सब्सक्राइब करे youtube चैनल

rowlatt act in hindi रौलट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह | रॉलेक्ट एक्ट क्या है bhartiya iska virodh kyu kiya hai को काला कानून क्यों कहा गया है हिंसक विरोध दिवस कब पारित किया गया अथवा लागू हुआ था ? के दिन का चरम रूप किसने बताया ?

रोलट एक्ट के प्रति विरोध
इस क्रूर कानून के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के लिए गाँधीजी ने सत्याग्रह सभाएँ बनाने का सुझाव दिया। 30 मार्च, 1919 के लिए एक अखिल भारतीय हड़ताल की योजना बनाई गई, जो कि 6 अप्रैल, 1919, तक के लिए टाल दी गई। हड़ताल उड़ीसा, असम, मद्रास, बम्बई व बंगाल में की गई। 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के दिन, जनरल डायर के आदेश पर पुलिस ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा पर अंधा-धुंध गोलियां चलाईं, और एक कार्यालिक अनुमान के अनुसार, 379 निःशस्त्र व रक्षाहीन लोगों को मार डाला। इसके बाद मार्शल लॉ (सैनिक कानून) लगा दिया गया, और लोगों को यूरोपियनों के सामने पेट के बल रेंगने पर भी मजबूर किया गया। जलियाँवाला बाग घटना ने देश में उत्तेजना फैला दी। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश क्राउन द्वारा प्रदत्त श्नाइटहुडश् की उपाधि लौटा दी। ब्रिटिश लोगों द्वारा जनरल डायर को कठघरे में खड़ा करने की बजाय, उसे एक धन की थैली भेंट की गई। घटना की तहकीकात कर रहे हण्टर कमीशन ने, गाँधीजी के शब्दों में,  पन्ना-दर-पन्ना लीपा-पोतीश् प्रकाशित की।

गाँधी व असहयोग आंदोलन का पदार्पण
प्रथम विश्व युद्ध ने कृषि-वर्ग व नए औद्योगिक कामगार वर्ग के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। ब्रिटिशों द्वारा विश्वास-भंग किए जाने से मुस्लिम बुद्धिजीवी-वर्ग आंदोलित हो गया। ब्रिटिश युद्ध प्रयासों में भारतीय मुस्लिमों के समर्थन के बदले में, अंग्रेजों ने उनसे वायदा किया था कि ऑटोमन सम्राट को खलीफा अथवा मुस्लिम विश्व के अध्यात्मिक व ऐहिक प्रधान की मान्यता देंगे। 1915 में यह लगभग उसी समय हुआ जबकि 1869 में गुजरात के काठियावाड़ में जन्मे मोहनदास करमचन्द गाँधी, दक्षिण अफ्रीका में बीस वर्ष बिताने के बाद भारत लौटे। वहाँ उन्होंने दक्षिण अफ्रीकाई सरकार की प्रजातीय व भेदभावपूर्ण नीतियों के विरुद्ध गरीब भारतीय कुलियों व अन्य को संगठित किया था। यहाँ आकर उन्होंने राजनीतिक हथियारों के रूप में सत्याग्रह व अहिंसा के तरीकों को आजमाया।

 गाँधी और कृषि-वर्ग
सन् 1917 में, भारतीयों ने गाँधीजी के आंदोलनकारी तरीकों का प्रथम परीक्षण बिहार के चम्पारण में देखा, जहाँ यूरोपीय नील-रोपक खेतीहरों को गैर-कानूनी लगान देने व अन्य बलात् ग्रहणों के लिए दवाब डालते थे। जब गाँधीजी चम्पारण पहुँचे तो जिला कमिश्नर ने उन्हें जिला छोड़ने का आदेश दिया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में यह एक नई घटना थी। गाँधी व सहयोगियों ने कृषकों की यथार्थ व विस्तृत शिकायतों को दर्ज किया, और उन्हें सरकार के सामने रखा। विपुल तथ्यों को नकारने में असमर्थ सरकार ने अन्ततः रोपकों पर दवाब डला कि वे कृषकों को अवैध बलात् ग्रहण का 25 प्रतिशत लौटाएँ। इससे रोपकों की साख और उनसे किसानों का भय दोनों खत्म हुए। गाँधीजी ने अहमदाबाद में मिल-मालिकों के विरुद्ध कर्मचारियों को, और औपनिवेशिक प्रशासन के विरुद्ध खेड़ा किसानों का नेतृत्व भी किया। 1918 के अन्त तक, यह शोषण व अन्याय के विरुद्ध अपने अनूठे विरोध-प्रदर्शनों के माध्यम से स्वयं को स्थापित कर चुके थे। अपने सरल और आत्मसंयमी जीवन से ही वह जन-सामान्य में जाने जाने लगे।

मुहम्मद अली, शौकत अली, अबुल कलाम आजाद और उलमा के वर्ग खासकर फिरंगी महल, लखनऊ के, इस समय खिलाफत आंदोलन में व्यस्त थे। जब वे गाँधीजी के पास पहुँचे, उन्होंने उनको अपने वाद के प्रति सहानुभूतिशील पाया। गाँधीजी ने कांग्रेस से अपील की कि खिलाफतियों के साथ चलें जिसके विरुद्ध ब्रिटिशों द्वारा एक गंभीर विश्वास-भंग हुआ। इस मोड़ पर, सरकार ने जल्दी में रोलट एक्टश् पास कर दिया। यह अधिनियम भारतीयों को बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद कर दिए जाने की व्यवस्था देता था, और यह शीघ्र ही आंदोलन के लिए जी-जान से जुट जाने के लिए आधार बन गया।

बोध प्रश्न 2
नोटः क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) चम्पारण में कृषक आंदोलन में गाँधीजी की भागीदारी का क्या परिणाम हुआ?
2) ब्रिटिश सरकार ने रोलट एक्ट क्यों पास किया?
3) असहयोग और खिलाफत आंदोलन में विरोध-प्रदर्शन का क्या तरीका अपनाया गया?

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) गाँधी के चम्पारण आन्दोलन में हिस्सा लेने के फलस्वरूप सरकार ने बागान मालिकों पर
किसानों को उनसे गैरकानूनी तरीके से उघाये गये कर का 25प्रतिशत वापस करने के लिए दबाव डाला।
2) इसने रॉलेट ऐक्ट पारित किया क्योंकि इसमें ऐसे प्रावधान थे जिससे भारतीयों को बिना
मुकदमा चलाए बंदी बनाया जा सकता था।
3) अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन ।

सम्प्रदायवाद का विकास
1920 के दशक में कुछ दिग्गज नेता या तो कांग्रेस के साथ जुड़ गए या फिर राष्ट्रीय विचारधारा के साथ। अनमनीय साम्प्रदायिक विचारों के साथ मोहम्मद अली जिन्ना ने गाँधीवादी राजनीति के प्रतिक्रियास्वरूप कांग्रेस छोड़ दी। लाजपत राय, वीर सावरकर, आशुतोष लाहिड़ी व अन्य अनेक देशभक्त राष्ट्रीय आंदोलनों के लोकप्रिय पहलू को हिन्दू समुदाय के सिद्धांत के प्रति हानिकारक के रूप में देखने लगे। उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त (एन.डब्ल्यू.एफ.पी.) में कोहाट, मालाबार व कलकत्ता (1926) में असहयोग-पश्चात् साम्प्रदायिक दंगों ने साम्प्रदायिक बोध को बढ़ाने में सहयोग दिया। खिलाफत के दिनों में गाँधीजी के निकट सहयोगियों, अली बंधुओं, ने गाँधीजी पर मुसलमानों से गद्दारी का आरोप लगाया। साम्प्रदायिक विचार व संगठन द्रुत गति से प्रचुरोद्भूत हुए। इसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारण थे – राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यक्रम की सफलता और इस आंदोलन में शामिल होने के लिए कृषकों, श्रमिकों व जनसाधारण को प्रेरित करने की अभिदृष्टि । राजभक्त व उच्च वर्ग राष्ट्रीय आंदोलन व कांग्रेस के इस आमूल-चूल परिवर्तन से घबराए हुए थे। इससे अंशतः यह भी स्पष्ट होता है कि मुस्लिम लीग व हिन्दू महासभा जैसे अधिकतर साम्प्रदायिक संगठन क्यों पूर्णतः कांग्रेस-विरोधी थे।