आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति चुनाव क्या है | समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली गुण दोष proportional representation system in hindi

By   October 29, 2020

proportional representation system in hindi आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति चुनाव क्या है | समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली गुण दोष ?

आनुपातिक प्रतिनिधित्व
आनुपातिक प्रतिनिधित्व का आरम्भ उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था। बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में इंगलैण्ड और फ्रांस को छोड़कर अनेक यूरोपीय देशों ने इस प्रणाली को अपनाया। अनेक देशों के संसदीय चुनावों में आज भी इसका प्रचलन है। उदाहरण के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् 23 दीर्घ-कालीन लोकतन्त्रों में कभी लोकतन्त्र को धक्का नहीं लगा (जिनमें 15 पुराने पश्चिमी यूरोपीय लोकतन्त्र तथा संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, इजराइल तथा कोस्टा रीका शामिल है)। 23 में से 15 ने मुख्य रूप से इस अवधि में आनुपातिक प्रतिनिधित्व को अपनाया, एक (जापान) ने अर्द्ध-आनुपातिक व्यवस्था के अनुसार चुनाव करवाए तथा शेष सात देशों में ही साधारण बहुमत पद्धति जारी रही।

जैसा कि इस प्रणाली के नाम से ही स्पष्ट है, आनुपातिक प्रतिनिधित्व का उद्देश्य साधारण बहुमत प्रणाली के उस दोष को दूर करना है जिसके कारण मतों की संख्या एवं सीटों की संख्या में तालमेल या अनुपात नहीं होता। आनुपातिक प्रतिनिधित्व के द्वारा मतों की संख्या और प्राप्त सीटों की संख्या में अधिक वास्तविक अनुपात हो सकता है। परन्तु, व्यवहार में इस प्रणाली से भी पूरी तरह आनुपातिक प्रतिनिधित्व सम्भव नहीं हो पाता । साधारण बहुमत प्रणाली के विपरीत, आनुपातिक प्रतिनिधित्व वहीं लागू किया जा सकता है जहाँ निर्वाचन क्षेत्र बहु-सदस्यीय हों। अन्य शब्दों में, इस. व्यवस्था का आधार यह है कि जहाँ तक सम्भव हो विधायिका में विभिन्न दल लगभग उस अनुपात . में स्थान प्राप्त कर सकें जिस अनुपात में उन्हें मत प्राप्त हुए हों।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व की दो प्रमुख प्रणालियाँ हैंरू(1) एकल संक्रमणीय मत पद्धति, तथा (2) सूची प्रणाली।

 सूची प्रणाली
सूची प्रणाली, आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एक अन्य प्रमुख पद्धति है। इसका उपयोग भी बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता है। जितने सदस्य चुने जाने होते हैं, प्रत्येक पार्टी उतने-उतने उम्मीदवारों की सूचियाँ मतदाताओं के समक्ष प्रस्तुत करती हैं। अतः, यदि किसी क्षेत्र से सात सदस्यों का निर्वाचन होना है तो प्रत्येक दल अपने सात उम्मीदवारों की सूची वरीयता के आधार पर तैयार करता है। अर्थात् पार्टी अपनी सूची में उसका नाम सबसे ऊपर रखती है जिसको वह प्रथम स्थान पर चुनवाना चाहती है। मतदाता किसी न किसी सूची के पक्ष में मतदान करते हैं, किसी उम्मीदवार के पक्ष में नहीं। एकल संक्रमणीय मत पद्धति की भान्ति सूची प्रणाली में भी प्रत्येक क्षेत्र में मतों का एक कोटा निर्धारित किया जाता है। किसी पार्टी की सूची के पक्ष में यदि प्राप्त मतों की संख्या उदाहरण के लिए कोटे के तीन गुणा के बराबर है तो उस सूची के ऊपर के तीन उम्मीदवार निर्वाचित घोषित कर दिए जायंगेद्य कोटे के आधे से अधिक मतों को एक कोटा गिना जाता है तथा आधे से कम को छोड़ दिया जाता है।

स्विट्जरलैण्ड में संसदीय चुनावों के लिए इस पद्धति का किंचित परिवर्तित रूप में प्रयोग में लाया जाता है। वहाँ प्रत्येक मतदाता को सूचियों के अतिरिक्त एक खाली मतपत्र भी दिया जाता है। कोई मतदाता या तो किसी एक सूची के पक्ष में मतदान कर सकता है, या फिर विभिन्न सूचियों में से नाम लेकर अपनी एक सूची बना सकता है।

अर्द्ध-आनुपातिक प्रणाली
कुछ देशों ने आंशिक (या अर्द्ध) आनुपातिक प्रणाली अपनाई है। राष्ट्रीय स्तर पर, जापान ने प्रतिनिधि सदन के चुनाव में 1947 से 1993 तक एकल-और हस्तांतरणीय पद्धति अपनाई गई। इस पद्धति में बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों (जापान में प्रायः 3, 4 या 5 सदस्यीय) में प्रत्येक मतदाता को एक मत देने का अधिकार था। वे उम्मीदवार जिन्हें सबसे अधिक मत प्राप्त हों निर्वाचित घोषित कर दिए जाते हैं। इस पद्धति में (जिसे सीमित मत पद्धति भी कह सकते है) छोटे राजनीतिक दलों को भी कुछ न कुछ स्थान प्राप्त हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी चार-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में यदि कोई पार्टी केवल एक उम्मीदवार खड़ा करती है, और उसे 20 प्रतिशत से अधिक मत मिल जाएँ तो वह अवश्य निर्वाचित हो सकता है। ऐसा, बिना औपचारिक आनुपातिक पद्धति के प्रयोग किए सम्भव हो सकता है।

एक अन्य प्रथा का प्रयोग जातीय अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए किया जा सकता है। यह न तो साधारण बहुमत प्रणाली है, और न आनुपातिक न्यूजीलैण्ड में कुछ माओरी (डंवतप) क्षेत्र हैं जिनमें केवल माओरी मतदाता ही मतदान कर सकते हैं। भारत के संविधान में प्रावधान है कि कुछ विशेष वर्गों (अनुसूचित जातियों और जनजातियों) को संसद और विधान सभाओं में आरक्षण प्राप्त होगा। भारत की व्यवस्था के अनुसार, कुछ क्षेत्रों को आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है जहाँ से केवल अनुसूचित जाति या जनजाति के उम्मीदवार ही चुने जा सकते हैं, चाहे मतदान का अधिकार क्षेत्र के सभी मतदाताओं को होता है। यह मात्र आरक्षण है, आनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं।

स्लेट प्रणाली
यह एक अनोखी व्यवस्था है। इस पद्धति के द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका में, राष्ट्रपति के चुनाव के लिए गठित किए जाने वाले निर्वाचक मंडल (Electoral College) के सदस्यों के चुनाव के लिए किया जाता है। प्रत्येक राज्य में (चुने जाने वाले निर्वाचकों की संख्या के बराबर) विभिन्न दल अपनी-अपनी सूची तैयार करते हैं। इस सूची को स्लेट कहा जाता है। मतदाता किसी एक उम्मीदवार को अपना मत न देकर, किसी एक सूची (स्लेट) के पक्ष में मतदान करते हैं। जिस स्लेट को बहुसंख्यक मत प्राप्त होते हैं वह पूरी की पूरी स्लेट (सूची) चुन ली जाती है। दूसरी सूची में से कोई भी निर्वाचित नहीं होता। अतः, यदि किसी सूची के पक्ष में 51 प्रतिशत मत पड़ें तो वह पुरी चुन ली जायगी। इस प्रकार उदाहरण के लिए कैलीफोर्निया (California) राज्य में 51 प्रतिशत मत डैमोक्रेट्स की सूची को मिलते हैं तो उसके सभी 54 डैमोक्रेट्स चुन लिए जायंगे, तथा रिपब्लिकन पार्टी का एक भी डैमोक्रेट्स नहीं होगा। इसे हम साधारण बहुमत प्रणाली का एक रूप कह सकते

 सामूहिक मत प्रणाली
इस प्रणाली को भी आंशिक आनुपातिक पद्धति की श्रेणी में रख सकते हैं। इसमें यदि कोई धार्मिक, जातीय या भाषायी अल्पसंख्यक वर्ग चाहे तो अपने सभी मत एक उम्मीदवार के पक्ष में डालकर उसकी विजय सुनिश्चित कर सकते हैं। यह प्रणाली भी बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में ही लागू होती है। अतः, यदि किसी क्षेत्र से दस सदस्य चुने जाने हैं तो प्रत्येक मतदाता को दस मत देने का अधिकार होगा। वह जिस प्रकार चाहे उन दस मतों का प्रयोग करेद्य चाहे तो वह दस अलग-अलग उम्मीदवारों को एक-एक मत दे, या उन्हें दो या तीन उम्मीदवारों में विभाजित कर दे, या फिर सभी दस मत एक ही उम्मीदवार के पक्ष में दे दे। मतपत्र पर किस को कितने मत दिए उसकी संख्या लिखनी होती है। मतदाता स्वेच्छा से 1, 2, 5 या फिर 10 जितने मत किसी को भी देना चाहे लिख देगा, परन्तु मतों का योग दस से अधिक नहीं होना चाहिए। मतगणना के पश्चात् वे दस उम्मीदवार चुने जायंगे जिन्हें सबसे अधिक मत मिलें होंगे।

बोध प्रश्न 2
नोटः क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) कुछ देशों ने आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली को क्यों अपनाया है?
2) सूची प्रणाली तथा एकल संक्रमणीय मत पद्धति में क्या अंतर है?
3) एकल संक्रमणीय मत पद्धति का वर्णन कीजिए।
4) सामूहिक मत प्रणाली क्या है?

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) आनुपातिक प्रतिनिधित्व, साधारण बहुमत प्रणाली के दोष को दूर करने का साधन है। इससे मतों की संख्या तथा चुने गए उम्मीदवारों एवं उनके दलों के मध्य समुचित अनुपात स्थापित होता है। (देखें भाग 22.3)
2) सूची प्रणाली में मतदाता किसी एक पार्टी की सूची के पक्ष में मतदान करते हैं, जबकि एकल संक्रमणीय मत पद्धति में मतदाता अपनी पसंद के अनुसार अपने मत को हस्तांतरित करवाने का संकेत कर सकते हैं। (देखें भाग 22.3.1 और 22.3.2)
3) प्रत्येक मतदाता का एक मत होता है (निर्वाचन क्षेत्र बहु-सदस्यीय होते है)। मतदाता अपनी पसंद का संकेत करते हैं, जिसके अनुसार यदि आवश्यक हो तो मत हस्तांतरित किए जा सकते हैं। एक कोटा निर्धारित किया जाता है। उसके बराबर मत पाने वाले विजयी होते हैं। विजयी उम्मीदवार के अतिरिक्त मत और कम मत प्राप्त उम्मीदवारों के मतों को अन्य उम्मीदवारों को हस्तांतरित कर दिए जाते हैं ताकि वे कोटा पूरा कर सकें और जीत जाएँ। (देखें भाग 22.3.1).
4) सभी मत एक ही उम्मीदवार के पक्ष में डाले जा सकते हैं, या फिर उन्हें मतदाता विभिन्न उम्मीदवारों के पक्ष में विभाजित कर सकता है। (देखें भाग 22.3.5)

चुनाव प्रक्रिया
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
बहुमत-आधारित व्यवस्थाएँ
साधारण बहुमत प्रणाली अथवा विजय स्तंभ पर पहले पहुंचने की प्रणाली
द्वितीय मतदान प्रणाली
अन्य प्रणालियाँ
बहुमत-आधारित व्यवस्थाओं के दोष
आनुपातिक प्रतिनिधित्व
एकल संक्रमणीय मत पद्धति
सूची प्रणाली
अर्द्ध-आनुपातिक प्रणाली
स्लेट प्रणाली
सामूहिक मत प्रणाली
चुनावी प्रक्रिया तथा राजनीतिक दल
पार्टी एकता तथा लगाव
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में आप चुनावी प्रक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे। साथ ही आप प्रतिनिधित्व की विभिन्न प्रणालियों एवं पद्धतियों के विषय में भी पढ़ेंगे।
इस इकाई का अध्ययन करने के पश्चात्, आपः
ऽ चुनाव प्रक्रिया का अर्थ स्पष्ट कर सकेंगे,
ऽ प्रतिनिधित्व की विभिन्न प्रणालियों का पुनः स्मरण कर सकेंगे,
ऽ विभिन्न चुनावी प्रणालियों की तुलना कर सकेंगे,
ऽ बहुमत-आधारित बहुलवादी व्यवस्था का वर्णन कर सकेंगे,
ऽ आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणालियों की समीक्षा कर सकेंगे, तथा
ऽ राजनीतिक दलों और निर्वाचन प्रक्रिया के सम्बन्धों की व्याख्या कर सकेंगे।