रेननकुलेसी कुल क्या है ? ranunculaceae family in hindi रेननकुलेसी की परिभाषा किसे कहते है , गुण प्रकार

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रेननकुलेसी कुल क्या है ? रेनन कुलेसी की परिभाषा किसे कहते है , गुण प्रकार ?

रेननकुलेसी (Ranunculaceae) :

बटरकप कुल : Rana राना = मेंढक ;

सन्दर्भ : कीचड़ अथवा दलदलवासी पौधे

वर्गीकृत स्थिति : बेन्थम और हुकर क़े अनुसार –

प्रभाग – एन्जियोस्पर्मी

उपप्रभाग – डाइकोटीलिडनी

वर्ग – पोलीपेटेली

श्रृंखला – थेलेमीफ्लोरी

गण – रेनेल्स

कुल – रेननकुलेसी

रेननकुलेसी के विशिष्ट लक्षण (salient features of ranunculaceae)

  1. इस कुल के सदस्य एकवर्षीय अथवा बहुवर्षीय शाक होते है |
  2. पर्ण अननुपर्णी , पर्णाधार आच्छादी |
  3. पुष्प अधोजायांगी , पुष्पासन उत्तल अथवा उभरा हुआ |
  4. बाह्यदलपुंज प्राय: दलाभ |
  5. पुंकेसर स्वतंत्र , असंख्य , सर्पिलाकार चक्रिक , प्राय: बहिर्मुखी |
  6. जायांग प्राय: बहुअंडपी और पृथकांडपी |
  7. फल फोलिकल |

वितरण और प्राप्तिस्थान (occurrence and distribution)

यह द्विबीजपत्री पौधों का अपेक्षाकृत छोटा लेकिन अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कुल है जिसमें 50 वंश और लगभग 1500 प्रजातियों के पौधे सम्मिलित किये गए है | इस कुल के सदस्य मुख्यतः उत्तरी शीतोष्ण क्षेत्रों में पाए जाते है | हमारे देश में इस कुल के 20 वंश और इनकी लगभग 155 प्रजातियाँ पायी जाती है | भारत में पाए जाने वाले इस कुल के अधिकांश सदस्य केवल पर्वतीय क्षेत्रों में ही सिमित है | हालाँकि कुछ पादप , जैसे – रेननकुलस म्युरीकेटस , क्लीमेटिस रोयेलाई आदि मैदानी क्षेत्रों में पाए जाते है | डेल्फीनियम (लार्कस्पर) और नाइजैला आदि शोभाकारी पादप है | एनीमोन , रेननकुलस (बटरकप) , क्लिमेटस (नाक छिकनी) तथा नाइजैला इस कुल के कुछ प्रमुख उदाहरण है |

कायिक लक्षणों का विस्तार (range of vegetative characters)

आवास और स्वभाव : इस कुल के अधिकांश सदस्य प्राय: एकवर्षीय अथवा बहुवर्षीय शाक है , जैसे – रेननकुलस स्केलेरेटस (बटरकप) जलीय शाक है , जो उथले जल में अथवा कीचड़ में मिलता है |  ऐकोनीटम बहुवर्षीय शाक है , जिसमें कंदिल जड़ें पायी जाती है | इस कुल में क्षुप झाड़ियाँ और वृक्ष नहीं पाए जाते | क्लिमेटिस की कुछ प्रजातियाँ कठलताएँ अथवा काष्ठीय आरोही होती है |

एक्टिया तथा थैलिक्ट्रम के तनों की आंतरिक संरचना में संवहन बंडल सामान्य द्विबीजपत्री तने की भाँती एक वलय में व्यवस्थित नहीं होकर , एकबीजपत्री तने के समान बिखरे हुए पाए जाते है |

पर्ण : प्राय: एकान्तरित जैसे रेननकुलस और डेल्फीनियम में अथवा सम्मुख क्रम में विन्यासित होती है , जैसे – क्लिमेटिस में | पत्तियाँ अननुपर्णी होती है और इनका पर्णाधार चौड़ा होता है | थैलिक्ट्रिम में पर्णाधार बहुत अधिक चौड़ा होकर सहपत्र के समान संरचना बनाता है |

सामान्यतया पत्तियाँ सरल , स्तम्भिक और चौड़े पर्णफलक युक्त होती है , जो आगे चलकर हस्ताकार पालित हो जाती है लेकिन क्लिमेटिस में पत्तियां पिच्छाकार संयुक्त होती है | रेननकुलस एक्वेटिलिस में विषमपर्णता पायी जाती है , अर्थात जलनिमग्न पत्तियाँ रैखिक अथवा कटी फटी होती है और जल की सतह के ऊपर की तैरती हुई अथवा वायवीय पत्तियों का पर्णफलक चौड़ा होता है |

पत्तियों में एकशिरीय अथवा बहुशिरीय जालिकावत शिराविन्यास पाया जाता है |

क्लिमेटिस एफिल्ला में पत्तियां प्रतान में रूपांतरित हो जाती है और प्रकाश संश्लेषण का कार्य तने द्वारा किया जाता है |

पुष्पीय लक्षणों का विस्तार (Range of floral character)

पुष्पक्रम और पुष्प : इस कुल के विभिन्न सदस्यों के पुष्पक्रम में पर्याप्त विविधता पायी जाती है , प्रमुख पुष्पक्रम निम्नलिखित प्रकार के पाए जाते है –

  1. एकल अंतस्थ – ऐनिमोन और नाइजेल्ला
  2. अशाखित असीमाक्षी – डेल्फीनीयम और एकोनिटम
  3. द्विशाखित ससीमाक्ष – रेननकुलस स्केलेरेटस
  4. शाखित यौगिक असीमाक्ष – थैलिक्ट्रम और क्लिमेटिस
  5. एकल कक्षस्थ – क्लिमेटिस केडीमा

पुष्प : प्राय: सहपत्री और दो पाशर्व सहपत्रिकाओं से युक्त जैसे – रेननकुलस और थैलिक्ट्रम में लेकिन नाइजेल्ला में पुष्प सहपत्र रहित होता है , सवृंत , प्रारूपिक सर्पिल चक्रिक , प्राय: उभयलिंगी लेकिन थैलिक्ट्रम की कुछ प्रजातियों में एकलिंगी , पुष्पासन प्राय: उत्तल लेकिन मायोसोरस में अत्यधिक सुदिर्घित , नियमित अथवा त्रिज्यासममित लेकिन डेल्फीनियम और एकोनीटम में अनियमित और एकव्यास सममित | पुष्प प्रारूपिक अधोजायांगी |

परिदलपुंज : रेननकुलेसी कुल के अधिकांश सदस्यों में परिदलपुंज दलाभ होता है और इसे बाह्यदलपुंज और दलपुंज में विभेदित नहीं किया जा सकता लेकिन कुछ सदस्यों जैसे – रेननकुलस में वास्तविक बाह्यदल और दलपुंज उपस्थित होते है |

बाह्यदल अथवा टेपल्स : बाह्यदल प्राय: पाँच होते है और ये स्वतंत्र और दलाभ होते है | डेल्फीनियम में पश्च बाह्यदलपत्र एक दलपुट बनाता है | पुष्प परिदलपुंज विन्यास अधिकांश उदाहरणों में कोरछादी अथवा क्विनकुन्शियल होता है परन्तु क्लिमेटिस में कोरस्पर्शी होता है |

दलपुंज : जब परिदलपुंज बाह्यदल और दलपुंज में विभेदित होता है तो अधिकांश उदाहरणों में प्राय: 5 स्वतंत्र सममित (रेननकुलस) अथवा असममित (ऐकोनीटम और डेल्फीनियम) दलपत्र पाए जाते है | डेल्फीनियम में दो पश्च दलपत्र मिलकर दलपुट बनाते है जो बाह्यदल के दलपुट में समाहित होते है | इस वंश में पाशर्व और अग्र दलपत्र छोटे होते है |

एक्वीलीजिया में पाँचों नलिकाकार दलपत्र आधारीय भाग में दलपुट बनाते है | रेननकुलस के प्रत्येक दलपत्र के आधार पर एक जेब जैसा मरकंद कोष होता है |

मरकंद पर्ण (honey leaves) : ये विभिन्न आकार और साइज की होती है और इस कुल के अधिकांश सदस्यों में विशेष लक्षण को निरुपित करती है | सामान्यतया इनको रूपान्तरित बाह्य पुंकेसर माना जाता है |

हैलेबोरस के दलपत्र नलिकाकार मकरंद पर्ण में रूपांतरित रहते है लेकिन केल्था में केवल 5 से 15 सफ़ेद अथवा पीले परिदल पाए जाते है और मकरंद पर्ण अनुपस्थित होते है और अंडप के ऊपर मरकंद कोष उपस्थित होता है |

पुमंग : पुंकेसर प्राय: असंख्य , स्वतंत्र और सर्पिलक्रम में विन्यासित होते है | एक्विलीजिया में लगभग 50 पुंकेसर 10 अरीय कतारों में , नाइजेल्ला में 32 पुंकेसर 8 कतारों में व्यवस्थित होते है |

परागकोश संलग्न , द्विकोष्ठीय बहिर्मुखी और लम्बवत रूप से स्फुटित होते है |

जायांग : प्राय: बहुअंडपी लेकिन डेल्फीनियम और एक्टिया में एकांडपी होता है | पृथकांडपी , स्वतंत्र अंडप पुष्पासन पर सर्पिल क्रम में विन्यासित होते है | नाइजेल्ला में जायांग चार से पंचअंडपी और संयुक्तांडपी होता है और स्तम्भीय बीजांडविन्यास प्रदर्शित करता है लेकिन डेल्फीनियम और हैलेबोरस में सीमांत बीजांडविन्यास और रेननकुलस में आधारीय और थैलिक्ट्रम में निलम्बी बीजाण्ड विन्यास पाया जाता है | अंडाशय उच्चवर्ती |

वर्तिका रेननकुलस में हुक के समान और क्लिमेटिस और नारवेलिया में लम्बी और पिच्छकी होती है |

फल और बीज : फल प्राय: सरल , शुष्क , संपुटिकावत , फोलिकल जैसे डेल्फीनियम में अथवा फोलिकलों का पुंजफल जैसे रेननकुलस , एनीमोन और क्लिमेटिस में अथवा पटविदारक सम्पुटिका जैसे नाइजैला में | बीज में भ्रूणपोष प्रचुर मात्रा में , भ्रूण छोटा |

परागण और प्रकीर्णन : रेननकुलेसी कुल के सदस्यों में प्राय: कीट परगण की प्रक्रिया पायी जाती है | इनके आकर्षक और भडकीले दलपत्र , दलाभ , बाह्यदल और रंगीन पुंतन्तु कीटों को आकर्षित करने में सक्षम होते है | कीट पुष्पों में मकरंद अथवा परागकण एकत्र करने आते है लेकिन थैलिक्ट्रम माइनस में वायुपरागण पाया जाता है |

अनेक सदस्यों जैसे एनिमोन और क्लिमेटिस आदि में फल एकिन और अपाती और पिच्छकी वर्तिका वाले होते है | अत: इनका प्रकीर्णन वायु द्वारा होता है , जबकि हैलेबोरस का प्रकीर्णन चीटियों और घोंघो के द्वारा होता है |

बंधुता और जातिवृतीय सम्बन्ध (affinities and phylogenetic relationships) : अधिकांश पादप वर्गीकरण विज्ञानियों के अनुसार रेननकुलेसी को द्विबीजपत्री पौधों का सर्वाधिक आदिम अथवा पुरोगामी कुल माना गया है क्योंकि इसके सदस्यों में निम्नलिखित लक्षण पाए जाते है –

  1. उभयलिंगी और त्रिज्यासममित पुष्प |
  2. पुष्प का सर्पिल चक्रिक होना |
  3. असंख्य पुंकेसरों और अंडपों की उपस्थिति |
  4. पुंकेसरों का बहिर्मुखी प्रस्फुटन |
  5. जायांग बहुअंडपी और पृथकांडपी |
  6. प्रतीप बीजांड का पाया जाना |
  7. भिदुर फल अथवा एकीन |
  8. अधिकांश सदस्यों में कीट परागण |

पुष्प सूत्र (floral formula) :

रेननकुलस :

डेलफिनियम :

नाइजेल्ला :

क्लिमेटिस :

आर्थिक महत्व (economic importance) :

  1. शोभाकारी पौधे : इस कुल के अनेक सदस्य उद्यानों में शोभाकारी पादपों के रूप में उगाये जाते है | कुछ उदाहरणों निम्नलिखित है –
  2. रेननकुलस एशियाटिकस और रेननकुलस म्यूरीकेटस – बटर कप
  3. डेल्फीनियम एजेसिस – लार्कस्पर
  4. नाइजेल्ला डेमासिना – लव इन ए मिस्ट
  5. क्लिमेटिस वरजिनियेन – ट्रेवलर्स ज्वाय
  6. एनीमोन परवीफ्लोरा – विंड फलावर
  7. एक्विलिजिया वल्गेरिस – कोलम्बाइन
  8. औषधिक पादप (Medicinal plants) :
  9. एकोनीटम केस्मेन्थम की कंदील जड़ों से एकोनाइट नामक औषधि प्राप्त होती है जो गठिया रोग के उपचार , बुखार , दर्द और तंत्रिका शामक के रूप में प्रयुक्त की जाती है |
  10. एनिमोन पल्सेटिल्ला : इस शाकीय पौधे से पल्सेटिल्ला नामक औषधि प्राप्त होती है जो स्त्रियों के रजोधर्म सम्बन्धी रोगों के उपचार में काम आती है |
  11. रेननकुलस आरवेन्सिस और रेननकुलस म्यूरीकेटस की कंदील जड़ों और पत्तियों का रस एकांतरा ज्वर के उपचार में प्रयुक्त होता है |
  12. सिमीसीफ्यूगा रेसीमोसा नामक पौधे के सूखे प्रकन्द को काला नाग जड़ के नाम से जाना जाता है और इससे सिमिसीफ्यूगिन नामक एल्कलाइड प्राप्त होता है , जो कोरिया नामक रोग के उपचार में काम आता है |
  13. डेल्फीनियम इलेटम और डेल्फीनियम वेस्टिटम की जड़ों का रस ह्रदय और श्वास रोगों में उपयोगी होता है | डेल्फीनियम सीरूलियम की जड़ें कीटनाशी के रूप में प्रयुक्त होती है |
  14. रेननकुलस फिकेरिया नाम पौधे को सामान्यतया पाइलवर्ट भी कहते है | इससे बवासीर के रोग का उपचार किया जाता है |
  15. हाइड्रेस्टिस कैनाड़ेंसिस की जड़ें सर्प विष की प्रतिकारी औषधि के रूप में प्रयुक्त होती है |
  16. नाइजेल्ला सेटाइवा के बीज ज्वर खाँसी , दमा रोगों में लाभदायक होते है | इस पादप को काला जीरा भी कहते है और यह मसाले के काम में आता है |
  17. थैलिक्ट्रम फोलियोलोसम की जड़ें कमजोरी दूर करती है और मूत्रवर्धक और रेचक है | बुखार को कम करने में भी ये उपयोगी है |

रेननकुलेसी कुल के प्रारूपिक सदस्य का वानस्पतिक विवरण (Botanical description of typical plant of ranunculaceae)

रेननकुलस स्केलेरेटस लिन.

स्थानीय नाम – जल धनिया |

प्रकृति और आवास – एकवर्षीय , दलदली शाक |

जड़ – मूसला जड़ जो बाद में अपस्थानिक जड़ों द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है |

तना अथवा स्तम्भ – शाकीय , उधर्व , ठोस , बेलनाकार और नालीदार , चिकना , पर्व और पर्वसंधि स्पष्ट |

पर्ण – सरल , सवृंत , एकान्तरित , अननुपर्णी , पर्णाधार आच्छादी , पर्णफलक , हस्ताकार पालित , शिराविन्यास बहुशिरीय जालिकावत |

पुष्पक्रम – युग्मशाखी समीमाक्ष |

पुष्प – सहपत्री और दो पाशर्वीय सहपत्रिका युक्त , सवृंत , पूर्ण , अधोजायांगी , त्रिज्यासममित , पंचतयी , सर्पिल चक्रिक , पुष्पासन उत्तल |

बाह्यदल – पाँच बाह्यदल , स्वतंत्र , दलाभ पीले हरे , कोरछादी पंचकी |

दलपुंज (corolla) : दलपत्र 5 , स्वतंत्र , पीले , कोरछादी प्रत्येक दल के आधारी भाग पर अन्दर की तरफ जेब के समान मकरंद कोष उपस्थित |

पुमंग (Androecium) : पुंकेसर असंख्य , स्वतंत्र , सर्पिलाकार क्रम में व्यवस्थित , पुंतन्तु लम्बे , परागकोष , द्विकोष्ठी , बहिर्मुखी , आधारलग्न लम्बवत स्फुटन |

जायांग : बहुअंडपी पृथकांडपी , एककोष्ठी , बीजांडविन्यास आधारीय , अंडाशय उच्चवर्ती , वर्तिका हुक के समान |

फल – एकीन्स का पुंज |

पुष्पसूत्र –

प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1 : रेननकुलेसी कुल है –

  • सर्वाधिक पुरातन कुल
  • प्रगत कुल
  • मध्यवर्ती कुल
  • विशिष्ट कुल

उत्तर : सर्वाधिक पुरातन कुल

प्रश्न 2 : रेननकुलेसी को पुरातन कुल कहा जाता है , क्योंकि इसमें –

  • बीजांड विन्यास सीमांत होता है
  • पुष्प सर्पिल चक्रिक होता है
  • पादप काष्ठीय होते है
  • पादप शाकीय होते है

उत्तर : पुष्प सर्पिल चक्रिक होता है

प्रश्न 3 : रेननकुलेसी का सदस्य है –

  • ब्रेसीका
  • यूकेलिप्टस
  • डेल्फीनियम
  • ऐजेरेटम

उत्तर : डेल्फीनियम

प्रश्न 4 : बटर कप का वानस्पतिक नाम है –

  • नाइजैला
  • एकोनीटम
  • ऐनीमोन
  • रेननकुलस

उत्तर : रेननकुलस

प्रश्न 5 : डेल्फीनियम है –

  • शोभाकारी पादप
  • खाद्योपयोगी पादप
  • औषधिय पादप
  • रेशा उत्पादक पादप

उत्तर : (A) शोभाकारी पादप