सब्सक्राइब करे youtube चैनल

precambrian in hindi cambrian difference प्री कैम्ब्रियन काल किसे कहते हैं , कैम्ब्रियन और प्रीकैम्ब्रीयन में अंतर क्या है ?

पृथ्वी की ऐतिहासिक पृष्ठभी
(HISTORICAL BACKGROUND OF EART) कोपरनिकस के सिद्धांत पर पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की रचना का सिद्धांत आधारित है। इनके अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4600 करोड़ वर्ष है। भुकम्पों के अध्ययन से पृथ्वी की आंतरिक संरचना का पता हमे चलता है। पृथ्वी का केन्द्र ठोस आन्तरिक क्रोड है जिसका धन्त्व लगभग 13 ग्राम प्रति घन सेन्टीमीटर है। आंतरिक फ्रोड लगभग 1370 किमी0 मोटा है और लगभग 2080 कि.मी. बाहरी क्रोड से घिरा है बाहरी क्रोड की मोटाई लगभग 2900 किमी. है। मैंटल का ऊपरी भाग पृथ्वी की परत से ढका है जिसकी मोटाई 12 से 60 किमी0 की है। आन्तारिक क्रोड के केन्द्र में अर्थात् लगभग 6370 कि.मी. की गहराई में तापमान लगभग 40000 से तक दबाव लगभग 40 लाख वायुमंण्डलों तक पहुंचाता है।
पृथ्वी की उत्पति सौरमंडल अन्य ग्रहों, उपग्रहों तथा उल्का पिड़ों के साथ-साथ आज से 460 करोड़ वर्ष पूर्व हुई है और इस बात की पुष्टि रेडियोमीट्रिक डेटिंग विधि से भली-भांति की जा चुकी है। इस प्रकार पृथ्वी का इतिहास 460 करोड़ वर्ष पुराना है इसके उद्भव के बारे में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल से विचारों का विश्लेषण किया जा चुका है परन्तु वर्तमान में भी पृथ्वी की उत्पत्ति का प्रामाणिक कारण स्पष्ट नहीं हो सका है। अगर यह माना जाए कि आंखों के सामने घटित घटना का ही सच माना जाए तो यह भी उपयुक्त प्रतीत होता क्योंकि भू-गर्भिक घटनाएँ विभिन्न दरों से घटित होती हैं। जिनके अध्ययन के लिए लम्बा समय जरूर होगा, इसलिए हमें पृथ्वी पर मिले विभिन्न प्रमाणों पर ही विश्वास करना होगा अब हम यहाँ पृथ्वी की आयु का निर्धारण करने के लिए कुछ सत्य प्रमाणों का अध्ययन करेंगे।
(अ) पृथ्वी का ठण्डा होना– पृथ्वी की आयु का निर्धारण इस आधार पर किया गया है कि वह कितने दर से ठण्डी हुई । इस सम्बन्ध में स्कॉटलैण्ड के विद्वान् लार्ड केल्विन ने सन् 1862 में एक संकल्पना प्रस्तुत की व बताया कि आरम्भिक समय में पृथ्वी एक पिघले पिण्ड के रूप में थी जो कालान्तर में शनैःशनैः ठण्डी हुई है। केल्विन महोदय ने भूसतह की ताप प्रवणता की गणना करके पृथ्वी की आयु 2 करोड़ वर्ष से 40 करोड़ वर्ष के बीच बताई।
(ब) समुद्रों की लवणता– वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार समुद्रीय पानी में लवणता शुरूआती दौर में नहीं थी। कालान्तर में नदियों के जल के कारण समुद्र के जल में लवणता आयी अगर प्रतिवर्ष के लवणीय जमाव का दर का पता लगा लिया जाये तो समद्रों की आय का पता लगाया जा सकता है। जोली ने इस संदर्भ में प्रयोग कर स्पष्ट किया कि सागरों में उपस्थित लवणों की कल मात्रा 1ण्26ग1022 ग्राम है व भूसतह में प्रतिवर्ष 56ग1014 ग्राम लवण जमा किया जाता है व इस गणना के आधार पर समुद्र की उम्र निम्नाकित होगी।
समुद्र की आयु = 1.26×1022/56×1014 = 80,000,000 वर्ष
उपर्युक्त आकलन द्वारा सिर्फ समुद्रा की उम्र का पता लगा है, पृथ्वी की उम्र का नही लवणता के जमाव की दर के आधार पर पृथ्वी की आयु का निर्धारण करने में प्रमुख समस्या यह है कि सागरों में नदियों द्वारा जमा होकर स्थल में बदल जाता है। अतः ऐसी स्थिति में लवणों की कुल मात्रा का आकलन कैसे होगा।
(स) अवसादी चट्टानों का जमाव– विभिन्न प्राकृतिक प्रक्रमों द्वारा अवसादी चट्टानों का जमाव किया जाता है। अवसाद व अवसादी चट्टानों का जमाव एक सतत प्रक्रिया है। चट्टानों के निरन्तर जमाव से अवसादी चट्टानों की सघनता बढ़ती जाती है। अगर इनके जमाव की कुल मोटाई व वार्षिक टर दी जाए तो प्रथम अवसादी चट्टानों के निर्माण की उम्र का पता लगा लेंगे व इस आधार पर पृथ्वी की स आकलन किया जा सकता है।
(द) रेडियोधर्मी तत्व– सबसे पहले सन् 1896 में विख्यात फ्रांसीसी भौतिक विशेषज्ञा हेनरी ने यूरेनियम से बाहर आने वाली शक्ति पर अनुसंधान कर बताया कि इससे फोटोग्राफी की प्लेटें अंधेरे में कियाशील हो जाती है। हेनरी ने यूरेनियम के इस गुण को रेडियो सक्रियता नाम दिया। इसके बाद सन् 1903 में पियरे क्यूरी ने रेडियो सक्रिय तत्वों के विखण्डन से ऊष्मा की उत्पत्ति का पहला प्रमाण दिया। एक वर्ष बाद सन् 1904 में रदरफोर्ड ने रेडियो सक्रिय तत्वों की मदद से चट्टानों की उम्र की गणना करने का प्रयत्न किया। ये दोनों तत्व भूपटल में पाई जाने वाली शैलों में विभिन्न रूपों में विद्यमान होते हैं। ये तत्व विख द्वारा ऊष्मा उत्पन्न करते हैं यूरेनियम विघटित होने पर ऊष्मा की उत्पत्ति द्वारा उसके रूप में बदलाव जाता है व सीसा का निर्माण हो जाता है। शैलों में यूरेनियम के विखण्डन से हीलियम गैस भी उत्पन्न है व बैसाल्टिक शैलों की उपस्थिति हीलियम की मात्रा ज्ञात करके भी चट्टानों की आयु ज्ञात की जा सकती है। रेडियो सक्रिय पदार्थों की उपस्थिति आज से 1500 करोड़ वर्ष पहले मानी गई है जिस आधार पर पाक की आयु 20 से 30 करोड़ के बीच मानी गई है।
(इ) अपरदन दर का आकलन– कुछ भू-वैज्ञानिकों का यह विचार है कि पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न भू-आकार के अपरदन की दर का आकलन करके पृथ्वी की उम्र ज्ञात की जा सकती है। अगर हम वर्तमान तक के कुल अनाच्छादनकारी पदार्थों की मात्रा व अनाच्छादन की वार्षिक दर का पता लगा लेते हैं तो पथ्वी की उम्र का आकलन करना सरल हो जाएगा।
(फ) जीवाश्म और अवसादी शैल– भूपटल पर स्थित विभिन्न तरह की शैलों में मृत जीवों के अवशेष अथवा अस्थिपंजर दबे मिलते हैं। इन्हें जीवाश्म कहते हैं। ये अवसादी शैलों में मिलते हैं व दस जीवाश्मों के आधार पर ही अवसादी शैलों की सापेक्षिक उम्र ज्ञात की जाती है। इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध फ्रांसीसो भू-वैज्ञानिक जे.वी. कुवियर (1769-1832) व ब्रोंग आर्ट (1770-1847) ने पेरिस के निकटवर्ती क्षेत्रों की अवसादी शैलों का अध्ययन किया।
भू-गर्भिक समय की खोज
स्काटलैण्ड के एडिनबर्ग में भू-वैज्ञानिक शोध छात्रों के एक समूह द्वारा भू-गर्भिक समय की खोज की गई, इस समूह का नेतृत्व विश्वविख्यात भू-वैज्ञानिक जैम्स हटन ने किया। इन्होंने काल निर्धारण की पारम्परिक तरीकों को नकार दिया व आर्कबिशप अशर नामक ईसाई पादरी द्वारा सत्रहवीं सदी में पृथ्वी की उम्र के बारे में दिए गए विचारों का विरोध किया। सन् 1658 में लन्दन में प्रकाशित पुस्तक The Annals of the World में यह वर्णन मिलता है कि अशर ने पृथ्वी की उत्पत्ति ईसा से 4004 वर्ष पहले 2 अक्टूबर को सुबह सात बजे होना बताया जिस आधार पर पृथ्वी की उम्र लगभग 6000 वर्ष हुई। हट्टन व उनके सहयोगी विद्वानों ने ऐसे धार्मिक प्रभावों के खिलाफ प्रामाणिक अध्ययन आरम्भ किया। इन्होंने स्कटिश तट की चट्टानों का अध्ययन किया।
उन्होने बताया कि समय की जड़ें हर व्यक्ति की सोच से अधिक गहरी हैं। हट्टन की समय की खोज पृथ्वी के इतिहास में घटित घटनाओं के परिणामतः उत्पन्न चट्टानों के पदार्थों की व्याख्या पर निर्भर था। इस नजरिए से पृथ्वी के बारे में प्रचलित सोच को एक नई दिशा दी। हट्टन महोदय ने बताया कि वर्तमान भूत का कुंजी है। अर्थात् भू-सतह वर्तमान में उपस्थित स्थल रूपों की संरचना, आकार व स्वरूप को देखकर इसका इतिहास खोज सकते हैं। हट्टन की इसी विचारधारा को एकरूपता की विचारधारा कहत हैं इसका विवरण सन् 1785 में रायल ज्यॉग्राफिकल सोसाइटी ऑफ एडिनबर्ग के सामने प्रस्तुत शोध-पत्र
Concerning the system The theory of Earth, its Duration and Stability में मिलता है। यह बाद में 1755 में The theory of earth with Prffo and Illustration नामक पुस्तक में प्रकाशित हुआ। चट्टान ने सबसे पहले पृथ्वी के इतिहास में चक्रिय अवस्था में प्रतिपादन किया। इसी तरह हटहल ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि चट्टाने पृथ्वी के इतिहास की पुस्तक के पृष्ठ है।
मानक भू-गर्भिक समय मापनी का प्रयोग
पृथ्वी की उम्र का निर्धारण होने पर उसके उद्य से लेकर वर्तमान समय तक के कालक्रम की किस तरह व्यवस्थित किया जाए व साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए इस दिशा में पहला प्रयास जामीमी विद्वान बफन ने किया। इन्होंने पृथ्वी के इतिहास को सात युगों में विभाजित किया। इसके बाद पुनः आगे चलकर भू-गार्भिक इतिहास को मुख्यतः दो कल्पों में विभाजित किया गया था। ये कल्प क्राइस्टोजोड़क कल्प व फेनेरोजोइक कल्प है जिन्हे बाद में तीन कल्पों में विभाजित कर दिया गया (प) क्राइप्टोजोइक कल्य, (पप) प्रीकॉम्बयन कला, (पपप) फेनेरोजोइक कल्प। इसी तरह कल्पों को दुबारा चार प्रमुख महाकल्पों में विभाजित किया गया (1) प्रीकेम्ब्रीयन महाकल्प, (2) पुराजीवी महाकल्प (3) मध्यजीवी महाकल्प. (4) नवजीवी महाकल्या कल्पों की समयावधि के आधार पर सबसे बडा कल्प प्रीकेम्बीयन कल्प रहा जिसकी अवधि सारी भू-गर्भिक इतिहास की 87.6 प्रतिशत रही व इसके बारे में अधिक स्पष्ट व विस्तृत जानकारी भी नहीं मिलती है। इस प्रकार अलग-अलग समय में भूगर्भशास्त्रीयों ने अपने-अपने निष्कर्षों के आधार पर भूगर्भिक प्रक्रिया का वर्णन किया। हम यहाँ निष्कर्ष स्वरूप् भूगर्भिक समय मापनी का अध्ययन करेगे।

(1) प्रीकैम्ब्रीयन महाकल्प

– यह ऐस महाकल्प है जिसमें भूपर्वटी का निमाण हुआ। इस काल में समुद्री जीव व दूसरे जलीय पौधो का निर्माण हुआ था। कुछ जगहों पर इन्हें प्रीकेम्ब्रियन कल्प महाकल्प माना गया है। Cryptozoic दो शब्दों Crypto oZ oic से मिलकर बना है। जिसका अर्थ क्रमशः Crypto अदृश्य (Hidden) व जीवन (Life) होता है अर्थात् वह समयावधि जिसका दृष्टिगत वर्णन प्राप्त नहीं होता है। प्रीके्रम्ब्रियन महाहकल्पा की समयावधि 4600 मिलियन वर्ष पहले 570 मिलियन वर्ष पहले तक मानी गई है। भारत का प्रायद्वीप पाठार प्रीकेम्ब्रियन शैलों से बना है। प्रीकेम्ब्रियन काल से पहले की हिम चादर गर्म जलवायु से टूट गई थी। वनस्पति में सिर्फ उष्म सागरों में जिसके स्वरूप व उत्पत्ति का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है।
(2) पराजीवी महाकल्प– इसकी समयावधि 570 मियिलन वर्ष पहले से 245 मिलियन वर्ष पहले मानी गई है। इसे केम्ब्रियन, ओर्डोविसियन, डिवोनियन, सिलुरियन, कार्बोनिफेरस व परभियन आदि छह कालों में विभाजित किया गया है। कभी-कभी इसे प्राथमिक महाकल्प भी कहते हैं। विश्व में पर्वत निर्माण कारी घटनाएँ इसी युग की देन मानी जाती है। इस महाकल्प का छः भागों में वर्गीकरण किया जाता है जो निम्नानुसार हैः-
(प) केम्ब्रियन कालः केम्ब्रियन शब्द ‘केम्ब्रिया‘ से बना है, जो वेल्स का लैटिन नाम है यह काल 570 मिलियन वर्ष पहले प्रारम्भ हुआ व 505 मिलियन वर्ष पहले तक चला। केम्बियन काल की चट्टाने वल्स, उत्तरी पश्चिमी स्कॉटलैंड व पश्चिमी इंग्लैंड में मिलती हैं। इसी तरह की चट्टाने कनाडा व संयुक्त राज्य अमेरिका के ग्राण्ड कैनियन क्षेत्र में भी मिलती हैं। इस समयाविधि में चट्टानों में विश्व के प्राचीनतम जीवों के जीवाश्म पाए जाते हैं। ये जीव रीढविहीन थे। इस समय समुद्र छिछला था व मुख्य विस्तार उत्तरी अमेरिका, आस्टेªलिया, यूरोप व ब्रिटेन के कछ भागों में था। इस काल के जीवों में शैवाल, कवक, डायटम व जीवाणु, स्पोंजी, घेघा, मौलस्क व ट्राइलोबाइट प्रमुख थे।
(पप) आर्डोविसियन कालः मध्य वेल्स की पुराने सेल्टिक जनजाति आर्ङोविसेज के नाम पर इस काल का नामकरण किया गया है। इसकी समयाविधि 505 मिलियन वर्ष पहले से 438 मिलियन वर्ष मिलियन वर्ष पहले तक मानी गई है आर्डोविसियन काल की चट्टाने वेल्स के अलावा उत्तरी अमेरिका व उत्तरी-पश्चिमी यूरोप में मिलती है। इस दौरान सागरीय तली में भी ज्वालामुखी उद्गार हुए थे। इसी काल में प्रथम रीढ़दार जीव का उदय हुआ था। इसी युग में सागरों का विस्तार हुआ व तलछटी शैलों का विकास हुआ। इस प्रकार में सागरीय जीवों में लिली, स्टेनफिश, ग्रेप्टोलाइट व प्रवाल आदि मुख्य है। उत्तरी अमेरिका की शैलों में कुछ विचित्र शैलों के जीवाश्म मिले हैं, जिन्हें आधुनिक मछलियों का माना गया है।
(पपप) सिलरियन कालः इस काल की अवधि 5 करोड़ वर्ष है जो 46 करोड़ 50 लाख वर्ष आंरभ होकर 41 करोड़ 50 लाख वर्ष पूर्व समाप्त हुआ था। इस कल्प में सर्वप्रथम स्थलीय जीवों का विकास हआ। स्कॉटलैंड, स्कैडीनेविया तथा स्पिटबर्जन का निम्न पहाड़ियाँ इसी कल्प में बनानी हुई थीं। लाल बलुवा-प्रस्तर भी इसी कल्प में बनना आरंभ हुआ था। इस काल में सागर तल में काफी चढ़ाव आया, जिसका असर स्थलीय भागों पर भी पड़ा इस काल की केलेडोनियन भू-हलचन ने सारी स्थलीय भाग को प्रभावित किया।
(पअ) डिवोनियन कालः दक्षिणी-पश्चिमी इंग्लैंड की डेवोन काउण्टी के नाम किया गया था। इसका काल का नामांकन किया गया था। इसका काल 408 मिलियन वर्ष पहले से 360 मिलियन वर्ष पहले तक माना जाता है। हलचल का उच्चतम विकास इसी काल में हुआ व महाद्वीपों पर उच्च पर्वतमालाएँ बनी स्थलीय भागों में भी विस्तार हुआ। इस काल में ज्वालामुखी उदगार हुए। लाल बलुआ पत्थर का विकास पर पृथ्वी का विकास यूरोप में होने लगा पृथ्वी पर हरियाली में वृद्धि हुई व जड़ों, तने व पत्तियों वाले वृक्षों का विकास हआ। आदिम शार्क व आविभाजित हुआ जो 20 फीट तक लम्बी थी। इस काल में मछलियों की संख्या बहुत बढ़ गई थी जिस युग कहते हैं।
(अ) कार्बोनीफेरस कालः इस काल में पृथ्वी के गर्भ में कार्बन का विकास तेजी से हुआ पृथ्वी के अंदर एक कोयले की विशाल और विस्तृत पट्टी तैयार हुई, इसीलिए इसे कोयला युग भी कहा जाता है। इसका विस्तार 360 मिलियन वर्ष पहले से 286 मिलियन वर्ष पहले तक माना गया है। जलवायु अधिक तथा वर्षा भी अधिकता के कारण दलदलों का अत्यधिक विस्तार होने लगी। इन पर सघन वन क्षेत्रों का विकास हुआ। वृक्षों की ऊँचाई 100 फीट तक हो गई थी। भू-हलचल की वजह से ये वन समुद्रों में दूर गए व कालान्तर में इनके ऊपर अवसाद की परतें जमती गई। जब ये भाग दुबारा ऊपर उठे तो उनका फिर वनावरण विकसित हुआ और दुबारा पानी में डूब गये। यही क्रिया बार-बार हुई व भूमिगत हए वर्ग के कायान्तरण से कालान्तर में कोयले का निर्माण हुआ। यही कोयला वर्तमान में हमें उपलब्ध होता है। यह क्रिया सबसे अधिक उत्तरी गोलार्द्ध में हुई।
(अप) परमियन कालः 1841 में इस काल का नामकरण रूस के पर्म प्रान्त के नाम पर रखा गया। इसकी अवधि 286 मिलियन वर्ष पहले से 245 मिलियन वर्ष पहले तक मानी गयी है। इस समय एशिया, यूरोप व पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका (अप्लेशियन) में पर्वत निर्माण हुआ। उत्तरी गोलार्द्ध में जलवायु सूखे रही, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध के अनेक भाग हिमावरित हो रहे थे। ट्राइलोबाइट खत्म हो गए। नुकीली पत्ते वाले वृक्षों का विकास हुआ। इस युग में सरीसृपों का सबसे अधिक विकास हुआ, जिस वजह से इसे ‘सरासून युग‘ भी कहा जाता है।