असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ | असहयोग आंदोलन के कारण और परिणाम कब वापस लिया गया

By   November 16, 2020

non cooperation movement in hindi असहयोग आंदोलन कब शुरू हुआ | असहयोग आंदोलन के कारण और परिणाम कब वापस लिया गया ? किसे कहते है परिभाषा क्या है ?

असहयोग आंदोलन
नवम्बर 1919 में, इलाहाबाद में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी की बैठक हुई, और गाँधीजी का अहिंसावादी असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव मान लिया गया। यह आंदोलन देशभर में छा गया। बंगाल में अबुल कलाम आजाद, मौलाना अक्रम खान और मुनिरुजमन इस्लामाबादी ने आन्दोलन लोकप्रिय कर दिया। अक्रम खान के मोहम्मदी ने स्वदेशी व बहिष्कार की विचारधारा का प्रचार किया । आन्दोलन के संदेश को फैलाने में मोहम्मद अली के हमदर्दश् और श्कामरेडश्, तथा अबुल कलाम आजाद के श्अल हिलालश् प्रबल संचार-साधन रहे। इसी बीच, गाँधीजी ने कांग्रेस को एक अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन का सिद्धांत स्वीकार करवाने का प्रयास किया। उनका विचार था कि पंजाब व खिलाफत के अन्यायों को असहयोग का आधार बनाया जाए। सितम्बर 1920 में कलकत्ता में हुए विशेष कांग्रेस अधिवेशन में, इस पर कुछ विरोध हुआ। दिसम्बर 1920 में, तथापि, कांग्रेस ने नागपुर में अपने वार्षिक अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव निर्विरोध प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

खिलाफत व असहयोग ने एक साथ मिलकर भारत का प्रथम शक्तिशाली व्यापक महापरिवर्तन किया। देशभर में स्कूलों, अदालतों व विदेशी-वस्त्रों का बहिष्कार किया गया, और चरखा व स्वदेशी-वस्त्र अपनाए गए। कांग्रेस नागपुर में पहले ही घोषणा कर चुकी थी कि स्वराज शांतिपूर्ण व विधिसंगत तरीकों से ही लिया जाना है। आसन्न स्वतंत्रता को लेकर एक नया जोश था, जो कि गाँधीजी ने एक साल के भीतर लाने का वायदा किया था। अवध, बंगाल, मद्रास, बम्बई, बिहार व असम में कृषक आन्दोलन में शामिल हो गए। एक नया नेतृत्व, बृहदतः ग्रामीण क्षेत्रों से, उद्गमित हुआ । गाँधीजी के आंदोलन व संदेश ने बिहार व मणिपुर की पहाड़ियों में जनजातीय आंदोलनों को भी प्रभावित किया। लेकिन 4 फरवरी, 1922 को, गोरखपुर के चैरीचैरा में लोगों के एक समूह ने पुलिस द्वारा उकसाये जाने पर पुलिस थाने पर हमला किया और पुलिसकर्मियों को जिंदा जला दिया ।

गाँधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया, और अधिकतर नेताओं द्वारा आलोचना किए जाने पर भी वह अपने निर्णय पर अडिग रहे। उन्होंने अहिंसा के सिद्धांत को छोड़ देने अथवा उसमें ढील देने से इंकार कर दिया।

 कृषि-वर्ग, कामगार वर्गों का वामपंथ का उदय
असहयोग आंदोलन अचानक वापस लिए जाने से एक असहाय स्थिति पैदा हो गई। सी.आर दास० (1870-1925) तथा मोतीलाल नेहरू (1861-1931) ने उन स्वराजियों का नेतृत्व किया जो विधान सभाओं के अन्दर घुसकर उन्हें बर्बाद करना चाहते थे। गाँधीजी के कार्यक्रम में चुनावी लड़ाई के लिए कोई स्थान न था। इसलिए, जबकि स्वराजी चुनाव लड़े और सैण्ट्रल प्रोविन्स, बंगाल व केन्द्रीय विधान सभा में भी जोरदार धावा बोला, गाँधीजी व अन्य ने रचनात्मक कार्य की अपनी सामाजिक कार्यसूची पर ध्यान केंद्रित किया। इसमें शामिल थे दृ ग्राम पुनर्निर्माण कार्य, शिल्पकारों का उत्थान, चरखे का प्रचार और अस्पृश्यता निवारण। गाँधीजी के विचार से, सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन एक-दूसरे से विलग नहीं किए जा सकते, और यहाँ उनके विचार उनसे भिन्न थे जिनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ मात्र देश को विदेशी शासन से मुक्त कराना था।

 गाँधी-अम्बेडकर विवाद
गाँधीजी ने अस्पृश्यता-प्रथा के खिलाफ अपना सबसे बड़ा आंदोलन शुरू किया। उन्होंने उस व्यावसायिक पदानुक्रम के द्योतन के विरुद्ध तर्क प्रस्तुत किया जो धीरे-धीरे वर्ण-व्यवस्था को परिभाषित करने लगी थी। चूंकि कुछ काम निम्नतर समझे जाते थे, इन अनिवार्य कामों को करने वाला अछूत माना जाने लगा। उन्होंने पदानुक्रम के इस द्योतन को खत्म करना चाहा, ताकि वर्ण-व्यवस्था अपने विशुद्ध व भेदभाव रहित रूप को पुनर्माप्त कर सके । अम्बेडकर ने गाँधीजी का विरोध किया, और तर्क दिया कि अस्पृश्यता वर्ण-व्यवस्था द्वारा ही वैध करार दी गई है। जब तक जाति-व्यवस्था को ही समाप्त नहीं कर दिया जाता, जाति-दमन नहीं जाएगा। गाँधीजी, तथापि, इससे सहमत नहीं थे क्योंकि जाति-प्रथा सदियों से चलती आई थी, और इसकी कैंसर-सी होती वृद्धि को ही समाप्त करने की आवश्यकता है। दोनों ही प्रबल रूप से तर्क प्रस्तुत करते थे, लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के लोकतांत्रिक लोकाचार के प्रति निष्ठावान रहते हुए वे एक-दूसरे के मत का सम्मान करते थे और अपनी-अपनी स्थिति की विशेषताएँ एक-दूसरे को समझाने के प्रयास करते थे। सत्याग्रह को हथियार के रूप में प्रयोग करते हुए केरल के वैकोम और गुरुवयुर में मंदिर-प्रवेश आंदोलन और निम्न जाति के लोगों उत्थान हेतु देशव्यापी आंदोलन गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम के प्रत्यक्ष परिणाम थे।

मार्क्सवाद का आगमन
1920 के दशक में बड़ी संख्या में लोग, खासकर युवा, मार्क्सवाद की ओर आकर्षित होने लगे। रूसी क्रांति ने उनकी कल्पना को प्रेरित किया था। बांग्ला कवि काजी नजरुल इस्लाम ने इस नए उत्साह को सशक्त अभिव्यक्ति दी कि समाजवादी विचार राष्ट्रवादियों के मस्तिष्क में घर कर चुका है। उनके श्सर्वहाराश् (मजदूर वर्ग) और श्बिशेर बंशीश् (विष-बाँसुरी) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और उन्हें एक साल की कैद हुई। एम.एन. राय समाजवादी युवावर्ग के शीर्षस्थ नेता थे। मद्रास, बंगाल व बम्बई में सिंगरावेलु, हेमन्त सरकार, मुजफ्फर अहमद, एस.ए. दांगे व शौकत उस्मानी द्वारा श्रमिक व कृषक दल संगठित किए गए और पंजाब में श्कीर्ति किसान पार्टीश् की स्थापना की गई। बाद में, वे श्किसान व कामगार पार्टीश् के झण्डे तले ले आए गए। इनमें परवर्ती ने कांग्रेस के भीतर ही रहकर काम किया जिसे वह एक लोक दल बनाना चाहती थी। श्रमिक-संघ कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर श्रमिकों को संगठित करने, और श्रम-संबंधी मुद्दों को सुस्पष्ट करने में मदद की। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (1925) के निर्माण ने समाजवादी आंदोलन को एक केन्द्र प्रदान किया और राष्ट्रीय आंदोलन को एक उग्र उन्मूलनवादी मोड़ भी। व्यक्तिगत बहादुरी के काम, तथापि, अभी तक क्रांतिकारी अतिवादियों का संचलन करते थे। लेकिन ये क्रांतिकारी एक वृहदतर सामाजिक कार्यक्रम के मद्देनजर संगठित थे। यह नई विचारधारा सूर्यसेन, भगत सिंह, जतिन मुखर्जी (बाघा जतिन), जादू गोपाल मुखर्जी भगवत् चरण वोहरा, यशपाल और चन्द्रशेखर आजाद के कार्यों में प्रतिबिम्बित हुई। सचीन्द्र सान्याल कृत ‘फिलासॅफी ऑव दि बॉमश् इस परिवर्तन का सबसे अच्छा कथन था। परिणामतः, ‘हिन्दुस्तान क्रांति सेना‘ बनाई गई।

1907 में जन्मे व प्रसिद्ध क्रांतिकारी अजीत सिंह के भतीजे, भगतसिंह (1907-1931) ने इस परिवर्तन का सबसे अच्छा संकेत दिया। उन्होंने 1926 में श्पंजाब नौजवान भारत सभाश् बनाई। भगत सिंह किसी भी क्रांति के लिए जनसाधारण का महत्त्व समझते थे। उन्होंने समाज पर सम्प्रदायवाद के बढ़ते खतरे को भी महसूस किया। 1928 में ही, उन्होंने व उनके मित्रों ने नौजवान सभा में किसी भी धार्मिक अथवा साम्प्रदायिक संगठन के सदस्यों के प्रवेश का विरोध किया, जिसका निर्णय 1938 में कांग्रेस द्वारा ही लिया गया था। बाइस वर्ष की उम्र में, अपने कारावास के दौरान, उन्होंने प्रसिद्ध पुस्तिका लिखी वाइ आई ऐम ऐन एथिइस्ट (मैं अनीश्वरवादी क्यों हूँ। वह समझ सकते थे कि परिवर्तन की शक्तियाँ भारत के खेतों व कारखानों में ही बसी हैं।

‘मास्टर दा‘ के नाम से लोकप्रिय, सूर्यसेन (1897-1934) एक अन्य प्रतिभाशाली क्रांतिकारी अतिवादी थे। सूर्यसेन व उनके अनुयायियों ने 18 अप्रैल, 1930 को चित्तगोंग स्थित दो शस्त्रागारों पर असफल रूप से धावा बोला। 1933 में सेन को गिरफ्तार कर लिया गया और 12 जनवरी, 1934 को उन्हें फाँसी हो गई। चित्तगोंग शस्त्रागार धावे में बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। असहयोग-पश्चात् चरण में प्रीतिलता वाडेकर, कल्पना दत्त, शांति घोष, सुनीति चैधरी, मीना दास, मणिकुंतला सेन और आशालता सेन समेत अनेक महिलाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन में तथा कृषकों व श्रमिकों को संगठित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।