पाठ योजना के हर्बर्ट पांच चरणों , पाठ योजना के चरण क्या हैं ? steps of lesson plan in hindi

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steps of lesson plan in hindi पाठ योजना के हर्बर्ट पांच चरणों , पाठ योजना के चरण क्या हैं ?

टिप्पणी लिखिये-पाठ योजना के सोपान।
Write short note on Steps of Lesson Plan.
उत्तर- पाट-योजना के सोपान-जे. एफ. हरबर्ट ने पाठ योजना के कुछ सोपान बताये हैं जिन्हें ‘हरबर्ट की पंच-पद प्रणाली‘ के नाम से जाना जाता है। ये निम्नलिखित हैं-
1. तैयारी (Preparation)- इसमें अध्यापक नवीन ज्ञान देने के लिए भूमिका बनाता है। वह अपने छात्रों को इस प्रकार से उत्तेजित करता है कि वे नया ज्ञान सीखने का आवश्यकता का अनुभव करें। यह कार्य उनके पूर्व ज्ञान सम्बन्धी प्रश्नों का मूल्यांकन करके, मौखिक प्रश्न पूछकर, कहानियों के माध्यम से अथवा चास मॉडल, पिक्चर्स आदि का योग करके किया जा सकता है । प्रस्तावना आकर्षक ढंग से प्रस्तुत की जाती है ताकि छात्रों की पाठ में रुचि शीघ्रता से जाग्रत की जा सके।
2. प्रस्तुतीकरण (Presention)- इस पद के अन्तर्गत ही छात्रों को नवीन ज्ञान दिया जाता है। इसमें छात्र तथ्यों का अवलोकन एवं निरीक्षण करता है. साथ ही तथ्यों के बीच सम्बन्ध भी स्थापित करता है। इन सम्बन्धों के आधार पर वह सामान्य नियम, सूत्र एवं निष्कर्ष निकालता है।
प्रश्नों के पूछने में अध्यापक को प्रश्नों की उपयुक्तता, छात्रों का मानसिक स्तर, प्रश्नों की सरल एवं स्पष्ट भाषा तथा प्रश्नों का समान वितरण (Evenly distributed) आदि बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। समय-समय पर सहायक सामग्री का प्रयोग करते जाना चाहिए। श्यामपट्ट सारांश (Black&Board Summary) भी साथ-साथ लिखा जाता है।
3. तुलना (Comparison)- छात्र जो भी ज्ञान प्राप्त करते हैं वे उस ज्ञान की सत्यता की परख प्राप्त करने को समान परिस्थितियों में रखकर करते हैं। इससे नवीन ज्ञान स्थायी अंग बन जाता है।
4. सामान्यीकरण (Generalçation) – सामान्यीकरण की इस प्रक्रिया में छात्रों का सक्रिय सहयोग प्राप्त करते हुए किसी सूत्र, नियम अथवा सिद्धान्त की स्थापना की जाती है। सामान्यीकरण का प्रयोग उन पाठों में किया जाता है जिसमें आगमन एवं निगमन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जैसे किसी सूत्र की स्थापना करना।
5. अनुप्रयोग (Application)- पढ़ाये गये पाठ को स्थायी अंग बनाने के लिए ‘सीखने का हस्तान्तरण‘ (Transfer of Training) करने के लिए प्रस्तुतीकरण के पश्चात अनुप्रयोग के लिए अभ्यासार्थ कक्षा-कार्य देना चाहिए। उसे विद्यार्थियों के सही कार्यों की प्रशंसा करनी चाहिए। ऐसा करने से उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा तथा उनमें स्पर्धा की भावना पैदा होगी और वे जीवन की वास्तविक समस्याओं के हल में वैज्ञानिक ज्ञान का प्रयोग कर सकेंगे।
अध्यापक को विद्यार्थियों की गलतियाँ भी ध्यान से देखनी चाहिये। यथासम्भव छोटी-छोटी गलतियाँ को विद्यार्थी के पास जाकर तथा बड़ी गलतियों को श्यामपट्ट पर हल करके बतलाना चाहिये।
6. संक्षिप्त पूर्व विवरण देना (Recapitulation)- ये पाठ-योजना का अन्तिम सोपान है। इसके माध्यम से अध्यापक को यह जानने में सहायता मिलती है कि उसके छात्रों ने क्या सीखा है, उनके बौद्धिक स्तर में कहाँ तक विकास हुआ है तथा छात्रों में अपेक्षित (वांछित) व्यवहारिक सुधारों को लाने में कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई है । इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षण की सफलता का पता लगाना है। प्रकरण की मुख्य-मुख्य बातें संक्षेप में प्रश्न पूछ कर दोहरायी जाती है।
प्रश्न 8. रसायन शिक्षक के सामान्य व विशेष गुणों के बारे में उल्लेख कीजिये? रसायन विज्ञान शिक्षक के क्या कर्तव्य होते हैं, स्पष्ट कीजिये।
Explain Normal and Specific qualities of chemistry teacher ?k~ What are duties of a Chemistry teacher.
उत्तर-प्रत्येक विषय में अध्यापक का बहुत महत्व है रसायन विज्ञान में तो यह स्थान और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसे छात्रों को विषय का ज्ञान देने के अलावा निम्न कार्य भी करने होते हैं-
1. रसायन विज्ञान शिक्षण द्वारा सोचने समझने, निरीक्षण, विश्लेषण, तर्क-नियतांक आदि का विकास करना।
2. छात्रों में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, निष्पक्षता आदि का विकास करना।
3. छात्रों में निर्णय लेने की क्षमता, अनुसंधान की प्रवृत्ति विकसित करना ।
4. छात्रों में स्वयं कार्य करने, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना।
उपरोक्त गुणों के विकास हेतु रसायन अध्यापक में निम्न सामान्य गुणों का आवश्यक है-
रसायन विज्ञान अध्यापक के सामान्य गुण
(1) प्रभावशील व्यक्तित्व-शिक्षक को मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होने चाहिये। उनके विचार, बातचीत का ढंग, रहन-सहन, व्यवहार इत्यादि छात्रों के लिए आदर्श होने चाहिये, जिससे उसका प्रभाव छात्रों पर अच्छा पढ़ सके।
(2) आत्मविश्वासी-अध्यापक को अपनी शक्तियों व योग्यताओं पर पूरा-पूरा विश्वास होना चाहिये। जिसका विचार विचलित होता है वह चाहे कितना ही विद्वान क्यों ना हो. छात्रों को ठीक प्रकार से ज्ञान नहीं दे सकता। अतः अध्यापक को आत्मविश्वासी होना चाहिये।
(3) नेतृत्व की क्षमता-छात्रों को सही ढंग से कार्य करने की आदत डालने व उचित ढंग से व्यवहार प्रदर्शन करने आदि में शिक्षक बहुत अच्छी भूमिका अदा करता है। अध्यापक ही छात्रों का नायक होता है।
(4) कार्य के प्रति लगाव-अध्यापक को अपने विषय व अध्यापन में पूर्ण रुचि होनी चाहिये। छात्रों के साथ मित्र, हितैषी, पथ-प्रदर्शक का उत्तरदायित्व ठीक प्रकार से निभाना चाहिये।
(5) सहनशीलता-अध्यापक के अन्दर इस गुण का होना अति आवश्यक है। छात्रों को ठीक प्रकार से उत्तर न देने पर अथवा एक या दो बार समझाने के बाद अध्यापक अपना संयम खो देते हैं और छात्र को डरा, धमका कर बैठा देते हैं जिससे वह छात्र उस अध्यापक के साथ उसके विषय से भी घृणा करने लगता है।
उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त भी उनमें बहुत से गुण जैसे विनोदप्रियता का होना लाने से प्रेम करना, आशावादी दृष्टिकोण उत्पन्न करना आदि होने चाहिये। यदि इन सभी से वह परिपूर्ण है तो निःसन्देह वह एक कुशल अध्यापक होगा तथा छात्रों के बीच लोक होगा।
(6) विनोदप्रिय-रसायन विज्ञान कोई नीरस विषय नहीं है। अध्यापक को स्वभाव का होना चाहिये। प्रायः देखा जाता है कि छात्र अध्यापक से डरे-डरे रहते हैं और कोई कठिनाई पूछने में संकोच करते हैं। छात्रों को यह लगना चाहिये कि अध्यापक उनकी समस्या या कठिनाई का निवारण बिना डांटे कर देंगे तभी रसायन शिक्षक का सही औचि होगा।
रसायन विज्ञान अध्यापक के विशेष गुण
1. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण-अध्यापक मनोविज्ञान का अच्छा ज्ञाता होना चाहिये, जिससे वह छात्रों की रुचियों, भावनाओं व विचारों का अध्ययन कर सके। गणित को बाल केन्द्रित शिक्षा बनाने के लिए यह अति आवश्यक है।
2. अपने विषय का पंडित-रसायन विज्ञान अध्यापक को अपने विषय की गहराई, बारीकी, कठिनाई इत्यादि की पूरी जानकारी होनी चाहिये क्योंकि पढ़ाते समय विभिन्न भागों में विभिन्न नियमों, सिद्धान्तों का प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ती है। अतः उसे पूर्ण सफलता के न इन सभी बातों का पूर्ण ज्ञान लिये होना चाहिये।
3. प्रयोग करने की योग्यता-रसायन विज्ञान अध्यापक में प्रयोग करने की योग्यता अवश्य होना चाहिये, क्योंकि रसायन शिक्षण में प्रयोग का महत्वपूर्ण स्थान है । प्रयोगशाला में जहां तक सम्भव हो, उसे प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करने चाहिये।
4. अध्यापन कार्य में रुचि-प्रायः देखा गया है कि जब नवयुवकों को कहीं नौकरी नहीं प्राप्त होती है तब वे अध्यापन व्यवसाय को अपनाते हैं। इस प्रकार के अध्यापक रसायन विज्ञान का अध्यापन अत्यन्त अरुचि से करते हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक से पढ़ाना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। अतः यह आवश्यक है कि रसायन का अध्यापक अध्यापन-कार्य में भी रुचि ले। वह जब कक्षा में प्रवेश करे तो अपने अन्दर हीनता और उदासीनता की भावना न आने दे । यदि वह अध्यापन में रुचि प्रदर्शित करेगा तो कक्षा में शिक्षण का स्तर तो उठेगा ही साथ ही छात्र भी रुचि लेने लगेंगे।
5. शिक्षण कला का ज्ञाता-रसायन का पंडित होने पर भी यदि वह शिक्षण को कला से अनभिज्ञ है तो वह छात्रों को उस विषय का ज्ञान तो प्रदान कर सकता है परन्तु न तो बालकों में वांछित गुणों का विकास हो सकेगा और ना ही वे प्रशिक्षित हो सकेगें। अतः उसे शिक्षण-कला का ज्ञाता भी होना आवश्यक है।
6. निष्पक्ष दृष्टिकोण-अध्यापक का सभी बालकों के प्रति पक्षपात और द्वेष रहित समान व्यवहार होना चाहिये। उसे किसी के बारे में पूर्व धारणा नहीं बना लेनी चाहिये । बालकों की परीक्षा लेते समय उसे पूर्ण न्यायाधीश होना चाहिये।
7. प्रयोगशाला संचालन की योग्यता-रसायन अध्यापक में प्रयोगशाला के संचालन की विशेष योग्यता होनी चाहिये। वह विभिन्न यंत्रों का प्रयोग करना भली-भांति जानता हो तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें ठीक भी कर लेता हो। इसी प्रकार उसे प्रयोगशाला विधि का भी ज्ञान होना चाहिये।
8. स्पष्टवादिता-यह सबसे महत्वपूर्ण गुण होता है। अपनी अज्ञानता, अपूर्ण तैयारी या कमजोरी को छिपाना नहीं चाहिये। अक्सर यह देखा जाता है कि शिक्षक पढ़ाते समय कुछ भूल जाता है । अतः छात्रों से यह बात नहीं छुपानी चाहिये और उन्हें स्पष्ट कह देना चाहिये कि यह बिन्दु हम आपको कल बतायेंगे इससे छात्र में विश्वास बढ़ता है।
9. परिश्रमी व उत्साही-एक योग्य रसायन अध्यापक अपना कार्य अत्यन्त उत्साह के साथ करता है। इसके विपरीत निरुत्साही अध्यापक का प्रत्येक कार्य अपूर्ण तथा आगे के लिये पड़ा रहता है। वास्तव में वही शिक्षक सफल हो सकता है जो अपने अन्दर उत्साह का अनुभव करता है। इसके लिए एक विद्वान का मत है कि “रसायन विज्ञान का पूर्ण पण्डित और अध्ययन-विषयों का पूर्ण ज्ञान होने पर भी कोई अध्यापक रसायन-शिक्षण में तब कर सफलता प्राप्त नहीं कर सकता जब तक उसमें अपने विषय के लिये पूरा-पूरा उत्साह न हो। रसायन-शिक्षण के लिये अपूर्व उत्साह, लगन और वैज्ञानिक अभिवृत्ति की जरूरत होती है। रसायन शिक्षक यदि अपने छात्रों में रसायन में रुचि, अन्वेषण कार्य में जोश और निष्पक्ष भाव के निष्कर्षों पर पहुंचने की क्षमता का विकास करना चाहता है तो उसमें भी इसी प्रकार की रुचि, जोश और क्षमता का होना जरूरी है।
10. अन्य विषयों का ज्ञान-रसायन अध्यापक को अपने विषय का ज्ञान तो होना ही चाहिये साथ ही उसे दूसरे विषयों का भी ज्ञान होना चाहिये। यदि विभिन्न विषयों का उसे सामान्य ज्ञान होगा तो वह रसायन विज्ञान का अन्य विषयों के साथ समन्वय करके अपने शिक्षण को प्रभावशाली बना लेगा। गणित के ज्ञान बिना वह रसायन की विभिन्न समस्याओं को हल नहीं कर सकेगा। एक विद्वान के मतानुसार, “अपने विषय का ज्ञान होने के अतिरिक्त उसको दूसरे विषयों का ज्ञान होना भी आवश्यक है। दूसरे विषयों की सहायता से अपने विषय को सरल बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिये यदि रसायन में आयतन पढ़ाना पड़ता है तब उसके प्रश्न गणित की सहायता से हल हो सकते हैं। इसलिए यदि उसको गणित का ज्ञान नहीं होगा तो वह अधिक कुछ नहीं पढ़ा सकेगा।