जनसांख्यिकी क्या है | demography in hindi meaning जनसांख्यिकी की परिभाषा किसे कहते है

By   November 28, 2020

demography in hindi meaning definition जनसांख्यिकी क्या है | जनसांख्यिकी की परिभाषा किसे कहते है ?

शब्दावली
जनसांख्यिकी: इसका संबंध जनसंख्या के विभिन्न पहलुओं से है, जैसे, स्त्री-पुरुष, अनुपात, किसी एक लक्षण का वितरण, सकल संख्या इत्यादि ।
द्वंद्वात्मक: किसी एक विषय पर दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों को लेकर उन्हें सार ग्रहण के एक उच्च तल पर सुलझाना।
क्रम-परंपरा: जातियों या समूहों का शीर्ष से नीचे की ओर श्रेणी क्रम।
वर्ण या जाति: एक प्रदत्त समूह जो समुदाय आधारित होता है
वर्ग: एक उपलब्धि प्रधान हित समूह
सत्ताधिकार: एक समूह या समुदाय में किसी व्यक्ति या समूह द्वारा निर्णयों को अपनी इच्छानुसार प्रभावित करने की क्षमता।
स्थिति या दर्जा: प्रतिष्ठा या सम्मान के पैमाने पर समूहों की सापेक्षिक स्थिति के अनुसार उनका समाज में श्रेणीकरण।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
योगेन्द्र सिंह, सोशल स्ट्रैटिफिकेशन ऐंड सोशल चेंज, नई दिल्ली, मनोहर, 1997
के.एल. शर्मा, सोशल स्ट्रैटिफिकेशन इन इंडिया: थीम्स एंड इशूज, नई दिल्ली, सेज, 1997

 सामाजिक विकास-क्रम की प्रक्रिया
एक संस्था के रूप में सामाजिक स्तरीकरण का विकास तब हुआ जब उत्पादन की प्रौद्योगिकियों में बुनियादी बदलाव आया । पशु-पालन और कृषि में आए नवप्रवर्तनों के फलस्वरूप अपेक्षाकृत अधिक जटिल प्रौद्योगिकियों और सामुदायिक जीवन में स्थायित्व समाज के लिए अनिवार्य बन गए। इन अर्थव्यवस्थाओं ने आर्थिक आधिक्य (अधिक उत्पादन) उत्पन्न करना और पशु या अनाज के रूप में संपदा का संचय करना आरंभ कर दिया। खाद्य संसाधनों के सुनिश्चित हो जाने से जनसंख्या में भारी वृद्धि होने लगी। इसके साथ-साथ उत्पादित सामग्रियों, वस्तुओं का लेन-देन और विनिमय भी बड़े पैमाने पर आरंभ हुआ। कालांतर में लेन-देन की युक्तियों का आविष्कार हुआ जो वस्तुओं के मूल्य को समाज के उन वर्गों के विकास में प्रतिबिंबित कर सकती थीं जिनका संपदा और सत्ता पर नियंत्रण अधिक था। अपेक्षाकृत जटिल प्रौद्योगिकियों के विकास और श्रम विभाजन के फलस्वरूप कालांतर में न सिर्फ विशेषज्ञता प्राप्त समूहों का समाज में उदय हुआ बल्कि शहर और देहात में विभाजन भी उत्पन्न हुआ। सामाजिक संरचना में आई जटिलता के चलते नई उभरती सामाजिक वास्तविकताओं पर सामाजिक नियंत्रण की अधिक विस्तृत संस्थाएं जरूरी हो गईं, जैसे धर्म का संस्थागत स्वरूप, कार्य के विभिन्न स्वरूपों में विशेषज्ञता प्राप्त कर्मियों के स्तर, संस्कृति के विशेषज्ञ, शासक वर्ग इत्यादि । सामाजिक स्तरीकरण संस्था ऐसे ऐतिहासिक क्षण में एक क्रमिकविकास संबंधी कार्यात्मक आवश्यकता के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आई।
 संयोजी सिद्धांत
सामाजिक स्तरीकरण के तीन मुख्य संयोजी सिद्धांत हैं। ये हैं स्थिति, संपदा और सत्ताधिकार। अब तक कई समाजों का जो समाजशास्त्रीय अध्ययन हुआ है उससे पता चलता है कि क्रमिकविकास प्रक्रिया में इन सिद्धांतों के बीच कुछ संबंध है। उदाहरण के लिए, ऐसे समाजों में जिनमें सामाजिक स्तरीकरण की संस्था नहीं थी, जैसे भोजन का संग्रह करने वाले और शिकारी समुदाय, उनमें भी कुछ व्यक्तियों को उच्च सामाजिक स्थान प्राप्त था और उन्हें नायक समझा जाता था। इन समुदायों में ओझा (शासन) आखेट में या सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा के कार्यक्षेत्र में अद्वितीय योग्यता रखने वाले व्यक्तियों को ऊंचा दर्जा दिया जाता था। लेकिन इसके बावजूद इनमें सामाजिक स्तरीकरण की संस्था का आविर्भाव नहीं हो पाया क्योंकि इस प्रकार की व्यक्तिगत विशिष्टता के उद्भव ने सामाजिक विभेदन को जन्म . दिया। यह सामाजिक विभेदन योग्यता, सामाजिक-लिंग या समाज में प्रचलित अन्य चिन्हकों पर आधारित था। समाज में सामाजिक स्तरीयकरण तभी अस्तित्व में आता है जब सामाजिक श्रेणी का निर्धारण लोगों के समूह के आधार पर किया जाता है, जैसा कि हमारे समाज में सामाजिक श्रेणियां जाति और वर्ग के आधार पर किया जाता है।

सामाजिक स्थिति
यह सामाजिक स्तरीकरण का सबसे पहला सिद्धांत है। सामाजिक स्तरीकरण की भाषा में सामाजिक स्थिति का अर्थ समाज में लोगों के समूहों का वर्गीकरण समाज में उनकी प्रतिष्ठा या आदर के रूप में उनकी सापेक्षिक स्थिति के आधार पर करना है। प्रतिष्ठा एक गुणात्मक विशेषता है, जो किसी स्थिति-समूह के सदस्यों को जन्म से ही मिलती है। इस तरह का कोई भी गुण जो जन्म से विरासत में मिलता हो, वह प्रदत्त गुण कहलाता है जिसे हम अपने प्रयास से अर्जित नहीं कर सकते। इसलिए सामाजिक स्तरीकरण के सामाजिक-स्थिति सिद्धांत को प्रदत्त का सिद्धांत भी कहते हैं। हमारे देश में जाति सामाजिक-स्थिति समूहों का एक अति उपयुक्त उदाहरण है। जो गुण एक सामाजिक-स्थिति समूह की रचना करते हैं उनका संबंध हमारे प्रयासों द्वारा अर्जित हो सकने वाले आर्थिक, राजनीतिक या सांस्कृतिक सिद्धांतों की अपेक्षा उन मूल्यों और विश्वासों, किवदंतियों और मिथकों से अधिक होता है, जिन्हें समाज में एक अवधि में चिरस्थायी बनाया जाता है।

संपदा
सामाजिक स्तरीकरण का दूसरा संयोजी सिद्धांत संपदा है। समाज में संपदा तभी उत्पन्न होती है जब प्रौद्योगिकी में उन्नति हो और उत्पादन की रीति में बदलाव आ जाए। जैसे आखेट और भोजन संग्रहण अर्थव्यवस्था से व्यवस्थित कृषि में बदलाव, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से मुख्यतः निर्माण और उद्योग पर आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तन । इस प्रकार के परिवर्तनों ने न सिर्फ सामाजिक स्तरीकरण को जन्म दिया बल्कि कालांतर में इन्होंने सामाजिक स्तरीकरण के संयोजी सिद्धांतों को भी बदल डाला। आर्थिक प्रगति से समाज में अधिक संपदा उपजी, संपदा के चिन्हकों का संचय हुआ, जिसके कई रूप थे, जैसे अनाज, पशुधन, धातुएं और खनिज-पदार्थ (चांदी, सोना, बहुमूल्य मणियां इत्यादि) या मुद्रा। इस चरण में आकर जिन समूहों का नियंत्रण आर्थिक संसाधनों और संपदा पर अपेक्षतया अधिक था या जो अधिक संपदा के स्वामी थे उन्हें समाज में उन समूहों से उच्च श्रेणी में रखा जाता था जिनका इन पर नियंत्रण कम था या लगभग नहीं था, जैसे, भूमिहीन श्रमिक या औद्योगिक मजदूर। इसका मुख्य उदाहरण वर्ग पर आधारित सामाजिक स्तरीकरण है।

सामाजिक गतिशीलता
वर्ण व्यवस्था के स्तरीकरण में परिवर्तन की प्रक्रिया के इस दौर ने एक नई सामाजिक गतिशीलता की प्रक्रिया को जन्म दिया। सामाजिक गतिशीलता को इसने राज्य की नीतियों से सीधे जोड़ा और इसने सामाजिक आंदोलनों में राजनीतिकरण के तत्वों को शामिल किया, जिससे व्यवस्था पीछे नहीं मुड़ पाई है। यह प्रक्रिया स्वतंत्रता के बाद भी बढ़ती रही है हालांकि उसमें कुछ बदलाव अवश्य आया है। यह आजादी हमें अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन के फलस्वरूप प्राप्त हुई जो वैचारिक रूप से भारत में जाति, धर्म या जातीयता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध थी। इसकी नींव पंथ-निरपेक्षता और समान नागरिक अधिकारों के सिद्धांतों पर रखी गई थी, इसीलिए स्वतंत्रता के बाद भारत ने जो संविधान स्वीकार किया वह सिर्फ कामकाज के उद्देश्य के लिए ही नागरिकों की नागरिक स्थिति को मानता है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के तत्काल बाद ग्रामीण और शहरी नागरिक संस्थाओं से जाति को अमान्य करार दे दिया गया। मगर वहीं भारतीय संविधान ने जनकल्याण नीति के मद्देनजर चुनी जातियों और जनजातियों के लिए जातिगत-स्थिति को मान्यता दी जो सदियों से शोषित रही थीं और अन्य जातियों के साधन-संपन्न वर्गों से स्पर्धा करने की स्थिति में नहीं थीं। इन जातियों और जनजातियों को संविधान की अनुसूची में सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थानों और निर्वाचित राजनीतिक पदों में क्रमशः सूचीबद्ध किया गया और इन्हें 15.0 और 7.5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।

बॉक्स 1.01
आरक्षण का यह प्रावधान संविधान में किया गया। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में भी यह कहा गया है कि राज्य “सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों‘‘ को भी आरक्षण का लाभ देगा। पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए पहले 1955 में काका कर्लेकर आयोग और फिर 1977 में मंडल आयोग बनाए गए। कर्लेकर आयोग इस दिशा में कोई निश्चित राय नहीं दे सका लेकिन मंडल आयोग ने पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की जिनकी पहचान आयोग ने उनकी जातियों से की। आयोग ने इन जातियों की सूची भी दी। यहां ध्यान देने की बात यह है कि भारत के कई राज्य पिछड़े वर्गों को केन्द्र सरकार की इस आरक्षण नीति के लागू होने से पहले ही आरक्षण दे रहे थे। इन राज्यों ने भी पिछड़ेपन की पहचान जातिध्समूहों से की जिन्हें सामाजिक और शैक्षिक अवसरों से वंचित रखा गया था ।

रोजगार, शिक्षा और राजनीतिक पदों में जातियों के लिए आरक्षण की नीति भारत में सामाजिक परिवर्तन की गतिशीलता को दर्शाती है जो खुद राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास की उपज है। इस नीति की उत्पत्ति में सहायक कारक हैंः लोकतांत्रिक रोजगार, कृषि उत्पादकता में वृद्धि जिसका श्रेय कृषक जातियों को जाता है (जिनमें से अधिकतर जातियों को केन्द्र और राज्यों में पिछड़े वर्ग की श्रेणियों में रखा गया है), और इन जातियों में शिक्षा और सरकारी सेवाओं के क्षेत्र में अपनी सामाजिक गतिशीलता को बढ़ाने की आकांक्षा । पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की नीति को राज्य से केन्द्र की ओर गति विभिन्न चरणों में पिछड़े वर्गों के आंदोलनों के फलस्वरूप मिली। पिछड़े वर्गों के आंदोलनों को इन वर्गों की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में आए सुधार से बल मिला, जो लोकतांत्रिक नीति के तहत राष्ट्र के 50 वर्ष तक आर्थिक और सामाजिक विकास में निवेश का परिणाम था।