बोल्शेविक क्रांति क्या थी | बोल्शेविक क्रांति किसे कहते हैं , कब हुई , अर्थ , नेता प्रभाव bolshevik revolution in hindi

By   September 30, 2020

bolshevik revolution in hindi बोल्शेविक क्रांति क्या थी | बोल्शेविक क्रांति किसे कहते हैं , कब हुई , अर्थ , नेता प्रभाव का नेतृत्व किसने किया था रूस पर बोल्शेविक क्रांति का क्या प्रभाव पड़ा 1917 की पहली रूसी क्रांति को किस नाम से जाना जाता है |

बोल्शेविक क्रांति एवं उसका प्रभाव
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
बोल्शेविक और अंतर्राष्ट्रीय संबंध की नई व्यवस्था
बोल्शेविक सरकार के शांति प्रयास
बोल्शेविक सरकार पड़ोसी देशों में अपने विशेषाधिकारों के खात्में की घोषणा
बोल्शेविक एवं उपनिवेश-विरोधी संघर्ष
पूर्व में समाजवादी विचारों का प्रसार
पूर्व में राष्ट्रवादी एवं समाजवादी ताकतों की एकता
राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम का तीव होना
कम्युनिस्ट एवं मजदूर आंदोलनों का उद्भव एवं विकास
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई में बोल्शेविक क्रांति, जो दुनिया की पहली समाजवादी क्रांति थी, की वजह से अंतर्राष्ट्रीय संबंध में आये महत्वपूर्ण बदलावों की चर्चा की गयी है। साथ ही पूरी दुनिया में चल रहे उपनिवेश विरोधी संघर्षों, श्रमिक एवं किसान संघर्षों पर बोल्शेविक क्रांति के प्रभावों की चर्चा की गयी है। इस इकाई के अध्ययन के बाद आप:
ऽ बोल्शेविक क्रांति एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध पर पड़ने वाले उसके प्रभावों की व्याख्या कर सकेंगे,
ऽ नये सोवियत राज्य ने शांति एवं अनाक्रमण पर आधारित शोषण तथा औपनिवेशकरण से मुक्त नयी विश्व व्यवस्था बनाने की दिशा में कौन से पहल किये हैं,उनका विश्लेषण करने में समर्थ हो सकेंगे,
ऽ उपनिवेश विरोधी संघर्षों पर बोल्शेविक क्रांति के प्रभाव को समझ सकेंगे और
ऽ अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी तथा श्रमिक आंदोलनों में बोल्शेविक क्रांति के योगदान की समीक्षा करने में
समर्थ हो सकेंगे।

प्रस्तावना
1861 में कृषि गुलामों की मुक्ति तथा क्रिमिया युद्ध (1856-59) में रूस की हार के बाद रूस में पूँजीवाद एवं औद्योगिकीकरण की तीव्रता से विकास हुआ। महाद्वीप में अपनी मजबूत स्थिति बनाये रखने की जरूरत ने रूस को बड़े पैमाने पर औद्योगिकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित/मजबूर किया। यह सब आर्थिक गतिविधियों में राज्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका से संभव हो सका। पूँजीवाद के विकास के साथ रूस को कच्चे माल और बाजार की भी जरूरत पड़ी। 19वीं सदी की तीसरी चैथाई के वर्षों के शुरू होत-होते रूसी साम्राज्यवाद पहले ही केन्द्रीय एशिया में अपने उपनिवेश बना लिये थे तथा वाल्कन एवं सुदूर पूर्व क्षेत्र में उपनिवेश बनाने के लिए दूसरी साम्राज्यवादी ताकतों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा था । सदी के अंत तक रूस एक साम्राज्यवादी ताकत बन चुका था किंतु उसकी कृषि आज भी अर्द्ध सामंती व्यवस्था पर आधारित थी तथा उसकी राज्य व्यवस्था भी निरंकुश थी। न तो कोई जनप्रिय सरकार थी, न कानून बनाने के लिए कोई प्रतिनिधिक संस्था थी और न ही कोई जनाधिकार एवं राजनीतिक स्वतंत्रता थी। उदारवादी समूह कमजोर थे जो शासकों के साथ बहुधा समझौते करते रहते थे। मार्क्सवाद लोकप्रिय हो रहा था। उसे सामंत विरोधी एवं पूँजीवाद विरोधी ताकतों की एकजुट करने के कठिन काम को पूरा करना था।

मार्क्सवादी समूह जो तब सामाजिक लोकतंत्रवादी कहे जाते थे, आपस में कई समूहों में बंटे हुए थे। उनके बीच विचारधारात्मक विभेद ऐसे थे कि उन्हें बाँटा नहीं जा सकता। 1898 में गठित रसन सोसल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी (आर एस डी एल जी) दो मख्य समहों में विभाजित थाः बोल्शेविक (बहसंख्य और मेन्शेविक (अल्पसंख्यक)। हालांकि दोनों समाजवादी क्रांति से पहले लोकतांत्रिक सामंत विरोधी क्रांति की वकालत करते थे, किन्तु बोल्शेवकों की राय थी कि श्रमिक वर्ग ही क्रांति के इस लोकतांत्रिक दौर की अगुआई करें। जबकि पेन्शेविक चाहते थे कि बुर्जऑजी यानि पूँजीवादी इसका नेतृत्व करें। अंततः लेनिन की अगुआई में बोल्शेविक 1917 के आते आते क्रांति के अगुआ बन गये। उनके नेतृत्व में मजदूरों और किसानों का गठबंधन क्रांति के बाद राज्य सत्ता पर काबिज हुआ। 1917 में जार। प्रशासन का तख्तापलट हो जाने के बाद, बर्जुऑनी का समर्थन तथा उनकी सरकार में शामिल होने वाले मेन्शेविकों का मजबूर किसानों के बीच कोई आधार नहीं रह गया। अक्टूबर के आते आते वे बिल्कुल अलग-थलग हो गये। 7 नवम्बर (पुराने रूसी कैलेंडर के अनुसार 25 अक्टूबर) को तीन दिनों के कड़े सशस्त्र संघर्ष के बाद बोल्शेविकों को विजय मिल सकी। जब 1917 के फरवरी में अस्थायी सरकार ने अंततः समर्पण कर दिया।

प्रथम विश्वयद्ध पहले ही जार प्रशासन के भाग्य का फैसला कर चका था। यद्ध ने रूसी राज्य के संकटों को उजागर कर दिया था। युद्ध की शुरूआत में रूसी समाज अंतर्विरोधों का बंडल था-सामंतों एवं किसानों के बीच अंतर्विरोध थे, कुलकों और भूमिहीन मजदूरों के बीच अंतर्विरोध थे, यानि तरह तरह के अंतर्विरोध विद्यमान थे। युद्ध शुरू होते ही ये अंतर्विरोध तेज हो गये। युद्ध की भारी कीमत रूस के लिए बहुत अधिक थी क्योंकि अन्य साम्राज्यवादी देशों की तुलना में वह एक पिछड़ा हुआ राज्य था। राज्य युद्ध का इतना भारी खर्च वहन नहीं कर सका और अंततः इस बोध को किसानों एवं मजदूरों को ढोना पड़ा। मजदूर यहाँ तक कि सैनिक भी राज्य के खिलाफ खड़े हो गये । इतिहास में पहली दफा एक समाजवादी क्रांति सफल हुई। कब्जा न होगा कि क्रांति के लिहाज से रूस से बेहतर कोई दूसरा देश नहीं था क्योंकि वह साम्राज्यवादी श्रृंखला की सबसे कमजोर कड़ी थी।

अक्तूबर क्रांति ने एक युग का सूत्रपात किया। किसानों और मजदूरों ने राज्य सत्ता पर कब्जा बनाया। इनके हित धार्मिक शोषण, युद्ध, आक्रमण, औपनिवेशीकरण और नस्लवादी भेदभाव के खिलाफ थे। क्रांति ने एक ऐसे राज्य को जन्म दिया जो युद्ध व साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई में प्रेरक शक्ति के रूप, में काम करता रहा। इसने वैकल्पिक विश्व समाजवादी व्यवस्था को भी जन्म दिया। जो यह व्यवस्था बराबरी और शोषण मुक्ति के सिद्धान्त पर आधारित थी जिसमें किसी भी तरह के अतिक्रमण औपनिवेशीकरण एवं नस्लवादी पूर्वाग्रह के लिए कोई जगह नहीं थी। यह व्यवस्था पूँजीवादी व्यवस्था जो औपनिवेशीकरण, आर्थिक शोषण एवं नस्लवाद आदि पर आधारित थी।

बोल्शेविक एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध की नई व्यवस्था
दुनिया के मेहनतकश लोगों और उपनिवेशों के लोगों को अक्तूबर क्रांति ने आशा और मुक्ति का पैगाम दिया। यह संदेश किसी भी तरह के शोषण से मुक्ति का संदेश था, चाहे उसका स्वरूप राष्ट्रीय हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो अथवा राजनीतिक हो। इसकी अभिव्यक्ति बोल्शेविक सरकार की उद्घोषणाओं, उसके कानूनी प्रावधानों तथा राजनयिक पहलों में हो रही थी।

मजदूर वर्ग और शोषित जनता के अधिकारों का घोषणा-पत्र 1918 के जनवरी माह में होने वाले ऑल रसियन कांग्रेस ऑफ सोवियत में स्वीकार किया गया था। इस घोषणा पत्र में मानवता को युद्ध से मुक्ति दिलाने का दृढ़ संकल्प दुहराया गया था और कहा गया था राष्ट्रों के बीच शांति बहाल करने की भारी से भारी कीमत भी चुकायी जायेगी। इसके लिए न तो किसी राज्य को जबरन अपने में मिलाया जाएगा और न ही किसी से कोई हर्जाना लिया जायेगा। घोषणा पत्र में सोवियत राज्य के बारे में कहा गया है -‘‘बुर्जुआ सभ्यता की उस बर्बर नीति से पूरे तौर पर अलग जिसने कुछ चुने हुए राष्ट्रों के शोषकों की समृद्धि के लिए एशिया के सैकड़ों लाखों लोगों, सामान्यतया सभी उपनिवेशों एवं छोटे देशों को गुलाम बनाया है।”

सोवियत राज्य ने मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय संबंध जहाँ युद्ध व औपनिवेशीकरण सहजीवी अंग थे, के खिलाफ सख्त रूप अपनाया। इसके बदले, न्यायसंगत एंव लोकतांत्रिक शांति तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध की ऐसी सिद्धान्तों पर आधारित हो, की वकालत की गयी । गुप्त राजनय की भर्त्सना अंतर्राष्ट्रीय राजनय की अनिवार्य तार्किक परिणति है।

बोल्शेविक सरकार के शांति प्रयास
दि डेक्री ऑन पीस सोवियत राज्य के महत्वपूर्ण प्रारंभिक कानूनों में से एक था। इसमें गुप्त राजनय की नीति की भर्त्सना की गयी थी। इस कानून के मुताबिक सोवियत विदेश मंत्रालय जारवादी राज्य (रूसी शहंशाहों को जार कहा जाता था) द्वारा की गयी गुप्त संधियों को उजागर करने लगा। इन संधियों में आंग्ल रूसी संधि तथा मध्य पूर्व में ब्रिटेन एवं रूसी हितों के क्षेत्रों की पहचान करने के लिए 1907 में हुए सम्मेलन तथा टर्की को ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के बीच विभाजित करने वाली 1916 की संधि शामिल थी।

गठबंधन शक्तियों (प्रथम विश्व युद्ध की विजेता शक्तियाँ) द्वारा शांति का सामान्य हल ढूंढने की मनाही ने रूस को जर्मनी आस्ट्रिया, हंगरी, टर्की तथा बुल्गारिया (युद्ध का दूसरा गुट) के साथ समझौता करने पर विवश कर दिया। सोवियत प्रस्ताव में 6 बिंदु थेः युद्ध के दौरान अधिग्रहित क्षेत्र पर किसी भी तरह का जबरन कब्जा नहीं करना, युद्ध में पराजित राष्ट्रों की राजनीतिक स्वतंत्रता की पुनर्बहाली, जातीय अल्पसंख्यकों को अपनी मर्जी से पूर्व राज्य के साथ रहने अथवा जनमत के द्वारा स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का अधिकार देना, किसी राज्य के जातीय अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा विशेष कानूनों, जिसमें राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण और हो सके तो प्रशासनिक स्वतंत्रता की बात शामिल हो, के जरिये करना, युद्ध के हर्जाने को खत्म करना और औपनिवेशिक समस्याओं का हल उपर्युक्त चार सिद्धान्तों के आधार पर तय करना। यद्यपि जर्मनी ने सोवियत प्रस्ताव को ठुकराते हुए उस पर अपमानजनक शांति शतों को थोप दिया,फिर भी, लेनिन अपनी ही पार्टी एवं सरकार के तीखे विरोध की अवहेलना करते हुए, जर्मनी की। शर्तों पर ब्रेस्ट लिटोवस्क की संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी हो गया। लेनिन का दृढ़मत था कि युद्ध मेहनतकश जनता के लिए हानिकारक है।

बोल्शेविक सरकार द्वारा पड़ोसी देशों में अपने विशेषाधिकारों के
खात्मे की घोषणा
सिद्धान्त और व्यवहार दोनों में राष्ट्रीय संप्रभुता एवं समानता की धारणाएँ सोवियत विदेश नीति के अनिवार्य अंग थे। इनके जरिये रूस लोकतांत्रिक सिद्धान्तों पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय संबंध को प्रतिष्ठित करना चाहता था। पहले समाजवादी राज्य के उदय ने औपचारिक रूप से स्वतंत्र छोटे राज्यों, उपनिवेशों और अर्द्ध-उपनिवेशों को साम्राज्यवादी ताकतों के शोषण एवं अतिक्रमण के खिलाफ संघर्ष तथा अपनी संप्रभता की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया। अंतर्राष्ट्रीय संबंध की नयी व्यवस्था के निर्माण की प्रक्रिया में सोवियत राज्य ने पूर्वी राज्यों के साथ अपने संबंधों को तरजीह दिया। ये संबंध समानता, परस्पर सम्मान व मित्रता के सिद्धान्तों पर बनाये जाने थे। सोवियत साम्राज्यवाद के खिलाफ उनके संघर्ष में दोस्ताना मदद देने के लिए तैयार था।कठिन आर्थिक हालात के बावजूद, सोवियत राज्य ने टर्की, अफगानि- स्तान, ईरान आदि देशों को न केवल राजनीतिक एवं नैतिक समर्थन अपितु भारी आर्थिक मदद भी प्रदान की। 1919 के जून महीने में सोवियत राज्य ने ईरान में रूसी नागरिकों के तमाम विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया, ईरान के राजकीय राजस्व पर से अपने तमाम नियंत्रण हटा लिये तथा ईरान के कैस्पियन तट पर स्थित बैंकों, रेलमार्गों, सड़कों और बंदरगाहों तथा उन तमाम परिसंपत्तियों को जिन पर जारकालीन रूस का कब्जा था, को फिर से ईरान के हवाले कर दिया। 1921 के फरवरी महीने में ईरान के साथ मैत्री संधि (ईरान और यूरोप के बीच संपन्न हुई पहली समतामूलक संधि) पर हस्ताक्षर हुआ। इस संधि ने ईरान की स्वतंत्रता और सोवियत राज्य से लगी। उसकी सीमाओं की सुरक्षा की गारंटी दी। इसी तरह टर्की के साथ मैत्री एवं सहयोग की संधि की गयी। नतीजतन टर्की सोवियत राज्य द्वारा दिये जाने वाले प्रचुर आर्थिक, वित्तीय और सैन्य सहायता का हकदार बना। 1921 के बसंत में सोवियत अफगान संधि हुई जिसके तहत अफगानिस्तान को ब्याजमुक्त कर्ज दिया गया तथा वहाँ काम करने के लिए सोवियत विशेषज्ञ भेजे गये।
बोध प्रश्न 1
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर का मिलान कीजिए।
1) बोल्शेविकों ने अंतर्राष्ट्रीय संबंध की किस नई वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण किया?
2) बोल्शेविक शांति नीति की विवेचना कीजिए।

बोल्शेविक एवं उपनिवेश-विरोधी संघर्ष
फिर भी इस स्वप्नसरीखे प्रथम समाजवादी राज्य की स्थापना का सबसे चिरस्थायी देन प्रेरणा के रूप में सामने आई थी। क्रांतिकारी चिंतन और विचारों को सफलता ने उपनिवेश बना दिए राष्ट्रों के स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ियों को प्रभावित किया । इसने अल्पविकसित दुनिया की मेहनतकश जनता के क्रांतिकारी आंदोलनों को भी बल दिया। सामंती और पूँजीवादी प्रभुओं पर रुसी मेहनतकश जनता की जीत ने उपनिवेशों की जनता के सामने यह उजागर कर दिया कि यूरोपीय साम्राज्यवादी एवं उसके । स्थानीय बंधु शोषितों के समवत संघर्ष के सामने अजेय नहीं है। नये समाजवादी राज्य की रूस एवं पूर्व की मेहनतकश जनता के नाम जारी अपील. में इरानियों, तुर्को, अरबों और हिन्दुओं से कहा गया कि वे अपने कंधों से शोषण के जुए को उतार फेंकने में समय जाया न करें तथा जल्दी से जल्दी अपनी जमीनों पर अपनी मिल्कियत कायम करें। अपील में भारत की उबलती राष्ट्रीय चेतना का विशेष उल्लेख किया गया था नये क्रांतिकारी राज्य की ऐसी घोषणाओं ने उपनिवेशों की जनता को भरोसा दिया कि रूस की क्रांतिकारी सरकार के रूप में उनका असल हमदर्द खड़ा है जिसे वे साम्राज्यवादी के खिलाफ अपने संघर्ष में इस्तेमाल कर सकते हैं।

पूर्व में समाजवादी विचारों का प्रसार
अक्तूबर क्रांति की राह पाकर समाजवादी विचारों का व्यापक प्रसार हुआ। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के कई नेता इन विचारों से प्रभावित हए। भारत के पंडित नेहरू वैज्ञानिक समाजवाद से खासतौर पर प्रभावित थे। भारत की खोज नामक अपनी पुस्तक में उन्होंने लिखा, “सामाजिक विकास के मुतल्लिक मार्क्स का सामान्य विश्लेषण उल्लेखनीयरुप रूस से सही प्रतीत होता है। लेनिन ने इन विचारों को अनुवर्ती विकासों में सफलतापूर्वक उपभोग किया है।‘‘ वैज्ञानिक समाजवाद राष्ट्रीय बुद्धिजीवी वर्ग के लिए अपने देश अथवा बाहर की राजनीतिक और सामाजिक ताकतों के बारे में बेहतर समझ पैदा करने में सहायक रहा। इस समझ का प्रयोग राजनीतिक स्वतंत्रता एवं सामाजिक विकास के संघर्षों में किया जा सकता था। इसने उन्हें उस विचार धारा की पहचान करने में मदद दी जो राष्ट्रीय पुनर्जीवन के लिए सबसे ज्यादा माकूल हो सकता था।

पूर्व में राष्ट्रवादी एवं समाजवादी ताकतों की एकता
अक्तूबर क्रांति के प्रभाव में समाजवादी विचारों का व्यापक प्रसार हुआ। अनेक क्रांतिकारी समूहों एवं कम्युनिस्ट पार्टियों का गठन हुआ। इनके क्रियाकलापों से मेहनतकश जनता की चेतना में इजाफा हुआ और शोषण चाहे साम्राज्यवादीयों की हो अथवा स्थानीय शोषकों के खिलाफ लामबंद हुए। ये समूह जनता को राजनीतिक रूप से सक्रिय बनाने की दिशा में तो कार्य कर ही रहे थे, किसानों और मजदूरों के संघर्ष को राष्ट्रीय मुक्ति और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों से जोड़ने के लिए जमीन भी तैयार कर रहे थे। साम्राज्यवाद को पराजित करने में मजदूरों और जनता के राष्ट्रीय संघर्षों के बीच एका की महत्ता का अहसास अवतूबर क्रांति ने करा दिया था। रूस में समाजवाद की सफलता तथा विश्व साम्राज्यवाद को लगे झटके के साथ-साथ एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमरीका का राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम और अधिक व्यापक और तेज हुआ। एक-एक कर अनेक देश और समाज के अनेक तबके इस मुहिम में शामिल होते चले गए। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के लक्ष्यों और सरोकारों में और अधिक गहराई आई और सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि वे उत्तरोत्तर सफल होते गए। सोवियत राज्य राष्ट्रीय एवं सामाजिक मसालों का सफल संचालन कर चुका था। बहुत हद तक यह उसी क्रांतिकारी प्रभाव का नतीजा था। संक्षेप में कहा जाए तो अवतूबर क्रांति ने पूरी दुनिया में समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति की ज्वाला प्रज्जवलित कर दी। इसने उपनिवेशों की जनता को जागृत किया, राष्ट्रीय आंदोलनों के आधार को व्यापक बनाया और अंततः उपनिवेशों और अर्द्ध उपनिवेशों में उत्तरपंथी आंदोलन की प्रक्रिया को तेज किया।

रूसी क्रांतिकारियों की कामयाबी से प्रेरित होकर विदेशों में कार्यरत्त भारतीय क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों ने लेनिन एवं अन्य बोल्शेविक नेताओं से संपर्क साधा। महेन्द्र प्रताप, बर्कतुल्ला, ओबेदुल्ला, सिन्धी, वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, भूपेन्द्रनाथ दत्त, हरदयाल एवं एम एन राय मास्को जाकर भारत की मुक्ति के लिए सहयोग और निर्देश प्राप्त करने वाले महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से थे। पंडित नेहरू एवं रवीन्द्र नाथ। टैगोर रूसी घटनाओं से गहरे प्रभावित होने वाले दो भारतीय नेता थे। वे जीवन भर सोवियत रूस के प्रतिबद्ध मित्र बने रहे। विदेशों में कार्यरत्त भारतीय क्रांतिकारियों ने अक्तूबर क्रांति से प्रेरणा ग्रहण की थी और समाजवाद को व्यावहारिक लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया था। इनमें अफगानिस्तान के रास्ते रूस जाने वाले युवा मुहानिदीन व प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व संयुक्त राज्य अमरीका में स्थापित गदर पार्टी के सदस्य शामिल थे। भारत के नवजात मजदूर आंदोलन ने अनेक कम्यूनिस्ट समूहों का निर्माण किया और अंततः 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की औपचारिक घोषणा को संभव बनाया। जेल के दिनों में शहीद भगत सिंह समाजवाद की ओर आकर्षित होने लगे थे। जेल में रहते हुए उनकी अंतिम गतिविधि थी लेनिन दिवस मनाना।

राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम का तीव्र
होना उपनिवेशों की व्यापक जनता को अनुप्रेरित कर अक्तूबर क्रांति ने राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम की गति को तेज किया। भारत में 1915 के आखिर और 1919 की शुरुआत में बड़े पैमाने पर हड़ताले हुई। भारत के लिए इतने बड़े पैमाने पर हड़तालों का आयोजन अनजानी बात थी। बम्बे कपड़ा मिलों के मजदूरों की हडताल में 1.25. 000 व्यक्तियों ने शिरकत की थी। 1920 के शुरुआती छह महीनों में हड़ताल आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया। इस दौरान करीब 200 हड़तालें हुई जिसमें एक करोड़ पचास लाख लोग शामिल हुए। यही वह स्थिति थी जब गांधी जी और कांग्रेस ने अहिंसक असहयोग आंदोलन चलाने का फैसला किया था। जब लामबंदी की नजर से यह बहुत बड़ा कदम साबित हुआ।

अन्य देशों में भी साम्राज्यवाद के खिलाफ कड़ें संघर्ष देखें गये। माइकेल कॉलीन्स की अगुआई में आयरिस उग्रवादी ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध जारी रखे हुए थे जबकि सिन फियेन पार्टी आयरिश गणतंत्र के गठन की घोषणा कर चुकी थी। मिस्र में जगलुल पासा की राष्ट्रवादी ब्रिटिश सत्ता को गंभीर चुनौती दे रही थी। 1919 में जगलुल का देश निकाला होने पर जबर्दस्त जन विद्रोह उभरा जिसे ब्रिटिश शासन ने बर्बरता से कुचल डाला। 1920 में मिस्त्र की आजादी की घोषणा की गयी। टकी में मुस्तफा कमाल पासा ने गठबंधन के अधिग्रहण के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया और एक अस्थायी सरकार का गठन किया। चीन ने न केवल वर्सा संधि पर हस्ताक्षर करना अस्वीकार कर दिया, अपितु वह साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के नये दौर में भी जा पहुँचा। 1919 के चतुर्थ मई आंदोलन, जो संक्रमण का संकेतक बना, में बड़े पैमाने पर बुद्धिजीवियों और छात्रों की भागीदारी हुई, कंफ्युशियनवाद पर सीधा धावा बोला गया तथा जापानी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया।

पूर्व के राष्ट्रवादी नेताओं का अक्तूबर क्रांति के प्रति सकारात्मक रूख था। बाल गंगाधर तिलक ने अपने केसरी अखबार में क्रांति का अभिवादन किया था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दूसरे प्रमुख नेता विपिन चन्द्र पाल अक्तूबर क्रांति और हर तरह के शोषण का अंत करने के उसके दावे से गहरे प्रभावित थे । लाला लाजपत राय के दिल में रूसी क्रांति की सफलता और पूरब के प्रति उसकी नीति के प्रति बहुत सम्मान था। जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक चिंतन पर रूसी क्रांति और उसकी समाजवादी उपलब्धियों का गहरा असर था। और नेहरू की वजह से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सोच में क्रांतिकारी बदलाव आया।

सन भात सेन चीन के नेताओं में पहले थे जिन्होंने एशियाई राज्यों का आहवान किया कि वे सोवियत रूस को मान्यता प्रदान करे। यह नये क्रांतिकारी राज्य के द्वारा चीन के प्रति अपनायी गयी नीतियों का भी प्रतिफल था। बेजिंग की सरकार सोवियत गणतंत्र के प्रति दुश्मनी का भाव रखती थी, फिर भी जन चेतना का ऐसा विस्फोट होता रहा। 1918 में सोवियत रूस उन तमाम संधियों, समझौतों और कजों को खारिज कर दिया जिन्हें जार प्रशासन ने चीन के ऊपर आरोपित किये थे। चीन के बड़े बुद्धिजीवियों ने चीन के भविष्य निर्धारण में अक्तूबर क्रांति की महत्ता को पहचान लिया था। लि दाजों और लू शून, जो चतुर्थ मई आंदोलन के प्रणेता थे, ने क्रांति को नये युग की सुबह कह कर सम्मानित किया। चतुर्थ मई आंदोलन आगे चलकर चीनी कम्युनिष्ट आंदोलन का नायक बना था ।

बोध प्रश्न 2
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर का मिलान कीजिए।
1) उपनिवेश विरोधी संघर्ष में बोल्शेविकों ने किस प्रकार योगदान किया था?
2) उपनिवेश विरोधी संघर्षों में समाजवादी और राष्ट्रवादी ताकतों के बीच एकता कायम करने में
बोल्शेविक क्रांति की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
3) राष्ट्र मुक्ति संग्राम को तीव्र करने में अक्तूबर क्रांति की क्या भूमिका रही?

 कम्युनिस्ट एवं मजदूर आंदोलनों का उद्भव और विकास
अक्तूबर क्रांति का असर केवल उपनिवेशों के मुक्ति संघर्ष पर ही नहीं हुआ था, अपितु इसने पूरब में कम्युनिस्ट और मजदूर आंदोलनों की शुरुआत के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। विभिन्न कम्युनिस्ट समूहों और आंदोलनों को एकजूट करने, मार्क्सवादी, लेनिनवादी विचारधारा को लोकप्रिय बनाने तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ जंग में कम्युनिस्ट ताकतों को जोड़ने की रणनीति और तरीकों की चर्चा करने के लिए 1919 में मास्को में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (यह कोमिनटर्न के नाम से भी जाना जाता है) की स्थापना की गयी। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का मकसद विकसित पश्चिमी दुनिया के मजदूरों और उपनिवेशों की दमित जनता की एकता कायम करना था ताकि साम्राज्यवाद के खिलाफ साझी लड़ाई को प्रभावी बनाया जा सके। दुनिया भर के क्रांतिकारियों के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल संयोजन केन्द्र बन चुका था। राष्ट्रीय और औपनिवेशिक सवालों के मद्देनजर साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों का सांझा मोर्चा खोलना सदैव ही कोमिनटर्न के सिद्धान्त और व्यवहार के केन्द्र में रहा। सभी साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों की एकता, अंततः 1920 में कोमिनटर्न के दूसरे कांग्रेस में फलीभूत हुआ।

औपनिवेशिक प्रशासन के दमनकारी चरित्र को देखते हुए यह अजीब नहीं था कि पूर्वी देशों की अनेक कम्युनिस्ट पाटियों का गठन केमिनटर्न के तत्वाधान में रूस में किया गया। टर्की के कम्युनिस्टों ने सबसे पहले रूस में अपनी पार्टी का गठन किया था, बाद में इरानियों, चीनियों व कोरियाइयों ने अपनी पार्टियाँ बनाई। भारत में पहली दफा 1920 में कंयुनिस्टों का कोई संगठन बना। यह भी तब संभव हुआ जब ताशकंद में सम्पन्न दूसरे कांग्रेस में उपस्थित होने वाले भारतीय लोग लौटकर भारत आए। एम एन राय और एच मुखर्जी की पहल पर सात व्यक्तियों के इस ग्रुप ने अपने आपको भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी कहन शुरू कर दिया।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तर से अपने उत्तर का मिलान कीजिए।
1) कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के महत्व पर प्रकाश डालिए।
2) कम्युनिस्ट व मजदूर पार्टियों के निर्माण में बोल्शेविकों का क्या योगदान रहा है?

सारांश
बोल्शेविकों की जीत और मुक्ति संग्रामों को दिए गए उनके समर्थन ने उपनिवेशों में साम्राज्यवाद विरोधी। संघर्ष को तेज करने का माकूल माहौल बनाया। इसने न केवल दुनिया भर के राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्टों को प्रेरित किया अपितु उन्हें साझे साम्राज्यवाद विरोधी जंग में एक मंच पर लाने में भी मदद पहँचाई। बोल्शेविक सरकार की शांति नीति तथा विशेषाधिकारों एवं गुप्त राजनय छोड़ने के उसके संकल्प ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की नयी व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

शब्दावली
साम्राज्यवाद ः एक ऐसी व्यवस्था जहाँ विकसित पूँजीवादी राज्य अल्पविकसित देशों को कच्चेमाल,श्रम एवं बाजार के लिए उपनिवेश बनाते हैं । इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि इस व्यवस्था के अंतर्गत विकसित राज्य ऊँचे लाभ के लिए अपनी अधिपूँजी का निवेश अल्पविकसित राज्यों में करते हैं।
पूंजीवादी व्यवस्था ः पूँजीवादी अथवा बुर्जुवा व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें भूमि श्रम एवं उत्पाद बाजार, चीजे होती है और मजदूरों का उत्पादन के । साधनों पर न तो कोई मल्कियत होती है और न ही कोई नियंत्रण। नतीजतन पूँजीपति मजदूरों का शोषण करते हैं।
समाजवाद ः ऐसी व्यवस्था जहाँ मजदूर वर्ग ही शासक वर्ग होता है और उत्पादन के साधनों पर किसी का निजी स्वामित्व नहीं होता।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
अशरफ अली एंड जी ए सियोमिन (संपादित),1917, अक्तूबर क्रांति और भारतीय स्वतंत्रता, सटलिंग
पब्लिसर्स दिल्ली
ई एच कार, दि बोल्शेविक रिवोल्यूशन 1917-21, पेंज्युइन बुक्स, लंदन ।
मिल्कोखिन, एल बी, 1901, लेनिन इन इंडिया, एलायड पब्लिसर्स, दिल्ली।
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