संथाली भाषा आंदोलन क्या है | santali language movement in hindi संथाली भाषा किस राज्य में बोली जाती है

By   December 6, 2020

संथाली भाषा किस राज्य में बोली जाती है संथाली भाषा आंदोलन क्या है santali language is spoken in which state of india in hindi ?

उत्तर : यह भाषा असम, बिहार, झारखंड, मिजोरम, ओडिशा, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल आदि भारत के मुख्य राज्यों में बोली जाती है |

संथाली भाषा आंदोलन
संथाली पहचान. के आंदोलनों का सिलसिला 19वीं सदी में खेरवाड़ आंदोलन से शुरू हुआ था। दरअसल यह सामाजिक गतिशीलता का आंदोलन था जिसके जरिए संथाल लोग वृहत्तर हिंदू जनसंख्या के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते थे। उन्होंने हिंदू संस्कृति की विशेषताएं अपना ली और जनेऊधारी बन गए। जनेऊधारी संथालों ने अपने आपको गैर-जनेऊधारियों से अलग कर लिया और दोनों में आपस में विवाह बंद हो गए। मगर 1938 में आदाबासी आंदोलन ने संथाल परगना में मजबूत स्वरूप गृहण कर लिया। इस आंदोलन के तहत संथाल लोग छोटा नागपुर के मूल आदिवासियों के लिए एक पृथक प्रांत और स्कूलों में संथाली और अन्य मूल जनजातीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने की मांग की। रगना झारखंड आंदोलन के हिस्से के रूप में जनजातीय एकता को दर्शाने के लिए सरना धोर्मा समलेट शुरू किया था। यह संगठन मूल संथाली लिपि और धर्म ग्रंथों को प्रतिष्ठित करने में प्रयत्नशील रहा। अब एक महानायक भी खोज लिया गया जिसको गुरु गोमके कहा गया। ये गुरु खेरवाड़ बीर के मूल रचियता माने जाते हैं। खेरवाड़ बीर महाभारत के ही समान है। सिंधी और कश्मीरी जैसे भाषाई समूहों से बड़े संथाल लोग अपनी जातीय पहचान को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। मगर उनका आंदोलन भी दो गुटों में बंटा है। एक गुट ईसाई बने संथाल लोगों का है जो संथाली के लिए रोमन लिपि की मांग करता है। दूसरा गुट अल चिकि संथाली का समर्थक है। झारखंड आंदोलन के नेताओं ने इन मतभेदों को दबाए रखने की कोशिश की ताकि पृथक राज्य की मांग को मजबूती मिल सके । संथाली को अब प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा का माध्यम बना दिया गया है लेकिन संविधान की छठी अनुसूची में उसे अभी तक स्थान नहीं मिल पाया है।

जनजातीय भाषाई आंदोलन
वर्ष 1961 की जनगणतना के अनुसार, भारत में प्रचलित 1965 मातृभाषाओं में लगभग 500 भाषाएं जनजातीय अंचलों में बोली जाती हैं । संथाली, गोंडी और खासी इनमें सबसे बड़ी भाषाई समूह हैं। भारत के जनजातीय भाषाई समूहों को तीन वर्गों में बांटा गया हैः (प) द्रविड़ (पप) ऑस्ट्रिक (पपप) तिब्बती-चीनी। राज्य के ढांचे के पुनर्गठन की प्रक्रिया में जनजातीय भाषाओं की विविधता दब जाती है। उड़ीसा में भाषा की स्थिति की विस्तृत व्याख्या से यह स्पष्ट किया जा चुका है। उड़ीसा राज्य में 1961 की जनगणना के अनुसार उड़िया बोलने वाले लोगों की संख्या मात्र 1.5 करोड़ थी। वर्ष 1981 में हुई जनगणना में उड़ियाभाषी लोगों की भाषा की संख्या बढ़कर 3 करोड़ हो गई थी। जबकि खाड़िया और भूमिजी भाषी लोगों की संख्या (1961 और 1971 जनगणना के अनुसार) 1.4 लाख ओर 91.000 से घटकर 198 जनगणना में क्रमशः 49,000 और 28,208 रह गई थी। यह आश्चर्यजनक है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में एक भी आदिवासी भाषा को मान्यता नहीं दी गई है, हालांकि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इन भाषाओं को बोलता है। जैसे संथाली को 36 लाख लोग, भीली भाषा को 12.5 लाख लोग, .

लाम्मी भाषा को 12 लाख लोग बोलते हैं । संविधान की आठवीं अनुसूची ने अनजाने में भाषाओं की जो क्रम-परंपरा स्थापित की है और त्रिभाषीय सूत्र के तहत राजकीय भाषा को राज्य से जो संरक्षण मिला है उसने हमारी मातृभूमि के मूल निवासियों को अलग-थलग कर दिया है । आदिवासियों में बढ़ती साक्षरता और शिक्षा से उनमें अपनी जातीय विशिष्टताओं को लेकर चेतना भी बढ़ रही है। इस जागरुकता के फलस्वरूप उनमें कुछ महत्वपूर्ण भाषाई-जातीयता के आंदोलन खड़े हुए हैं। हम यहां उनमें से सिर्फ तीन आंदोलनों के बारे में बता रहे हैं।

प्रधानमंत्री शास्त्री के आश्वासनों से संतुष्ठ होकर हिंदी विरोधी आंदोलकारियों ने अपना आंदोलन 22 फरवरी को वापस ले लिया। इसके बाद आंदोलन के नेताओं ने खेद प्रकट करते हुए कहा कि उनके एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन को असमाजिक तत्वों ने अपने हाथ में ले लिया था। बहरहाल, इस आंदोलन ने राज्य में अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाने के लिए डीएमके का रास्ता साफ कर दिया और 1967 में डीएमके चुनाव जीतकर राज्य में अपनी सरकार बना ली। डीएमके के शासनकाल में ही 27 नवंबर 1967 को लोकसभा में राजकीय भाषा अधिनियम 1963 की धारा 3 के लिए एक संशोधन विधेयक लाया गया। इस विधेयक में यह व्यवस्था की गई कि केन्द्र सरकार और गैर-हिंदी राज्य सरकारों के बीच कुछ खास कार्यों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होगा। इस विधेयक ने हिंदी भाषी राज्यों को अंग्रेजी के प्रयोग को समाप्त करने की स्वतंत्रता भी दे दी। डीएमके हालांकि चिंतित थी लेकिन उसने विधेयक को इस शर्त पर अपना समर्थन देने का निर्णय किया कि वह बिना किसी परिवर्तन के पारित किया जाए। जिसका मतलब यह था कि यह अंग्रेजी के प्रयोग को संवैधानिक अनुमति दे।

बोध प्रश्न 2
1) पंजाबी सूबा आंदोलन क्या था? इसके बारे में पांच से दस पंक्तियों में बताइए।
2) एक उदाहरण देकर पांच से दस पंक्तियों में जनजातीय भाषाई आंदोलनों के बारे में समझाइए।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) पंजाबी सूबा आंदोलन एक पंजाबी भाषी राज्य की स्थापन के लिए हुआ था। इसकी मांग सबसे पहले 1919 में उठी थी और जो 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी जा रही। सिख राज्य के बजाए पंजाबी भाषी राज्य की सलाह डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दी थी। उनका कहना था कि पंजाबी भाषा के जरिए पंजाबी सूबा के नाम से एक सिख राज्य बनाया जा सकता है। वर्ष 1966 में पंजाब राज्य को पंजाब और हरियाणा में विभाजित कर दिया गया।

2) जनजातीय लोगों में साक्षरता के बढ़ने से उनमें अपनी जातीय विशिष्टताओं की चेतना भी बढ़ी। उदाहरण के लिए जैंतिया लोगों ने 1975 से साहित्य गोष्ठियों और साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन करके अपनी जातीयता को प्रतिष्ठित किया। साहित्यिक गतिशीलता और राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से उन्होंने अपनी विशिष्ट जातीय पहचान को स्थापित किया।

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