व्यवहारपरक अर्थशास्त्र किसे कहते हैं | व्यवहारवादी अर्थशास्त्र की परिभाषा क्या है Behavioral economics in hindi

By   December 22, 2021

Behavioral economics in hindi व्यवहारपरक अर्थशास्त्र किसे कहते हैं | व्यवहारवादी अर्थशास्त्र की परिभाषा क्या है ?

मानव व्यवहार की अन्तर्दृष्टि
(Insight into Human Behaviour)
विश्व बैंक ने अपनी ताजा रिपोर्ट में (विश्व विकास रिपोर्ट 2015ः दिमाग, समाज और व्यवहार) में कहा है किए विकास की नीतियां तब ज्यादा प्रभावी हो जाती हैं जब उन्हें मानव व्यवहार के ज्ञान के साथ मिया जाए। इसमें आगे कहा गया है कि व्यवहारपरक अर्थशास्त्र की जागकारी वाले नीति निर्णय विकास को बढ़ावा देने और समाज के भले के लिए प्रभावशाली सुधार सकते हैं। इसमें भारत के स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र से कुछ उदाहरण दिए गए हैंः
ऽ जब कुछ चुनिंदा गंवों में समुदाय के नेतृत्व में पूर्ण स्वच्छता (सी,लटी,स) कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसमें शौचालय निर्माण पर सब्सिडी दी गई और फैलगे वाली बीमारियों के बारे में बताया गया, तो खुले में शौच किया जाग बड़ी संख्या में, 11 फीसदी तक कम हो गया।
ऽ माइक्रो फाइनेंस उपभोक्ताओं और उनसे पैसा वसूलगे वाले समूहों के बीच होने वाली मियादी बैठकों की अवधि मासिक के बजाय साप्ताहिक करने से ऋण न चुकाने के मामले में तीन गुना तक कम हो गए।
ऽ शोध ने साबित किया कि जातिगत पहचान जाहिर न किए जागे पर पिछडी जातियों के लड़के पहेलियां सुलझाने में उच्च जातियों के लडकों के समान ही थे। लेकिन एक मिश्रित समूह, जिसमें जातिगत पहचान पहेली सुलझाने के पहले ही उजागर कर दी गई थी, में पिछड़ी जातियों के लड़कों की उपलब्धियों में उल्लेखनीय ‘जातिगत अंतर’ नजर आया और वे 23 प्रतिशत पिछड़ गए (रिपोर्ट के अनुसार, परीक्षा लेने वों को जाति पहले ही पता चल गई थी, जिससे उगका कार्य निष्पादन प्रभावित हुआ)।
रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि रूढिवादी ढांचे से क्षमता में काफी अंतर आ जाता है, जिससे फिर से वही रूढिवादिता हावी होती है और बहिष्कार का आधार बनती है-यह एक विषचक्र बन जाता है। इस चक्र को
तोड़ने के तरीके ढूंढकर वंचितों का बड़े पैमाने पर भ किया जा सकता है।
सामाजिक मानदंड, संस्कृति और विकास
(Social Norms, Culture and Development)
आर्थिक विकास न सिर्फ राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति और कराधान को सही करने पर निर्भर करता है बल्कि इसका आधार इंसान के मनोविज्ञानए समाज शास्त्र, संस्कृति और मानदंडों में भी होता है। अर्थशास्त्र के पेशे में इसका थोडा विरोध हुआ क्योंकि इसका अर्थ एक तरह से शास्त्रों को आस-पास रखने का आधार देना होता। हालिया, 2015 की विश्व विकास रिपोर्ट (डब्ल्यूडीआर) विकास के व्यवहारपरक और सामाजिक आधारों पर केंद्रित है और उसे अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।
सरकारी दस्तावेज (सामान्यतः रूखे, स्पष्ट) अक्सर विकास और आर्थिक क्षमता को बढ़ाने में सामाजिक मानदंडों और संस्कृति का कोई उल्लेख नहीं करते। हांकि अब ऐसी रचनाएं बढ़ती जा रही हैं जो बताती हैं कि सामाजिक मानदंड और सांस्कृतिक परंपरा,ं आर्थिक क्षमता और विकास के महत्वपूर्ण अंग हैं। इसे दर्शाने वाले विशाल देश व्यापक शोध और लैबोरेट्री एकसपेरिमेंट हैं। अक्सर ही कहा जाता है कि किसी देश का विकास इसके संसाधनों, मानव शक्ति और आर्थिक नीतियों, उदाहरण के लिए राजकोषीय और मौद्रिक नीति, की दिशा पर निर्भर करता है लेकिन इसके साथ ही सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड भी हैं जो समाज में व्याप्त हैं। ऐसे समाज जो निजी शराफत और विश्वास से संपन्न होते हैं, उन्हें यह स्वाभाविक भ होता है कि किसी तीसरे पक्ष को अनुबंध गू नहीं करने पड़ते। बाहर वों के लिए यह जागकारी, कि खास समाज विश्वसनीय है, ही व्यापार और कारोबार करने के लिए काफी होती है। विकास के इन ‘सामाजिक’ कामों को आर्थिक नीतियों पर रचनाओं में पर्याप्त पहचान क्यों नहीं मिलती, इसकी एक वजह कि यह है कि अर्थशास्त्र के लिए मददगर यह सामाजिक गुण कैसेहासिल किए जाते हैं, इसे पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। सौभाग्य से एक नया विषय व्यवहारपरक अर्थशास्त्र हमें परंपराओं और स्वभाव के निर्माण पर कुछ ज्ञान देने जा रहा हैः
ऽ उदाहरण के लिए, यह मानी हुई बात है कि जिन भवन और कार्यस्थल जिगका रख-रखाव ज्यादा साफ, सुंदर किया जाता है वहांलोग ज्यादातर ईमानदार और भ्रष्ट आचरण से बचने वाले होते हैं। यह लगभग इसी तरह है कि हमारा मानसिक झुकाव हो कि हम एक अच्छे वातावरण को अपने भ्रष्ट आचरण से बर्बाद न करें।
ऽ न्यूयाॅर्क शहर में दीवारों से ग्रैफिटी (भित्तिचित्र) हटाकर और शहर की सफाई करके वहां अन्य चीजों के अवा भारी संख्या में होने वाले अपराधों पर भी नियंत्रण पाया गया। न्यूयाॅर्क फलिस विभाग ने गुंडागर्दी रोकने और सार्वजगिक स्थें परलोगों को डराने वाली ग्रैफिटी हआगे का फैस लिया। शहर की फिजा को ज्यादा सुंदर बनाने से किसी तरह संभावित अपराधी को कम अपराध करने को प्रेरित किया जा सका।
ऽ किसी को भी इसका आम उदाहरण मैट्रो में सफर करने वाले दिल्ली वों के व्यवहार में दिख सकता है। व्यापक रूप से यह देखा गया है किलोग दिल्ली की साफ-सुथरी मैट्रो में यात्रा के दौरान बेहतर बर्ताव करते हैं (कुछ का कहना है कि वह अपने बुरे बर्ताव को वापस जमीन तक आगे के लिए टाल देते हैं)।
इस तरह यह समाजशास्त्र के प्रभावशाली टूटी खिड़की सिद्धांत के अनुरूप ही है। इसके अनुसार अगर हम छोटे स्तर के असामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए छोटे-छोटे कदम उठाते हैं तो इससे स्वाभाविक रूप से बड़े अपराधों और भ्रष्टाचार के कृत्यों पर एक निरोधी असर होता है। इसके अवा नागरिकों के कुछसामूहिक गुणों जैसे कि ईमानदारी, विश्वसनीयता की असली पहचान और जागरूकता समूचे समाज को इन गुणों को अपनाने के काबिल बनाती है और सर्वव्यापी मुफ्रत के फायदे उठाने की समस्या से निजात दिती है।
अर्थशास्त्र में इस तरह की रचनाएं बढ़ रही हैं जिगके अनुसार समाज-परस्त व्यवहार, जिसमें परोकारिता और विश्वसनीयता शामिल हैं, इंसानों में जन्मजात होता है और अर्थवस्था को प्रभावी ढंग से च, रखने के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में काम करता है। दूसरे शब्दों में इंसानों में दूसरेलोगों के लिए निजी फायदे से ऊपर उठने की स्वाभाविक क्षमता होती है या इसी की जरूरत होती है क्योंकि उस व्यक्ति ने एक वायदा किया हुआ है। यह विशेषता भले ही इंसान में क्रमिक विकास से ही हो लेकिन आज इसकी मौजूदगी को हाल के अध्ययनों में लैबोरेट्री टेस्ट के जरिए दर्शाया गया है।
मूल्य और अर्थशास्त्र (Values and Economics)
मनोविज्ञान और विकासपरक जीव विज्ञान में एक शोध से दर्शाया गया है कि नैतिकता, परोपकार और मूल्य मानी जागे वाली अन्य बातें इंसानी दिमाग का जन्मजात हिस्सा होती हैं, फिर भी जिस परिवेश में एक व्यक्ति रहता है वह उगका पोषण कर सकती हैं या कुचल सकती हैं। हांकि इन इंसानी और नैतिक गुणों की पहचान का आर्थिक विकास पर भारी असर पड़ सकता था, लेकिन इसका अर्थशास्त्र में देरी से प्रवेश हुआ। इसलिए इस पर रचनाएं नई और छोटी हैं। दरअसल हालिया शोध दिखाते हैं कि समाज में कुछ‘अच्छे’लोग होने से व्यवहार का स्तर ऊपर उठ सकता है जिससे हम कुल मिकर एक बेहतर समाज बना सकते हैं। इसके भी प्रमा.ा हैं कि सामाजिक मानदंड और आदतें जो पहली नजर में किसी समाज में अंदर तक सीमा,ं लगती हैं, अल्पकाल में ही बदल सकती हैं। इस तर्क से तो किसी देश के लिए सामाजिक मानदंडों को विकसित और पोषित किया जा सकता है जो अधिक सक्रिय अर्थव्यवस्था को सक्षम करें।
एक देश की आर्थिक प्रगति की बात करते हुए सारा ध्यानए प्रशंसा और ओचना दोनों, सामान्यतः सरकार पर केंद्रित रहता है। हांकि यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि वह बहुत कुछ नागरिक समाज, फर्मों, किसानों और आमनागरिकों पर भी निर्भर होती है। सामाजिक मानदंड और सामूहिक विश्वास जो इन पक्षों के व्यवहार को आकार देते हैं, किसी देश के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ईमानदारी, समयबद्धता, वायदे पूरे करने की प्रवृत्ति, भ्रष्टाचार के प्रति नजरिया ऐसी विशेषताएं हैं जो सामाजिक विश्वास और मानदंड से बनती हैं और व्यवहार के तरीके आदत बन सकते हैं। इसके अवा भारत जैसे एक लोकतंत्र में सरकार क्या कर सकती है यह काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि आमलोग क्या सोचते हैं और किस पर यकीन करते हैं। चुनावी राजनीति का अर्थ यही है। पहले इस पर ज्यादा ध्यान क्यों नहीं गया, इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि पारंपरिक अर्थशास्त्र के बारे में इतना ज्यादा लिखा गया था कि जैसे जीवन के ये गैर-अर्थशास्त्रीय पहलू महत्वहीन हैं। लेकिन अब हम जागते हैं कि एक बाजार आधारित अर्थव्यस्था नहीं चल सकती अगरलोग पूरी तरह खुद सोचकर काम करने वाले हों। जहां निजी.हित आर्थिक विकास का एक मुख्य कारकहै, यह भी महत्वपूर्ण है कि माना जाए कि ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, और विश्वसनीयता उस सीमेंट का काम करते हैं जो समाज को बांधता है। एक समय था जब अर्थशास्त्री इन सामाजिक मानदंडों, प्राथमिकताओं और परंपराओं को अपरिवर्तनीय मागकर व्यवहार करते थे। अगर ऐसा था तो उगके असर का विश्लेषण करने का कोई खास फायदा नहीं है। लेकिन हम जागते हैं किलोगों में यह गुण बदले जा सकते हैं। ईमानदारी और शराफत को पोषित किया जा सकता है और भ्रष्टाचार से विमुखता को मजबूत किया जा सकता है।
अगर किसी देश में यह गुण अपर्याप्त या नहीं हैं तो यह संभव है कि वह देश जड़ हो जाएना और अराजक गरीबी के जाल में फंसा रहेग। उदाहरण के लिए उन अनुबंधों को लीजिए जो बाजार को विकसित होने और आर्थिक जिंदगी का आधार तैयार करते हैं। अगर किसी देश में अनुबंध की व्यवस्था इतनी कमजोर होगी कि अगर कोई बैंक मकान खरीदने के लिए किसी व्यक्ति को 20 साल का ऋण देता है, जिसके लौटा, न जागे की बहुतज्यादा आशंका है तो इसका असर यह नहीं पड़ेग कि उस देश में बैंक भारी घाटे में जाएंगे। इसका असर यह होग कि बैंक ऋण नहीं देंगे और मकान का बाजार बहुतअल्पविकसित रहेग और मकानों की कुलसंख्या बहुतकम रहेगी।
जटिल और बड़े अनुबंध गू करने, विशेषकर जिगहें लंबे समय तक सुरक्षा दी गई हो, की जिम्मेदारी राज्य की है। राज्य कानून और व्यवस्था उपलब्ध करवाता है ताकिलोग अनुबंध कर सकें। आर्थिक जीवन रोजमर्रा के अनुबंधों से भरा होता है (उदाहरण के लिए, आप मुझे अपनी टैक्सी में यात्रा करने देते हैं और उसके अंत में आपको भुगतान करता हूं मैं आपको पैसे देता हूं और आप मेरा घर अगले दो दिन तक पेंट करते हैं या आप मेरा घर दो दिन तक पेंट करते हैं और मैं उसके बाद आपको पैसे देता हूं)। रोजमर्रा की इन स्थितियों में राज्य और अदालतों को ना बहुत बोझिल होग। यहां मुख्य जमानतीलोगों की व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा और विश्वसनीयता होनी चाहिए। जिन समाजों ने सफलतापूर्वक इन गुणों को विकसित कर लिया है उन्होंगे अच्छा प्रदर्शन किया है जो समाज इन विशेषताओं में पीछे रह गए उगकी आर्थिक प्रगति भी कमजोर ही रही है।
यह ठीक-ठीक पता नहीं है कि इन मूल्यों को समाज में कैसे शामिल किया जाए। लेकिनए उम्मीद की जा सकती है कि इगके महत्व के बारे में लिखते रहने से बदलाव की प्रेरणा मिलेगी, जैसे ही आमलोगों को यह अहसास होग कि आर्थिक प्रगति के लिए ये सामाजिक गुण उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि वह नीतियां जो सीधे अर्थव्यवस्था से संबंधित हैं, जैसे-स्टाॅक मार्केट का चलगीा या बाजार में प्रतियोगिता के नियम तय करना।
इसके अवा, आधारभूत साक्षरता और बेहतर शिक्षा भी मददगर होगी क्योंकि फिरलोग खुद ही, अपने स्तर पर विचार कर सकते हैं और निष्कर्ष गिकाल सकते हैं। साक्षरता का और फायदा है इसका परिणाम यह होता है कि सामान्यजन ऐसी नीतियों की मांग करते हैं जो वास्तव में बेहतर होती हैं, उगके बजाय जो सिर्फ सतह पर बेहतर दिखती हैं और भारत जैसे लालालोकतांत्रिक समाज में इससे राजनेता बेहतर नीतियां चुनना शुरू करेंगे। अंततः राजनेता और नीति-निर्माता अगर ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, और विश्वसनीयता के गुणोंके आदर्श बनें तो गड़ी चल पड़ेगी। नीति-निर्माण में इंसानी जीवन के व्यवहारपरक पहलुओं को शामिल करनालोगों के कल्याण में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है।