placentation in hindi बीजांडन्यास क्या है | पादप गर्भनाल किसे कहते है परिभाषा बताइये मीनिंग english

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बीजांडन्यास क्या है | पादप गर्भनाल किसे कहते है परिभाषा बताइये मीनिंग english placentation in hindi ?

बीजांडन्यास (Placentation)

अंडाशय के अन्दर बीजांडसन और बीजाण्डो के व्यव्स्थाक्रम को बीजाण्डन्यास कहते है | यह निम्नलिखित प्रकार का होता है –

  1. सीमान्त (Marginal) : जब जायांग , एकअंडपी (अथवा बहुअंडपी , पृथकांडपी) और एककोष्ठीय हो और बीजांड एक पंक्ति में प्रतिपृष्ठ सीवनी पर लगे हुए हो , जैसे – मटर |

सीवन अथवा सीवनी (Suture) : अंडप के तटों को सीवनी कहते है | मध्यशिरा वाले जोड़ को पृष्ठ सीवनी और तटों वाले जोड़ को प्रतिपृष्ठ सीवनी कहते है |

  1. भित्तीय (parietal) : जब जायांग दो अथवा बहुअंडपी परन्तु हमेशा युक्तांडपी और एककोष्ठीय हो और बीजाण्ड , अंडाशय की परिधि (भित्ति) पर अंडपो के संधि स्थल पर लगे हो , जैसे – द्विबीजपत्री पौधों में गण पेराइटेल्स के सदस्य |
  2. अक्षीय अथवा स्तम्भीय (Axile) : जायांग द्विअंडपी से बहुअंडपी परन्तु सदैव युक्तांडपी और कोष्ठों की संख्या अंडपों के समान हो और बीजांड अंडाशय के केन्द्रीय भाग में स्थित अक्ष पर लगे हो , जिसका निर्माण अंडपों के तटों के संयोजन से होता है , जैसे – मालवेसी और सोलेनेसी कुलों के सदस्य |
  3. आधारीय (Basal) : जब जायांग एक अथवा बहुअंडपी और एककोष्ठीय हो और एक अथवा अधिक बीजांड कोष्ठ के आधारीय भाग अथवा फर्श पर लगे हो , जैसे – एस्टेरेसी कुल के सदस्य |
  4. मुक्तस्तम्भीय (Free central) : जब जायांग द्वि अथवा बहुअंडपी युक्तांडपी परन्तु सदैव एककोष्ठीय हो , इसके आधारीय भाग अथवा फर्श से एक अक्ष इस प्रकार से उभरी हुई हो कि इसका जुड़ाव अंडाशय की छत अथवा शीर्ष से नहीं हो इस बीजांड और अक्ष पर लगे हो , जैसे – केरियोफिल्लेसी कुल के सदस्य |
  5. परिभित्तीय (superficial) : जब जायांग बहुअंडपी , युक्तांडपी और बहुकोष्ठीय हो और बीजांडकोष्ठों के पटों पर लगे हो , जैसे – कमल |

वर्तिका (style) : जब अंडाशय और वर्तिकाग्र का सुदिर्घित भाग होता है | इसका अंडाशय से जुड़ाव तीन प्रकार का हो सकता है –

  1. अग्रस्थ (Terminal) : जब वर्तिका अंडाशय के शीर्ष पर जुडी हो |
  2. पाशर्व (Lateral) : जब वर्तिका अंडाशय की पाशर्व सतह से निकली हो |
  3. जायांग नाभिक वर्तिका (Gynobasic style) : जब वर्तिका अंडाशय के आधारीय भाग से निकलती हुई हो , जैसे – तुलसी |

वर्तिकाग्र अथवा कुक्षि (stigma) : यह वर्तिका का ऊपरी ग्राही बिंदु होता है , इसकी सतह और आकृति निम्नलिखित प्रकार की हो सकती है –

  1. पालियुक्त (lobed) : जब वर्तिकाग्र दो अथवा अधिक पालियों में विभक्त हो , जैसे – इक्जोरा |
  2. समुंड (Capitate) : जब यह घुंडी अथवा टोपी जैसी हो | जैसी – आरजीमोन |
  3. चक्रिक (discoid) : बिम्ब अथवा डिस्क के आकार की , जैसे – गुड़हल |
  4. तन्तुरूप (filiform) : जब यह पतली , लम्बी , बेलनाकार और सूत्रवत हो , जैसे – मक्का |
  5. पिच्छकी (Plumose) : पंख की भांति वर्गिकाग्र , जैसे – घासें |
  6. ढोलाकार (drum shaped) : जब वर्तिकाग्र ढोल की आकृति की हो , जैसे – सेजवीकिया |

वर्तिकाग्र की सतह शुष्क , चिपचिपी अथवा रोमिल हो सकती है |

फल (Fruit)

परिपक्व अंडाशय को फल कहते है और इसकी भित्ति को फलभित्ति कहा जाता है जो एकस्तरीय अथवा त्रिस्तरीय हो सकती है | त्रिस्तरीय फलभित्ति में बाहरी परत को बाह्यफलभित्ति , मध्यफलभित्ति मध्यपरत और अन्त:फलभित्ति आंतरिक पर्त होती है |

पुष्पाधारी पौधों में फल तीन प्रमुख वर्गों में विभेदित किये गए है | इनके पुनः अनेक उपवर्ग होते है –

  1. एकल अथवा सरल फल (simple fruit) : जब फल का निर्माण एकअंडपी अथवा बहुअंडपी , युक्तांडपी अंडाशय के निषेचन से होता है |

सरल अथवा एकल फलों के प्रकार (Types of simple fruits) – स्फुटन के अनुसार सरल फल दो प्रकार के होते है –

  1. स्फुटनशील फल (dehiscent fruit) : इस प्रकार के फल पूर्ण परिपक्व होने पर शुष्क होकर फट जाते है , इनकी भी अनेक किस्में होती है –
  • शिम्ब फली (legume , pod) : यह फल , एकअंडपी ,एककोष्ठीय अंडाशय से बनता है , जिसमें सीमांत बीजांडन्यास होता है और पकने पर पृष्ठ और प्रतिपृष्ठ दोनों सीवनियों से स्फुटित होता है , जैसे – लेग्यूमिनोसी कुल के सदस्य |
  • फोलिकल (follicle) : लेग्यूम की भांति होता है लेकिन इसका स्फुटन केवल प्रतिपृष्ठ सीवनी से ही होता है , जैसे – एसक्लीपियेडेसी कुल के सदस्य |
  • सिलिकुआ (siliqua) : जब फल द्विअंडपी , एककोष्ठीय और भित्तीय बीजांडविन्यास वाले अंडाशय से बनता है जिसमें आभासी पट उपस्थित होता है | फल लम्बा पुच्छीय और प्राय: बेलनाकार और स्फुटन के समय फल के दो कपाट आधार से शीर्ष की तरफ क्रम में खुलते है , जैसे – ब्रेसीकेसी कुल के सदस्य |
  • सिलीकुला (silicula) : सिलिकुआ की भाँती परन्तु लम्बाई और बीजों की संख्या कम और आकृति त्रिकोणीय होती है , जैसे – आइबेरिस और केप्सेला |
  • सम्पुटिका (capsule) : जब फल बहुअंडपी , युक्तांडपी , बहुकोष्ठीय और स्तम्भीय बीजांडन्यास वाले अंडाशय (जायांग) से बनता है और अनेक कपाटों में फटता है , जैसे – भिण्डी |
  • भिदुरफल (schizocarpic fruit) : ये बहुअंडपी , युक्तांडपी और बहुकोष्ठीय अंडाशय से बनते है और पकने पर कई बीजयुक्त फलांशकों में फटते है , जैसे – अरण्ड |
  • क्रीमोकार्प (Cremocarp) : जब फल द्विअंडपी , युक्तांडपी और अधोवर्ती अंडाशय से बनता है और पकने पर दो फलांशको में बिखर जाता है | दोनों फलांशक , फलधर पर लगे रहते है , जैसे – धनिया |
  • लोमेन्टम : लेग्यूम के समान फल परन्तु यहाँ फलभित्ति में बीजों की संख्या के अनुरूप संकीर्णन होते है , जैसे – बबूल |
  1. अस्फुटशील फल (Indehiscent fruit) : ये शुष्क या सरस फल होते है जो पकने पर फटते नहीं है | इनको पुनः अनेक प्रकारों जैसे शुष्क और सरस अस्फुटनशील फलों में बाँटा जा सकता है –
  • शुष्क अस्फुटनशील फल (dry , indehiscent fruits) :
  • एकिन (achene) : ये फल , एकांडपी और उच्चवर्ती अंडाशय से विकसित होते है , जैसे – नारवेलिया |
  • केरेयोप्सिस (Caryopsis) : यह त्रिअंडपी , युक्तांडपी , एककोष्ठीय और उच्चवर्ती अंडाशय से बनता है जिसमे एक ही बीजांड होता है | इसकी पेरीकार्प पतली , कागज जैसे और बीज चोल से जुडी हुई है , जैसे – पोएसी कुल के सदस्य |
  • सिप्सेला (cypsela) : यह भी केरियोप्सिस के समान होता है लेकिन अधोवर्ती अंडाशय से बनता है और फलभित्ति से बीजचोल जुडी हुई नहीं होती , जैसे – एस्टेरेसी कुल के सदस्य |
  • सपारा (samara) : यह फल सिप्सेला के समान होता है लेकिन फलभित्ति पंखवत होती है , जैसे – बन्दर की रोटी |
  • नट (nut) : एक कोष्ठीय एक बीजीफल द्वि अथवा बहुअंडपी अंडाशय से विकसित , फलभित्ति कठोर जैसे – जायफल |
  1. गुदेदार , अस्फुटनशील फल (Fleshy indehiscent fruits) :

(i) अष्ठिफल , ड्रप (Drupe) : फलभित्ति तीन स्तरों – बाह्य , मध्य और अन्त: फलभित्ति में विभेदित और अन्त:फलभित्ति सदैव काष्ठीय होती है जिसे गुठली कहते है , जैसे – आम और नारियल |

(ii) बदरीफल अथवा बेरी (Berry) : जब फलभित्ति झिल्लीमय हो और बीज फल के भीतर गुदे में लिपटे रहते है , जैसे – टमाटर |

  • पोम (Pome) : यह एक कूट फल है | इसके निर्माण में अंडाशय के अतिरिक्त पुष्पासन भी प्रयुक्त होता है और यही भाग इस फल का खाने योग्य गूदेदार भाग होता है , जैसे – सेब |
  • पीपो (pepo) : यह फल बेरी के समान ही होता है परन्तु फलभित्ति कड़ी और चर्मिल होती है | जैसे – कुकुरबिटेसी कुल के सदस्य |
  • हेस्पेरीडियम अथवा नारंगक (Hesperidium) : यह भी बेरी के सामान फल है परन्तु यहाँ फलभित्ति तीन उपस्तरों में विभक्त होती है | बाह्यफलभित्ति मोटी परन्तु नरम , मध्यफल भित्ति रेशेमय और अंत: फलभित्ति झिल्लीमय होती है जो रसीली बीजांडासनों को घेरे रहती है | येबीजाण्डासन , जो रसीले होते है , फल का खाने योग्य भाग होते है , जैसे – संतरा और निम्बू और साइट्रस वंश के अन्य सदस्य |
  • बेलॉस्टा (Balausta) : इस प्रकार का फल बहुअंडपी , युकांडपी और बहुकोष्ठीय अधोवर्ती अंडाशय से बनता है , बाह्यभित्ति चर्मिल , मध्यभित्ति पतली और बाहरी भित्ति से जुडी हुई और अंत:फलभित्ति झिल्लिमय और अनेक खण्डों में विभक्त होती है | इसका खाने योग्य भाग रसीला बाह्य बीज चोल होता है , जैसे – अनार |
  • एम्फीसारका (Amphisarca) : यह बहुअंडपी , युक्तांडपी , बहुकोष्ठी और उच्चवर्ती अंडाशय से बनता है जिसमें स्तम्भीय बीजांडन्यास होता है | फलभित्ति अत्यंत कठोर और काष्ठीय और तीन स्तरों में विभेदित नहीं होती है | फलभित्ति की भीतरी सतह सामान्यतया एंडोकार्प गूदेदार और खाने योग्य भाग होता है | बाह्य बीजचोल अत्यंत लसदार होती है , जैसे – बीलपत्र |
  1. पुंजफल (Aggregate fruits) : इस प्रकार का फल बहुअंडपी , पृथकांडपी जायांग के अंडाशय से बनता है | ये निम्नलिखित प्रकार के होते है –
  • अष्ठिलो का पुंज (Etaerio of drupes) : यह दो या अधिक अष्ठिल फलों का समूह होता है , जैसे – रूबस |
  • फ़ॉलिकलों का पुंज (Etaerio of follicles) : इस फल में फ़ॉलिकलों का समूह पाया जाता है , जैसे – सदाबहार |
  • एकीनों का पुंज (Etaerio of achenes) : यह शुष्क अस्फुटनशील और एक बीजी फलों , जिनको एकीन्स कहते है , उनसे मिलकर बना होता है , जैसे – क्लिमेटिस |
  • बेरी का पुंज (Etaerio of berries) : जब फल का निर्माण दो अथवा दो से अधिक , सरस बेरी फलों से मिलकर होता हो , जैसे – सीताफल |
  • संग्रथित फल (multiple fruits) : सम्पूर्ण पुष्पक्रम से बने फल को संग्रथित फल कहते है |
  • सोरोसिस (sorosis) : यह फल स्पाइक अथवा स्पेडिक्स पुष्पक्रम से बनता है | इसमें पुष्पक्रम अक्ष और परिदलपुंज माँसल हो जाते है | जैसे शहतूत , कटहल और अनन्नास |
  • साइकोनस (Syconus) : इस प्रकार के फल का निर्माण हाइपेन्थोडियम पुष्पक्रम से होता है | फल का माँसल और खाने योग्य भाग गूदेदार पुष्पक्रम अक्ष होता है जो कुम्भाकार (घडा) होता है , जैसे अंजीर और फाइकस वंश की अन्य प्रजातियाँ |

पुष्पीय पादप के वर्णन की विधि (method of describing flowering plant)

वनस्पति विज्ञान में वर्गिकी के अंतर्गत आवृतबीजीय पौधों के विभिन्न भागों का अध्ययन करते है | अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से पौधे के विभिन्न भागों का वर्णन निम्नलिखित क्रम में करते है –

  • प्राकृतिक वास
  • स्वभाव
  • विशेष प्रकृति
  • मूल
  • स्तम्भ अथवा तना
  • पत्ती
  • पुष्पक्रम
  • पुष्प
  • फल
  1. प्राकृतिक वास (Habitat) : पौधा जंगली , उद्यान वाला या कृष्ट है |
  2. स्वभाव (Habit) : पौधा शाकीय , झाडी अथवा वृक्ष या आरोही है | शाकीय पौधे में पौधे की आयु जैसे एक वर्षीय , द्विवर्षीय या बहुवर्षीय आदि का वर्णन करते है | पौधा उधर्व अथवा तल सर्पी है |
  • विशेष प्रकृति (Special nature) : परजीवी , अधिपादप , मरुदभिद , समोदभिद , जलोद्भिद |
  1. मूल (Root) : मूसला अथवा अपस्थानिक |

शाखित अथवा अशाखित |

विशेष रूपान्तर जैसे रेशेदार , ग्रंथिल , कंदिल , मांसल , शंकुरूप , कुम्भीरूप , तर्कुरूप आदि |

  1. स्तम्भ (Stem) : उधर्व अथवा आरोही , श्यान |

बेलनाकार अथवा चपटा अथवा कोणीय |

रोमवत या चिकना |

शाखीय या अशाखीय |

ठोस अथवा खोखला |

सतह रोमिल , दीर्घरोमी , तीक्ष्णवर्धी , शूलमय , मोमी , अरोमिल , नीलाभ अथवा चिकना |

रंग – हरा अथवा दूसरे रंग का |

विशेष रूपांतर अगर हो तो उसका विशेष नाम , जैसे – प्रकंद , स्तम्भकंद , बल्ब , उपरिभूस्तारी , अंत:भूस्तारी , पर्णाभ स्तम्भ आदि |

  1. पत्ती (Leaf) : निवेशन – मुलज , स्तम्भिक , शाकीय |

पर्ण विन्यास – एकांतर , सम्मुख अथवा चक्करदार अथवा सम्मुख क्रॉसित |

सवृन्त अवृन्त |

अनुपर्णी अथवा अननुपर्णी | यदि अनुपर्णी हो तो अनुपर्णके विशेष रूप लिखे , जैसे – मुक्तापाशर्व , संलग्न , अंतरावृंतक , पर्णील , प्रतानवत , शूलमय , परिवेष्टकीय आदि |

पर्णाधार – आच्छदीय , सहजात , जीभिकाकार , स्तम्भवेष्टी आदि |

प्रकार – सरल अथवा संयुक्त |

अगर पत्ती सरल हो तो फलक का पूरा वर्णन –

  • फलक – सूच्याकार , रेखीय , भालाकार , दीर्घवृतीय , वृक्काकार आदि |
  • सतह – रोमिल , अरोमिल , शूलमय , नीलाभ आदि |
  • तट – अछिन्न , क्रकची , शूलमय , रोमिल , श्वदंती आदि |
  • अग्रक – निशिताग्र , लम्बाग्र , कुंठाग्र आदि |
  • गठन – पतली , मांसल अथवा चर्मिल आदि |
  • शिरा विन्यास – जालिकारुपी अथवा समान्तर |
  • कटाव – जीर्णपिच्छाकार और जीर्णतर पिच्छाकार , जीर्णतम पिच्छाकार , जीर्ण हस्ताकार |
  • अगर संयुक्त हो तो उसके प्रकार का नाम , जैसे –
  • पिच्छाकार अथवा हस्ताकार यदि पिच्छाकार हो तो द्विपिच्छकी , त्रिपिच्छकी , समपिच्छकी , विषमपिच्छाकार |

यदि हस्ताकार हो तो पर्णिकाओं की संख्या | पर्णिकाओं का वर्णन उपर्युक्त सरल पत्ती के वर्णन के समान करना चाहिए |

  • पुष्पक्रम (inflorescence) :

पुष्पक्रम का प्रकार जैसे सरल असीमाक्षी अथवा ससीमाक्षी और इनके प्रकार भी लिखते है –

  • असीमाक्षी (Racemose) :
  • रेसीम
  • स्पाइक अथवा कणीश अथवा शुकी |
  • स्पेडिक्स
  • केटकिन अथवा मंजरी अथवा नतकणिश
  • स्पाइकलेट अथवा कणिशिका अथवा शुकिका |
  • समशिख
  • छत्रक
  • मुंडक
  • ससीमाक्षी (Cymose) :
  1. एकल (solitary)
  • एकल अंतस्थ
  • एकल कक्षस्थ
  1. एकलशाखी (Monochasial)
  • वृश्चिकी
  • कुंडलित
  • युग्मशाखी (Dichasial)
  1. बहुशाखी
  2. विशेष ससीमाक्षी
  • हाइपैन्थोडियम
  • साएथियम
  • वर्टिसिलास्टर
  • मिश्रित (Mixed) :
  • पेनिकल
  • मिश्रित स्पेडिक्स
  • ससीमाक्षी छत्रक
  • ससीमाक्षी समशिख
  • थायरसस
  • पुष्प (Flower) :

सवृन्त अथवा अवृन्त |

सहपत्री अथवा सहपत्रिका रहित |

पूर्ण अथवा अपूर्ण |

नियमित अथवा अनियमित |

उभयलिंगी अथवा एकलिंगी अथवा बन्धय |

त्रिज्यासम्मित अथवा एकव्यास सममित |

त्रितयी , चतुर्तयी अथवा पंचतयी |

जायांग अथवा अधोजायांगी , परिजायांगी अथवा जायांगोपरिक अथवा उपरिजायांगी |

आकृति , गुलाबवत कीपाकार , चक्रीय , द्विओष्ठीय आदि |

रंग – सफ़ेद , गुलाबी , लाल आदि |

  • बाह्यदलपुंज (Calyx) :

बाह्यदलों की संख्या 3 , 4 , 5 अथवा अधिक |

हरे अथवा दलाभ |

आशुपाती , पर्णपाती अथवा चिरलग्न |

पृथकबाह्यदली अथवा संयुक्त बाह्यदली | यदि पृथकबाह्यदली हो तो बाह्यदल की संख्या और आकार , यदि संयुक्तबाह्यदली हो तो विशेष आकृति का नाम , संख्या और कटाव |

बाह्यदलपुंज – विन्यास – कोरस्पर्शी , व्यावर्तित , कोरछादी अथवा ध्वजकीय |

अधोवर्ती अथवा उच्चवर्ती अथवा उधर्ववर्ती |

  • दलपुंज (Corolla) :

रंग का नाम |

दलों की संख्या 3 , 4 , 5 अथवा अधिक |

पृथकदलीय अथवा संयुक्तदली |

विशेष आकृति , जैसे – अगर पृथकदली हो तो संख्या और विशेष आकार – जीभाकार , स्वस्तिकाकार अथवा क्रॉसरूप , पैपिलियोनेसियस आदि |

अगर संयुक्तदलीय हो तो नलिकाकार , घंटाकार , कीपाकार अथवा द्विओष्ठी |

दलफलक के कटाव का प्रकार |

दलपुंज विन्यास का नाम जैसे कोरस्पर्शी , कोरछादी अथवा व्यावर्तित |

  • परिदलपुंज (Perianth) : इसका वर्णन बाह्यदलपुंज अथवा दलपुंज की भाँती किया जाता है | इसके विवरण में पृथक परिदलीय अथवा संयुक्त परिदली शब्द का प्रयोग करते है |
  • पुमंग (Androecium) :

पुंकेसरों की संख्या जैसे – 2 , 4 , 8 , 10 अथवा अनेक |

पुंकेसरों का ससंजन , जैसे – एकसंघी , द्विसंघी , बहुसंघी , युक्तकोशी , साइनेन्ड्रस |

आसंजन , जैसे – दललग्न , परिदललग्न |

पुंकेसरों की लम्बाई , जैसे – द्विदीर्घी , चतुर्दिघी |

परागकोशों का निवेशन , जैसे – आधारलग्न , संलग्न , पृष्ठलग्न , मुक्तदोली |

अंतर्मुखी अथवा बहुर्मुखी |

पुन्तन्तु – लम्बा , छोटा , गोल अथवा चपटा |

दल विपरीत दल एकांतर अथवा दलभिमुख द्विवर्त पुंकेसरी |

परागकोश – एककोशी अथवा द्विकोशी |

परागकोश का स्फुटन , जैसे अनुदैधर्य , अनुप्रस्थ , संरन्धी अथवा कपाटकीय |

  • जायांग (Gynoecium) :

अंडप की संख्या , जैसे – एकांडपी , द्विअंडपी अथवा बहुअंडपी |

वियुक्ताण्डपी अथवा युक्तांडपी |

अंडाशय – अधोवर्ती अथवा उधर्ववर्ती अथवा उच्चवर्ती |

अंडाशय के कोष्ठकों की संख्या – एककोष्ठकी , द्विकोष्ठकी , त्रिकोष्ठकी , बहुकोष्ठकी |

बीजांडन्यास – सीमांत , स्तम्भीय , भित्तीय , आधारी अथवा परिभित्तीय बीजांडन्यास |

प्रत्येक कोष्ठ में बीजाण्डो की संख्या |

विशेष गुण – रोमिल , अंडाशय तिरछी रखी हुई और मकरन्द कोष है अथवा नहीं |

वर्तिका – टर्मिनल , पाशर्व अथवा जायांगनाभिक |

वर्तिकाग्र – सरल , पालिवत , शाखित , रोमिल अथवा पंखदार , द्विशाखी , समुंड |

  1. फल (Fruit) : एकल फल पुंजफल अथवा संग्रथित फल |

फल का विशेष नाम |

  1. बीज (Seed) : भ्रूणपोषी अथवा अभ्रूणपोषी |

बीजपत्रों की संख्या , जैसे – एकबीजपत्रीय अथवा द्विबीजपत्री |

  1. पुष्प सूत्र (Floral formula) : पुष्प सूत्र लिखने और बनाने के लिए संकेत निचे दिए गए है –
  त्रिज्यासममित (actinomorphic)
  एकव्याससममित (Zygomorphic)
  पुंकेसरी (staminate)
  स्त्रीकेसरी (pistillate)
  उभयलिंगी (hermaphrodite)
  सहपत्री (Bracteate)
  सहपत्रहीन (Ebracteate)
  अनुबाह्यदलपुंज (epicalyx)
  चार पृथक बाह्यदल (four free sepals)
  बाह्यदलपुंज (Calyx)
  दलपुंज (corolla)
  चार पृथक दल (four free petals)
  चार संयुक्त दल (four fused petals)
  परिदलपुंज (perianth)
  चार पृथक परिदल (four free tepals)
  चार संयुक्त परिदल (four fused tepals)
  तीन तीन परिदल दो चक्करों में (three tepals each in two whorls)
  पुमंग (Androecium)
  पाँच पृथक पुंकेसर (five free stamens)
  पाँच संयुक्त पुंकेसर (five fused stamens)
  पाँच पाँच पुंकेसर दो चक्करों में (five stamens each in two whorls)
  पुंकेसर अनुपस्थित (stamens absent)
  पुंकेसर अनगिनत (stamens indefinite)
  जायांग (gynoecium)
  दो पृथक अंडप (two free carpels)
  दो संयुक्त अंडप (two fused carpels)
  अंडप अनुप्रस्थित (carpels absent)
  जायांग उधर्ववर्ती (gynoecium superior)
  जायांग अधोवर्ती (gynoecium inferior)
  जायांग अर्धअधोवर्ती (gynoecium semi inferior)
   

 

(XII) पुष्प चित्र (floral diagram) : पुष्पांतर पर लगे पुष्प के विभिन्न भागों अथवा अंगों की संख्या , व्यवस्था , उनके आपस में सम्बन्ध को पुष्प चित्र अथवा पुष्प आरेख द्वारा दर्शाया जाता है | पुष्प चित्र मातृ अक्ष की स्थिति से सम्बन्ध रखता हुआ बनाया जाता है | इसके लिए पुष्प को इस स्थिति में देखा जाता है कि मातृ अक्ष पीछे की तरफ रहे और सामने पुष्प का आगे का भाग रहे |

पुष्प चित्र में सबसे पहले मातृ अक्ष को एक गोल बिंदु द्वारा दर्शाया जाता है | मातृ अक्ष की तरफ स्थिति पुष्पी भाग पश्च कहलाते है और सामने की तरफ स्थित भाग , अग्र कहलाते है | विभिन्न भागों के पृथक चिन्हों द्वारा दर्शाया जाता है |

पुष्प चित्र में विभिन्न भागों के आसंजन और ससंजन को दर्शाया जाता है |