धर्म की व्याख्या करें | धर्म की अवधारणा की विवेचना कीजिए बताएं | अर्थ क्या है religion in hindi meaning

By   January 1, 2021

religion in hindi meaning explanation धर्म की व्याख्या करें | धर्म की अवधारणा की विवेचना कीजिए बताएं | अर्थ क्या है ?

धर्म की व्याख्या – मान्यताएँ और अनुष्ठान
दर्खाइम का कहना है कि धर्म की व्याख्या करने से पहले हमें अपनी पूर्वाकल्पनाओं और पूर्वाग्रहों को दूर करना होगा। वह इस मान्यता को नकारता है कि देवताओं और भूत-प्रेतों जैसी रहस्यम और अलौकिक बातों मात्र से धर्म संबंधित है। उसके अनुसारं धर्म न सिर्फ असाधारण बातों से बल्कि आम जीवन की सामान्य घटनाओं से संबद्ध है। सूर व और सूर्यास्त, ऋतुओं का चक्र, पेड़-पौधों, फसलों का उगना-बढ़ना, नये जीवों का जन्म सब धार्मिक विचारों के विषय हैं।

धर्मों की व्याख्या करने के लिये विभिन्न धार्मिक प्रणालियों का अध्ययन जरूरी है, जिससे उनके समान तत्वों को पहचाना जा सके। दर्खाइम (1912ः 38) का कहना है कि “धर्म की परिभाषा उन समान गुणों के संदर्भ में ही की जा सकती है जो हर धर्म में पाये जाते हैं।‘‘

दर्खाइम के अनुसार सभी धर्मों में दो मूल तत्व होते हैं धार्मिक विश्वास और धार्मिक अनुष्ठान । ये विश्वास सामूहिक प्रतिनिधान (collective representations) हैं (जिनका विस्तृत अध्ययन खंड 3 में किया जा चुका है), और धार्मिक अनुष्ठान समाज द्वारा स्थापित वे क्रियाएँ हैं जो इन विश्वासों से प्रभावित होती हैं।

जैसा कि आपने पहले पढ़ा है, धार्मिक विश्वास पवित्र और लौकिक इस विभाजन पर आधारित है। पवित्र और लौकिक क्षेत्र एक दूसरे के विपरीत हैं और इस आपसी भेद को धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांडों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। पवित्र अथवा दिव्य क्षेत्र वह है जिसे उच्च स्तर दिया जाता है और जिसके प्रति सम्मान अथवा भय की भावना पैदा होती है। दिव्य क्षेत्र को लौकिक क्षेत्र से अधिक महत्व और प्रतिष्ठा दी जाती है। उसके अस्तित्व और शक्ति को सामाजिक नियमों द्वारा सुरक्षित किया जाता है। दूसरी और लौकिक क्षेत्र के अंतर्गत आम दैनिक जीवन के सामान्य पहलू शामिल हैं। दर्खाइम के अनुसार दिव्य और लौकिक क्षेत्रों को एक दूसरे से अलग रखना आवश्यक माना जाता है, क्योंकि वे एक दूसरे से मूल रूप से भिन्न, विपरीत और विरोधी हैं।

आइए, इस बात को उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें। मंदिर में जूते पहनकर जाना मना क्यों है? जूते या चप्पल आम जीवन में इस्तेमाल किये जाते हैं, अतःवे लौकिक क्षेत्र से संबद्ध हैं। किन्तु मंदिर को दिव्य, शुद्ध स्थल माना जाता है। जूतों की गंदगी से मंदिर को सुरक्षित रखना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार, दिव्य और लौकिक क्षेत्रों को अलग रखा जाता है।

दर्खाइम के अनुसार धार्मिक विश्वास और अनुष्ठानों का एकीकरण धर्म का स्वरूप लेता है। विश्वास से उसका तात्पर्य है विभिन्न नियम, नैतिक विचार, शिक्षा और मिथक। ये सब वे सामूहिक प्रतिनिधान है जो व्यक्ति के बाहर होते हुए भी उसे धार्मिक व्यवस्था से एकीकृत करते हैं। विश्वासों के माध्यम से व्यक्ति दिव्य क्षेत्र और उसके साथ अपना संबंध समझ सकते हैं, जिसके अनुरूप वह अपना जीवन बिता सकते हैं।

विश्वासों पर आधारित धार्मिक अनुष्ठान वे नियम हैं जो दिव्य क्षेत्र से संबंधित व्यक्तिगत व्यवहार का मार्ग दर्शन करते हैं। धार्मिक अनुष्ठान सकारात्मक होते हैं (जिससे व्यक्ति को दिव्य क्षेत्र के नजदीक लाया जाता है, जैसे कि हवन या यज्ञ) और नकारात्मक भी (इनमें दिव्य और लौकिक क्षेत्रों को एक दूसरे से दूर रखा जाता है)। उदाहरण के तौर पर शुद्धिकरण, उपवास, तपस्या आदि धार्मिक अनुष्ठान विश्वासों को और अधिक तीव्र या शक्तिशाली बनाते हैं। व्यक्तियों को एक दूसरे के करीब लाकर उनके सामाजिक स्वभावों को सशक्त किया जाता है। धार्मिक अनुष्ठान सामूहिक चेतना को अभिव्यक्त करते हैं। जैसा कि आपने पढ़ा है, सामूहिक चेतना का अर्थ है कि समान मूल्य, विश्वास और विचार जो सामाजिक एकात्मता को संभव बनाते हैं दिखिए गिडन्स 1974ः 84-89)।

धर्म की व्याख्या विश्वासों और अनुष्ठानों की शब्दावली में करने से एक समस्या सामने आती है, क्योंकि इसके अंर्तगत जादू-टोना भी शामिल हो जाता है। क्या धर्म और जादू-टोना में कोई अंतर नहीं? नृशास्त्री रॉबर्टसन् स्मिथ की तरह दर्खाइम धर्म और जादू-टोने में स्पष्ट भेद करता है। जादू-टोना निजी, स्वार्थी मामला है जो व्यक्तिगत स्तर पर किया जाता है। उदाहरण के लिये यदि जादू में विश्वास करने वाला अपने पड़ोसी से ज्यादा सफल होना चाहे तो उसे जादू-टोना करवा कर पड़ोसी पर विपत्ति लाने का प्रयास करना होगा। ओझा (उंहपबपंद) को पैसा देकर तंत्र-मंत्र के द्वारा जादू में विश्वास करने वाले के लिए अपने पड़ोसी की फसल नष्ट करवाना संभव है, या उसकी गाय-भैंसे मरवाना संभव है। जादू-टोने में ओझा और ग्राहक के बीच संबंध निजी स्वार्थ से प्रेरित होता है। यह केवल व्यक्तिगत इच्छाओं के अनुरूप प्रकृति को प्रभावित करने का एक प्रयास है।

दूसरी ओर धर्म का सार्वजनिक और सामाजिक रूप है। भक्तों के बीच सामाजिक बंधन होते हैं, जो उन्हें समान जीवन बिताने वाले एक समूह के रूप में एकीकृत करते हैं। इन पक्षों पर ध्यान देते हुए दर्खाइम ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि पवित्र चीजों के संबंधित विश्वासों और अनुष्ठानों की एकीकृत व्यवस्था को धर्म कहते हैं और इन विश्वासों और अनुष्ठानों को मानने वाले अनुयायी एक नैतिक समूह में एकीकृत होते हैं।

आइए, अब हम देखें कि किस प्रकार आस्ट्रेलिया के आदिवासी समूह में प्रचलित टोटमवाद का अध्ययन कर दर्खाइम ने धर्म के सरलतम रूप को समझने का प्रयास किया। लेकिन इससे पहले, बोध प्रश्न 1 के उत्तर दीजिए।

बोध प्रश्न 1
प) निम्नलिखित वाक्यों को रिक्त स्थानों की पूर्ति द्वारा पूरा कीजिए।
क) दर्खाइम ने धर्म के सरलतम रूप का अध्ययन किया क्योंकि
ख) दर्खाइम के अनुसार प्रत्येक धर्म में पाए जाने वाले समान तत्व
ग) लौकिक क्षेत्र ………………………….. से संबद्ध है।
पप) दर्खाइम धर्म और जादू-टोने के बीच किस प्रकार भेद करता है? तीन पंक्तियों में उत्तर दीजिए।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
प) क) इससे जटिल धर्म को समझना आसान हो जाता है।
ख) विश्वास और अनुष्ठान
ग) आम, साधारण वस्तुओं
पप) दर्खाइम के अनुसार जादू टोना निजी और स्वार्थी मामला है। इसमें जादूगर और ग्राहक के बीच ही संबंध होता है। दूसरी ओर धर्म सार्वजनिक और सामाजिक है। सामाजिक बंधनों द्वारा अनुयायी एक दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं। इस प्रकार, सामाजिक एकात्मता को बढ़ावा मिलता है।

उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ने के बाद आपके लिए संभव होगा।
ऽ धर्म से संबंधित एमिल दर्खाइम के विचारों का विवेचन करना
ऽ धर्म के समाजशास्त्र में मैक्स वेबर के योगदान पर चर्चा करना
ऽ इन दोनों चिंतकों के दृष्टिकोण में अंतर बताना।

प्रस्तावना
जैसा कि आपको मालूम है, धर्म को मानव समाज का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। धर्म का संबंध मनुष्यों की मान्यताओं और अनुष्ठानों की उस प्रणाली से है जो उसके क्रियाकलापों और विचारधाराओं को मार्गदर्शित करती है। धर्म वह माध्यम है जिसके द्वारा लोग एकजुट होते हैं, जिससे उनमें एकता और आत्मीयता की भावना पैदा होती है। कभी-कभी इसका परिणाम बिल्कुल विपरीत होता है जब कोई एक धार्मिक समूह दूसरे समूह के प्रति विरोध प्रकट करने के उद्देश्य से काम करता है। धर्म वह माध्यम है जिसके द्वारा लोग जीवन की समस्याओं और संकटों के समाधान ढूँढते हैं।

धर्म एक सामाजिक सत्य है और समाज की अन्य व्यवस्थाओं से उसका गहरा संबंध है। धर्म, समाजशास्त्रियों और नृशास्त्रियों के लिये हमेशा से रोचक विषय रहा है। इस संबंध में दर्खाइम और वेबर के योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस खंड की पहली इकाई में हमने समाजशास्त्र के संस्थापकों की विशिष्ट विचार पद्धतियों का अध्ययन किया। इस इकाई में आइए हम देखें कि किस प्रकार दर्खाइम और वेबर ने अपनी समाजशास्त्रीय पद्धतियों का प्रयोग धर्म के अध्ययन द्वारा किया।

भाग 18.2 में धर्म के समाजशास्त्र में दर्खाइम के योगदान को प्रस्तुत किया जायेगा। उसकी महत्वपूर्ण कृति द एलिमेंटरी फार्स ऑफ रिलीजस लाइफ (1912) में उसकी प्रमुख संभावनाओं पर चर्चा की जायेगी। भाग 19.3 में धर्म संबंधित वेबर की प्रमुख अवधारणाओं पर विचार किया जायेगा। अंतिम भाग 19.4 में इन चिंतकों के दृष्टिकोण में अंतर पर नजर डाली जायेगी।

 धर्म के समाजशास्त्र में एमिल दर्खाइम का योगदान
द एलिमेंटरी फॉर्स ऑफ रिलीजस लाइफ दर्खाइम की महत्वपूर्ण कृति है। इस की प्रमुख स्थापनाओं पर आज भी विद्वानों और विद्यार्थियों के बीच वाद विवाद होते हैं।
इससे पहले कि इस कृति के प्रमुख विचारों पर चर्चा करें, आइए एक महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर नजर डालें। दर्खाइम ने विश्व के विकसित धर्मों के अध्ययन (जैसे कि हिन्दू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म) की अपेक्षा धर्म के सरलतम रूप पर ही ध्यान क्यों केन्द्रित किया?

आइए, एक उदाहरण द्वारा इस प्रश्न का उत्तर दें।

यदि आपको साइकिल चलाना आता है तो मोटर साईकिल चलाने में आपको ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। इसी तरह यदि आप धर्म के सरल रूप समझें, तो जटिल, सुव्यवस्थित धर्मों को समझने में सहायता मिलेगी। धर्म का सरलतम रूप उन समाजों में पाया जा सकता है जिनकी सामाजिक व्यवस्था उतनी ही सरल हो, यानी आदिम जनजातीय या आदिवासी समाज। दर्खाइम का उद्देश्य “आदिवासी‘‘ (ंइवतपहपदमे) समाज में आदिवासी धर्म के अध्ययन द्वारा जटिल विचार प्रणालियों और मान्यताओं पर प्रकाश डालना था।

अगले उपभागों में इसी प्रयास का विवेचन किया जायेगा। सबसे पहले आइए देखें कि दर्खाइम किस प्रकार धर्म की व्याख्या करता है।