पादप नामकरण (plant nomenclature in hindi) | नामकरण की द्विनाम पद्धति (binomial system of nomenclature)

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नामकरण की द्विनाम पद्धति (binomial system of nomenclature) पादप नामकरण (plant nomenclature in hindi) नाम कैसे लिखते है ?

पादप नामकरण (plant nomenclature) : आदिकाल से ही मानव और पौधों का अटूट सम्बन्ध रहा है , जीवन की तीन मुलभुत आवश्यकताओं अर्थात रोटी , कपडा तथा मकान को पूर्ण करने के लिए मनुष्य किसी न किसी रूप से पेड़ पौधों का उपयोग करता है। तदनुसार विश्व के विभिन्न भागों में निवास करने वाले और विभिन्न जातियों के लोगो ने अपने आसपास के परिवेश में पाए जाने वाले पेड़ पौधों के नाम अपनी सुविधानुसार , अपनी स्वयं की भाषा में रखे है। विश्व के सभी भागों में पाए जाने वाले एक ही प्रकार के पौधों को यदि अलग अलग नामों से पुकारा जाए तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किये जाने वाले शोध कार्यो और महत्वपूर्ण जानकारियों का आदान प्रदान पूर्णतया असंभव है। इसके अतिरिक्त एक ही पौधे को एक ही देश के विभिन्न भागों में अलग अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है , उदाहरणार्थ , सोलेनम मेलोन्जिना नामक पौधे का अंग्रेजी में Brinjal और Egg plant हिंदी में बैंगन और भट्टा और अन्य भाषाओँ में अन्य नाम दिए गए है , इसी प्रकार वायोला या पेन्जी के 150 और वरबेस्कम के 140 से भी अधिक स्थानीय नाम है। इससे स्पष्ट होता है कि एक ही देश के विभिन्न क्षेत्रों में भी किसी भी पौधे को मात्र स्थानीय नाम की सहायता से पहचानना संभव नहीं है। इन कारणों के चलते किसी पौधे के लिए ऐसे नाम की आवश्यकता उत्पन्न होती है जिससे सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिक जगत में इसे आसानी से पहचाना जा सके। इसके अनुरूप पौधों के वैज्ञानिक आधार पर नामकरण अथवा नाम देने की प्रक्रिया को पादप नामकरण कहते है।
वैज्ञानिक परम्परा के अनुसार पौधों को सामूहिक नाम दिए जाते है अर्थात एक प्रकार के सभी पौधों को केवल एक ही नाम से जाना जाता है। इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु पादप नामकरण की एक सामान्य पद्धति को विश्व के समस्त राष्ट्रों द्वारा अपनाया गया है। इसके साथ ही लेटिन भाषा को अपने यथार्थ और संक्षिप्त स्वभाव के कारण पादप नामकरण हेतु उपयुक्त माना गया है। इसलिए पौधों के वैज्ञानिक नाम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लैटिन भाषा में दिए गए है और इसी भाषा के अनुसार लिखे और उच्चारित किये जाते है।
पादप नामकरण की प्रथम वैज्ञानिक पद्धति बहुनाम पद्धति थी। इस पद्धति में एक पौधे के नाम में अनेक शब्दों का प्रयोग होता था। ये नाम प्राय: पौधे के सभी मुख्य गुणों को अभिव्यक्त करते थे। उदाहरणार्थ , बहुनाम पद्धति में साइडा एक्यूटा नामक पौधे का नाम क्रायसोफिल्लम फोलिस ओवेलिस सपर्नी ग्लेबरिस , पेरेलेली स्ट्राइटीस , सबटस टोमेन्टोसोनिटीडीस दिया गया था लेकिन इस प्रकार के लम्बे नामो को याद रखना और इनका उच्चारण करना अत्यंत कठिन था , अत: ये नाम प्रयोग की दृष्टि से पूर्णतया अनुपयोगी थे। ऐसी अवस्था में बहुनाम पद्धति के स्थान पर वनस्पति शास्त्रियों द्वारा ऐसी प्रणाली की आवश्यकता का अनुभव किया गया जो न केवल सर्वमान्य , अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हो बल्कि इसके प्रयोग में भी आसानी हो। संभवत: इन्ही आवश्यकताओं को महसूस करने के कारण आधुनिक वानस्पतिक नामकरण की सर्व प्रचलित द्विनाम पद्धति का विकास हुआ।

नामकरण की द्विनाम पद्धति (binomial system of nomenclature)

हालाँकि अनेक लेखकों द्वारा पादप नामकरण की द्विनाम पद्धति को प्रस्तुत करने का श्रेय केरोलस लिनियस (carolus linnaeus) को दिया जाता है। जिसने इस पद्धति का अपनी पुस्तकों में अधिकाधिक प्रयोग किया और इसे सर्वमान्य और बहुप्रचलित बनाया और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुस्थापित करने में सक्रीय योगदान दिया। लेकिन सर्वप्रथम द्विनाम पद्धति को गेस्पार्ड बाहिन द्वारा अपनी पुस्तक पाइनेक्स में सन 1623 में प्रस्तुत किया गया था और इसके बाद लिनियस ने सन 1753 में इसका प्रयोग अपनी पुस्तक स्पीसीज प्लांटेरस में व्यापक रूप से किया क्योंकि इस पद्धति को वैज्ञानिक आधार प्रदान कर , जनसाधारण तक पहुँचाने और लोकप्रिय बनाने का कार्य लिनियस द्वारा किया गया था , अत: उनके द्वारा किये गए भागीरथ प्रयासों के कारण अधिकांशत: इस पद्धति की खोज का श्रेय उनको दिया जाता है।
द्विनाम पद्धति के अनुसार प्रत्येक पौधे के नाम के दो भाग होते है –
(1) वंशीय नाम और (2) प्रजातीय नाम।
उदाहरण के लिए आलू का वंशीय संकेत पद सोलेनम और प्रजातीय संकेत पद ट्यूबरोसम है। वंशीय संकेत पद बड़े अक्षर से और प्रजातीय संकेत पद छोटे अक्षर अर्थात दूसरी वर्णमाला से लिखा जाता है। यह प्रक्रिया अंग्रेजी या लैटिन भाषा में तो संभव है लेकिन हिंदी और देवनागरी लिपि में संभव नहीं है।
द्विनाम पद्धति अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सुस्थापित और प्रामाणिक नामकरण विधि है। इस पद्धति के अंतर्गत पौधे का नाम टेढ़े अक्षरों (इटालिक) में लिखा जाता है। या नाम को रेखांकित (अंडर लाइन) किया जाता है। इस पद्धति के अनुसार किसी भी पौधे का नाम दो लेटिन या लैटिनीकृत शब्दों से मिलकर बनता है और प्रजाति के नाम के बाद में उस व्यक्ति का अन्तर्राष्ट्रीय रूप से स्वीकृत संक्षिप्त नाम होता है जिसने उस प्रजाति का सर्वप्रथम विवरण दिया होता है। उदाहरण के लिए sida tiagii bhandari का अर्थ है कि इस पादप प्रजाति का सर्वप्रथम विवरण भण्डारी ने दिया था , इसी प्रकार brassica campestris linn का अर्थ है कि इस प्रजाति का सर्वप्रथम विवरण लिनियस (linnaeus) ने दिया था , यहाँ Linn से तात्पर्य लिनियस के संक्षिप्त नाम से है।

पादप नामकरण की अन्तर्राष्ट्रीय संहिता (international code of botanical nomenclature)

केरोलस लिनियस द्वारा प्रयुक्त पद्धति , नामकरण की सर्वोत्तम पद्धति है। उनके द्वारा सन 1751 में अपनी पुस्तक फिलोसोफिया बोटेनिका में पादप नामकरण के कुछ सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये लेकिन उनकी पुस्तकों में केवल कुछ ही पौधों का वर्णन है। इसके कारण जैसे जैसे विभिन्न प्रकार के पौधों के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त हुई तो इसके साथ ही पादप जगत में उनको उचित वर्गीकृत स्थान पर स्थापित करने में कठिनाई महसूस की जाने लगी। इसके अतिरिक्त पादप नामकरण के विस्तृत और स्पष्ट नियम नहीं होने के कारण अनेक पौधों के नामों में विसंगती उत्पन्न हो गयी। अत: नामकरण की अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। इसे ध्यान में रखकर सन 1813 में अगस्तिन डी केंडोले ने “थ्योरी एलिमेंटयर डी ला बोटेनिक” नामक अपनी पुस्तक में नामकरण के कुछ प्रमुख सिद्धान्त प्रस्तुत किये।
पादप वर्गीकरण विज्ञान के इतिहास में नाम निर्धारण की दृष्टि से वर्ष 1867 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसी वर्ष एल्फोंज्रे डी केंडोल ने लोइस डी ला नोमेनक्लेचर बोटेनिक नामक अपने प्रकाशन में पादप नामकरण से सम्बन्धित कुछ मौलिक सिद्धान्त प्रस्तुत किये। इसी वर्ष उन्होंने पेरिस में एक अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस का आयोजन किया जिसमें विश्व के अनेक प्रमुख पादप वर्गीकरण शास्त्रियों ने भाग लिया। इस कांग्रेस में उन्होंने पादप नामकरण के कुछ नियम प्रस्तुत किये , जिनको कुछ संशोधनों के बाद स्वीकार कर लिया गया।
उपर्युक्त नियम डी केंडोले के नियम या पेरिस की 1867 की संहिता कहलाते है। इसके पश्चात् इन नियमों में समय समय पर अनेक संशोधन किये गये। पादप नामकरण की अन्तर्राष्ट्रीय संहिता जो वर्तमान समय में प्रयुक्त की जाती है उसका गठन सन 1975 में बारहवीं अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस में हुआ था। ये नियम 1978 में प्रकाशित हुए और इसके बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नामकरण और वर्गीकरण से सम्बन्धित स्वीकृत नियमों का प्रकाशन अन्तर्राष्ट्रीय वानस्पतिक नामकरण संहिता (international code of botanical nomenclature : ICBN) के अंतर्गत प्रत्येक पांच वर्षो में होता है।
उपर्युक्त नियमों को तीन भागों में बाँटा गया है –
सिद्धांत , नियम और सुझाव अथवा संस्तुति।
(A) सिद्धान्त :
12 वीं अन्तर्राष्ट्रीय वानस्पतिक कांगेस (1975) द्वारा प्रस्तुत पादप नामकरण छ: सिद्धान्तों पर आधारित है , जो निम्नलिखित प्रकार से है –
  1. पादप नामकरण प्रक्रिया जन्तु नामकरण से भिन्न है।
  2. किसी वर्गक का नाम , नामकरण प्रारूप से निर्धारित किया जाता है।
  3. वर्गकों का नामकरण उनके प्रकाशन की प्राथमिकता पर आधारित है।
  4. कुछ अपवादों को छोड़कर , प्रत्येक वर्गक का नियमों के आधार पर दिया जाने वाला नाम ही शुद्ध अथवा सही नाम होता है।
  5. वर्गकों का वैज्ञानिक नाम , उनकी व्युत्पत्ति को ध्यान में न रखते हुए लैटिन , लैटिन भाषा में होता है।
  6. कुछ अपवादों को छोड़कर नामकरण के नियम पूर्वव्यापी होते है।