प्रधानमंत्री की शक्तियां क्या है | प्रधानमंत्री की शक्तियों का वर्णन कीजिए powers of prime minister of india in hindi

By   October 17, 2020

powers of prime minister of india in hindi प्रधानमंत्री की शक्तियां क्या है | प्रधानमंत्री की शक्तियों का वर्णन कीजिए ?

प्रधानमंत्री की शक्ति एवं प्रभाव के स्रोत
यद्यपि संविधान प्रधानमंत्री की शक्तियों तथा प्रकार्यों को परिकलित नहीं करता है, व्यवहार्यतः प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद् तथा लोक सभा के नेता के रूप में शक्तियों की एक विस्तृत श्रृंखला का उपभोग करता है।

मंत्रालय को संघटित करने, पुनर्संघटित करने और उसमें फेर-बदल के साथ-साथ सभाओं की अध्यक्षता करने का प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार उसके पद को संसद-सदस्यों पर यथेष्ट प्रभाव प्रदान करता है। यह तथापि गौरतलब है कि अपने सहयोगियों को चुनने का प्रधानमंत्री का अधिकार पार्टी के भीतर उसकी अपनी स्थिति पर निर्भर है। उदाहरण के लिए, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू, सरदार पटेल की अनदेखी नहीं कर सके जो कि काँग्रेस पार्टी में बहुत प्रभावशाली थे। इसी कारण उन्हें उप-प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। पटेल के कुछ अनुयायी भी मंत्रालय के सदस्य बनाए। इसी प्रकार, श्रीमती इंदिरा गाँधी की अपने पद-ग्रहण करने के आरंभिक वर्षों में अपने मंत्रालय में पार्टी के प्रभावशाली नेताओं को समायोजित करना पड़ा। 1971 के मध्यावधि चुनावों के बाद एक सर्व-शक्तिशाली नेता के रूप में उभरते हुए, उन्हें मंत्री चुनने तथा फेर-बदल करने की पूरी आजादी थी। गठबंधन सरकारों में, प्रधानमंत्रीगण मंत्रीय सहयोगी चुनने में ज्यादा विकल्प नहीं रखते थे। जनता सरकार में मोरारजी देसाई के पास अनेक मंत्री ऐसे थे जिनको वे पहले कभी नहीं जानते थे। हरदनहल्ली देवेगौड़ा और उसके बाद इंद्रकुमार गुजराल सरकारों के मामले में, मंत्रीगण प्रधानमंत्री द्वारा नहीं बल्कि उन 14 क्षेत्रीय दलों के नेताओं द्वारा चुने गए जिन्होंने संयुक्त मोर्चा गठित किया था।

प्रधानमंत्री शक्ति व प्रभाव इस तथ्य से भी प्राप्त करताध्करती है कि वही बहुमत दल का नेता होता है और कभी-कभी पार्टी के संसदीय स्कंध का भी नेता होता है। लोकसभा के एक नेता के रूप में, प्रधानमंत्री का संसदीय गतिविधियों पर अत्यधिक नियंत्रण होता है। संसद का सत्र बुलाने अथवा सत्रावसान पर प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सलाह देता है। लोकसभा की कार्यसूची को अंतिम रूप देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष प्रधानमंत्री की सलाह लेता है। संसद के समक्ष अधिकांश विधेयकों को मंत्रिपरिषद् के समर्थन की वजह से और संसद के समक्ष विधेयक प्रस्तुत करने हेतु रणनीतियाँ तय करते प्रधानमंत्रियों की वजह से, विधायिका के ऊपर प्रधानमंत्री का प्रभाव दृढीकृत हो जाता है। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री के पास सत्रावसान की स्थिति में प्रवर्तन हेतु राष्ट्रपति को अध्यादेशों की अनुशंसा करने के रूप में विपुल विधायी शक्ति भी है। परंतु संसद के संबंध में प्रधानमंत्री का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार लोकसभा भंग करने की सिफारिश करना है। राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की सलाह माननी पड़ती है क्योंकि परवर्ती के पास लोक सभा के बहुमत का समर्थन होता है। यही वह शक्ति है जिसके द्वारा प्रधानमंत्री विपक्ष पर भी नियंत्रण रखता है।

सरकार-प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री सरक्षक की शक्ति का उपभोग करता है। केन्द्रीय सरकार की सभी मुख्य नियुक्तियाँ राष्ट्रपति के नाम से प्रधानमंत्री द्वारा की जाती हैं, जिनमें शामिल है – सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति तथा न्यायाधीश, महान्यायवादी, थल, जल तथा वायू सेनाओं के प्रमुख, राज्यपाल, राजदूत तथा उच्चायुक्त, मुख्य चुनाव आयुक्त तथा आयोग के सदस्य, आदि। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री का प्रशासन पर नियंत्रण, गुप्तचर एजेंसियों तथा सरकार के अन्य प्रशासनिक स्कंधों समेत, अन्य संसद-सदस्यों तथा प्रशासन पर उसके प्रभाव को बढ़ाते हैं।

इन प्राधारिक कारकों से परे अन्य कारक भी हैं जो प्रधानमंत्री की शक्ति और प्रभुत्व को बढ़ाते हैं। आरंभतः, द्वितीय विश्वयुद्धोपरांत, कार्यकारिणी का उदय एक सार्वभौमिक चमत्कारिक घटना रही है, राजनीतिक प्रणाली चाहे जो हो। इसके अतिरिक्त अधिकांश लोकतांत्रिक प्रणालियों में आम चुनाव वस्तुतः एक नेता का चुनाव बन गए हैं, और इसी को एक लोकप्रिय जनाधार के रूप में निर्वाचित किया जा रहा है। कभी-कभी कोई नेता/नेत्री अपने चमत्कार से शक्ति अर्जित करता है। जवाहरलाल नेहरू तथा इंदिरा गाँधी जैसे नेताओं का अपने चमत्कार के कारण ही निर्विवादित नियंत्रण था। इसने उन्हें उन राष्ट्रीय मुद्दों पर विपुल शक्ति व प्रभाव का प्रयोग करने में मदद की जो कि संविधान में स्पष्टतः अभिकल्पित नहीं थे। इन कारकों, संचयी प्रभाव ने निरर्थक प्रधानमंत्री पद की शक्ति और प्रतिष्ठा को बढ़ाने में योगदान दिया है।

सामूहिक उत्तरदायित्व
मंत्रिपरिषद् सामूहिक दायित्व के सिद्धांत पर कार्य करती है। इस सिद्धांत के अधीन, सभी मंत्री सरकार के प्रत्येक कार्य के लिए समान रूप से उत्तरदायी हैं। यथा, सामूहिक नेतृत्व के अंतर्गत प्रत्येक मंत्री मंत्रिमंडल के सभी निर्णयों के लिए दायित्व स्वीकार करता है और अपनी भागीदारी हेतु सहमत होता है। शंकाएँ तथा असहमतियाँ मंत्रिमंडल-कक्ष की गोपनीयता तक परिसीमित हैं। एक बार निर्णय लिए जाने के बाद, इसको निष्ठापूर्वक समर्थन दिया जाना होता है और पूरी सरकार के निर्णय के रूप में मान लिया जाना होता है। यदि मंत्रिपरिषद् का कोई सदस्य-संसद में अथवा पूरे देश में सरकारी नीति को समर्थन देने में असमर्थ होता है, तब वह सदस्य मंत्रिपरिषद् से पद-मुक्त होने को नैतिक रूप से बाध्य है।

यदि मंत्रिपरिषद् विभिन्न राजनीतिक देलों के एक गठजोड़ के फलस्वरूप गठित हुई हो तो भी मंत्रालय की संहति को बनाए रखने के लिए एक न्यूनतम सर्वमान्य कार्यक्रम आवश्यक हो जाता है, और गठबंधन सरकार का गठन करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों को उस कार्यक्रम का अनुगामी होना पड़ता है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, मंत्रिमंडल बना नहीं रह सकता। मंत्रिपरिषद्, के भीतर एका का होना मात्र इसकी उत्तरजीविता हेतु आवश्यक नहीं है, बल्कि यह उसकी दक्षता तथा प्रभावोत्पादकता हेतु भी आवश्यक है, जिनके आधार पर ही वह जनता का विश्वास निरंतर जीत सकती है। जयप्रकाश नारायण द्वारा शुरू किए गए जन-आंदोलन को काबू करने की सरकारी नीति से सार्वजनिक विसम्मति के कारण 1975 में राज्य मंत्री, मोहन धारिया को मंत्रिपरिषद् से निलंबित कर दिया गया था। 1979 में सार्वजनिक नीति के मसलों पर जनता सरकार के सदस्यों के बीच खुली कलह उस सरकार के विध्वंस का ही पूर्वरंग था।

 मंत्रिपरिषद् और संसद
संसदीय सरकार का सार-तत्त्व है – संसद के प्रति प्रधानमंत्री तथा मंत्रिमंडल की उत्तरदेयता । संसद शासन नहीं करती वरन् सरकार की नीतियों तथा कार्यों की आलोचनात्मक रूप से जाँच करती है, और जनता के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें स्वीकृत अथवा अस्वीकृत करती है। प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद् का नितांत अस्तित्व तथा उत्तरजीवन संसद में उनको मिलने वाले समर्थ पर निर्भर करता है। जैसा कि हमने देखा, मंत्रिपरिषद् संसद के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। इस प्रकार, आम धारणा यह है कि संसद कार्यपालिका को नियंत्रित करती है। परंतु वस्तुतः अपने बहुमत समर्थन के साथ प्रधानमंत्री ही संसद की वास्तविक कार्यवाही पर नियंत्रण रखता है।

बोध प्रश्न 2
नोट: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें।
1) किसी कैबिनेट के तीन सबसे महत्त्वपूर्ण प्रकार्य क्या हैं?
2) सामूहिक उत्तरदायित्व क्या होता है?
3) संसदीय प्रणाली में प्राधारिक कारक होते हैं जो प्रधानमंत्री की शक्ति व प्रभाव में योगदान देते हैं। इन कारकों को पहचानें।

बोध प्रश्न 2
1) (क) संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाने हेतु सरकारी नीति निर्धारित करनाय (ख) सरकारी नीति लागू करना, और (ग) अंतर्विभागीय समन्वय तथा सहयोग कायम करना।
2) मंत्रिपरिषद् इसी सिद्धांत पर कार्य करती है। प्रत्येक सदस्य मंत्रिमंडल के सभी निर्णयों को स्वीकार करता है और दायित्व निभाने को सहमत होता है। दक्षता और प्रभावोत्पादकता के लिए तो यह आवश्यक है ही, सरकार की मंत्रिमंडलीय व्यवस्था की उत्तरजीविता हेतु भी आवश्यक है।
3) एक संसदीय प्रणाली में, प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद्-प्रमुख, निम्न सदन में बहुमत दल का नेता और सरकार-प्रमुख होता है।