लोक देवी | राजस्थान की लोक देवियाँ | lok devi | rajasthan ki lok deviya lok devi of rajasthan in hindi

By   May 29, 2020

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राजस्थान की लोक देवियाँ :-

1. करणी माता : करणी माता का जन्म जोधपुर के “सुआप” नामक स्थान पर हुआ था।

इनका बचपन का नाम “रिद्धि बाई” था।

करणी माता बीकानेर के राठौड़ो की कुल देवी है।

करणी माता का जन्म चारण जाति में हुआ था तथा इनके पिता का नाम श्री मेहा जी था।

बीकानेर के “देशनोक” में करणी माता का मंदिर स्थित है। इस मंदिर में बड़ी संख्या में चूहे रहते है , इन चूहों को “करणी जी के काबे” या “काबा” कहते है।

यहाँ सफ़ेद चूहे के दर्शन को शुभ माना जाता है।

यही कारण है कि करणी माता को “चूहों वाली देवी” भी कहा जाता है तथा इनके देशनोक वाले मंदिर को “चूहों का मंदिर” भी कहते है।

देशनोक में नेहडी जी का मंदिर भी है , यहाँ करणी माता स्वयं रहती थी।

करणी माता स्वयं “तेमडेराय माता” की पूजा करती थी  अर्थात करणी माता की इष्ट देवी तेमडेराय माता थी।

देशनोक में तेमडेराय माता का मंदिर भी है।

सफ़ेद चील (संवली) को करणी माता का प्रतिक माना जाता है।

नेहडी जी के मंदिर में एक शमी (खेजड़ी) का वृक्ष है , इस वृक्ष पर करणी माता रस्सी बांधकर दही बिलोया करती थी।

इस वृक्ष की छाल को नाख़ून से उतारकर भक्त अपने साथ ले जाते है। इसे वे पवित्र मानते है।

करणी माता के मंदिर को मठ कहा जाता है। करणी माता के मठ के पुजारी चारण जाति के हुआ करते है। करणी माता के आशीर्वाद से ही राठौड़ शासक “राव बीका” ने बीकानेर की स्थापना की थी। करणी माता को “दाढ़ी वाली डोकरी” भी कहते है।

2. जीण माता

जीण माता के पिता का नाम “धंधराय ” तथा इनके भाई का नाम “हर्ष” था। जीण माता का मंदिर सीकर के “रैवासा” नामक स्थान पर है। इस मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान प्रथम के शासन काल में “हट्टड मोहिल” (सामंत) द्वारा करवाया गया था।

इस मंदिर में जीण माता की अष्ट भुजी प्रतिमा (मूर्ति) लगी हुई है। जीण माता तांत्रिक शक्ति पीठ है।

जीण माता चौहानों की ईष्ट देवी मानी जाती है।

जीण माता को मधुमक्खियों (भौरों) की देवी भी कहा जाता है।

औरंगजेब ने इनके मंदिर में “छत्र” चढ़ाया था।

जीणमाता की प्रतिमा के सामने घी एवं तेल की दो अखण्ड ज्योति हमेशा प्रज्वलित रहती है।

वर्तमान में भी जीण माता के मंदिर का घी “केंद्र सरकार” द्वारा भेजा जाता है।

जीण माता को शेखावाटी क्षेत्र की लोक देवी भी कहा जाता है।

जीण माता का गीत “चिरंजा” है। यह गीत को “कनफटे जोगियों” द्वारा केसरिया कपडे पहनकर माथे पर सिंदूर लगाकर डमरू एवं सारंगी वाद्य यंत्रो के साथ गाया जाता है। जीण माता का यह लोक गीत (चिरंजा) सबसे लम्बा/सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

जीण माता का मेला चैत्र तथा आश्विन माह की शुक्ल नवमी (नवरात्रों) में भरता है।

जीण माता का भाई हर्ष का मंदिर भी पास में हर्ष की पहाड़ी पर स्थित है। इसका निर्माण “गूवक” ने करवाया था।

पुराणों में जीणमाता का जयन्ती देवी नाम से वर्णन किया गया है। जीण माता का अन्य नाम “भ्रामरी देवी (भूरी की राणी)” भी कहा जाता है।

3. सकराय माता

सकराय माता को “शाकम्भरी माता” भी कहा जाता है। सकराय माता का मंदिर झुंझुनू के “उदयपुरवाटी” में स्थित है।
सकराय माता खंडेलवालों की कुल देवी है तथा चौहानों की ईष्ट देवी के रूप में पूजी जाती है।
सकराय माता के मंदिर में पुजारी “नाथ साम्प्रदाय” के होते है। शाकम्भरी माता के अन्य मंदिर “जयपुर के सांभर” तथा उत्तर प्रदेश के “सहारनपुर” में स्थित है।
चैत्र तथा आश्विन महीने के नवरात्रों में देवी माता के मंदिर में मेला भरता है।
ऐसा माना जाता है कि सकराय माता अकाल पीडितो की रक्षा करती है तथा फल सब्जियां तथा कंदमूल-फल आदि उत्पन्न करने में सहायता करती है इसलिए इनका नाम “शाकम्भरी देवी” माता पड़ा।
सकराय माता को स्थानीय बोल चाल में शंकरा माता व शुक्र माता आदि नामो से भी पुकारा जाता है।
सकराय माता को पुराणों में दुर्गा माता और शताक्षी माता कहा गया था।

4. आशापुरा माता

इनका मंदिर जालौर के “मोन्दरा” में तथा “पाली के नाडौल” नामक स्थानों पर है।
आशापुरा माता को “मोंदरा माता ” या “महोदरी माता” नाम से भी जानते है।
आशापुरा माता चौहानों की कुल देवी है तथा यह बिस्सा ब्राह्मणों की भी कुल देवी मानी जाती है। इनको आशा पूर्ण करने वाली देवी माना जाता है इसलिए इनका नाम आशापुरी देवी है। इनकी मूर्ति लगभग 1000 वर्ष पुरानी मानी जाती है।
मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती नामक भाग में भगवती दुर्गा का नाम “महोदरी” उल्लेखित मिलता है।
आशापुरी माता की पूजा करते समय महिलायें हाथो में मेहँदी नहीं लगाती है तथा पूजा करते समय महिलाएं घुंघट रखती है।

5. शीतला माता

इनका मंदिर जयपुर के चाकसू नामक स्थान की शील डूंगरी पर स्थित है।

शीतला माता के इस मंदिर का निर्माण जयपुर के महाराजा माधोसिंह जी द्वारा करवाया गया था।

शीतला माता एक मात्र ऐसी देवी है जिनकी खंडित मूर्ति की पूजा की जाती है।

शीतला माता चेचक रक्षक देवी मानी जाती है। शीतला माता का मेला चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतलाष्टमी) को भरता है। इस दिन बास्योड़ा मनाया जाता है। जिसमे लोग रात को बनाया हुआ ठण्डा भोजन खाते है। शीतला माता को “सिढल माता” , “महामाई माता” तथा बच्चो की संरक्षिका भी कहा जाता है।

स्त्रियाँ संतान प्राप्ति के लिए शीतला माता की पूजा करती है।

प्राय: शीतला माता की पूजा कुम्हार जाति के लोग करते है अर्थात कुम्हार जाति के लोग इनके पुजारी होते है। शीतला माता का वाहन “गधा” होता है।

शीतला माता के अनुयायी जांटी (खेजड़ी) वृक्ष की पूजा करते है। दीपक (मिट्टी की बनी कटोरियाँ) शीतला माता का प्रतिक चिन्ह माना जाता है।

उत्तरी भारत में शीतला माता को महामाई (माता माई) कहते है तथा पश्चिमी भारत में शीतला माता को “माई अनामा” कहा जाता है।

प्रारंभ में शीतला माता का मंदिर मेहरानगढ़ (जोधपुर दुर्ग) में स्थित या वर्तमान में इनका एक मंदिर जोधपुर के कागा क्षेत्र में भी स्थित है।

6. कैला देवी

ऐसा माना जाता है कि कैला देवी अपने पूर्व जन्म में हनुमान जी की माता अंजनी थी। इसलिए कैलादेवी को अंजनी माता भी कहा जाता है।

कैला देवी का मंदिर करौली जिले में कालीसिल नदी के किनारे पर त्रिकूट पर्वत पर स्थित है।

कैला देवी को “जादोन राजवंश” की कुल देवी माना जाता है। कैला देवी को भगवान कृष्ण की बहन सुभद्रा एवं हनुमान जी की माता अंजनी माना जाता है।

अग्रवाल जाति के लोग हनुमान जी को कुल देवता तथा हनुमान जी की माँ “माता अंजनी” को अपनी कुल देवी मानते है।

कैला देवी के भक्तो को “लांगुरिया” कहा जाता है।

कैला देवी का मेला “चैत्र शुक्ल अष्टमी” को वर्ष में एक बार भरता है। इस मेले में मीणा एवं गुर्जर जाति के लोग “घुटकन / लांगुरिया” नृत्य करते है।

कैला देवी के मंदिर के सामने “बोहरा भक्त की छतरी” बनी हुई है जहाँ छोटे बच्चों के रोगों का इलाज किया जाता है।

करौली के कैला देवी मंदिर में बलि नहीं दी जाती है।

इनके भक्त “लांगुरिया गीत” गाते है।

7. आई माता

इनका बचपन का नाम “जीजी बाई ” था। आई माता के गुरु “राम देव जी” थे।

आई माता सीरवी समाज की कुल देवी है।

सिरवी समाज के लोग आई माता द्वारा बनाये गए 11 नियमो की पालना करते है।

आई माता को नवदुर्गा (मानी देवी) का अवतार माना जाता है।

जोधपुर के “बिलाडा” नामक स्थान पर आई माता का मंदिर स्थित है।

सिरवी जाति के लोग आई माता के मंदिर को दरगाह भी कहते है।

आई माता के मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है। इनके मंदिर में दीपक की अखण्ड ज्योति जलती रहती है।

इनके इस दीपक की ज्योति से केसर टपकती है जिसे लगाने से रोग दूर होते है।

आई माता ने बिलाडा में जहाँ समाधि ली थी उस स्थान को “बडेर” कहा जाता है , यह आई माता का थान है।

आई माता ने छुआछुत को कम करने तथा हिन्दू मुस्लिम एकता स्थापित करने को प्रयास किया था।

8. चामुंडा माता

जोधपुर दुर्ग (मेहरान गढ़) में इनका मंदिर स्थित है।

चामुण्डा माता प्रतिहार तथा परिहार वंश की कुल देवी है। सन 1857 ई. में चामुंडा माता के मंदिर पर बिजली गिरने से क्षति पहुंची थी। महाराजा तख़्तसिंह से इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था।

30 सितम्बर 2008 को नवरात्रों में चामुंडा माता के मंदिर में भगदड मच गयी थी जिसके कारण कई लोगो की मृत्यु हो गयी थी। इसे मेहरानगढ़ दुरवान्तिका कहा जाता है। इसकी जांच के लिए “जसराज चौपडा” की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया था।

9. सच्चियाय माता

जोधपुर के “ओसिया” नामक स्थान पर इनका भव्य मंदिर बना हुआ है।

सच्चियाय माता ओसवालों की कुल देवी है। सच्चियाय माता के इस मंदिर का निर्माण संभवत: परमार राजकुमार उपलदेव ने करवाया था। यह मंदिर “महामारू” शैली में निर्मित किया हुआ है।

सच्चियाय माता को “साम्प्रदायिक सद्भाव की देवी” भी कहा जाता है। ओसिया में बना मंदिर प्रतिहार काल में बना हुआ है।

10. लटियाल माता

इनका मंदिर जोधपुर में “फलौदी” नामक कस्बे में स्थित है। लटियाल (लुटियाली) माता “कल्ला ब्राह्मणों” की कुल देवी है।

लटियाल माता को “खेजड बेरी राय भवानी” उपनाम (अन्य नाम) से भी जाना जाता है।

11. तन्नोट माता

जैसलमेर के “तन्नोट” नामक स्थान पर तन्नोट माता का मंदिर स्थित है।

तन्नोट माता भाटी शासकों की कुल देवी थी।

तन्नोट के अंतिम राजा भाटी ने विक्रम संवत 888 में किले व इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

तन्नोट माता को “थार की वैष्णो देवी” तथा “सेना के जवानों की देवी” आदि अन्य उपनामों से जानी जाती है।

तन्नोट माता को रुमाल की देवी कहा जाता है।

B.S.F के जवान तन्नोट माता की पूजा करते है। मंदिर के सामने भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 में भारत की विजय के रूप में एक विजय स्तम्भ बना हुआ है।

12. स्वांगिया माता

इनका मंदिर जैसलमेर जिले के “भादरिया” नामक गाँव में है।

इनको सांगीया या सुग्गा माता भी कहा जाता है।

स्वांगिया माता को जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुल देवी माना जाता है।

सुगनचिड़ी को स्वांगिया माता का पवित्र पक्षी माना जाता है। इसलिए सुगन चिड़ि को स्वांगिया माता का प्रतिक मानते है।

जैसलमेर के राज चिन्ह में देवी के हाथ में मुड़ा हुआ भाला (स्वांग) दिखाया गया है तथा साथ ही इस राज चिन्ह में सुगन चिड़ी (पालम चिड़िया) इस देवी के प्रतिक के रूप में दर्शाया गया है।

13. दधीमती माता

नागौर जिले के गोठ-मांगलोद नामक दो गाँवों की सीमा पर दधीमती माता का मंदिर बना हुआ है। यह मंदिर “महामारू” शैली में निर्मित है , यह मंदिर प्रतिहार कालीन वास्तुकला का माना जाता है। इस मंदिर का शिखर नागर शैली में बना हुआ है। दधीमती माता , “दाधीच ब्राह्मणों” की कुल देवी है।

इस मंदिर में चैत्र तथा आश्विन नवरात्रों में मेले भरते है। इस मंदिर में दधीमती माता का कपाल ही पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि शेष शरीर धरती में ही रह गया क्योंकि जब माता धरती से निकल रही थी तो तेज ध्वनि उत्पन्न हुई जिससे आस पास के लोग दर गए इसलिए माता अपना शेष शरीर बाहर नहीं निकाली।

इसलिए इस क्षेत्र को “कपाल पीठ” भी कहा जाता है। दधीमती माता की मूर्ति के सामने संवत 289 का ध्रुलाना गुप्त शिलालेख लगा है , इसमें सरस्वती माता की प्रार्थना की गयी है तथा इस प्रार्थना के नीचे दधीमती माता की वंदना की गयी है।

इस मंदिर का निर्माण “अविघ्न नाग” नामक दायमा ब्राह्मण के संरक्षण में करवाया गया था।

14. कैवाय माता

नागौर जिले के “किणसरिया” नामक गाँव में कैवाय माता का मंदिर स्थित है।
इस मंदिर की दिवार पर लिखी शिलालेख के अनुसार कैवाय माता के इस मंदिर का निर्माण “चच्च देव”नामक दहिया सामंत द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर की दीवारों पर 10 और शिलालेख उत्कीर्ण है।
कैवाय माता , “दहिया राजपूतों  ” की कुल देवी है। मंदिर में उत्कीर्ण एक शिलालेख में उल्लेखित है कि महर्षि दधीचि ने राक्षसों से युद्ध करने के लिए देवताओं को अपनी हड्डियाँ दान की थी जिससे देवता रक्षसों के विरुद्ध युद्ध करने के लिए हथियार बना सके। महर्षि दधिची के वंशज ही दधिची (दधिचिक) कहलाते है।
कैवाय माता के मंदिर के प्रवेश द्वार पर ” काला – गोरा ” भैरव की दो मूर्तियाँ विराजमान है।

15. भंवाल माता

इनका मंदिर नागौर जिले के भंवाल नामक गाँव में स्थित है। भंवाल माता को ढाई प्याले (2.1/2) शराब चढ़ाई जाती है।

16. राना बाई

राना बाई का मंदिर नागौर जिले के “हरनांवा” नामक गाँव में स्थित है। राना बाई एकमात्र ऐसी महिला संत है जो कुंवारी सती हुई थी। इनका मेला “भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी” को आयोजित होता है। अहमदाबाद युद्ध के दौरान जोधपुर के राजा अभयसिंह की रक्षा राना बाई ने की थी।

17. माता रानी भटियाणी

इनका मंदिर जैसलमेर के “जसोल ” गाँव में स्थित है।
माता रानी भटियाणी का मेला “भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी” को भरता है।

18. रानी सती

इनका वास्तविक नाम “नारायणी देवी” है। रानी सती माता का मंदिर झुंझुनू में स्थित है। रानी (राणी) सती माता का विवाह “तनधन दास अग्रवाल” से हुआ था , इनके पति की मृत्यु के बाद नारायणी सती हो गयी।
रानी सती को “दादी सती” भी कहा जाता है।
रानी सती का मेला प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को आयोजित होता है।
रानी सती अग्रवालों की कुल देवी है।

19. नारायणी माता

अलवर में बरवा डूंगरी पर नारायणी माता का मंदिर बना हुआ है , इस मंदिर का निर्माण “प्रतिहार शैली” में किया गया है।
नारायणी माता “नाई जाति” के लोगों की कुल देवी होती है तथा नारायणी माता के मंदिर में “मीणा जाति ” के पुजारी होते है।

20. ब्राह्मणी माता

बारां जिले के “सोरसन” नामक गाँव में ब्राह्मणी माता का प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर में माता की “पीठ” की पूजा की जाती है। ब्राह्मणी माता एक मात्र ऐसी देवी है जिनकी केवल पीठ की पूजा की जाती है। अग्र भाग की नहीं।
ब्राह्मणी माता का मेला “माघ शुक्ल सप्तमी” को लगता है।  यह गधो का मेला होता है , अर्थात इसमें गधो का क्रय विक्रय किया जाता है।

21. छींक माता

छींक माता का मंदिर जयपुर के गोपालजी के रास्ते में स्थित है। छींक माता का मेला माघ शुक्ल सप्तमी को भरता है।

22. ब्रह्मणि माता

हनुमानगढ़ जिले के “पल्लू” नामक गाँव में ब्रह्मणि माता का मंदिर स्थित है। इस मंदिर में कालिका माता की भी मूर्ति स्थित है।

23. त्रिपुर सुन्दरी

बाँसवाड़ा जिले के तलवाडा गाँव से लगभग 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित “उमराई ” नामक छोटे से गाँव में त्रिपुर सुन्दरी माता का मंदिर स्थित है।
इन्हें “तुरताई माता” भी कहते है।
मुख्यतः “लौहार जाति” के लोग इनकी पूजा करते है।
ऐसा माना जाता है कि त्रिपुर सुन्दरी माता की इस पीठ की स्थापना तीसरी सदी से भी पहले हो गयी थी।
12 शताब्दी के प्रारंभ में चांदा भाई (उर्फ़ पाता लुहार) ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
इस मंदिर के गर्भ ग्रह में काली माँ की अठारह भुजाओ वाली काले पत्थर की मूर्ति विराजमान है।
इस मूर्ति के निचले भाग में “श्री यंत्र (श्री चक्र)” उत्कीर्ण है।
प्रतिवर्ष चैत्र तथा बासन्ती नवरात्रों में त्रिपुर सुन्दरी माता का मेला लगता है।

24. आवरी माता

इन्हें आसावरी माता भी कहा जाता है। चित्तोडगढ में “निकुम्भ” नामक गाँव में “आवरी माता” का मंदिर स्थित है। आवरी माता के मंदिर में लकवाग्रस्त लोगो का इलाज किया जाता है। यह शक्तिपीठ शारीरिक व्याधियो के निवारण के लिए प्रसिद्ध है।

25. बडली माता

चित्तोडगढ जिले के “अकोला गाँव” में बडली माता का मंदिर स्थित है।
यह मंदिर बेडच नदी के तट पर बना हुआ हुआ है।
इस मंदिर में दो तिबारियाँ बनी हुई है , इन तिबारियों से बच्चों को गुजारा जाता है जिससे उनकी बीमारियाँ दूर हो जाती है।

26. अम्बिका माता

उदयपुर जिले में “जगत” नामक गाँव में अम्बिका माता का मंदिर है। इस मंदिर को “शक्तिपीठ” भी कहते है। यह मंदिर महामारू शैली में निर्मित है। अम्बिका माता के इस मंदिर को “मेवाड़ का खजुराहो” भी कहा जाता है। यह मंदिर मातृ देवियों को समर्पित है।
नोट : जोधपुर के जगत गाँव में ही “नृत्य गणपति” का भी मंदिर स्थित है।

27. महामाया

उदयपुर के “मावली” गाँव में महामाया का मंदिर स्थित है।
महामाया को शीश रक्षक लोक देवी माना जाता है।

28. आमजा माता

राजसमंद जिले के “रीछडा ” नामक गाँव में आमजा माता का मंदिर बना हुआ है। भील जाति के लोग आमजा माता की पूजा करते है।

29. भदाणा माता

इनका मंदिर कोटा में स्थित है। भदाणा माता के मंदिर में मूठ पीड़ित (तांत्रिक मारक शक्ति की झडप में आये) व्यक्तियों का इलाज किया जाता है।

30. राजेश्वरी माता

इनका मंदिर भरतपुर में स्थित है। राजेश्वरी माता भरतपुर के जाट राजवंश की कुल देवी है।

31. आवड माता

जैसलमेर के तेमडी भाखर पर्वत पर आवड माता का मंदिर स्थित है।
आवड माता , जैसलमेर के भाटी राजवंश की ईष्ट देवी है।
भक्तजनों द्वारा आवड माता को हिंगलाज माता का अवतार माना जाता है।

32. ज्वाला माता

जयपुर जिले के “जोबनेर” नामक स्थान पर ज्वाला माता का मंदिर स्थित है। इन्हें कछवाहा वंश की शाखा “खंगारोत ” शासकों की कुल देवी माना जाता है।
एक बार जब अजमेर के सेनापति लाल बेग ने जोबनेर के शासक जैतसिंह पर आक्रमण किया था तो ज्वाला माता के रूप में मधुमक्खियो का एक बड़ा झुण्ड लाल बेग की सेना पर टूट पड़ा और उन्हें भागने पर विवश होना पड़ा , इस प्रकार ज्वाला माता ने जोबनेर की रक्षा की।

33. हर्षद माता

इनका मंदिर दौसा जिले के “आभानेरी” नामक स्थान पर है।

34. क्षेमकरी माता

इन्हें क्षेमंककरी / क्षेंमकरी / खिंवल / शुंभकरी देवी आदि नामों से भी जाना जाता है। क्षेमकरी माता को भीनमाल की आदि देवी भी कहते है।
क्षेमकरी माता , सौलंकीराजपूतों की कुल देवी है।
क्षेमकरी माता का मंदिर जालौर के भीनमाल नामक स्थान पर बना हुआ है।

35. शीला देवी

शिला देवी का मंदिर आमेर (जयपुर) में स्थित है। शीला देवी का मंदिर आमेर दुर्ग के जलेब चौक में बना हुआ है।
जयपुर के राजा मानसिंह प्रथम 1599 ईस्वी में शीला देवी की मूर्ति बंगाल से लेकर आये थे और आमेर में स्थापित किये थे।
शिला देवी , जयपुर के कछवाहा राजवंश की आराध्य देवी है। इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप सवाई मानसिंह द्वितीय ने बनवाया था।
शिलादेवी की मूर्ति पाल शैली में काले संगमरमर से बनी हुई है।

36. जमवाय माता

इनका प्रसिद्ध मंदिर जयपुर जिले के जमवा रामगढ नामक स्थान पर स्थित है। जमवाय माता ढूंढाड़ के कछवाहा राजवंश की कुल देवी है।
इनके कारण ही कस्बे का नाम “जमवारामगढ़” पड़ा है।
राजस्थान में जमवाय माता के अन्य मंदिर निम्न है –
  • महरौली एवं मादनी मंढ़ा (सीकर)
  • भौडकी (झुंझुनू)
  • भूणास (नागौर)
जमुवाय माता का प्राचीन नाम जामवंती बताया जाता है। जमवारामगढ के मंदिर में जमवाय माता की मूर्ति , गाय व बछड़े के साथ विराजमान है। इस मंदिर के सामने एवं वटवृक्ष है जिसके नीचे भौमिया जी महाराज प्रतिष्ठित है।

37. घेवर माता

इनका मंदिर राजसमंद झील की पाल (किनारे) पर बना हुआ है। राजसमंद झील की नींव घेवर माता के हाथो से ही रखी गयी थी।

38. अधर देवी / अर्बुदा माता

सिरोही में “माउंट आबू” पर लगभग 4200 फीट ऊँची पहाड़ी पर अधरदेवी (अर्बुदा माता) का मंदिर बना हुआ है।
देवी की मूर्ति को दूर से देखने पर यह धरती को स्पर्श नहीं करते हुए दिखाई देती है , यही कारण है कि इन्हें अधर देवी भी कहा जाता है।
अर्बुद माता का मेला प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा और आश्विन पूर्णिमा को लगता है।

39. नकटी माता

जयपुर के पास जयभवानीपूरा नामक स्थान पर नकटी माता का मंदिर स्थित है। नकटी माता का यह मंदिर गुर्जर प्रतिहार कालीन बना हुआ मंदिर है।

40. जिलाड़ी माता (जिलाणी माता )

इनका मंदिर अलवर जिले के बहरोड़ नामक शहर में बना हुआ है। जिलाणी माता “अलवर क्षेत्र” की लोक देवी है।
प्रतिवर्ष दो बार यहाँ मेला आयोजित होता है।

41. सुंधा (सुंडा) माता

इनका मंदिर जालौर जिले के सुंडा (सुंगधाद्रि) नामक पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर में जालौर के चौहान शासकों का एक शिलालेख भी उत्कीर्ण है।
यहाँ सुंधा माता का केवल सिर पूजा जाता है , मूर्ति में धड नहीं होने के कारण इन्हें अधरेश्वरी (अघटेश्वरी) के नाम से भी जाना जाता है।
यहाँ वैशाख तथा भाद्रपद माह में शुक्ला त्रयोदशी से पूर्णिमा तक मेला भरता है।
सुंधा माता मंदिर ऊँचाई पर स्थित है , मंदिर तक पहुँचने के लिए वर्ष 2007 में “रोप वे” आरम्भ हुआ , यह राजस्थान का प्रथम रोप वे है।

42. बाण माता

इनका मंदिर उदयपुर जिले के “नागदा” नामक स्थान पर है। बाण माता मेवाड़ के गुहिल तथा सिसोदिया वंश की कुल देवी है।

43. पथवारी माता

इन्हें पथिको की रक्षा करने वाली देवी कहा जाता है। पथवारी माता को गाँव के बाहर स्थापित किया जाता है।
पथवारी देवी के चित्रों में नीचे काला-गौरा भैंरू व ऊपर कावड़िया वीर तथा गंगोज का कलश बनाया जाता है। तीर्थ यात्रा की सफलता की कामना करने हेतु राजस्थान में पथवारी माता को लोक देवी के रूप में पूजा जाता है।

44. नागणेची माता

नागणेचियां माता की अठारह भुजाओं की मूर्ति राव बिका ने जोधपुर में स्थापित की थी। नागणेची माता जोधपुर के राठौड़ो की कुल देवी है। श्येन पक्षी / चील पक्षी का नागणेची माता का रूप माना जाता है। यही कारण है कि जोधपुर (मारवाड़) रियासत के राजकीय ध्वज में श्येन पक्षी का चिन्ह अंकित है।

45. सुगाली माता

सुगाली माता की प्रतिमा के 10 सिर तथा 54 (चौपन) हाथ है। सुगाली माता आऊवा के ठाकुरों (चम्पवातों)की कुल देवी है। ज्ञातव्य है कि आउवा स्थान पहले जोधपुर जिले में पड़ता था तथा आउवा 1857 की क्रांति का मुख्य स्थल माना जाता था।
राजस्थान में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत का मुख्य केंद्र सुगाली माता का स्थल ही रहा था।
इसलिए सुगाली माता को 1857 की क्रांति की देवी भी कहते है। वर्तमान समय में सुगाली माता की मूर्ति पाली के म्यूजियम में रखी हुई है।

46. वीरातरा माता

बाड़मेर जिले के चौहटन नामक स्थान पर वीरातरा माता का मंदिर स्थित है। यहाँ चैत्र , भाद्रपद और माघ माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मेले लगते है।
विरातरा माता को “श्री वांकल माता” भी कहते है। विरातरा माता “भोपों” की कुल देवी है।
इस मंदिर की एक विशेषता है कि इस मंदिर के एक तरफ बालू का रेतीला टीला है तथा दूसरी तरफ पहाड़ स्थित है।
यहाँ बकरों की बली दी जाती है और मेले में नारियल की जोत जलाई जाती है।

47. पिपलाद माता

राजसमंद जिले के “ऊनवास” नामक गाँव में गुहिल शासक अल्लट ने दुर्गामाता के मंदिर का निर्माण करवाया था , जिसे पिपलाद माता तथा उनवास की माता के नाम से भी जाना जाता है।

48. कंठेसरी माता

यह आदिवासियों की लोक देवी है।

49. चौथ माता

सवाई माधोपुर जिले में चौथ का बरवाडा के पास एक ऊँची पहाड़ी पर चौथ माता का मंदिर स्थित है। इस मंदिर की स्थापना राजा भीम सिंह द्वारा 1451 में की गयी थी।
इस मंदिर के पीछे गोरे व काले भैरव की प्रतिमाएँ भी स्थित है।
चौथ माता बूंदी के राजघराने की कुल देवी मानी जाती है।
चौथ माता के इस मंदिर में अखण्ड ज्योति जलती रहती है।

50. जोगणियाँ माता

इनका मंदिर भीलवाडा जिले के बेगू कस्बे में स्थित है। इस मंदिर को अन्नपूर्णा माता के मंदिर के नाम से भी प्रसिद्धि प्राप्त है।
जोगनियाँ माता को कंजरो की कुल देवी माना जाता है।
इस मंदिर में “हथकड़ी” चढ़ायी जाती है।

51. सीतामाता

इनका मंदिर प्रतापगढ़ जिले में सिताबाड़ी गाँव से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर सीतामाता वन्य जीव अभयारण्य में स्थित है।
सीतामाता के इस मंदिर में पहुँचने के लिए जाखम नदी को पार करना पड़ता है।
सीतामाता का यहाँ मेला प्रतिवर्ष ज्येष्ठ अमावस्या को भरता है। यहाँ आसपास से ही “सीता माता” नदी का उद्गम स्थान है।
ऐसा माना जाता है कि सीता माता ने अपने अंतिम दिन यही बिताये थे तथा लव कुश दोनों का जन्म यही हुआ था। यहाँ दो लव तथा कुश कुण्ड स्थित है , जिनमे से एक कुण्ड में हमेशा गर्म पानी रहता है तथा दुसरे कुण्ड में ठंडा पानी रहता है।

52. सावित्री माता मंदिर

पुष्कर में रत्नागिरी पहाड़ी पर सावित्री माता का मंदिर स्थित है। सावित्री माता , प्रजापिता ब्रह्मा की पत्नी थी।
इस मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को मेला भरता है।

53. गायत्री माता

पुष्कर में सुरम्य पहाड़ी पर गायत्री माता का मंदिर स्थित है। गायत्री माता का यह मंदिर भगवती के 51 शक्ति पीठों में से एक है।
इस मंदिर में गायत्री माता के मणिबंधों की पूजा की जाती है।
गायत्री माता को “शाप विमोचनी देवी” भी माना जाता है।

54. दांत माता (द्रष्टामाता)

इनका मंदिर कोटा में स्थित है। इन्हें श्री द्रष्टा मोर डेरू माता भी कहा जाता है।
द्रष्टामाता को कोटा राजपरिवार की कुलदेवी मानते है।

55. विंध्यवासिनी माता

इनका मंदिर उदयपुर जिले में है। इनके मंदिर के पास ही एकलिंगजी का मंदिर भी स्थित है।

56. भद्रकाली

भद्रकाली का मंदिर हनुमानगढ़ में स्थित है।
भद्रकाली माता के मेले हर वर्ष चैत्र व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में नवरात्रों पर भरते है।

57. कालिका माता

इनका मंदिर चित्तोडगढ में स्थित है। मेवाड़ के शासक “सज्जन सिंह” ने कालिका माता के इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

58. तुलजा भवानी देवी

तुलजा भवानी देवी माता का मंदिर चित्तोडगढ दुर्ग के अन्दर स्थित है।
तुलजा भवानी देवी “छत्रपति शिवाजी ” के वंश की कुलदेवी है।

59. वटयक्षिणी देवी / झांतला माता – कपासन

इनका मंदिर चित्तोडगढ में स्थित है। यहाँ लकवा जैसे असाध्य रोगों का इलाज किया जाता है।

60. कुशाल माता

कुशालमाता का मंदिर भीलवाड़ा में स्थित है।
राणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को बदनौर (भीलवाड़ा) के युद्ध में पराजित करने की याद में विक्रम संवत 1490 को यह मंदिर बनवाया था।
कुशाल माता के पास बैराठ माता (जाट बैराठ) का मंदिर भी स्थित है।
61. ऊंटा माता : जोधपुर
62. परमेश्वरी माता : कोलायत (बीकानेर)
63. भद्रकाली : हनुमानगढ़
64. मरमर / आदमाता : झालावंश की कुल देवी है |
65. मरकंडी माता : निमाज (पाली)