वृद्धों की समस्या और समाधान | वृद्धजनों की समस्या तथा उसके कारणों की व्याख्या कीजिए problems of old age essay in hindi

By   January 17, 2021

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वृद्धों की समस्या का स्वरूप
वृद्धों के प्रति पूर्वग्रह तथा पक्षपातपूर्ण व्यवहार में वृद्धि को स्पष्ट रूप से देखा गया है। यहाँ तक कि वृद्ध (बूढ़े) लोग शब्द ने अपमानसूचक अर्थ ले लिया है तथा जब वृद्ध लोगों से विनम्रता से पेश आते हैं तो अंग्रेजी भाषा में वृद्ध (aged), वयोवृद्ध (aging), बुजुर्ग (elderly), वरिष्ठ नागरिक (senior citçens) जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। हमे शुरू में ही वृद्धांे की समस्याओं की जटिलता का सामना करना पड़ता है जब यह प्रश्न उठता है कि वृद्ध कौन है? व्यवहार में उन लोगों को वृद्ध कहा जाता है जो जीवन की एक विशेष आयु को पूरा कर चुके होते हैं। विकसित देशों में जहाँ पर जीवन संभाव्यता अपेक्षाकृत अधिक है वहाँ लोग 65 वर्ष की आयु पार करने के बाद ही वृद्धों की श्रेणी में आते हैं किंतु विकासशील देशों में जैसे कि भारत में जहाँ पर अपेक्षाकृत कम जीवन संभाव्यता है इस अवधि को 60 वर्ष माना गया है। इन दोनों ही मामलों में वृद्ध होने की परिभाषा अस्पष्ट है। यह तो उसी प्रकार से है जैसे कि आप किसी दिन प्रातः सोकर उठें और अपने आपको एक बूढ़े व्यक्ति के रूप में पाएँ। वृद्ध होना अकस्मात् नहीं होता यह तो बहुत जटिल और क्रमिक प्रक्रिया है।

 समस्या के आयाम
वृद्ध होना एक जटिल और क्रमिक प्रक्रिया है जिसमें जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयाम होते हैं जो एक-दूसरे से न ही मिलते हैं। और न ही ये किसी व्यक्ति की कालक्रमिक आयु (chronological age) के अनुरूप होते हैं। तथापि, यह सत्य है कि कालक्रमिक आयु बढ़ती हुई आयु और विकासात्मक प्रक्रिया का एक सूचक है जो जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयामों में पूरा होता है। इसलिए अध्ययन के उद्देश्य के लिए कालक्रमिक परिभाषा वृद्ध अवस्था में क्या-क्या होता है, यह जानना लाभप्रद होगा। किंतु महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसी निर्धारित आयु-वर्ग, उदाहरण के लिए 60-64 वर्ष पर यह समरूप श्रेणी (homogeneous category) बनती है क्योंकि जैविक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक विकास की गति सभी व्यक्तियों में समान नहीं होती।

वृद्धों की समस्या तो तब उठती है जब वे वृद्धावस्था की तरफ अग्रसर होते हुए अपने जीवन में कुछ विशेष घटनाओं का सामना करते हैं और उन्हें समाज से सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है। इस तरह की घटनाओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम श्रेणी की घटनाएँ वृद्ध व्यक्तियों के विकास से संबंधित होती हैं जबकि दूसरी श्रेणी में ऐतिहासिक काल की घटनाएँ होती हैं, जब व्यक्ति वृद्ध हो रहा होता है। अतः समाज में वृद्धों की प्रस्थिति को जनसांख्यिकीय संक्रमण, उद्योगीकरण, आधुनिकीकरण आदि प्रक्रियाएँ प्रभावित करती हैं।

 वृद्ध व्यक्ति विशेष के समक्ष समस्याएँ
आइए, अब हम पहले उन समस्याओं के संबंध में विचार करें जिनका सामना व्यक्ति जब वृद्ध हो रहा होता है तो वह अपने जीवन के जैव-शारीरिक (bio-physiological), मनोवैज्ञानिक और सामाजिक क्षेत्रों में करता है। जब व्यक्ति बाल्यावस्था से युवावस्था व प्रौढ़ावस्था को पार करके वृद्धावस्था से गुजरता है तो कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं के अनुभवों के कारण उसके दैनिक व्यवहार में बहुत परिवर्तन आ जाता है। ये घटनाएँ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विशिष्ट होती हैं:
क) जैव-शारीरिक क्षेत्र में जैसे-जैसे व्यक्ति विकसित होता है तो जीवन में वह प्रजनन क्षमता की प्राप्ति व ह्रास, शारीरिक शक्ति की वृद्धि एवं ह्रास, कोशिकाओं एवं कार्यों का ह्रास अनुभव करने के साथ-साथ शरीर के विभिन्न अंगों में रोग के प्रति बढ़ती हुई आग्राहिता का अनुभव करता है।
ख) मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में व्यक्ति अपनी बोध क्षमताओं के विकास का अनुभव करता है। उसे अपने जीवन-लक्ष्यों और आत्म-पहचान का आभास होता है। इसके साथ-साथ वह वृद्ध होता है तो उसके जीवन लक्ष्य संकुचित हो जाते हैं और उसकी आत्म-छवि और नकारात्मक प्रतीत होने लगती है।
ग) सामाजिक क्षेत्र में अपने जीवन के प्रारंभिक चरण में जब व्यक्ति वयस्क हो जाता है तो उसके परस्पर कार्यकलापों में वृद्धि हो जाती है जैसे कार्य, विवाह, परिवार का पालन-पोषण और सामाजिक संगठनों में सदस्य बन जाना। इन कार्यकलापों में उसके अधेड़ होने तक अनुभवों एवं जिम्मेदारियों में बढ़ोत्तरी होती रहती है और वृद्धावस्था में उसकी भूमिकाएँ या तो समाप्त हो जाती हैं या उसके उत्तरदायित्व और शक्ति में ह्रास हो जाता है। अतः व्यक्ति के वृद्ध होने पर जीवन के सभी क्षेत्रों में उसकी समाज में सामंजस्य स्थापित करने की क्षमता कम हो जाती है।

तथापि मानव की समाज में तालमेल करने की योग्यता न केवल विद्यमान विशेषताओं और क्षमताओं पर निर्भर करती है बल्कि समाज में वृद्धों के समायोजन के लिए मौजूदा सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों द्वारा भी उनको सहायता प्रदान की जा सकती है चाहे वे अनुकूल हों अथवा न हों। यह सब वृद्धों के जीवन काल के दौरान घटने वाली प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं पर भी निर्भर करता है।

 जनसांख्यिकी एवं सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन तथा वृद्ध जन
कई बार इतिहास में युगांतकारी परिवर्तन होते हैं जो समाज में सामंजस्य बनाने के लिए वृद्धों सहित सभी लोगों में बुनियादी परिवर्तन लाते हैं। एक महत्त्वपूर्ण घटना यह हुई है कि अर्थव्यवस्था का पूर्व-औद्योगिक ढाँचे से औद्योगिक ढाँचे में रूपांतरण हुआ है। यह रूपांतरण सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों के साथ हुआ है। इसे आधुनिकीकरण कहते हैं। इस घटना से वृद्धों की स्थिति के दूरगामी परिणाम सामने आए हैं जिसके परिणामस्वरूप जनसंख्या में उनके अनुपात में वृद्धि हुई है और समाज में उनके सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाइयाँ बढ़ती जा रही हैं।

क) जनसांख्यिकीय संक्रमण एवं वृद्ध
जनसंख्या में वृद्धों के अनुपात में वृद्धि सीधे ही जनसांख्यिकीय संक्रमण प्रक्रिया से जुड़ी है जो आर्थिक विकास तथा आधुनिकीकरण के द्वारा लायी गई है। यह विशेष रूप से ध्यान देने वाला तथ्य है कि हमारी जनसंख्या में वृद्धों के अनुपात में हो रही वृद्धि बढ़ती हुई दीर्घ आयु अथवा जीवन संभाव्यता के कारण है जो कि अंशतः सच है। वास्तव में, प्रमुख कारण लोगों की जन्म दर का गिरना है। इसका अभिप्राय है कि समाज में महिलाओं की शिशु जन्म दर की औसत में विशेष कमी आई है। दूसरी ओर जन्म दर में परिवर्तन होना जनसांख्यिकीय संक्रमण का एक पहलू है।

जनसांख्यिकीय संक्रमण का तात्पर्य है वह प्रक्रिया जिसके द्वारा कोई देश अथवा समाज अपनी उच्च जन्म दर और मृत्यु दर से किस प्रकार निम्न जन्म दर और निम्न मृत्यु दर की ओर अग्रसर होता है। पहली स्थिति को पूर्व-संक्रमण अवस्था (pre-transitional stage) के नाम से जानते हैं और दूसरी स्थिति को उत्तर-संक्रमण अवस्था (post-transitional stage) के नाम से जानते हैं। इन दोनों अवस्थाओं के बीच की अवधि को संक्रमण अवस्था के नाम से जानते हैं जिसको फिर से प्रारंभिक, मध्य और बाद की अवस्थाओं में विभाजित किया गया है। जब तक धीरे-धीरे संतुलन नहीं हो जाता तब तक संक्रमण अवस्था के दौरान जन्म दर की तुलना में मृत्यु दर में अपेक्षाकृत तेजी से कमी आती है और धीरे-धीरे इनके बीच संतुलन हो जाता है। इससे उत्तर-संक्रमण अवस्था में पर्दापण होता है।

पिछले कुछ दशकों में भारत में ऐसा अनुभव किया गया है कि मृत्यु दरों और जन्म दरों में परिवर्तन में एक विशिष्ट विन्यास होने से जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई है। इसी प्रकार जैसे-जैसे जन्म दर गिरती जा रही है, एक ओर जनसंख्या के आयु परिवृत्य के कारण, बच्चों का अनुपात गिर रहा है और दूसरी और वृद्धों का अनुपात बढ़ रहा है। समाज में जितनी कम प्रजनन दर होगी, उतना ही ज्यादा वृद्धों का अनुपात होगा। इसलिए जो विकसित देश निम्न प्रजनन दरों के कारण अपनी उत्तर-संक्रमण अवस्था में हैं, कुल मिलाकर उनमें भारत जैसे विकासशील देशों के मुकाबले जनसंख्या में वृद्धों का उच्च अनुपात है।

ख) औद्योगिकीकरण, आधुनिकीकरण एवं वृद्धजन
औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण ने जनसांख्यिकीय संक्रमण तो किया ही है, इसके अलावा समाज के संस्थागत ढाँचे में आमूल परिवर्तन भी किए हैं जिससे समाज में वृद्धों के तालमेल की पद्धति भी प्रभावित हुई है। इसको परिवार की संस्था में परिवर्तनों के संदर्भ में और स्पष्ट किया जा सकता है जो कि पूर्व-औद्योगिक समाज में वृद्धों के सामंजस्य को आसान बनाने में एक प्रमुख कारक था। इसे दूसरे शब्दों में इस प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है कि एक वृद्ध व्यक्ति अपने जैविक, मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक संसाधनों की कमी के कारण समाज में अपनी सुरक्षा और स्तर में ह्रास का अनुभव करता है और जोखिम उठाता है। वृद्ध के जीवन के जोखिम की भरपाई पूर्व औद्योगिक समाज में उसके परिवार के विशेष स्वरूप के अंतर्गत की जाती है और परिवार में वृद्धों को विशेष स्थान दिया जाता है।

पूर्व-औद्योगिक समाज में परिवार भी उत्पादन की एक इकाई होता था तथा उत्पादनकारी सम्पत्ति का नियंत्रण परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के हाथों में होता था जो उनकी व्यक्तिगत विशेषताओं में कमी आने के बावजूद उनके प्रभाव एवं उनकी स्थिति को कायम रखता था। इसी प्रकार कोई वृद्ध अपने पारिवारिक उद्यम में उस समय तक जब तक कि उसके स्वास्थ्य की स्थिति अच्छी रहे, काम कर सकता है और घटती हुई कार्यक्षमता के अनुरूप ही वह वो कार्य करता है जिस कारण उसकी जीर्णन प्रक्रिया (aging process) धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। दूसरी ओर आधुनिक औद्योगिक समाज में परिवार अपने उत्पादन प्रकार्य से अलग होने लगता है तथा परिवार के युवा या कनिष्ठ संबंधी अपने-अपने परिवार को और अधिक समृद्ध बनाने के उद्देश्य से अपने वरिष्ठ सदस्यों से आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के लिए अलग हो जाते हैं। इससे परिवार का ढाँचा बदल जाता है।
औद्योगिक समाज में नए किस्म के पारिवारिक ढाँचे में प्रायः वृद्धों को अपने भरोसे छोड़ दिया जाता है। जबकि सामाजिक सामंजस्य बनाए रखने की उनकी क्षमता भी कम होने लगती है। इसी दौरान, औद्योगिक अर्थव्यवस्था में आर्थिक तर्कसंगति के आधार पर वृद्धजन अनैच्छिक रूप से लाभकारी रोजगार से हटा दिए जाते हैं। जबकि उनमें उस समय तक उत्पादनकारी योग्यता मौजूद होती है या मामूली सी कम हो जाती है। इस तरह से उनकी आर्थिक असुरक्षा में और अधिक वृद्धि होती है तथा इससे वृद्ध होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।

सामान्यतः वृद्धों की समस्या के संबंधों में पूर्वोलिखित विवरण की पृष्ठभूमि में हम भारत में रहने वाले वृद्धों की समस्याओं के कुछ पहलुओं की आगे चर्चा करेंगे। वृद्धों की कुछ जनसांख्यिकीय, आर्थिक तथा उनकी स्वाथ्य संबंधी स्थिति के बारे में देखी गई प्रवृत्तियों और उनके रहने की व्यवस्था एवं समाज में उनका सामंजस्य तथा उनकी समस्या के समाधान में लोगों की प्रतिक्रिया के संबंध में आगे विवेचना की गई है।
सोचिए और करिए

कुछ वृद्ध लोग अवश्य ही आस-पड़ोस में आपके संपर्क में आते रहते होंगे। अपने अनुभव और बातचीत के आधार पर एक टिप्पणी लिखिए। वे कौन-से कारण हैं जिनसे वृद्धों के लिए गहन समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। यदि संभव हो तो अध्ययन केंद्र के अन्य विद्यार्थियों से अपनी टिप्पणी की तुलना कीजिए।

 वृद्धों की जनसांख्यिकीय विशेषताएँ
भारत सरकार द्वारा प्रत्येक दस वर्ष के बाद की जाने वाली जनगणना से जनसंख्या की औसत आयु (आयु विभाजन) के बारे में सूचना मिलती है जिससे हमको वृद्धों की जनसांख्यिकीय विशेषताओं में व्याप्त प्रवृत्तियों की जानकारी मिलती है। यद्यपि अंतिम जनगणना वर्ष 1991 में की गई थी लेकिन यहाँ (1991 में) आयु से संबंधित जानकारी 1981 की जनगणना के आधार पर दी गई है। जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि यह बात भी ध्यान में रखनी आवश्यक है कि अनेक दूसरे विकासशील देशों की तरह ही भारत में भी वृद्धों की आयु को परिभाषित करते समय केवल उन लोगों की आयु को ही सम्मिलित किया गया है जो अपने जीवन के 60 वर्ष पूरे कर चुके हैं जबकि विकसित देशों में अंतिम आयु या औसत आयु 65 वर्ष निर्धारित की गई है। इससे विकासशील देशों और विकसित देशों की आयु में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। भारत में रोजगार के संगठित क्षेत्रों में अधिकांश मामलों में अनिवार्य सेवा-निवृत्ति पहले कर दी जाती है जबकि सरकारी सेवाओं में सेवा-निवृत्ति की आयु 58 वर्ष है और शैक्षिक संस्थाओं तथा निजी निगमों में यह सामान्यतः 60 वर्ष है।

 वृद्धों की जनसंख्या में वृद्धि
वृद्धों की जनसंख्या का आकार और विशेषकर उनका कुल जनसंख्या में अनुपात समाज में वृद्धों के सामंजस्य में एक महत्त्वपूर्ण कारक है। वृद्धों की जनसंख्या का आकार और अनुपात जितना कम होगा, उतने ही अच्छे सामंजस्य स्थापित करने के बेहतर अवसर होते हैं। भारत में वृद्धों के अनुपात के बारे में अनुमान लगाने के लिए आपको तालिका 1 में दिखाए गए व्यापक आयु-वर्गों के द्वारा कुल जनसंख्या के प्रतिशत वितरण के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकती है।

तालिका 1: व्यापक आयु-वगों द्वारा कुल जनसंख्या का प्रतिशत वितरण, 1901-2000
जनगणना आयु-वर्ग
वर्ष 0-14 15-29 60$ सभी आयु
1901 38.60 56.35 5.05 100
1911 38.45 56.40 5.15 100
1921 39.20 55.55 5.25 100
1931 40.00 55.95 4.05 100
1041 38.25 56.85 4.90 100
1951 37.50 56.85 5.65 100
1961 41.00 53.36 5.64 100
1971 42.02 52.01 5.97 100
1981 39.54 53.93 6.52 100
1991 37.3 55.5 6.8 100
2001 – – 7.6 –
स्रोत: 1901-1971 के लिए ई.एस.सी.ए.पी., 1982 कंट्री मोनोग्राफ सीरीज नं. 10 भारत की जनसंख्या, तालिका सं. 43। 1991 के लिए भारत की जनगणना 1991/2000 के लिए योजना आयोग।

यदि आप कुछ क्षणों के लिए तालिका 1 में दिए गए कालम को ध्यान से देखें जिसमें 60़ वर्ष के समूह से संबंधित वृद्धों का प्रतिशत दिया गया है तो आपको पता चलेगा कि वर्ष 1901 से 2000 तक के लिए यह प्रतिशत 5.05 से 7.6 तक है। इन तथ्यों को ध्यान में रखने से पता चलता है कि कुछ विकसित देशों में 60 वर्ष से अधिक लोगों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है किंतु भारत में वृद्धों की आयु का प्रतिशत प्रभावपूर्ण नहीं लगता परंतु यह महत्त्वपूर्ण बात है कि 1950 के दशक से भारत में वृद्धों की आयु का प्रतिशत लगातार तेजी से बढ़ा है, वर्ष 2000 में यह 7.6 तक पहुंच गया है। वृद्धों की जनसंख्या के प्रतिशत में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। चूंकि भारत हाल ही के दशक में जनसांख्यिकीय संक्रमण की विश्व प्रक्रिया की संक्रमण अवस्था से गुजर रहा है और तदनुसार आने वाले दशकों में वृद्धों के प्रतिशत में वृद्धि दर बहुत तेजी से बढ़ेगी।

भारत में वृद्धों की जनसंख्या की एक अन्य आश्चर्यजनक विशेषता इसका प्रभावपूर्ण सुनिश्चित आकार है। वर्ष 1981 में इनकी जनसंख्या 4.3 करोड़ थी, 1991 में यह अनुमानतः 5.5 करोड़ रही और वर्ष 2001 में यह संख्या 7.5 करोड़ की सीमा को छू गई। किसी भी मानक पर ये चुनौती देने वाले आँकड़े हैं यदि हम उनकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए वृद्धों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रयासों तथा संसाधनों को जुटाते हैं।

 निर्भरता अनुपात
विभिन्न आयु-वर्गों में जनसंख्या के वितरण के महत्त्व को प्रदर्शित करने के लिए अनेक तरीके हैं। इनमें से एक महत्त्वपूर्ण तरीका यह है कि उस बोझ के आकार को अनदेखा नहीं किया जा सकता जो (0-14) तथा (60़) आयु के लोगों की जनसंख्या का कामकाजी (15-59) आयु-वर्ग के लोगों की जनसंख्या पर पड़ता है। कनिष्ठ जनसंख्या के द्वारा पड़ने वाले भार को युवा निर्भरता अनुपात कहते हैं तथा जिससे 0-14 आयु-वर्ग में जनसंख्या के प्रतिशत को 15-59 आयु-वर्ग में जनसंख्या के प्रतिशत से विभाजित करके तथा भागफल को 100 की संख्या से गुणा करके निकाला जाता है। इसी तरह से वृद्धों की जनसंख्या से पड़ने वाले भार को वृद्ध निर्भरता अनुपात कहते हैं और जिसे 60़ आयु समूह की जनसंख्या के प्रतिशत को 15-59 वर्ष आयु-वर्ग के प्रतिशत से विभाजित करके और भागफल को 100 से गुणा करके निकाला जाता है। निर्भरता अनुपात की बुनियादी जानकारी तालिका-2 से प्राप्त की जा सकती है तथा अभ्यास के तौर पर विभिन्न वर्षों के लिए ये अनुपात प्राप्त किए जा सकते हैं।

भारत की जनसंख्या की युवा प्रकृति के कारण देश के समक्ष बहुत बड़ी जनसंख्या में युवा निर्भरता अनुपात विद्यमान हैं जो 1971 में सबसे अधिक 80 प्रतिशत से ज्यादा था। दूसरी ओर वृद्ध निर्भरता अनुपात बहुत कम है। यह अनुपात 1951 तक 10 प्रतिशत से ऊपर नहीं गया था। परंतु 1961 से यह अनुपात बढ़ता ही जा रहा है और 1991 में एक समय ऐसा आया जब यह अनुपात 12.26 प्रतिशत तक पहुँच गया था। यह अनुपात पिछले नौ दशकों के दौरान सबसे अधिक था। जैसा कि तालिका 2 में दिखाया गया है वृद्ध निर्भरता अनुपात में वृद्धि होगी।

तालिका 2: भारत में लिंग-वार वृद्धावस्था पराश्रितता अनुपात जोड़ पुरुष
महिला जोड़ पुरूष महिला
1961 10.93 10.91 10.94
1971 11.39 11.39 11.57
1981 12.04 11.84 12.24
1991 12.26 12.16 12.29
1996 12.00 11.99 12.02
2001 11.88 11.72 12.05
2011 12.84 12.67 13.01
2016 14.12 13.94 14.31

यद्यपि, युवा और वृद्ध निर्भरता अनुपात की प्रवृत्तियाँ विपरीत दिशा की ओर जाती हैं, इससे कामकाजी आयु के लोगों द्वारा वहन की जाने वाली समूची निर्भरता के लिए अधिक परिमाणात्मक अंतर पैदा नहीं होता। लेकिन इसे समाज द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के लिए गुणात्मक अंतर पैदा होते हैं। जब युवा निर्भरता अनुपात अधिक होता है तो स्वास्थ्य देखभाल तथा बच्चों की स्कूली शिक्षा के लिए सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए हमें और अधिक ध्यान देना पड़ेगा, जबकि वृद्ध निर्भरता भार अधिक होने के कारण वृद्धों के लिए जराचिकित्सा स्वास्थ्य रक्षा (हमतपंजतपब ीमंसजी बंतम) तथा उनके लिए आवास-व्यवस्था उपलब्ध कराना बहुत महत्त्व रखता है।

 लिंग अनुपात
पिछले अनेक दशकों के दौरान महिलाओं का लिंग अनुपात (प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या के रूप में व्यक्त) उनके प्रतिकूल रहा है। पुरुषों की प्रधानता कम होती जा रही है क्योंकि पुरुष उत्तरोत्तर बूढ़े हो रहे हैं, इस बात को छोड़कर यह पूर्वाग्रह वृद्धों के मामले में भी देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, 1981 में आम जनसंख्या में प्रति 1000 पुरुषों पर 933 महिलाएँ थीं। परंतु वृद्धों के विभिन्न समूहों में अर्थात् 60-64, 65-69 और 70़ आयु समूहों में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या क्रमशः 933, 985 और 974 थी।

यह भी ध्यातव्य है कि लिंग के अनुसार महिलाओं में वृद्धों का प्रतिशत पुरुषों में वृद्धों के प्रतिशत से अधिक है।

विकसित देशों में जन्म के समय पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की जीवन-प्रत्याशा लगभग 6-8 वर्ष ज्यादा होती है और सामान्य जनसंख्या और वृद्धों में महिलाओं का अनुपात अधिक होता है। जनसांख्यिकीय संक्रमण की प्रगति के साथ-साथ जीवन-प्रत्याशा में लिंग अनुपात और लिंग-संबंधित विभेद के संबंध में भारत में स्थिति विकसित देशों में मौजूद स्थिति की तरह ही हो जाने की संभावना है।

 शहरी-ग्रामीण वितरण
पुरुषों और महिलाओं दोनों में वृद्धों का अनुपात शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत अधिक है। 1981 में ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों में वृद्धों का प्रतिशत 6.83 था और शहरी क्षेत्रों में यह 5.06 था। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं में वृद्ध महिलाएँ 6.85 प्रतिशत थीं और शहरी क्षेत्रों में यह 5.68 प्रतिशत थीं। इस प्रकार की प्रवृत्ति इस इकाई में बनी हमारी धारणा के विपरीत है कि जनसंख्या में वृद्धों का प्रतिशत नकारात्मक रूप से प्रजनन दर से जुड़ा है, क्योंकि प्रजनन दर शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्यतया ज्यादा है।

शहरी क्षेत्रों में मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धों का अप्रत्याशित रूप से उच्च प्रतिशत दूसरी प्रवृत्ति से जोड़ा जा सकता है अर्थात् ग्रामीण से शहरी प्रवसन। भारत में शहरी जनसंख्या में ग्रामीण प्रवासियों का अनुपात अधिक है, और प्रायः प्रवासी युवा वृद्ध माता-पिता को अपने गृह समुदायों में छोड़ जाते हैं। इसी प्रकार शहरों में जटिल आवास समस्या के कारण कुछ सेवानिवृत्त व्यक्ति विशेषकर निम्न आर्थिक श्रेणियों के वृद्ध बसने के लिए शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों में अपने गृह समुदायों के पास वापस चले जाते हैं। मुम्बई से लगे कोंकण क्षेत्र जैसे कुछ क्षेत्र जिनसे बहुत बड़ी संख्या में प्रवासी बड़े शहरों में आते हैं, उनकी जनसंख्या में वृद्धों का अनुपात अपेक्षाकृत बहुत अधिक होता है।

 वैवाहिक प्रस्थिति
भारत में यह आम बात है कि हर व्यक्ति का विवाह यथासमय हो जाता है। इसलिए वृद्ध पुरुषों और महिलाओं में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो अविवाहित हों। 1981 में वृद्ध जनसंख्या में पुरुषों में लगभग 2 प्रतिशत और महिलाओं में 0.40 प्रतिशत से भी कम लोग ऐसे थे जिन्होंने कभी विवाह नहीं किया था। भारत में वृद्धों की वैवाहिक स्थिति नीचे तालिका 3 में दी गई है।
तालिका 3: लिंग के अनुसार वृद्धों में विवाहित, विधुरविधवा और तलाकशुदा या
परित्यक्त व्यक्तियों का अनुपात, 1991

देश आयु-वर्ग (वर्षो में) पुरूष महिला
विवाहित
(ः) विधुर
(ः) तलाकशुदा
परित्यक्त
(ः) विवाहित
(ः) विधुर
(ः) तलाकशुदा
परित्यक्त
(ः)
भारत 60-69 85.4 12.0 0.3 52.5 46.3 0.4
70-79 52.5 19.6 0.3 32.7 66.1 0.4
80$ 61.7 25.4 0.3 23.4 23.4 0.3
जम्मू-कश्मीर के आकड़ें नहीं दिए गए हैं।

वृद्ध महिलाओं में वैधव्य की उच्च दर कुल मिलाकर निराशाजनक है क्योंकि आर्थिक सहायता के लिए महिलाएँ पुरुषों पर बहुत अधिक आश्रित रहती हैं और उनके पति ही उनके कानूनी प्रतिपालक होते हैं। इसलिए हमारे समाज में नियमतः एक विधवा की स्थिति एक विधुर की स्थिति के मुकाबले अधिक दुःखद है।

 शैक्षिक पृष्ठभूमि
शिक्षा वृद्धावस्था में समायोजक के लिए एक उपयोगी माध्यम है, विशेषतः जब वृद्ध सेवा, निवृत्त, जीवन-साथी का न होना अथवा शक्ति में गिरावट जैसे कारणों की वजह से नई भूमिकाएँ प्राप्त करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। किंतु भारत में आम जनसंख्या की शैक्षिक पृष्ठभूमि ही संतोषजनक नहीं है, फिर वृद्धों की कैसे ठीक हो सकती है। हाल ही के दशकों में लोगों के शैक्षिक स्तर को उठाने के लिए प्रयास किए गए हैं। आजकल के वृद्ध जिन्हें इन प्रयासों में प्राथमिकता दी गई है, अपनी शैक्षिक उपलब्धि में आम लोगों को बहुत पीछे छोड़ रहे हैं।

हमारे यहाँ वृद्धों में व्यापक निरक्षरता है। 1981 में आम जनसंख्या में 53 प्रतिशत पुरुष और 75 प्रतिशत महिलाएँ निरक्षर थीं और यह प्रतिशत वृद्ध पुरुषों में और महिलाओं में क्रमशः 65 और 92 था। इसी प्रकार के अंतर सभी शैक्षिक स्तरों पर पाए जाते हैं।

तेजी से बदलते हुए समाज में जब वृद्ध महिलाओं को नई भूमिकाएँ ग्रहण करने की जरूरत होती है तो कुल मिलाकर वृद्धों की निम्न शैक्षिक पृष्ठभूमि, विशेषकर वृद्ध महिलाओं की पृष्ठभूमि उन्हें बहुत नाजुक स्थिति में पहुंचा देती है।

बोध प्रश्न 1
1) वे दो व्यापक कारण कौन-से हैं जो वृद्धों की समस्याओं को जन्म देते हैं? लगभग छह पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
2) कुछ समय से जनसंख्या में वृद्धों का प्रतिशत क्यों बढ़ रहा है? स्पष्ट कीजिए। लगभग चार पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
3) युवा निर्भरता और वृद्ध निर्भरता अनुपात कैसे प्राप्त किया जाता है और भारत में ये अनुपात किस प्रकार बदल रहे हैं? लगभग आठ पंक्तियों में उत्तर दीजिए।

वृद्धों की आर्थिक विशेषताएँ

वृद्धों के सामाजिक समायोजन का एक प्रमुख कारक है उनकी आर्थिक स्थिति जिसे उनकी रोजगार प्रस्थिति और आय में विभाजित किया जा सकता है वृद्धावस्था में आय का कम होना अथवा आय का बिल्कुल न होना ही एकमात्र संभावना नहीं होती बल्कि यह तथ्य जानना भी जरूरी कि वृद्धावस्था में उन्हें अपना काम-धंधा छोड़ देने से, उन पर हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। व्यवसाय व्यक्ति के लिए केवल आय का साधन ही नहीं होता बल्कि इससे वह स्वयं को समाज जोड़ता है। व्यवसाय या रोजगार व्यक्ति को आत्म, पहचान और सामाजिक प्रस्थिति प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि वृद्धों के सामाजिक समायोजन पर ऐतिहासिक परिवर्तनों के प्रभाव को आर्थिक समंजन से कहीं भी बेहतर अनुभव नहीं किया जाता। औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण के कारण हाल ही के दशकों में आर्थिक ढांचे में गुणात्मक परिवर्तन होता रहा है जो महत्वपूर्ण तरीके से वृद्धों की आर्थिक भूमिका को प्रभावित कर रहा है। अतीत की असंगठित पूर्व-औद्योगिक अर्थव्यवस्था में वृद्ध जब तक चाहते थे तब तक अपने पारिवारिक उद्यम में कार्य करते थे परंतु संगठित आधुनिक अर्थव्यवस्था में वृद्धों को अनिवार्य सेवा निवृत्त कर दिया जाता है अनिवार्य कार्यमुक्ति या सेवा, निवृत्ति वृद्धों के लिए कई समस्याएँ उत्पन्न करती है जिनमें आय का समाप्त हो जाना या उसमें कमी आ जाना तो केवल एक समस्या है। इसीलिए श्रमिक बल में वृद्धों की सहभागिता के बारे में जानना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

 कार्य सहभागिता
आपके लिए वृद्धों द्वारा श्रमिक में सहभागिता की कुछ प्रवृत्तियाँ जानना और यह देखना कि ये प्रवृत्तियाँ अर्थव्यवस्था में परिवर्तनों द्वारा किस प्रकार प्रभावित होती है, जरूरी है।

आमतौर पर पुरुषों और महिलाओं की कार्य सहभागिता दर में व्यापक अंतर है। तदनुसार, 1981 में वृद्धों में 63.71 प्रतिशत पुरुष और 10.19 प्रतिशत महिलाएँ श्रमिक बल में थीं। किंतु वृद्धों की कार्य सहभागिता के बदलते हुए विन्यास को जानने के लिए आपके लिए केवल वृद्ध पुरुषों की संबद्ध प्रवृत्तियों पर ध्यान देना ही काफी होगा।

सामान्यतया पुरुष की जब श्रमिक बल में सहभागिता बहुत अधिक हो जाती है तो लगभग 97 प्रतिशत लोग रोजगार में लगे पाए जाते हैं। इसलिए यह तथ्य कि केवल 63.71 प्रतिशत पुरुष ही 1981 में श्रमिक बल में थे तो इससे अर्थ यह निकलेगा कि लगभग 33 प्रतिशत अथवा एक-तिहाई पुरुष वृद्धावस्था के कारण श्रमबल से हट गए थे। उसी प्रकार भारत में वृद्ध पुरुषों की कार्य सहभागिता दर इस तथ्य को मानते हुए बहुत ऊँची है कि विकसित देशों में यह दर बहुत ही कम है।भारत में वृद्ध पुरुषों की अपेक्षाकृत उच्च कार्य सहभागिता दर इस तथ्य पर आधारित है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण के अत्यंत निम्न स्तर पर है। इसलिए यह दर्शाया जा सकता है कि भारत मे वृद्ध पुरुषों की कार्य सहभागिता दर उद्योगीकरण के स्तर से जुड़ी हुई है। उदाहरण के लिए, कई दशकों से भारतीय अर्थव्यवस्था का उद्योगी करण हो रहा है और यह अधिकाधिक संगठित हो रही है। इसीलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मुकाबले शहरी अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक संगठित है। तदनुसार यह पता चलता है कि कई दशकों से वृद्धों की कार्य सहभागिता दरें, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गिरी हैं, और एक निश्चित कालावधि में शहरी दर ग्रामीण दर से बहुत कम है। आपको इन प्रवृत्तियों की जानकारी तालिका 4 में दी गई जानकारी से मिलेगी। चूंकि महिलाओं की कार्य सहभागिता दरें सामाजिक सांस्कृतिक कारकों द्वारा प्रभावित होती हैं, इसलिए उनके मामले में कोई भी ध्यान देने योग्य प्रवृत्ति नहीं है जिससे आर्थिक परिवर्तन हो सकता हो।
तालिका 4: लिंग के आधार पर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वृद्धों (60़) की कार्य सहभागिता दर (प्रतिशत), 1971, 1981, 1983, 1987 और 1995-96
वर्ष ग्रामीण शहरी
1971 77.5 11.5 53.4 6.5
1981 67.6 11.3 47.5 5.8
1983 64.2 15.6 48.8 11.8
1987 59.4 12.8 41.5 5.9
1995-96 60.3 17.3 35.3 9.2
स्रोत: 1971 और 1981 के लिए जानकारी भारत की जनगणना, 1981 श्रृंखला-1 भारत (5ः नमूना), विवरण 53 और 55य 1983 और 1987 तथा 1995-96 के लिए जानकारी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण क्रमशः 30वें, 42वें और 52वें चक्रों से है।

अतः यह स्पष्ट है कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था ज्यादा से ज्यादा संगठित होती जा रही है, वैसे-वैसे भविष्य में वृद्ध पुरुषों की कार्य सहभागिता दरों में और ह्रास होता जा रहा है। जो वृद्ध अभी भी रोजगार में लगे हैं वे अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र में मुख्य रूप से कार्य कर रहे हैं और वे उन काम-धंधों में लगे हैं जो अपेक्षाकृत कम लाभकारी हैं।

 आर्थिक प्रस्थिति
अधिकांश वृद्ध लोगों द्वारा महसूस की गई प्रमुख समस्या वृद्धावस्था के दौरान उनकी आय कम हो जाना है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक साथ उनके लाभकारी आर्थिक कार्यकलाप कम हो जाते हैं अथवा पूर्ण रूप से छूट जाते हैं। यह विशेषकर उन वृद्धों के मामले में स्पष्ट है जो संगठित क्षेत्र से जबरन सेवानिवृत्त हो जाते हैं और गरीबों में वे वृद्ध हैं जो अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र से सेवानिवृत्त होते हैं।

यद्यपि कई वृद्ध जो सरकारी सेवा जैसे संगठित क्षेत्र से सेवानिवृत्त होते हैं उन्हे पेंशन अथवा भविष्य निधि लाभ के माध्यम से आंशिक आय की सुरक्षा प्रदान की जाती है। लेकिन उनमें से कुछ ही व्यक्ति वित्तीय समस्याओं से मुक्त होते हैं। यदि पेंशन वाले वृद्धों की आर्थिक दशा काफी खराब होती है तो उनकी सामान्य स्थिति तो और भी ज्यादा खराब हो जाती है। वृद्धों की आर्थिक समस्याओं पर किए गए अध्ययन के व्यापक निष्कर्षों से पता चलता है कि वृद्धों की आय अधिक नहीं है और जिन परिवारों के साथ वे रहते हैं, वे परिवार निम्न आय-समूहों से संबंधित है इसलिए वित्तीय चिंताएँ अधिकांश वृद्धों की दुविधापूर्ण समस्या है।

वृद्धों की आर्थिक स्थिति के बारे में व्यापक जानकारी राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 52वें चक्र से प्राप्त की जा सकती है। 1995-96 में ग्रामीण क्षेत्रों में 60.3 प्रतिशत वृद्ध पुरुष और शहरी क्षेत्रों में 35.3 प्रतिशत वृद्ध पुरुष आर्थिक रूप से स्वतंत्र थे। शेष आंशिक तौर पर या पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर थे। वृद्ध महिलाओं में ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 17.3 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 9.2 प्रतिशत ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र थीं। यहाँ तक कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र पुरुषों और महिलाओं पर परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल करने की जिम्मेदारी का भार होता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में 69 प्रतिशत आर्थिक रूप से स्वतंत्र वृद्ध पुरुषों पर ही परिवार के अन्य सदस्य आश्रित थे। वृद्धावस्था में जो अपर्याप्त आय के कारण सबसे अधिक कष्ट में हैं वे हैं निर्धन वर्ग के वरिष्ठ सदस्य (बुजुर्ग) जो आमतौर पर अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक अथवा असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं और जिन्हें पेंशन लाभ प्राप्त नहीं होते। उनके पास अपनी बचत राशि भी नहीं होती और उनके कनिष्ठ संबंधी भी, जो अपना निर्वाह ही कर पाते हैं, उनकी सहायता करने में असमर्थ होते हैं। सबसे अधिक दुख की बात यह है कि गरीबों को जो कठिन व शारीरिक श्रम करना पड़ता है वह वृद्धावस्था में नहीं किया जा सकता। फिर भी परिस्थितियों से मजबूर होकर वृद्ध निर्धन व्यक्तियों को तब तक कार्य करते रहना पड़ता है जब तक वे शारीरिक रूप से टूट नहीं जाते और भूख से मर नहीं जाते।

 वृद्धों का सामाजिक समायोजन

वृद्धों की जनसांख्यिकीय, आर्थिक और स्वास्थ्य परिस्थितियों के संबंध में आगामी चर्चा से भारत में वृद्धों की कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याओं के बारे में बतलाया गया है। आपने पढ़ा है जनसंख्या में वृद्धों का अनुपात धीरे-धीरे बढ़ रहा है और साथ ही साथ बहुत तेजी से वृद्धों को आधुनिक और संगठित अर्थव्यवस्था से निष्कासित अथवा अलग किया जा रहा है। जो वृद्ध श्रमिक बल में रहते हैं अर्थात् कार्यरत रहते हैं वे अर्थव्यवस्था के कम लाभकारी अनौपचारिक क्षेत्र तक सीमित रहते हैं। इसलिए वृद्धों की आर्थिक असुरक्षा का उत्तरोत्तर अधिक खतरा होता जा रहा है।

महिलाएँ वृद्धावस्था में विशेषतौर पर असुरक्षित हो जाती हैं। पुरुषों के मुकाबले वृद्ध महिलाओं का शिक्षा स्तर बहुत कम होता है, लाभकारी रोजगार में भागीदारी बहुत कम होती है और उनके पास आर्थिक परिसंपत्ति या तो नाममात्र या होती ही नहीं है। इसलिए वे लगभग पूरी तरह से अपने पुरुष संबंधियों पर निर्भर होती हैं। वे इसलिए भी मजबूर हो जाती हैं कि उनमें से अधिकांश महिलाएँ विधवा होती हैं अर्थात् उनका कानूनी प्रतिपालक नहीं होता। इसलिए वृद्ध महिलाओं द्वारा अनुभव की जाने वाली आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक असुरक्षा बहुत ज्यादा होती है।

जैसा कि पहले बतलाया गया है कि वृद्धों की समस्याएँ उनके जैविक, मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय जीर्णन और समाज में दूरगामी ऐतिहासिक परिवर्तनों में मौजूद होती हैं। आइए, अब यह देखें कि वृद्ध अपने आपको इन परिस्थितियों में समाज के साथ कैसे ढाल रहे हैं।

 अतीत में वृद्धों के रहने की व्यवस्था
वृद्धावस्था को पहले इसलिए गंभीर सामाजिक समस्या नहीं माना जाता था कि कुल जनसंख्या में वृद्धों का अनुपात अपेक्षाकृत कम होता था बल्कि उनके परिवारों द्वारा उनकी आवश्यक देखभाल और भरण-पोषण भी किया जाता था। परंतु बदलती हुई परिस्थितियों में वृद्धों की देखभाल करने की परिवार की क्षमता कम होती जा रही है।

परंपरागत भारतीय समाज में वृद्धों की परिवार में एक सम्मानित प्रस्थिति होती थी। उनकी प्रतिष्ठित प्रस्थिति आदर्श परिवार की भाँति विशेष स्वरूप की देन थी जो संयुक्त परिवार कहलाता था। संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियों के सगे-संबंधी होते थे जो एक ही वंश के होते थे और वे पति/पत्नी और बाल-बच्चों के साथ रहते थे। संयुक्त परिवार में कई प्रकार के संबंधी होते थे और निस्संतान, अविवाहित अथवा विधवा/विधुर वृद्ध व्यक्ति परिवारों में रह सकते थे। परंतु संयुक्त परिवार में संबंधियों की नातेदारी के विन्यास नातेदारी प्रथा के सिद्धांतों द्वारा निर्धारित किए जाते थे चाहे वह देश के अधिकांश भागों में अपनाई पितृवंश परंपरा हो अथवा कुछ क्षेत्रों में प्रचलित मातृवंश परंपरा हो। उदाहरण के लिए, पितृवंश नातेदारी प्रथा में वृद्ध अपनी पुत्री तथा दामाद के साथ नहीं रहते।

परंतु वास्तव में संयुक्त परिवार अपने वृद्ध सदस्यों के प्रति कार्य करने के लिए जिस कारण से प्रेरित था वह भी पूर्व-औद्योगिक आर्थिक व्यवस्था और मध्यकालीन संपत्ति अवधारणाएँ पूर्व-औद्योगिक आर्थिक व्यवस्था में, जैसे कि कृषि अर्थव्यवस्था में अब भी है, परिवार उत्पादन की एक इकाई था और मध्यकालीन संपत्ति अवधारणाओं ने वृद्ध व्यक्तियों विशेषकर वरिष्ठ पुरुष सदस्य को परिवार की उत्पादक परिसपंत्ति का कर्ता-धर्ता बना दिया था। इस प्रकार के ढाँचे में कनिष्ठ सदस्य वरिष्ठ सदस्यों पर आर्थिक रूप से निर्भर थे। इस प्रकार आर्थिक निर्भरता द्वारा मजबूत किए गए संतान संबंधी प्रेम और कर्तव्य ने कनिष्ठ सगे-संबंधियों को अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों की बेहतर देखभाल करने के लिए बाध्य कर दिया था।

 बदलती हुई परिवार-व्यवस्था
भारत में पारिवारिक स्थिति जिससे वृद्धों का संतोषजनक सामाजिक समायोजन हो जाता था, अब तेजी से बदल रही है। वृद्धों के बढ़ते अनुपात के लिए उत्तरदायी आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण की शक्तियाँ परिवार व्यवस्था में भी परिवर्तन ला रही है। ये परिवर्तन वृद्धों की देखभाल करने में परिवार की क्षमता को कम कर देते हैं। ये शक्तियाँ परिवार को उसके उत्पादन कार्य से वंचित करने का प्रयास कर रही है और ऐसा करके संयुक्त परिवार व्यवस्था के आधार को कमजोर कर रही है।

उभरती अर्थव्यवस्था में, परिवार के कमाऊ सदस्य जो कि एक उत्पादन इकाई नहीं है, परिवार से बाहर रोजगार पाने के लिए बाध्य हो जाते हैं। ऐसे मामलों में न केवल परिवार के छोटे संबंधी सदस्य बड़े सदस्यों के आर्थिक सत्ता से मुक्त होते हैं बल्कि उनमें से कुछ अपनी अलग गृहस्थी भी बसा लेते हैं और यहाँ तक कि अन्य स्थानों में चले जाते हैं। इन परिस्थितियों में वृद्ध व्यक्ति को अपने निजी संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि किसी वृद्ध की आय पर्याप्त नहीं होती तो वह दूसरों पर आश्रित हो जाता है क्योंकि वृद्धों के बढ़ते हुए अनुपात के कारण ऐसा हो भी रहा है। आप वृद्धों का आर्थिक स्तर से संबंधित भाग में पहले ही देख चुके है कि अधिकांश वृद्ध आंशिक तौर पर या पूर्ण तौर पर दूसरों पर निर्भर हैं।

भारत में परिवार व्यवस्था विश्व की अन्य परिवार व्यवस्थाओं की भाँति परिवर्तनीय स्थिति में है। प्राचीन संयुक्त परिवार के ढाँचे से जुड़े परिवार अब तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं। इसके स्थान पर परिवार के अधिक सरल ढाँचे बन रहे हैं जो उत्पादन की एक इकाई होते हुए भी परिवार पर निर्भर नहीं होते। परिवार के बनते-उभरते ढाँचों से एकल परिवार (छनबसमंत थ्ंउपसल) विकसित हो रहा है जिसमें इकाई के रूप में पति, पत्नी और बच्चे होते हैं। वृद्ध माता-पिता की उपस्थिति के कारण नाभिक परिवार साधारण वंशगत संयुक्त परिवार का रूप ले सकता है जिसमें वृद्ध माता-पिता में विवाहित पुत्र अथवा पुत्री में से किसी एक के साथ रहते हैं।

जब सभी बच्चों (संतान) का विवाह होता है तो वृद्ध पति पत्नी या तो स्वयं एक साथ रह सकते हैं या वृद्ध व्यक्ति विधुर/विधवा हो जाए तो वह बिल्कुल अकेला भी रह सकता है।

वृद्धों के रहने की व्यवस्थाओं की उपर्युक्त संभावनाओं को भारत में वृद्धों के रहने की व्यवस्थाओं में दर्शाया गया है। यह राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 52वें चक्र से पता चलता है। यथोचित निष्कर्ष तालिका 6 में प्रस्तुत किए गए हैं। आपके लिए तालिका 6 का ध्यान से अवलोकन करना उचित होगा। आपको पता चलेगा कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लगभग 86 प्रतिशत वृद्ध या तो अपने जीवन-साथी अर्थात् पति या पत्नी के साथ या अपनी संतानों के साथ रह रहे हैं। लगभग 6 प्रतिशत वृद्ध ग्रामीण क्षेत्रों में और 4 प्रतिशत वृद्ध शहरी क्षेत्रों में अकेले रहते हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गैर-संबंधियों और वृद्ध आश्रम (ओल्ड एज होम) में रहने वाले वृद्धों का प्रतिशत नाममात्र है। अतः अधिकतर वृद्ध अपने सगे-संबंधियों के साथ रहते हैं।

तालिका 6: लिंग के आधार पर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वृद्धों की
रहने की व्यवस्था, 1995-96
ग्रामीण शहरी
रहने की व्यवस्था का प्रकार पुरुष महिला कुल पुरुष महिला कुल
अकेले रहना 2.5 6.1 4.3 3.0 6.0 4.5
पति/पत्नी व अन्य
सदस्यों के साथ रहना 75.0 39.0 56.9 75.1 35.4 54.9
अपने बच्चों के साथ रहना 17.9 48.1 33.1 17.8 51.2 34.9
अन्य संबंधियों व गैर-संबंधियों 3.8 5.9 4.8 0.4 0.4 0.4
के साथ रहना
स्रोत: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण, 52वां चक्र

विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में वृद्धों के संबंध में किए गए विभिन्न अध्ययनों की जानकारी से पता चलता है कि यदि हम पिछले इतिहास को देखें तो अपनी संतान के साथ रहने वाले वृद्धों का प्रतिशत पहले ज्यादा था। अन्य देश जो भारत से बहुत आधुनिक हैं, वहाँ की प्रवृत्तियों को देखने से पता चलता है कि इस श्रेणी की रहने की व्यवस्थाएँ और घटती जा रही हैं और ‘‘अकेले रहना‘‘, ‘‘पति या पत्नी के साथ रहना‘‘ की श्रेणियाँ बढ़ती जा रही हैं।

इस प्रकार वृद्धों के वर्तमान परिवार का दायरा अधिकाधिक सीमित होता जा रहा है जिससे वृद्धों के लिए नई-नई समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इस प्रकार की दो महत्त्वपूर्ण समस्याओं की ओर आपका ध्यान आकृष्ट किया जा सकता है। पहली समस्या है वृद्धों के अंतर्वैयक्तिक पारिवारिक संबंध। ये संबंध वृद्धों के अपने पुत्रों के साथ रहने के बावजूद अत्यधिक जटिल होते जा रहे हैं। ऐसा विशेषकर शहरी क्षेत्रों में है। पहले जब परिवार के संसाधनों का नियंत्रण वृद्धों द्वारा किया जाता था तो पुत्र अपने माता-पिता पर आश्रित होते थे। आज स्थिति बिल्कुल उल्टी है। आज अधिक से अधिक माता-पिता आर्थिक रूप से अपने पुत्रों पर निर्भर हैं जिस कारण वृद्धों के आत्म-सम्मान को हानि पहुँच रही है। दूसरी समस्या है परिवार में मौजूद देखभाल करने वाले लोगों की संख्या घटती जा रही है। अब पुत्रों के घरों में वृद्ध अपनी पुत्रवधुओं की सेवाएँ प्राप्त नहीं कर सकते जबकि पहले पुत्रवधुएं उनकी परंपरागत देखभाल करने वाली होती थी।

विकसित समाजों में वृद्धों के लिए परिवारों की संरक्षण क्षमता बहुत कमजोर हो गई है और परिवार का स्थान कुछ सीमा तक बड़ी संस्थाओं जैसे वृद्ध आश्रम और वृद्ध देखभाल केंद्रों ने ले लिया है। भारत में ऐसी संस्थाओं के लिए बहुत गुजांइश है परंतु उनका विकास अभी प्रारंभिक अवस्था में है। तालिका 6 में यह देखा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 0.7 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 0.4 प्रतिशत वृद्ध ऐसे आश्रमों में रह रहे हैं। वृद्ध देखभाल केंद्र अभी प्रयोगात्मक चरण में हैं और वो भी केवल बड़े शहरों में हैं।

पुरुषों और महिलाओं के रहने की व्यवस्थाएँ
वृद्ध पुरुषों और महिलाओं के रहने की व्यवस्थाएँ एक दूसरे से इतनी अधिक भिन्न हैं कि आपको यह जानने की जिज्ञासा होगी कि इनके अंतर का क्या कारण है? वृद्ध महिलाओं में से अधिकांश उदाहरणतः ग्रामीण क्षेत्रों में 66 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 67 प्रतिशत अपनी संतान के साथ रहती हैं, जबकि इसकी तुलना में वृद्ध पुरुष क्रमशः 37 और 40 प्रतिशत अपनी संतान के साथ रहते हैं। अपने नाती/पोतों और अन्य संबंधियों के साथ रहने वाले वृद्धों की श्रेणियों में महिलाओं का प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक है। दूसरे, महिलाओं की तुलना में पुरुष प्रायः अपनी पत्नियों के साथ अधिक रहते हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लगभग 45 प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नियों के साथ रहते हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों में केवल 25 प्रतिशत महिलाएँ और ग्रामीण क्षेत्रों में 22 प्रतिशत महिलाएं अपने पतियों के साथ रहती हैं। अकेले रहने वाले पुरुषों का प्रतिशत बहुत ज्यादा है। शहरी क्षेत्रों में यह 11.8 प्रतिशित है और ग्रामीण क्षेत्रों में 8.2 प्रतिशत है जबकि महिलाओं में यह प्रतिशत ग्रामीण में 0.7 है और शहरी क्षेत्रों में 0.6 है जो केवल नाम-मात्र है।

वृद्ध पुरूषों और महिलाओं में रहने की व्यवस्था के ढाँचे में महत्त्वपूर्ण अंतर उनकी विशेषताओं में दो बुनियादी विषमताओं के कारण है। पहली, पुरुषों की तुलना में वृद्ध महिलाओं का प्रतिशत बिना पतियों के बहुत अधिक है। इससे स्पष्ट है कि अपने जीवनसाथी के साथ रहने वाली महिलाओं का प्रतिशत क्यों कम है। दूसरे, महिलाओं की दूसरों पर आर्थिक निर्भरता पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा है जिससे पता चलता है कि अकेली रहने वाली महिलाओं का प्रतिशत इतना कम क्यों है। ये दोनों कारण महिलाओं को दूसरों पर निर्भर रहने के लिए बहुत ज्यादा विवश करते हैं।

 वृद्धों के लिए सार्वजनिक नीतियाँ और कार्यक्रम
आपको अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि वृद्धों की समस्या आजकल दो मुख्य कारणों से अत्यंत चिंता उत्पन्न कर रही है। जनसंख्या में वृद्धों का प्रतिशत बढ़ रहा है और परिवार द्वारा वृद्धों की देखभाल और भरण-पोषण कम होता जा रहा है। इसलिए अब समाज के लिए वृद्धों के सामाजिक समायोजन की व्यापक जिम्मेदारी स्वीकार करना अत्यावश्यक हो गया है। इसलिए आपको यह जानने की उत्सुकता होगी कि वृद्धों की समस्याएँ दूर करने के लिए समाज के विभिन्न स्कंधों-राज्य सरकार और विभिन्न संस्थाओं द्वारा क्या-क्या नीतियाँ और कार्यक्रम चलाए गए हैं।

विकसित समाजों में जहाँ पर वृद्धों की समस्या बहुत गंभीर हो गई है, वहाँ पर वृद्धों के लिए सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा तैयार की गई सुविकसित सहायता पद्धतियाँ विद्यमान हैं। वृद्धों की वित्तीय, आवासीय और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की आवश्यकताओं पर ध्यान देने के लिए संस्थाओं द्वारा व्यवस्था की जाती है। ये संस्थाएँ परिवार का कार्य करती हैं और परिवार द्वारा भरण-पोषण की निर्भरता को भुला देती हैं। सामाजिक कार्यकलाप की हर शाखा में वृद्धों की विशेष जरूरतों को खासतौर पर मान्यता दी जाती है।

भारतीय समाज में भी वृद्धों की देखभाल करने के लिए वृहत समाज की जिम्मेदारी को मान्यता मिली है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य को वंचित और कमजोर वर्गों के लाभ के लिए जिनमें वृद्ध भी शामिल हैं, सार्वजनिक सहायता (भरण-पोषण) का प्रभावकारी प्रावधान बनाने का अधिकार प्रदान करता है। किंतु सरकार ने जिन नीतियों और कार्यक्रमों को अपने हाथ में लिया है, उनमें अभी तक वृद्धों की समस्या के छोर को ही स्पर्श किया है।

वृद्धों के संबंध में सरकार द्वारा उठाए गए तीन कदमों का यहाँ उल्लेख किया जा सकता है। पहला, सरकार ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए जिसके पास पर्याप्त साधन है, अपने वृद्ध अथवा अशक्त माता-पिता जो अपना भरण-पोषण नहीं कर सकते, उनके भरण-पोषण और देखभाल करने का कर्तव्य निर्धारित किया है, लेकिन सरकार के इस कदम द्वारा परिवार की परंपरागत भूमिका जिसके द्वारा वृद्धों को सहायता प्रदान की जाती है, उसकी उपेक्षा ही हुई है। इस कानून का व्यवहारिक प्रयोग नहीं हो पाता क्योंकि कोई भी मातापिता अपनी संकल्प रहित, संतान से सहायता प्राप्त करने के लिए न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाना चाहता।
कोष्ठक 1
वृद्धों के लिए सामाजिक सुरक्षा
वृद्धों की जनसंख्या का एक भाग संगठित क्षेत्र से सेवा निवृत हुए व्यक्तियों का है। उन्हें पेंशन, भविष्य निधि और उपदान के रूप में नियोक्ताओं द्वारा सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाती है। फिर भी हो सकता है उन्हें परिवारों से यथेष्ट भावनात्मक सहयोग न मिलता हो। उनकी मनोरंजन संबंधी जरूरतें भी परिवार द्वारा पूरी न की जाती हों। ऐसी स्थिति में राज्य को ये सुविधाएँ उपलब्ध करवानी पड़ती हैं। इसके अलावा वृद्ध जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग असंगठित क्षेत्र से सेवा निवृत्त होने वालों का है? जिन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलते हैं। इनमें से वे वृद्ध जिनका परिवार भी नहीं होता है, उनको भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाती है। भारत में राज्य द्वारा संचालित वृद्धाश्रम भी है। राज्य व केंद्रीय सरकारें स्वैच्छिक अभिकरणों को वृद्धाश्रम स्थापित करने व नए कार्यक्रम चलाकर वृद्धों को सेवाएँ प्रदान करने के लिए आर्थिक सहायता देती हैं। सभी राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों में वृद्धावस्था पेंशन की योजनाएँ भी मौजूद हैं। यद्यपि इसमें अलग-अलग क्षेत्रों में पात्रता मानदंड भिन्न-भिन्न हैं। आमतौर पर 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के वृद्धों में निराश्रित, गरीब व अशक्त व्यक्तियों को 30 रुपयों से लेकर 100 रुपयों तक प्रति माह पेंशन प्रदान की जाती है (भारत, 2000)।

सरकार ने जो दूसरा कदम उठाया है वह है-उन वृद्धों के लिए भरण-पोषण की आंशिक जिम्मेदारी निर्धारित करना जिनके पास कमाने वाली संतान नहीं है या संतान है परंतु उनके भरण-पोषण के लिए जिनके पास पर्याप्त साधन नहीं है। सरकार असहाय वृद्धों को वृद्धावस्था पेंशन देती है और जो संस्थाएँ ऐसे वृद्धों की देखभाल करती हैं उन्हें सहायता अनुदान देती है। वृद्धावस्था पेंशन की राशि यद्यपि भरण-पोषण के लिए बहुत कम होती है।

वृद्धों के संबंध में सरकार द्वारा उठाया गया तीसरा कदम अनिवार्य सेवानिवृत्त किए जाने वाले वृद्धों को नियोक्ताओं द्वारा उपदान (हतंजनपजल), पेंशन और भविष्य निधि (चतवअपकमदज निदक) जैसे सेवानिवृत्ति लाभ (तमजपतमउमदज इमदमपिजे) सुरक्षित करवाने के लिए कानून पास करना है। ऐसा कानून बड़े-बड़े उद्यमों पर लागू होता है और इस प्रकार से यह लाभ वृद्धों का एक छोटा भाग ही प्राप्त कर पाता है।

सरकार के अतिरिक्त अनेक गैर-सरकारी संगठन (छळव्) भी हैं जो वृद्धों को विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करते हैं। गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में शामिल हैंः
क) वृद्धावस्था आश्रम (वसकंहम ीवउमे) के रूप में संस्थागत सेवाएँ
ख) रोजगार सेवाएँ और व्यावसायिक चिकित्सा
ग) गैर-संस्थागत सहायता पद्धतियाँ जैसे- चिकित्सा, मनोचिकित्सा और पुनर्वास सेवाएँ, पोषण संबंधी देखभाल, मनोरंजन, परामर्श, शिक्षा, प्रशिक्षण और जानकारी; एवं
घ) दिवस देखभाल केंद्र।
यद्यपि यह सूची आकर्षक लगती है परंतु ये सेवाएं देश के कुछ भागों में ही उपलब्ध हैं और वह भी केवल बड़े-बड़े शहरों में।

आपको उपर्युक्त चर्चा से पता चल जाएगा कि अधिकांश वृद्ध सरकार अथवा गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की गई वृद्धावस्था सहायता की सार्वजनिक व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आ पाते।

बोध प्रश्न 3
1) वृद्ध महिलाओं की स्थिति वृद्ध पुरुषों से किस प्रकार भिन्न है? लगभग आठ पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
2) वृद्धों का पहले सामाजिक समायोजन अधिक संतोषजनक क्यों था? लगभग छह पंक्तियों में उत्तर दीजिए।
3) आजकल वृद्धों का सामाजिक समायोजन कम संतोषजनक क्यों है? लगभग आठ पंक्तियों में उत्तर दीजिए।

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
1) जब लोग वृद्ध हो रहे होते हैं तो कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएँ उनके समक्ष आती हैं। वृद्धों की समस्या तब उत्पन्न होती है जब उन्हें समाज के साथ सामंजस्य स्थापित करना होता है। इन घटनाओं में वे परिवर्तन भी है जो उनके जीव के जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक क्षेत्र में होते हैं। दूसरे तरह के परिवर्तन हैं- सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन, ये उस ऐतिहासिक चरण के दौर में होते हैं जिसमें वे रह रहे होते हैं।
2) जनसंख्या में वृद्धों का बढ़ता अनुपात गिरती हुई प्रजनन क्षमता और लोगों की बढ़ती हुई जीवन-प्रत्याशा के कारण है। ये जनसांख्यिकीय संक्रमण की विशेषताएँ हैं। यह आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण द्वारा लाया जाता है।
3) युवा निर्भरता अनुपात 0-14 आयु-वर्ग की जनसंख्या के प्रतिशत को 15-59 आयु वर्ग की जनसंख्या के प्रतिशत से भाग करके और भागफल को 100 से गुणा करके प्राप्त किया जाता है। इसी प्रकार वृद्ध निर्भरता अनुपात 60़ आयु समूह की जनसंख्या के प्रतिशत को 15-59 आयु समूह के जनसंख्या के प्रतिशत से भाग देकर और भागफल को 100 से गुणा करके प्राप्त किया जाता है। हाल ही में युवा निर्भरता अनुपात गिरना आरंभ हो गया है और वृद्ध निर्भरता अनुपात बढ़ना शुरू हो गया है।

बोध प्रश्न 3
1) वृद्ध महिलाएँ वृद्ध पुरुषों की अपेक्षा कम शिक्षित होती है और श्रमिक बल में कम भाग लेती है तथा आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर होती है। वृद्ध महिलाएँ जो पति के बिना रहती हैं, उनका प्रतिशत अपेक्षाकृत वृद्ध पुरुषों से काफी अधिक है। वृद्ध पुरुषों और महिलाओं के रहने की व्यवस्थाओं के विन्यास में बहुत अंतर है जबकि पुरुष अपनी पत्नियों के साथ या काफी सीमा तक बिल्कुल अकेले रहते हैं और महिलाएँ प्रायः अपने बाल-बच्चों या अन्य संबंधियों के साथ रहती हैं।

2) सामाजिक समायोजन के संबंध में पहले वृद्ध की सहायता परिवार करते थे। परिवार की विशिष्ट संरचना और प्रकार्य वृद्धों के सामंजस्य के लिए पहले बहुत लाभदायक होते थे। विशेषकर यह तथ्य कि परिवार एक उत्पादन इकाई था और परिवार की उत्पादनकारी संपत्ति पर वृद्धों का नियंत्रण, वृद्धों की प्रस्थिति और सुरक्षा का संरक्षण करता था।

3) आज के समय में अर्थव्यवस्था बहुत अधिक औद्योगीकृत और संगठित हो रही है। इससे परिवार को उत्पादन कार्य से वंचित होना पड़ रहा है। युवा वर्ग जन आर्थिक रूप से वृद्धों पर कम निर्भर है और इसके विपरीत वृद्ध जन अपने कनिष्ठ संबंधियों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। बदलती हुई परिस्थितियों में परिवार में वृद्धों को सहायता प्रदान करने वाले सदस्यों की संख्या, योग्यता और देखभाल करने की स्थिति गिरती जा रही है। इसलिए वृद्धों को अपने सामाजिक समायोजन में अधिक कठिनाई हो रही है।