मूल्य निर्धारण निर्णय क्या है |  मूल्य निर्धारण निर्णय किसे कहते है परिभाषा अर्थ Pricing strategies in hindi

By   February 26, 2021

Pricing strategies in hindi definition meaning in market or economy  मूल्य निर्धारण निर्णय क्या है |  मूल्य निर्धारण निर्णय किसे कहते है परिभाषा अर्थ ?

प्रस्तावना
प्रत्येक आर्थिक व्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी तरह से मूल्यों से संबंधित है। एक उपभोक्ता अपनी आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए कोई वस्तु अथवा सेवा खरीदता है। वह कोई भी जिन्स कितनी मात्रा में खरीदता है, अन्य बातों के साथ, उस जिन्स और अन्य वस्तुओं तथा सेवाओं जिस पर वह अपना धन खर्च करता है के मूल्य पर निर्भर करता है। अतएव, स्वाभाविक रूप से उसका मूल्य से सरोकार होगा क्योंकि वस्तुओं के उपभोग से उसका कल्याण अथवा उपयोगिता लाभ मूल्यों से नियंत्रित होगा।

एक उत्पादक बाजार में एक या अधिक वस्तुओं अथवा सेवाओं की आपूर्ति करता है। वस्तुओं के उत्पादन से उसका राजस्व अथवा लाभ बिक्री से प्राप्त मूल्य पर निर्भर करता है। यदि बाजार में अपने उत्पादों के लिए उसे अधिक मूल्य मिलता है तो वह प्रसन्न होगा।

इसी प्रकार, हम आर्थिक व्यवस्था में अन्य एजेण्टों के लिए मूल्यों के महत्त्व को देख सकते हैं। एक व्यक्ति जो मूल्य का भुगतान करता है उसके लिए यह एक घाटा है जबकि जो व्यक्ति यह प्राप्त करता है उसके लिए यह फायदा है।

मूल्य निर्धारण की भूमिका संसाधनों के आबंटन के आर्थिक विश्लेषण में केन्द्रीय महत्त्व की रही है। तथापि, इस तथ्य के बावजूद भी कि अलग-अलग बाजार संरचनाओं के लिए अलग-अलग मूल्य निर्धारण मॉडल विकसित किए गए हैं, औद्योगिक वस्तुओं के मूल्य निर्धारण में अभी भी अनेक मुद्दे हैं जिनका समाधान नहीं किया जा सका है। ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तविक व्यवहार में मूल्य निर्धारण इन सैद्धान्तिक मॉडलों की अभिधारणाओं से हटकर है।

हम आरम्भ में मूल्य निर्धारण संबंधी सिद्धान्त और तथ्यों में संबंध स्थापित करने में अन्तर्निहित कठिनाइयों को सरल रूप में प्रस्तुत करेंगे। हम अलग-अलग बाजार संरचनाओं के लिए उपयुक्त अलग-अलग मूल्य निर्धारण मॉडलों का विश्लेषण करेंगे। अंततः हम वास्तविक व्यवहार में उत्पादकों द्वारा अपनाए गए कुछ महत्त्वपूर्ण तकनीकों की समीक्षा करेंगे।

 मूल्य निर्धारण निर्णय
मूल्य निर्धारण निर्णय या तो
क) उपभोक्ता अधिशेषों को खींचना है अर्थात् वह स्थिति जब विभेदमूलक मूल्य निर्धारण तकनीकों का उपयोग किया जाता है, आपने ई ई सी-11, में विभेदमूलक मूल्य निर्धारण के बारे में अवश्य ही विस्तार में पढ़ा होगा; अथवा
ख) रणनीतिक मूल्य निर्धारण निर्णय है, जिसमें (प) आरम्भिक मूल्य निर्धारण और (पप) मूल्य परिवर्तन। अब हम इस पर विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे।

जब एक फर्म पहली बार मूल्य निर्धारित करती है, स्पष्ट है कि मूल्य निर्धारण का कार्य अत्यन्त कठिन होगा। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब एक फर्म बिक्री के लिए नए उत्पाद के साथ व्यापार में प्रवेश करती है अथवा विद्यमान उत्पाद श्रृंखला में नया उत्पाद जोड़ती है अथवा अपने नियमित उत्पादों को नए भौगोलिक क्षेत्र में उतारती है अथवा अपनी सेवाओं के लिए नया ठेका प्राप्त करती है।

जब एक फर्म उत्पादों अथवा सेवाओं के मूल्यों में परिवर्तन करने पर विचार करती है तो ऐसा अनेक कारणों से हो सकता है, जैसे इसके उत्पादों की माँग में अचानक परिवर्तन हो सकता है अथवा उत्पादन की लागत में परिवर्तन हो सकता है अथवा कुछ अन्य अल्पकालिक कारक, फर्मों को अपने मूल्य में परिवर्तन करने के लिए बाध्य कर सकते हैं जिससे कि इसके उत्पादों अथवा सेवाओं के लिए माँग और पूर्ति में सन्तुलन स्थापित किया जा सके अथवा जब प्रतियोगिता मूल्य परिवर्तन शुरू करती है, जो तथापि, इसके बाजार की प्रकृति पर निर्भर करता है कि क्या यह प्रतियोगी है अथवा एकाधिकारी अथवा अल्पाधिकारी बाजार है।

तथापि, फर्म द्वारा उत्पादन किए जा रहे उत्पादों की अन्तर्संबंधित माँग और/अथवा लागतों के कारण मूल्य निर्धारण जटिल हो जाता है। जब एक फर्म अनेक उत्पादों का उत्पादन करती है जिनके माँग और/अथवा लागत में अन्तर्सम्बन्ध होता है (अर्थात्, संयुक्त या बहु उत्पाद है)।

मूल्य निर्धारण निर्णयों में कठिनाइयाँ

पिछली शताब्दी या उससे भी पहले से, विभिन्न बाजार दशाओं के अनुरूप सैद्धान्तिक मॉडल अर्थशास्त्रियों द्वारा तैयार किए गए हैं। इसी प्रकार, अनुभव सिद्ध अध्ययनों ने अलग-अलग दशाओं में उत्पादकों द्वारा अपनाए गए विभिन्न मूल्य निर्धारण तकनीकों को स्पष्ट रूप से प्रकाशित किया है। तथापि, मूल्य निर्धारण संबंधी सिद्धान्त और तथ्य में तादात्म्य स्थापित करना आसान काम नहीं रहा है।

मूल्य निर्धारण संबंधी सिद्धान्त और तथ्य में तादात्म्य स्थापित करने का काम निम्नलिखित कारकों के कारण कठिन हो गया है:

प्) इस संबंध में कोई सर्वस्वीकृत विचार नहीं है कि फर्म वास्तव में कैसे मूल्य निर्धारण संबंधी अपना निर्णय लेती हैं, हालाँकि इस विषय पर किसी न किसी रूप में, बड़ी संख्या में अनुभवसिद्ध अध्ययन मौजूद रहे हैं। इस स्थिति के चार कारण हैं:

क) विभिन्न अध्ययनों के प्रेक्षण विरोधाभासी रहे हैं।
ख) दी गई परिस्थिति में उत्पादक अपने कृत्यों के संबंध में जो कुछ कहते हैं अथवा जो कुछ करते हुए प्रतीत होते हैं और वास्तव में वे जो कुछ करते हैं उसके बारे में अनुमान लगाने में भारी कठिनाइयाँ हैं।
ग) मूल्य निर्धारण संबंधी निर्णय करने की अनेक रीतियाँ हैं और इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग मूल्य निर्धारण प्रक्रियाओं को अपनाया जाए। इनमें से कुछ को निम्नवत् वर्गीकृत किया जा सकता है।
प) उत्पाद के प्रकार ः उपभोक्ता
औद्योगिक
पप) प्रतियोगिता का प्रकार ः प्रतियोगी
अल्पाधिकारी
एकाधिकारी
पपप) उत्पाद की अवधि ः विद्यमान
उत्पाद नया
उत्पाद
पअ) उत्पादन की प्रकृति ः एकल उत्पाद
संयुक्त उत्पाद
बहु (परस्पर परिवर्तनीय) उत्पाद
विषमस्तरीय समेकित उत्पाद
अ) क्षमता में अंतर ः विद्यमान क्षमता का उपयोग
नई क्षमता का पूर्वानुमान

अन्य श्रेणियों को भी सम्मिलित किया जा सकता है किंतु यह सूची अनेक प्रकार की संभव मूल्य निर्धारण स्थितियों को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। लगभग सभी वर्गीकरणों को एक-दूसरे से समूहित किया जा सकता है और प्रत्येक समूह से अत्यन्त ही विशिष्ट मूल्य निर्धारण पद्धति का सृजन हो सकता है। अतएव, यह भी हो सकता है कि कुछ प्रयोजनों के लिए कम से कम मूल्य निर्धारण प्रक्रियाओं का सामान्यीकरण उपयोगी नहीं हो।

घ) फर्मों में प्रबन्धन विशेषज्ञता, कार्यान्वयन और प्रयास में अन्तर होता है। इसके परिणामस्वरूप मूल्य निर्धारण को अलग-अलग महत्त्व दिया जा सकता है और मूल्य निर्धारण निर्णय प्रक्रिया की संश्लिष्टता अलग-अलग हो सकती है।

प्प्) प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया में मूल्य निर्धारण को दिए जाने वाले महत्त्व पर असहमति है। कुछ निम्नलिखित परम्परागत घटनाक्रमों ने इसे धुरी के रूप में देखा है। तथापि, अधिक से अधिक अर्थशास्त्रियों ने उत्पादकों के सुपरिचित परिप्रेक्ष्य को स्वीकार करना शुरू कर दिया है जिसमें विज्ञापन, उत्पाद विभेदीकरण, बाजार प्रभुत्व इत्यादि के साथ-साथ मूल्य सिर्फ एक और कभी-कभी तो अपेक्षाकृत गौण प्रतिस्पर्धी साधन है। प्रबन्धकीय पदसोपान में अपेक्षाकृत निम्न स्तर जिस पर बार-बार मूल्य निर्धारित किए जाते हैं इस विचार को और पक्का करते हैं कि फर्म के मूल्य बहुधा इसकी प्रतिस्पर्धी रणनीति में आवश्यक रूप से केन्द्रीय नहीं हैं।

प्प्प्) बहुधा यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि एक उत्पाद के ‘‘मूल्य‘‘ का अभिप्राय क्या है। बट्टा/छूट (क्पेबवनदज), विशेष पेशकश, भुगतान की रीति, व्यापार के मूल्य, खरीदी गई मात्रा और परिवहन प्रभारों के परिणामस्वरूप वास्तविक लेन-देन मूल्य, प्रकाशित अथवा सारणी में दिखाए गए मूल्य से प्रायः भिन्न होता है। विनिर्माता का मूल्य न सिर्फ थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता के मूल्यों से भिन्न होता है अपितु, इनका प्रभाव भी अलग-अलग होता है। कई औद्योगिक कारोबार मूल्य बातचीत, निविदा या प्रकाशित मूल्य में गोपनीय रूप से कमी करके निर्धारित किए जाते हैं। परिणामस्वरूप, व्यष्टि और समष्टि आर्थिक स्तर पर मूल्य निर्धारण अन्वेषणकर्ता को वास्तविक कारोबार मूल्यों के संबंध में जानकारी की कमी की समस्या से जूझना पड़ सकता है।

प्ट) वह स्तर जिस पर मूल्य नियत है को निर्धारित करने वाले कारक और क्या इसमें परिवर्तन किया जाएगा और कितना परिवर्तन किया जाएगा इसे निर्धारित करने वाले कारक बिल्कुल अलग-अलग हो सकते हैं और इस प्रकार, अलग-अलग प्रकार के विश्लेषणों की आवश्यकता होती है तथा मूल्य किस तरह से निर्धारित किए जाते हैं इस संबंध में अलग-अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

ट) सामान्यतया मूल्य सिद्धान्त में मॉडलों की शृखंला सम्मिलित होती है जिसमें से सबकी स्पष्ट रूप से अथवा निश्चित विश्व के निहितार्थ द्वारा यह मान्यता होती है कि लागत और राजस्व वक्र की स्थिति और आकार उत्पादकों को ज्ञात है। किंतु जैसे ही उसमें अनिश्चितता का तत्व आ जाता है मूल्य व्यवहार, जो इन मॉडलों में सुझाया गया है, उससे काफी अलग हो

टप्) फर्म विशेष रूप से तैयार उत्पादों का भण्डार रखती हैं। यह उत्पादन और बिक्री के बीच प्रत्यक्ष संबंध को विच्छेदित कर देता है और इस प्रकार फर्मों के लिए अधिक मूल्य विवेकाधिकार का सृजन करता है। यह पुनः नए कारकों को जन्म देता है जो मूल्य मॉडलों की व्यवहार्यता को और कम कर देता है। इसके अतिरिक्त स्टाक परिवर्तनों के अस्तित्व में आने के बाद फर्म प्रायः विसंतुलन मूल्य समायोजन करेगी जिन्हें सामान्यतया संतुलन मूल्य स्तर और इसके निर्धारकों की व्याख्या करने के लिए तैयार मॉडलों के दायरे में नहीं लिया गया है।

उपरोक्त सभी मुद्दों के मद्देनजर संभवतः यह विस्मयजनक नहीं कि मूल्य व्यवहार की व्याख्या करने में कठिनाइयाँ आती हैं।

बोध प्रश्न 1
1) विभिन्न आर्थिक इकाइयों के लिए मूल्य के महत्त्व की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
2) विभिन्न परिस्थितियों का उल्लेख कीजिए जिसमें फर्म को मूल्य के संबंध में निर्णय लेना पड़ता
3) क्यों मूल्य निर्धारण संबंधी तथ्यों को सिद्धान्त से जोड़ना कठिन है?