भारत में योजना आयोग का गठन कब हुआ planning commission of india was set up in the year in hindi

By   April 6, 2022
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planning commission of india was set up in the year in hindi भारत में योजना आयोग का गठन कब हुआ ?

योजना आयोग (The Planning Commission)
राष्ट्रीय योजना समिति के रिपोर्ट के प्रकाशन ;1949द्ध के बाद ‘आर्थिक तथा सामाजिक नियोजन’ को संविधान में शामिल करने पर सहमति बनी तथा यह चरण देश में औपचारिक रूप से नियोजन की शुरुआत के लिए अनुकूल था। यद्यपि स्वतंत्रत के बाद ही अर्थव्यवस्था नियोजन के सिद्धान्तों पर चल रहा था लेकिन इन सिद्धान्तों पर यह खण्डशः कार्य कर रहा था। राष्ट्रीय स्तर पर पूरे अर्थव्यवस्था के लिए औपचारिक रूप से नियोजन की
शुरआत करने के लिए एक स्थायी विशेष निकाय की आवश्यकता थी जो नियोजन के संपूर्ण क्षेत्र का उत्तरदायित्व उठा सके, जैसे-योजना निर्माण, संसाधन की उपलब्धता, कार्यान्वयन तथा पुनरीक्षणऋ चूँकि नियोजन एक तकनीकी विषय है। इस तरह मार्च, 1950 में मंत्रिमंडल के एक प्रस्ताव द्वारा योजना आयोग का गठन हुआ। इसकी रचना, कानूनी स्थिति, इत्यादि से सम्बन्धित महत्वपूर्ण विवरण निम्नलिखित हैंः
i. यह एक अतिरिक्त-संविधानिक (गैर-सांविधानिक) तथा गैर-वैधानिक निकाय था (यद्यपि ‘नियोजन’ की धारणा संविधान से ली गई थी)।
ii. आर्थिक विकास से जुड़े विभिन्न मुद्दों हेतु भारत सरकार के लिए यह एक सलाहकारी निकाय था।
iii. यह आर्थिक विकास के लिए एक ‘‘विचारक मंडल’’ (Think tank) था, जिसके पदेन अध्यक्ष (ex-ffoicio chairman) प्रधानमंत्री थे तथा जिसके तहत एक उपाध्यक्ष का भी प्रावधान था। उपाध्यक्ष का मुख्य कार्य आयोग के कार्यों को समन्वित करना था।
iv. 6 केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य इसके पदेन सदस्य (ex-ffoicio members) थे तथा इस आयोग में एक सचिव सदस्य (Member Secretary) होता था। इसके अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाई जा सकती थी (चूँकि नियोजन के लिए अनेक विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है)। योजना मंत्री भी इस आयोग के पदेन सदस्य थे।
(v) यह एक स्वायत्त निकाय था, जिसका मुख्य मुद्दों पर अपना विचार होता था तथा सरकार के समक्ष यह अपने विचारों को रखता था। यह केन्द्र तथा राज्य मंत्रिमंडल के संपर्क में रहकर कार्य करता है तथा उनकी नीतियों के बारे में इस आयोग को पूर्ण जानकारी होती थी।
vi. सामाजिक तथा आर्थिक नीतियों में प्रस्तावित परिवर्तन के लिए इस आयोग से परामर्श लिया जाता था। स्वतंत्र विचारों के आदान-प्रदान को सुनिश्चित करने के लिए योजना आयोग ने यह परंपरा स्थापित की थी कि आयोग तथा केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच विचारों के मतभेद का प्रचार नहीं किया जाएगा।
vii. यह केन्द्रीय मंत्रिमंडल से सचिवालय स्तर पर जुड़ा हुआ था। योजना आयोग मंत्रिमंडल संगठन का एक भाग था। तथा इसके लिए ‘माँग-अनुदान’ (demand for grant) को बजट में मंत्रिमंडल सचिवालय की माँग के तहत रखा गया था।
viii.  इसका कार्यालय ‘योजना भवन’ में था। आयोग के कर्मचारियों में सचिव व सलाहकार शामिल हैं तथा इसमें एक अनुसंधान संगठन भी मौजूद थे।
;ix) योजना आयोग एक तकनीकी निकाय ;ज्मबीदपबंस ठवकलद्ध था तथा सम्बद्ध अवधि में नियोजन की आवश्यकता के अनुसार इस निकाय में विशेषज्ञों एवं पेशेवरों को शामिल किया जाता था।
;x) आयोग को कार्यकारी शक्तियाँ ;म्गमबनजपअम च्वूमतेद्ध प्राप्त थीं।
योजना आयोग के कार्य
(Functions of Planning Commission)
यद्यपि योजना आयोग का गठन नियोजन के उद्देश्य के लिए किया गया था, लेकिन यह किसी को नहीं पता था कि यह आयोग अपने कार्यों का विस्तार देश के सम्पूर्ण प्रशासन क्षेत्र में कर लेगा। इसे देश का ‘आर्थिक मंत्रिमंडल’
कहा गया जिसने संविधानिक निकाय, जैसे-वित्त आयोग के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण किया तथा जो संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं था। समय के साथ इसने एक बड़े नौकरशाही संगठन को स्थापित किया, जिसके कारण
नेहरू ने कहा था कि, ‘‘आयोग जो गंभीर विचारकों का एक लघु निकाय था, अब एक सरकारी विभाग में परिवर्तित हो चुका है, जिसमें सचिवों व निदेशकों की भीड़ रहती है तथा जिसका एक बड़ा भवन है।’’
यद्यपि योजना आयोग के कार्यों में विस्तार किया गया ताकि नियोजन की समयानुसार आवश्यकताओं को इसमें शामिल किया जा सके (खासतौर पर आर्थिक सुधार के बाद का दौर) लेकिन इसके कार्यों की घोषणा उसी सरकारी आदेश द्वारा की गई जिसने इसे स्थापित किया था। इसके अनुसार योजना आयोगः
i. देश के भौतिक, पूँजीगत तथा मानव ससंाधनांे का मूल्यांकन करता है जिसमें तकनीकी कर्मचारी भी शामिल हैं तथा उन संसाधनों के वृद्धि की संभावनाओं की जाँच करता है, जो देश की आवश्यकताओं की तुलना में कम हैं।
ii. देश के संसाधनों के अधिक प्रभावी तथा संतुलित उपयोग की योजना को सूत्रबद्ध करता है।
iii. प्राथमिकताओं के निर्धारण के अनुसार उन चरणों को परिभाषित करता है जिनमें योजनाओं को कार्यान्वित किया जाएगा तथा प्रत्येक चरण को पूरा करने के लिए संसाधनों के आवंटन को प्रस्तावित करता है।
iv. उन कारकों को सूचित करता है, जिनकी प्रवृत्ति आर्थिक विकास को घटाने की है तथा उन परिस्थितियों को निर्धारित करता है जो वर्तमान सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति के संदर्भ में योजना के सफल कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है।
v. योजना के प्रत्येक चरण के सभी पहलुओं के सफल कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक मशीनरी की प्रकृति को निर्धारित करता है।
vi. योजना के प्रत्येक चरण के कार्यान्वयन में हुई प्रगति का समय-समय पर मूल्यांकन करना तथा ऐसे मूल्यांकन द्वारा दिए गए आवश्यक सुझावों के तर्ज पर नीति तथा उपायों के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
vii. ऐसे अंतरिम अथवा आनुषंगिक सुझाव देना जो दिए गए संदर्भ में उचित प्रतीत हों या तो इसे निर्दिष्ट किए गए कार्यों के निर्वहण को सरल बनाने में, अथवा वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों, वर्तमान नीतिगत उपायों तथा विकास कार्यक्रमों पर सोच-विचार करने के लिए अथवा ऐसे विशेष समस्याओं की जाँच के लिए जो उनके राय के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा भेजा जाए।’’
दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) की शुरआत के साथ ही सरकार ने (तत्कालीन) योजना आयोग को निम्नलिखित दो नए कार्य सौंपेः
;i) संचालन समिति (Steering Committee) की मदद से ‘आर्थिक सुधार’ की प्रक्रिया के विशेष संदर्भ में योजनाओं के कार्यान्वयन का निरीक्षण करना।
यहाँ यह उल्लिखित करना जरूरी है कि, देश में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया शुरू होने के बाद (1990 के दशक की शुरआत में) अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका कुछ क्षेत्रों में घट गई है तथा यह कुछ क्षेत्रों में बढ़ गई है। अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को पुनः परिभाषित करने (यद्यपि यह विश्व व्यापक समसामयिक विचार था) की प्रक्रिया से ज्यादातर विशेषज्ञों तथा व्यवसायिक समुदायों ने यह निष्कर्ष निकाला कि अर्थव्यवस्था में नियोजन की कोई भूमिका नहीं रह जाएगी। 1991-92 की नई आर्थिक नीति प्रत्यक्षतः देश में बाजार अर्थव्यवस्था के विस्तार का प्रस्ताव था। लेकिन यह पूर्णतः सही नहीं था। नियोजन अप्रसांगिक नहीं बना केवल इसे एक नई दिशा की जरूरत थी। आर्थिक सुधार के व्यापक प्रक्रिया के लिए यह अत्यधिक जरूरी था कि नियोजन अपना महत्व नहीं खोए। योजना आयोग के इस नए कार्य को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
ii. विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों के प्रगति का निरीक्षण करना। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि पहली बार योजना आयोग ने दस क्षेत्रों के लिए ‘नियंत्रित/प्रोबोधन किए जाने वाले लक्ष्यों’  (Monitorable Targets) को निर्धारित किया है जो विकास के संकेतक हैं। केन्द्रीय मंत्रालयों को इन लक्ष्यों से जोड़ा गया है। मंत्रालयों के समय निर्धारित कार्यों का अब निरीक्षण योजना आयोग के द्वारा इसके नए कार्य के तहत किया जाएगा।
ऊपर दिए गए दो नए कार्यों के साथ योजना आयोग अब वास्तविक रूप में एक ‘अधि-मंत्रिमंडल (Super Cabinet) के रूप में उभरा है। चूँकि मूलतः उपाध्यक्ष ही योजना आयोग के सामान्य बैठकों का संचालन करता है इसलिए आर्थिक नीतियों की दिशा एवं प्रकृति को स्पष्ट करने में उसकी अहम भूमिका होती है। अपने पहले नए कार्य के द्वारा आयोग आर्थिक सुधारों के आयाम को स्पष्ट करता है तथा अपने दूसरे नए कार्य के द्वारा आयोग विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों को प्रभावित करता है। मूल रूप में ऐसा प्रतीत होता है कि योजना आयोग देश के विकास में वास्तविक विचारक मंडल के रूप में उभरा है।
योजना आयोग वर्ष 2002 के उपरान्त राज्यों के आर्थिक नीतियों को भी प्रभावित करने में बहुत हद तक सफल रहा था, यद्यपि योजना आयोग राज्यों की योजनाओं के नहीं बनाता था लेकिन यह राज्यों के समस्त आर्थिक नीतियों को प्रभावित करता था। केन्द्र की ही तरह राज्यों के लिए भी उन्हीं क्षेत्रों/विकास सूचकांक के लिए नियंत्रित किए जाने वाले लक्ष्यों (Monitorable Targets) को निर्धारित करने के कारण यह संभव हो सका था। इन लक्ष्यों से संबंधित प्रदर्शन के लिए राज्य योजना आयोग के संवीक्षण एवं निरीक्षण के प्रति उत्तरदायी था। इस तरह केन्द्र सरकार योजना आयोग के नए कार्यों द्वारा राज्य सरकारों पर नियंत्रण रख सकता था।
हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि योजना आयोग अपने दो नए कार्यों की मदद से न केवल केन्द्र के बल्कि राज्यों के विभिन्न आर्थिक नीतियों को एक करने में सफल रहा था। इससे पहले विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालय के नीतियों तथा योजना आयोग द्वारा स्पष्ट किए गए विचारों के बीच सामंजस्य की कमी थी। यद्यपि समसामयिक गठबंधन की राजनीति कभी-कभी योजना आयोग के विचारों से मतभेद रखती थी।
योजना आयोग का समाधि-लेख (An Epitaph to the Planning Commission)
1 जनवरी, 2015 को सरकार ने औपचारिक रूप से योजना आयोग को समाप्त कर इसके स्थान पर एक नया निकाय ‘नीति आयोग’ का गठन किया। इसके साथ ही स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास का एक युग का अंत हो गया। विषय विशेषज्ञों, राजनीतिज्ञों तथा मीडिया के बीच लंबे समय से यह बहस का विषय बना हुआ था कि योजना आयोग को पुनर्जीवित करना बेहतर होगा अथवा इसका उन्मूलन। चर्चा कई बार भावनात्मक भी हो जाती थी। लेकिन सरकार ने अपने विवेक के अनुसार यह कदम उठाया (इस अध्याय के ‘नीति आयोग’ खण्ड में इस विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है)।
योजना आयोग के समाधि-लेख के रूप में स्वतंत्र मूल्यांकन कार्यालय (Independent Evaluation off~ice, IEO) द्वारा जून 2014 में प्रधानमंत्री कार्यालय को समर्पित प्रतिवेदन पर दृष्टिपात प्रासंगिक होगा। इसके अनुसार योजना आयोग का गठन एक नवजात लोकतंत्र तथा कमजोर, अनुभवहीन अर्थव्यवस्था के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए किया गया था। इसके अंतर्गत नियोजन के लिए ‘शीर्ष से नीचे दृष्टिकोण’ का सहारा लिया गया था, जिसमें एक गतिशील केन्द्र सरकार कमजोर राज्यों के लिए आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करे। प्रतिवेदन में वर्तमान योजना आयोग को भारत के विकास में बाधक माना गया। प्रतिवेदन में यह भी जोड़ा गया कि इतनी वृहद संस्था में सुधार आसान नहीं है और इसके स्थान पर एक नई संस्था या निकाय को खड़ा करना श्रेयस्कर होगा जो राज्यों को विचार के स्तर पर सहायता प्रदान करे, उन्हें दीर्घकालीन चिंतन के आधार पर सुधारों के अनुरूप ढालने में मदद करे। आई.ई.ओ. की योजना आयोग के बारे में निम्नलिखित सलाह उल्लेखनीय हैः
i. योजना आयोग को समाप्त कर इसके स्थान पर सुधार एवं समाधान आयोग (Reform and Solution Commission–RSC) का गठन किया जाना चाहिए। जिसमें विषय विशेषज्ञों को रखा जाए तथा जो मंत्रालयी प्रशासनिक ढांचे से युक्त हो। नई संस्था में प्रमुख व्यापारिक एवं औद्योगिक संगठनों, नागरिक समाज प्रतिनिधियों, अकादमियों आदि का पूर्णकालिक प्रतिनिधित्व हो, जिससे कि उनकी चिंताओं पर ध्यान दिया जा सके तथा दीर्घकालीन रणनीति के सूत्रण में उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सके।
ii. आर.सी.सी. के तीन प्रमुख कार्य होंगेः
;a) यह एक समाधान केन्द्र के रूप में कार्य करेगा। साथ ही ऐसे विचारों के कोष के रूप में कार्य करेगा जिनका विभिन्न प्रदेशों एवं जिलों, साथ ही विश्व के अन्य भागों मंे विकास के विभिन्न पक्षो पर सफल रह,े
;b) यह समेकित प्रणालीगत सुधार के लिए विचार सुझाएगा, तथा;
;c) नई उभरती चुनौतियों की पहचान कर उनके समाधान का तरीका सुझाएगा।
;iii) योजना आयोग द्वारा निष्पादित वर्तमान कार्यों को उन निकायों को हस्तगत करना चाहिए जो कि इनका निष्पादन बेहतर ढंग से करने के लिए प्रकल्पित किए गए हैं।
iv. चूँकि स्थानीय जरूरतों एवं संसाधनों के बारे में राज्य सरकारों को केन्द्र सरकार तथा स्थानीय संस्थाओं के अपेक्षा अधिक जानकारी होती है। इसलिए उन्हें राज्य सरकार प्राथमिकताओं को चिन्हित करने तथा सुधारों को लागू करने की स्वतंत्रत होनी चाहिए और केन्द्रीय संस्थाओं के निर्देशों से मुक्त होना चाहिए।
v.  दीर्घकालीन आर्थिक चिंतन एवं समन्वय का कार्य करने के लिए एक नई संस्था स्थापित की जानी चाहिए जो कि सरकार के अंदर ‘थिंक टैंक’ के रूप में कार्य करे।
vi. वित्त आयोग को स्थायी निकाय बनाकर इसे राज्यों को राजस्व आवंटन के लिए उत्तरदायी बनाना चाहिए तथा वित्त मंत्रालय को विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों के बीच निधि का बंटवारा करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए।
आई.ई.ओ. जो कि स्वयं योजना आयोग का ही मानस-शिशु है कि योजना आयोग संबंधी मंतव्य काफी आश्चर्यजनक थे और कुछ लोगों को तो इससे आघात लगा। योजना आयोग को प्रतिस्थापित करने वाली नई संस्था वास्तव में बेहतरी के लिए होगी एवं अपने वांछित लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होगी। इसका मूल्यांकन एवं विश्लेषण भविष्य में होगा। इस बीच आई.ई.ओ. द्वारा दिए गए कुछ परामर्शों को नवसृजित ‘नीति आयोग’ में भी
साफ-साफ देख सकते हैं।
नोटः इस संस्करण में नीति आयोग पर विस्तृत सामग्री दी गई है, साथ ही योजना आयोग संबंधी सामग्री को तुलनात्मक अध्ययन की सुविधा के लिए अपरिवर्तित रखा गया है।