कर्म का सिद्धान्त सम्बन्धित है | principle of karma in hindi करम सिद्धांत क्या है किसे कहते है परिभाषा

By   January 28, 2021

करम सिद्धांत क्या है किसे कहते है परिभाषा principle of karma in hindi कर्म का सिद्धान्त सम्बन्धित है ? 

जाति एवं धर्म (Caste and Religion)
भारत के धार्मिक बहुलवाद में जाति व्यवस्था की व्यापक भूमिका के विश्लेषण के बिना धर्म की प्रकृति को समझ पाना कठिन है। जाति, हिन्दू धर्म के जन्म-पुनर्जन्म और कर्म पर आधारित है (विस्तृत जानकारी के लिए बॉक्स 17.03 देखें)। हिन्दू धर्म में चार वर्णों के आधार पर जाति समूह शुद्ध और अशुद्ध संबंधी आनुष्ठानिक स्थितियों के सोपानक्रम में क्रमबद्ध हैं। जहाँ सबसे ऊपर ब्राहमण, फिर क्षत्रिय, फिर वैश्व और अंत में शूद्र है और अन्य बहिष्कृत जातियाँ हैं। असल जीवन में, वर्ण समाज में जाति के रूप में मौजूद हैं। हिन्दुओं की हजारों जातियां हैं जो वर्ण क्रम और वर्ण की एकता में योगदान देती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दू धर्म एक अखंड समुदाय का रूप धारण नहीं करता है। इसका मूल स्वरूप ही बहुलवादी है। इसलिए यह एक उदार, परिवर्तनशील धर्म रहा है।

बॉक्स 17.03
कर्म सिद्धान्त: कर्म सिद्धान्त और इससे संबद्ध जन्म-पुनर्जन्म का चक्र अर्थात् संसार में आवागमन, हिन्दू धर्म की मूल मान्यताएं, हिन्दू विचार और व्यवहार पर इनका गहरा प्रभाव है। यह आत्मा के पुनर्जन्म पर आधारित है। माना जाता है कि हर काम या क्रिया का न सिर्फ भौतिक/शारीरिक बल्कि मानसिक और नैतिक असर भी होता है। इस जीवन में व्यक्ति का स्थान पिछले जन्म के कर्मों पर ही आधारित है। जन्म और पुनर्जन्म के इस चक्र (आवागमन) से मुक्ति का एकमात्र मार्ग हैनिर्वाण अर्थात सच्चा ज्ञान ।

भारत के अन्य महत्वपूर्ण धर्म, जैसे कि इस्लाम, ईसाई और सिक्ख धर्म सामुदायिक सिद्धांत पर आधारित हैं। इसका यह अर्थ है कि ये धर्म अनुयायियों के समुदाय/समूह को महत्व देते हैं। वर्ण या जाति पर आधारित असमानताओं को मान्यता नहीं दी जाती है। परंतु वास्तव में इन धर्मों में भी जाति जैसे वर्ग देखे जाते हैं जो सामाजिक प्रतिष्ठा पर आधारित हैं। इन वर्गों में भी आपसी विवाह संबंध अपने जातीय समूह में होते हैं और सामाजिक सबंधों में भी भेदभाव हैं। पूरे भारत में मुसलमानों में जाति जैसे वर्ग देखने को मिलते हैं। 1931 की जनगणना में युनाइटेड प्रॉविन्सेस की मुख्य जातियां इस प्रकार हैं: शेख, पठान, सैय्यद, राजपूत (मुस्लिम) और मुगल उच्च वर्गों में, और निम्न वर्गों में जुलाहा, पनिहार, धुनिया, तेली, फकीर, नाई (हजाम), दर्जी, धोबी और कसाब । ऊँची जातियाँ शासक, जमींदार या शैक्षिक वर्ग से संबंधित थीं जबकि निम्न जातियों के व्यवसाय समाज में इतने प्रतिष्ठित नहीं थे। प्रत्येक जाति सजातीय विवाह का पालन करती थी और क्रम या श्रेणी के आधार पर एक-दूसरे से सामाजिक और सांस्कृतिक दूरी रखती थी। समकालीन अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं। व्यावसायिक परिवर्तन के आधार पर मुसलमानों की जातियों में सामाजिक गतिशीलता तो आ गई है, फिर भी जाति जैसे सामाजिक भेदभाव आज भी देखने को मिलते हैं।

भारत के ईसाई भी अपने आप को जाति व्यवस्था से मुक्त नहीं कर पाए हैं। धर्म परिवर्तन के बाद भी पहले वाले धर्म भेद बन रहे हैं। धर्म परिवर्तन के बाद भी उन्हें वही सामाजिक स्थान दिया गया, जो उन्हें उससे पहले मिला हुआ था, धर्म परिवर्तन के माध्यम से ईसाई धर्म जाति-क्रम और सहजातीय विवाह मानने वाले वर्ग इसमें शामिल हुए हैं। इस संदर्भ में उत्तर-पूर्व के आदिवासी अपवाद हैं क्योंकि उनकी सामाजिक व्यवस्था में जाति की कोई भूमिका नहीं थी। देखा गया है कि लगभग सारे भारतीय ईसाई समुदायों में जाति भेद देखने को मिलते हैं। प्रोटेस्टैन्ट की तुलना में रोमन कैथोलिक समुदाय में यह अधिक है। इसका कारण यह है कि रोमन कैथोलिक समुदाय में ऊँची जाति के हिन्दू अधिक संख्या में शामिल हुए, जबकि प्रोटेस्टैन्ट समुदाय में छोटी जाति के लोग अधिक संख्या में आए । इसी प्रकार के जाति भेद सिक्खों में भी दिखाई देते हैं। बौद्ध धर्म, जो जाति व्यवस्था और उस पर सामाजिक शोषण को नकारता है। वह भी अपने अनुयायियों को इस शोषण से मुक्त नहीं कर पाया है। जिस तरह से इस्लाम धर्म और ईसाई धर्म में उसी तरह से सिक्ख धर्म में भी जाति व्यवस्था मौजूद है।

हमने देखा कि किस प्रकार जाति भारत में लगभग सारे धर्मों का हिस्सा बन चुकी है, उन धर्मों का भी जो इसे सैद्धांतिक रूप से नकारते हैं। इससे हम देख सकते हैं कि किस प्रकार प्रत्येक धर्म के सामाजिक वर्ग धार्मिक बहुलवाद को और अधिक मजबूत बनाते हैं। हिन्दू धर्म में जातिगत समूह चार वर्णों के अंतर्गत पवित्रता और अपवित्रता की रूढ़ि पर आधारित एक क्रमबद्ध प्रणाली के तहत रखे गए हैं, जिसमें ब्राह्मण सर्वोच्च स्थान पर हैं और उसके बाद क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा जाति बहिष्कृत लोग रखे गए हैं। वास्तविक जीवन में समाज जाति के रूप में है। हिन्दू धर्म में हजारों जातियां हैं, प्रत्येक जाति में असंख्य उपजातियाँ तथा जातियों में समस्तर और परस्पर निर्भरता पर विभेदीकरण है। इसलिए हिन्दू धर्म का निर्माण परस्पर सहयोग से न होकर विभेद पर बना है। इसका आधार असमानता है। जाति सामाजिक विभाजन के सिद्धांत के आधार पर बनी है, जो धार्मिक समूहों के बीच विभेदीकरण को और मजबूत बनाती है और चूंकि अधिकतर जातियां परंपरागत व्यवसायों से जुड़ी हैं, इसलिए वे अन्य धर्मों की जातियों के साथ-साथ समान प्रथाओं, तौर-तरीकों और मान्यताओं का भी पालन करती हैं। इससे धर्मों के बीच आदान-प्रदान और संस्थागत, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध संभव हुए। धार्मिक अंतर के बावजूद विभिन्न धर्मों की जातियाँ समान व्यावसायिक रीतियों और प्रथाओं को मानती हैं, विशेषतः किसान और कारीगर जातियाँ । धार्मिक लेन-देन और समान मूल्यों और मान्यताओं के स्तर पर भारतीय धर्मों में जातीय विशिष्टीकरण बहुलवाद को प्रदर्शित करता है। अलग-अलग धर्मों के बीच उदारता और भाईचारा लाने में भी इसका काफी योगदान रहा है।

भाषा एवं धार्मिक बहुलवाद (Language and Religious Pluralism)
भारत में अनेक प्रकार की संस्कृतियां पाई जाती हैं, जो विशिष्ट धार्मिक, भाषाई, भौगोलिक और स्थानीय परंपराओं के परिवेश में पनपी हैं। 1931 की जनगणना के अनुसार भारत में 13 प्रमुख भाषाएं हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या 90 लाख से अधिक है। कुल जनसंख्या का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इन भाषाओं को बोलता था । आज भारत की मुख्य भाषाओं की संख्या, जिनका संविधान में उल्लेख है, में वृद्धि हो चुकी है।

भाषा व्यक्ति को नई पहचान देती है। भारत में सैंकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां हैं, जो अनेक भाषां वर्गों से संबद्ध हैं। इसलिए भारत की भाषाई सांस्कृतिक संरचना अत्यंत पेचीदा है। भाषाई विभाजन, धार्मिक भेद से जुड़ा हुआ है। इसके फलस्वरूप भारत के मुख्य धर्मों (हिन्दू, इस्लाम और ईसाई धर्म) के अनुयायी विभिन्न भाषाई समुदायों के सदस्य हैं। ये सदस्य भी जाति व्यवस्था की तरह भेदीकरण और एकीकरण एक साथ करते हैं। इसका कारण यह है कि समान भाषाई लोगों के समान मूल्य, संस्कृति और तौर-तरीके होते हैं। भाषा न सिर्फ लोगों की पहचान का चिहन है, बल्कि यह सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण साधन भी है।
धर्म के अनुयायियों के भाषाई विशिष्टीकरण के कारण भारत के लोग धर्म और सामाजिकसांस्कृतिक जीवन के संबंध के विषय में उदारवादी दृष्टि ले सकें। धर्मों के बीच तौर-तरीकों, खान-पान इत्यादि का आदान-प्रदान रहा, जिससे धार्मिक बहुलवाद और अधिक मजबूत बना।

बोध प्रश्न 2
प) धर्म और जाति किस प्रकार से अंतः संबद्ध हैं ? लगभग दस पंक्तियों में स्पष्ट कीजिए।
पप) धार्मिक बहुलवाद में भाषा की क्या भूमिका है ? आठ पंक्तियों में चर्चा कीजिए।
पपप) सही उत्तर पर () और गलत उत्तर पर (ग) का निशान लगाइएः
क) जाति, हिन्दू धर्म के जन्म-पुनर्जन्म और कर्म आधारित नजरिए पर सही मायने में आधारित नहीं है।
ख) हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप बहुलवादी है।
ग) उत्तर-पूर्वी जनजातियों को छोड़कर ईसाई धर्म में जाति का प्रभाव साफ दिखाई देता है भाषा न सिर्फ व्यक्ति की पहचान है, बल्कि उसका धार्मिक विश्वास भी निर्धारित करती है।

बोध प्रश्न 2
प) जाति व्यवस्था, हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म और कर्म, संबंधी दृष्टिकोण पर आधारित है। पवित्रता/अपवित्रता पर आधारित श्रेणी में जातियों को क्रमबद्ध किया जाता है। इसके अनुसार उच्च स्थान पर ब्राह्मण हैं। फिर क्षत्रिय, वैश्य और अंततः शुद्र। इसी क्रम पर व्यवसाय भी आधारित हैं। हिन्दू धर्म के साथ इस्लाम और ईसाई धर्म का लम्बा संबंध रहा है, अतः उन्होंने अनेक हिन्दू प्रथाओं को अपनाया। खासतौर पर वे लोग जो हिन्दू धर्म को छोड़कर अन्य धर्मों में शामिल हुए, अपने नये धर्मों में भी जाति-भेद का प्रयोग करने लगे।

पप) हिन्दू, इस्लाम, ईसाई और कुछ हद तक सिक्ख धर्म के अनुयायी भारत के विभिन्न भाषाई समुदायों में मिलते हैं। भाषा ऐसा सूत्र है, जिससे समान प्रथाओं, जीवनपद्धतियों आदि का निर्वाह करने वाले लोग बंध जाते हैं। सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और विभिन्न धर्मों के अनुयायियों की एकता का यह एक माध्यम है। इस प्रकार यह भारतीय समाज और धर्म का बहुलवादी स्वरूप कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका
पपप) क) गलत
ख) सही
ग) सही
घ) गलत