सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था क्या है भारत में  सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था की परिभाषा किसे कहते है Service oriented economy in hindi

By   November 28, 2020

Service oriented economy in hindi सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था क्या है ? भारत में  सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था की परिभाषा किसे कहते है ?

सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था
भारतीय समाज का वर्गीय ढांचा अपनी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था से अब औद्योगिक और विशेषकर सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इससे हमारे समाज में जाति और वर्गीय ढांचे के बीच मौजूदा गठजोड़ के लिए बड़े ही महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय परिणाम निकलेंगे। नई अर्थव्यवस्थाओं के बढ़ते आवेग के फलस्वरूप नगरीकरण में भारी तेजी आएगी और विभिन्न प्रदेशों और सामुदायों के बीच पलायन भी तेज होगा। इन सबके फलस्वरूप जाति पर आधारित राजनीतिक लामबंदी की जगह राजनीतिक और सामाजिक शक्ति को सामाजिक ढांचे में मिलने वाले स्थान के नए सिद्धांतों का सूत्रपात होगा। इस स्थिति में जाति-समूहों से अधिक महत्व वर्ग और जातीयता को मिलेगी। सामाजिक-नृविज्ञानियों ने हमारे समाज में जाति संजातीकरण की तेज होती प्रक्रिया को भांप लिया है।

क्रम-परंपरा के सिद्धांत
जाति भी सामाजिक स्तरीकरण में क्रम-परंपरा के सिद्धांत को प्रतिबिंबित करती है। फ्रांस के सामाजिक नृविज्ञानी लुई ड्यूमोंट भारतीय सामाजिक संरचना को इसकी अनूठी वर्ण संस्था के मद्देनजर पाश्चात्य सामाजिक संरचना से एकदम विपरीत रखकर देखते हैं। इसका एक कारण यह है कि जाति की यह अनूठी संस्था संरचनात्मक और सभ्यता दोनों दृष्टि से क्रम-परंपरा के सिद्धांत को प्रतिबिंबित करती है जो कि पश्चिमी समाज के समानता के सिद्धांत के एकदम विपरीत है। ड्यूमोंट क्रम-परंपरा को एक सामाजिक व्यवस्था की विशेषता के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसमें मानकीय सिद्धांत समाज के मामलों में नैमित्तिक (साधनपरक) या उपयोगितावादी सिद्धांतों को संचालित या निर्धारित करते हैं। वह इसे परिवेष्टित और परिवेष्टनकारी कहते हैं। यानी उनके अनुसार यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा परंपरागत रूप से मान्य मूल्य और विश्वास तर्कसंगत उपयोगितावादी सिद्धांतों को परिवेष्टित करते हैं या उन्हें लेकर चलते हैं। दूसरे शब्दों में क्रम-परंपरा की व्यवस्था में समाज के आदर्श मानकों को आर्थिक, राजनीतिक और अन्य कारक तय नहीं करते। बल्कि इन्हें तय करने वाले कारक इनसे बिल्कुल भिन्न होते हैं। इसलिए ड्यूमोंट के अनुसार वर्ण व्यवस्था में प्रचलित अशुद्धि-शुद्धि की धारणाओं को हम पाश्चात्य जगत् के धर्मनिरपेक्ष मानकों की कसौटी पर नहीं कस सकते क्योंकि ये मानक ऐसी सभ्यता से जुड़े हैं, जिनका ताना-बाना बिल्कुल ही भिन्न है।

ड्यूमोंट की क्रम-परंपरा के रूप में जाति की व्याख्या पर भारत में ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में एक बहस छिड़ी। जातियों के स्तरीकरण और उसके स्थायीकरण में आर्थिक और राजनीतिक कारकों की भूमिका की अनदेखी करने के लिए उनकी आलोचना हुई। लेकिन जैसाकि देखने में आ रहा है कि आज जिस प्रकार जाति सफलतापूर्वक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक आधुनिकीकरण की मांगों के अनुसार ढल रही हैं, और जिस प्रकार बड़े आर्थिक और राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसको ज्यादा से ज्यादा संगठित किया जा रहा है उससे यही प्रतीत होता है कि क्रम-परंपरा के सिद्धांत में इसने अपने अधिकांश पारंपरिक विशेषताओं को खो दिया है।

भारतीय समाज का ढांचा
भारत के सामाजिक ढांचे में उसकी वर्गीय संरचना और उसकी प्रक्रियाओं का काफी विस्तृत और गहन अध्ययन हुआ है। इस प्रकार के अध्ययन में अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों और नृविज्ञानियों ने योगदान किया है। ऐसे कई अध्ययनों में भारतीय समाज में जाति और वर्ग के बीच घनिष्ठ संबंध को स्थापित करने के प्रयास भी खूब हुए हैं। इस तरह के ज्यादातर अध्ययन अनुभवजन्य प्रेक्षणों पर आधारित हैं और उनका चरित्र क्षेत्रीय है। इसके बावजूद इन अध्ययनों से हमें भारत में वर्गीय संरचना और जाति स्तरीकरण से उसके घनिष्ठ संबंध का पता चलता है।

स्थिति का सार
पारंपरिक रूप से यह देखा गया है कि जाति में एक विशेष लक्षण होता है जिसे ‘स्थिति का सार‘ सिद्धांत कहा गया। आनुष्ठानिक (शुद्धि-अशुद्धि) क्रम-परंपरा में जाति की स्थिति अगर निम्न हो तो आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्थिति तक उस जाति की पहुंच भी उतनी ही निम्न रहती है। ऐसी स्थिति में जाति में एक तरह से वर्ग की विशेषता भी शामिल रहती है मगर उसमें सारी विशेषताएं नहीं होती। परिभाषा के अनसार जाति एक संवत समूह है. इसकी सदस्यता जन्म से मिलती है. इसलिए जाति-स्थिति प्रदत्त होती है। इसे हम आर्थिक या सामाजिक गतिशीलता के द्वारा अर्जित नहीं कर सकते। दूसरी ओर वर्ग एक खुला या विवृत समूह है जिसकी सदस्यता का आधार अर्जन या उपलब्धि की कसौटी है, जो आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक हो सकती है। जाति एक समुदाय भी है, जिसकी गतिशीलता समूह पर आधारित या सामूहिक होती है। इसीलिए अतीत में संस्कृतिकरण के द्वारा अपनी स्थिति को ऊंचा उठाने के प्रयासों में समूचा जाति-समूह शामिल रहता था। जाति के विपरीत वर्ग में ऐसी कोई सामदायिकतावादी विशेषता नहीं होती हालांकि यह साझे हितों के आधार पर सामूहिक-सहचारिता विकसित कर सकता है। इस अर्थ में वर्ग एक हित-समूह है जबकि जाति एक समुदाय है। नए सामाजिक और आर्थिक विकास और जातिगत । सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के सक्रिय होने (जिसमें आरक्षण नीति भी शामिल है) से जाति समूह हित-समूहों में परिवर्तित हो गए हैं । इस हद तक वर्ग के कुछ विशेष-लक्षण भी ऐसे जातिगत संगठनों में शामिल हो गए हैं। खासकर यह बात हम उन अनेक जातिगत संगठनों के बारे में कह सकते हैं जो अंग्रेजी शासन के समय से ही भारत में विद्यमान हैं और स्वतंत्रता के बाद जिनकी संख्या में खूब बढ़ोतरी ही हुई है।

अभ्यास 2
अपने अध्ययन केन्द्र के सहपाठियों के साथ ‘स्थिति का सार‘ सिद्धांत पर चर्चा कीजिए। इस चर्चा में आपको जो जो मुख्य बातें पता चलें उन्हें अपनी नोटबुक में लिख लें।

भारतीय समाज में वर्गीय ढांचा ग्रामीण और शहरी समाजों में एक दूसरे से भिन्न पाया जाता है। समाजशास्त्रियों और सामाजिक नृविज्ञानियों ने ग्रामीण समाज के बारे में जो-जो अध्ययन किए हैं, उनमें ग्रामीण वर्गीय संरचना में मुख्यतः तीन वर्ग पाए गए हैं-जमींदार, किसान और मजदूर वर्ग । गांवों में दस्तकार और अहलकार या वृत्तिमूलक जातियां भी छोटी संख्या में एक अलग आर्थिक हित-समूह के रूप में विद्यमान रहती हैं जिसमें वर्ग के कुछ लक्षण पाए जाते हैं। मार्क्सवादी श्रेणियों के अनुसार अध्ययन करने वाली कैथलीन गॉग और कुछ अन्य समाज-विज्ञानियों ने ग्रामीण वर्गीय ढांचे को इन वर्गों में बांटा हैः बुर्जुवा वर्गः (बड़े जमींदार), छोटा बुर्जुवा वर्ग (मझोले और छोटे जमींदार तथा व्यापारी और दस्तकार) और ग्रामीण सर्वहारा या श्रमिक वर्ग (जिनके पास कोई जमीन नहीं होती और जो दिहाड़ी मजदूरों के रूप में जीवन-यापन करते हैं)।

 मार्क्सवादी विधि और धारणाएं
अर्थशास्त्रियों में भारत के वर्गीय ढांचे के अध्ययन-विश्लेषण के लिए मार्क्सवादी विधि और धारणाओं के प्रयोग का चलन अधिक रहा है। कालांतर में समाजशास्त्रियों ने भी इन्हीं का प्रयोग आरंभ कर दिया। चूंकि सामाजिक विश्लेषण की मार्क्सवादी विधि वर्गीय ढांचे को उत्पादन विधियों, जैसे आदिम, सामंती और पूंजीवादी, के अनुसार बांटती है इसलिए भारत में वर्गीय ढांचे पर जो बहस हुई वह अधिकतर ग्रामीण और औद्योगिक अर्थव्यवस्था में प्रचलित उत्पादन विधियों के बारे में हुई बहसों पर आधारित रही है। ग्रामीण संदर्भ में इस पर काफी बहस हुई है कि क्या ग्रामीण व्यवस्था और उसकी सामाजिक संरचना में सामंती, अर्धसामंतवादी पूर्व-पूंजीवाद या पूंजीवादी लक्षण हैं। ये भेद इस बात पर आधारित हैं कि अध्ययनकर्ता सामंतवादी अर्थव्यवस्था को अपने विश्लेषण का प्रस्थान बिंदु मानकर चलता है या नहीं, जिसमें वह कृषि अर्थव्यवस्था में उसके पूंजीवादी लक्षणों का अध्ययन करता है। मोटे तौर पर इन अध्ययनों से पता चलता है कि गांवों का वर्गीय ढांचा, जहां कृषि अर्थव्यवस्था अभी तक चल रही है, वह तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रहा है। इसका अर्थ यह है कि वस्तुओं या कृषि उत्पादों के रूप में दी और ली जाने मजदूरी की जगह अब नकद मजदूरी ने ली है, कृषि का काम गुजारे की जगह लाभोन्मुखी हो गया है, उत्पादन में निवेश के लिए बैंक ऋण और सहकारिताओं की भूमिका बढ़ गई है, बाजार से बढ़ते संपर्क के साथ ही अनाज उत्पादन के बजाए अब नकदी फसलों के उत्पादन को अधिक महत्व मिल रहा है। इस प्रकार ग्रामीण कृषि-व्यवस्था में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के ऐसे कई गुण आ गए हैं।

बॉक्स 1.02
खेती-बाड़ी में आए परिवर्तनों के फलस्वरूप पूंजीपति किसानों का एक वर्ग उत्पन्न हुआ है। मगर जहां-कहीं परिवर्तन की हवाएं पूरी तरह से नहीं पहुंच पाई हैं वहां भी पूर्व-पूंजीवादी वर्गीय लक्षण पूंजीवादी क्षमता की ओर बढ़ रहे हैं। मगर भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन का स्तर इतना असमान और विविध है कि जो राज्य पिछड़े हैं उनमें हमें कृषि अर्थव्यवस्था में सामंती और अर्ध-सामंती (या पूर्व-पूंजीवादी) लक्षण दिखाई देते हैं । इसीलिए भारतीय गांवों में वर्गीय ढांचा आज भी जटिल बना हुआ है जिसकी अनेक विशेषताएं हैं।

शहरी क्षेत्रों में वर्गीय ढांचा प्रायः उद्योगपतियों, बनियों और व्यापारियों, व्यवसायियों या नौकरी-पेशा लोगों, अर्ध-कुशल कामगारों और दिहाड़ी मजदूरों के वर्गों में बंटा रहता है। स्वतंत्रता के बाद से व्यवसायी वर्गों की संख्या में वृद्धि हुई है और आज देश की अर्थव्यवस्था में सेवा-क्षेत्र का अंश सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 51 प्रतिशत है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान अब करीब 28 प्रतिशत है। जाहिर है,
व्यक्तिगत पहनावे में झलकता जातिगत सार
साभार: बी. किरणमई

नगरीय-औद्योगिक भारत की वर्गीय संरचना नई प्रौद्योगिकी और अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के कारण तेजी से बदल रही है। इस परिवर्तन के फलस्वरूप हमारे समाज के ग्रामीण और नगरीय दोनों क्षेत्रों में मध्यम वर्गों की संरचना में विस्तार आया है। उदाहरण के लिए हरित क्रांति ने एक मजबूत ग्रामीण मध्यम वर्ग का निर्माण किया है। इस हरित क्रांति की अगुआई कृषक जातियों ने ही की (जो पिछड़े वर्ग के आंदोलन की रीढ़ हैं)। इसी प्रकार अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र को जो विस्तार मिला है उससे हमारे शहरों और कस्बों में मध्यवर्गीय लोगों की संख्या में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है। नगरों और कस्बों में नगरीय मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या अब 35 करोड़ के लगभग है। हमारी अर्थव्यवस्था में वृद्धि होती रही तो ऐसा अनुमान है कि इसकी. संख्या बढ़ कर आगामी दो-तीन दशकों में 50 करोड़ यानी देश की आधी जनसंख्या के बराबर हो जाएगी।