिमीकरण, और
ऽ आधुनिकीकरण।
संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें निम्न जातियां उच्च जातियों के अनुष्ठानों और रीति रिवाज का अनुकरण कर या फिर रोमांचक ढंग से समाज के ऊपरी पायदान पर पहुँच जाते हैं। यह एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है परन्तु सामाजिक हैसियत और पेशे में संस्कृतिकरण के कारण आया उच्च स्तरीय बदलाव भी एक संरचनात्मक प्रक्रिया है।

पश्चिम और खासतौर पर इंगलैंड के सम्पर्क में आने पर भारत में रूपांतरण की रेल चल पड़ी जिसे पश्चिमीकरण के नाम से जाना जाता है। इसमें प्रशासन कानून और शिक्षा पर पश्चिम और अंग्रेजी भाषा का प्रभाव स्पष्ट है। पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव में शिक्षित और शहरी भारतवासियों के एक बड़े हिस्से में खानपान, पहनावा, बोली और आदतों को पश्चिम शैली में ढाल लिया। पश्चिम के अनुकरण से पश्चिमी लोकतंत्र के मूल्य औद्योगिकरण और पूंजीवाद का समावेश हुआ। पश्चिमीकरण का सांस्कृतिक के साथ-साथ संरचनात्मक आयाम भी है। औपनिवेशिक प्रशासन के तहत शहरी केन्द्रों का उदय हुआ। आधुनिक शिक्षा अर्थव्यवस्था के उद्योग से रोजगार जुड़े तथा शिक्षा प्रशासन, न्यायपालिका और प्रेस के प्रभाव से शहरी मध्यवर्ग का उदय हुआ। ये सब संरचनात्मक परिवर्तन थे। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं भारतीय संदर्भ में आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण का गहरा आपसी रिश्ता है। औपनिवेशिक प्रशासन में शिक्षा राजनीतिक भागीदारी, शहरीकरण, देशांतरण, गत्यात्मकता, मुद्रा, बाजार, आधुनिक प्रौद्योगिकी, संचार के माध्यम और औद्योगिकरण जैसे आधुनिकीकरण को प्रमुख घटकों को मुहैया करवाया। आजादी के बाद इनमें और भी तेजी आई। आजाद भारत ने आधुनिक संविधान अपनाया। धर्म निपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की और नियोजित सामाजिक-आर्थिक विकास की नीति अपनाई, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण किया और गरीब तबकों के लिए संरक्षणात्मक भेदभाव की नीति अपनाई।

असल सवाल यह है कि भारत में इन संरचनात्मक रूपांतरणों से किस प्रकार की सामाजिक समस्याएं पैदा हुई? भारतीय समाज में अन्तर्विरोधों के बावजूद माक्र्स द्वारा परिभाषित और इकाई 1 में व्याख्याति क्रांति भारत में नहीं हुई। संस्कृतिकरण, पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण के रूप में रूपांतरण की यह प्रक्रिया कमोबेश भारतीय संदर्भ में बना किसी रूकावट के धीरे-धीरे होता चला गया।