ph की खोज किसने की , विद्युत अन अपघट्य , ऑरेनियस का सिद्धान्त या विद्युत अपघट्य का वियोजन सिद्धांत या आयनिक सिद्धांत 

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PH : S.P.L सोरेन्सन (Søren Peder Lauritz Sørensen) ने PH की  खोज की।

हाइड्रोजन आयन (H+) की सांद्रता के ऋणात्मक लघुगणक (log) को Ph कहते है।
या
हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता को व्यक्त करने के लिए 10 के ऊपर जितनी ऋणात्मक घातें लगायी जाती है , इसे pH कहते है।
PH = -log [H+]
Or

PH = 1/log[H+]

नोट : pH का मान 0 से 14 तक होता है।
pH का मान 7 होने पर विलयन उदासीन , 7 से कम होने पर विलयन अम्लीय तथा 7 से अधिक होने पर विलयन क्षारीय प्रवृति का होता है।
अर्थात
PH = उदासीन
PH > क्षारीय

PH < अम्लीय

लोग (log) के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र :-
Log ab = b Log a
Log (a x b) = log a + log b

Log (a/b) = log a – log b

लोग (log) के कुछ महत्वपूर्ण मान –
Log 2 = 0.3010
Log 3 = 0.4771
Log 5 = 0.6990
Log 7 = 0.8451
Log 10 = 1

Log 100 = 2

प्रश्न 1 : सिद्ध कीजिये PH + POH = 14

उत्तर : [H+][OH] = Kw
Kw = 10-14 मोल2/लीटर2
[H+][OH] = 10-14
दोनों ओर log लेने पर
log [H+][OH] = log 10-14
log [H+] + log[OH] = log 10-14
“(-)” से गुणा करने पर [चूँकि Log (a x b) = log a + log b]
-log [H+] – log[OH] = -log 10-14
PH + POH = -[- 14 log10]
चूँकि log10 = 1
PH + POH = 14

नोट : pH ज्ञात करने के लिए हाइड्रोजन आयन की सांद्रता हमेशा नार्मलता में होनी चाहिए।
प्रश्न 2 : 0.0001 N HCl विलयन की pH ज्ञात कीजिये।
उत्तर :

[H+] = 0.0001
[H+] = 1 x 10-4
PH = -log [H+]
PH = -log [1 x 10-4]
PH = – [log 1 + log 10-4]
चूँकि log 1 = 0
PH  = + [+ 4 log 10]

PH  = 4
विद्युत अपघट्य : वे पदार्थ जो पिघली या विलयन अवस्था में विद्युत का चालन करते है , उन्हें विद्युत अपघट्य कहते है।
विद्युत अन अपघट्य : वे पदार्थ जो पिघली अवस्था या विलयन अवस्था में विद्युत का चालन नहीं करते है उन्हें विधुत अनअघटय कहते है।
उदाहरण : शर्करा व यूरिया का विलयन।

ऑरेनियस का सिद्धान्त या विद्युत अपघट्य का वियोजन सिद्धांत या आयनिक सिद्धांत

इस सिद्धान्त के मुख्य बिंदु निम्न है –
  • जब किसी विद्युत अपघट्य को जल में घोला जाता है तो वह दो प्रकार के कणों में टूट जाता है। एक प्रकार के कणों पर धनावेश व दुसरे प्रकार के कणों पर ऋणावेश होता है।
  • विलयन में धनावेश की मात्रा ऋणावेश की मात्रा के बराबर होती है अत: विलयन उदासीन होता है।
  • विद्युत अपघट्य आयनिक होकर आयन में बदल जाते है तथा ये आयन पुनः मिलकर अवियोजित अणु बना लेते है , इस प्रकार अवियोजित अणु व आयन के मध्य एक साम्य स्थापित हो जाता है जिसे आयनिक साम्य कहते है।
  • विद्युत अपघट्य के विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर ऋण आयन एनोड की ओर तथा धनायन कैथोड की ओर गमन करते है।
  • विलयन की चालकता आयन की संख्या व उसकी प्रकृति पर निर्भर करती है।
  • विद्युत अपघट्य के विलयन के गुण उनके आयन के गुण होते है।
  • विद्युत अपघट्य की सम्पूर्ण मात्रा का आयनन नहीं होता बल्कि इसकी कुछ ही मात्रा का आयनन होता है , इसे आयनन की मात्रा या वियोजन की मात्रा कहते है।

आयनन की मात्रा को प्रभावित करने वाले कारक

[I] तनुता : तनुता बढ़ाने पर आयनन की मात्रा बढती जाती है।  माना AB विद्युत अपघट्य है जो निम्न प्रकार से आयनित होता है –
AB         ⇌  A+     +      B+
1                     0                 0                      (साम्यावस्थासे पूर्व मोल)
1 – x               x                 x                  (साम्यावस्थापर मोल)
(1 – x)/V        x/V            x/V       (साम्यावस्था पर सक्रीय द्रव्यमान)
यहाँ x = आयनन/वियोजन की मात्रा
K = [A+][B+]/[AB]
मान रखने पर
K = X2/V(1- x)
यदि 1 >>>>> x हो तो
1 – x = 1
K = X2/V
KV = X2
X∝ V
X ∝ √V
अत: विद्युत अपघट्य के आयनन की मात्रा तनुता के वर्गमूल के समानुपाती होती है , इसे ‘ओस्टवाल की तनुता का नियम’ भी कहते है।
[II] ताप :  ताप बढ़ाने पर आयनन की मात्रा बढती जाती है।
[III] विद्युत अपघट्य की प्रकृति : प्रबल विद्युत अपघट्य का आयनन अधिक होता है जबकि दुर्बल विद्युत अपघट्य का आयनन कम होता है।
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