पूर्ण प्रतिस्पर्धा क्या है | पूर्ण प्रतियोगिता और अपूर्ण प्रतियोगिता में अंतर Perfect competition in hindi

By   January 21, 2021

Perfect competition in hindi perfect competition and monopolistic competition पूर्ण प्रतिस्पर्धा क्या है | पूर्ण प्रतियोगिता और अपूर्ण प्रतियोगिता में अंतर किसे कहते है परिभाषा लिखिए |

औद्योगिक प्रतिस्पर्धा : सिद्धान्त
इस भाग में हम पूर्ण और अपूर्ण प्रतिस्पर्धा के सिद्धान्त और फर्मों के लिए बाजार शक्ति के स्रोतों के बारे में पढ़ेंगे। विभिन्न प्रकार के प्रवेश बाधाओं जोकि एकाधिकारी को अपना एकाधिकार बनाए रखने में सहायक होती हैं पर उपभाग 17.2.2 में चर्चा की गई है। संरक्षणवादी व्यापार नीति, जो विदेशी प्रतिस्पर्धा को सीमित अथवा समाप्त करती हैं, भी फर्मों के लिए बाजार शक्ति के स्रोत हैं। उपभाग 17.2.3 में इस पहलू पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। अंततः उपभाग 17.2.4 में रणनीतिक समझौतों, विलयों और अधिग्रहणों के लागत और लाभों की विवेचना की गई है।

 पूर्ण और अपूर्ण प्रतिस्पर्धा

आपने ई ई सी -11 (अर्थशास्त्र के मूल सिद्धान्त) में पूर्ण और अपूर्ण प्रतिस्पर्धा के संबंध में अवश्य पढ़ा होगा। तथापि, आपको स्मरण होगा कि सिद्धान्त और व्यवहार में दो प्रकार की प्रतिस्पर्धा की कल्पना की गई है। जब बड़ी संख्या में विक्रेता एक समान वस्तु का उत्पादन कर रहे हैं एवं उन्हें पूर्ण जानकारी है और बाजार की अपेक्षा उनकी संख्या अत्यन्त कम है और इसलिए जो वस्तु वे बेचते हैं उसके मूल्य को प्रभावित करने की बाजार शक्ति उनके पास नहीं है, और फर्मों को खोलने तथा बंद करने की स्वतंत्रता है, ऐसी स्थिति में हम कह सकते हैं कि यह बाजार पूर्णतः प्रतिस्पर्धी है। दूसरी ओर, अपूर्ण प्रतिस्पर्धा की स्थिति तब उत्पन्न हो सकती है जब फर्म के पास बाजार शक्ति हो जो निम्नलिखित का परिणाम हो सकती है: (प) उत्पाद विभेदीकरण; (पप) बड़े पैमाने की मितव्ययिता लाने वाली प्रौद्योगिकी; (पपप) फर्मों की संख्या कम है एवं इनका आकार बड़ा है; और (पअ) घरेलू फर्मों और विदेशी फर्मों दोनों के लिए उद्योग में प्रवेश प्रतिबंधित अथवा प्रतिषिद्ध है (अथवा खर्चीला है)।

सिद्धान्त रूप में, अपूर्ण प्रतिस्पर्धा का वर्गीकरण बाजार शक्ति के इन वैकल्पिक स्रोतों के अनुसार एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा, अल्पाधिकार और एकाधिकार में किया जाता है। तथापि, चूंकि प्रौद्योगिकी और प्रवेश अनिवार्य रूप से फर्म का आकार और एक उद्योग में फर्मों की संख्या निर्धारित करते हैं, ऐसी स्थिति में ये बाजार शक्ति के सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

एक एकाधिकारी बाजार जिसमें एक ही फर्म कार्यरत होती है, वह अनन्य पेटेंट अधिकार अथवा बड़े पैमाने की मितव्ययिता वाली प्रौद्योगिकी का परिणाम हो सकता है। लेकिन यदि एक वस्तु विभिन्न किस्मों में उत्पादित की जाती है यद्यपि कि बड़े पैमाने की मितव्ययिता फर्म को बृहत् रूप में विकसित होने का अवसर देती है, उस स्थिति में बाजार के अंतर्गत बड़ी संख्या में उत्पादक एवं किस्में होंगी, बशर्ते कि कुछ के लिए प्रवेश प्रतिबंधित हो। ऐसे में फर्म की बाजार शक्ति उन किस्मों की प्रतिस्थापनीयता के अनुसार परिवर्तित होगी। उदाहरणस्वरूप, यदि ये किस्में एक दूसरे के अत्यन्त ही निकट स्थानापन्न हैं, जैसाकि अलग-अलग ब्रांडों के टूथपेस्ट में है, फर्मों के बीच उपभोक्ताओं के बजट के लिए अत्यन्त ही तीव्र प्रतिस्पर्धा होगी। सबसे पहले चैम्बरलेन द्वारा इस परिदृश्य पर विचार किया गया जिसे एकाधिकारी प्रतिस्पर्धा के रूप में जाना जाता है।

दूसरी ओर, यदि प्रवेश कुछ ही फर्मों तक सीमित है और प्रौद्योगिकी ऐसी नहीं है कि एक ही फर्म का काफी बड़े आकार तक विकास हो ताकि वह संपूर्ण बाजार पर कब्जा कर सके, बाजार को अल्पाधिकारी प्रतिस्पर्धा वाला कहा जाता है। निःसंदेह, इस तरह के बाजार की इनके अलावा कुछ विशिष्ट विशेषताएँ होती हैं जो इसे अन्य प्रकार के बाजार अपूर्णता से निश्चायक रूप से अलग करती हैं। हम बाद में इस पर विचार करेंगे।

फर्मों के बीच पूर्ण प्रतिस्पर्धा दीर्घकाल में सीमांत लागत निर्धारण और फर्म के निर्गत को उस बिंदु तक जहाँ औसत लागत न्यूनतम होता है, पहुँचाती है। इस प्रकार प्रत्येक फर्म उत्पादन के कुशल पैमाने को प्राप्त करती है। संतुलन बिंदु पर सभी फर्मंे शून्य (सामान्य से अधिक) लाभ अर्जित करती हैं। ये दोनों परिणाम मुक्त प्रवेश और एक्जिट (निर्गत) का अनुसरण करते हैं। मान लीजिए, किसी समय विशेष में, प्रत्येक फर्म के लिए बाजार मूल्य न्यूनतम – औसत लागत से अधिक है (जिनकी समान प्रौद्योगिकी है और फलतः लागत वक्र एक समान है), जिससे उद्योग में प्रत्येक फर्म यथार्थतः सकारात्मक लाभ अर्जित करती है। यह संभावित – प्रवेशियों को आकर्षित करती है और चूँकि प्रवेश निर्बाध है, फर्मों की संख्या और उद्योग का कुल उत्पादन निःसंदेह प्रवेश और अधिक उत्पादन के परिणामस्वरूप तब तक बढ़ेगा जब तक कि मूल्य, शून्य न्यूनतम औसत लागत और लाभ तक नहीं गिर जाता है। अतएव, पूर्ण प्रतियोगी बाजार में संतुलन बिंदु पर मूल्य न्यूनतम औसत लागत और फलतः सीमांत लागत के तुल्य हो जाता है।

स्वतंत्र प्रवेश और एक्जिट (निर्गत) के कारण भी एकाधिकारी प्रतियोगी बाजार में शून्य लाभ तक पहुँच जाता है। इस प्रकार के बाजार में, बड़े पैमाने की मितव्ययिता (अथवा पैमाने का वर्द्धमान प्रतिलाभ) के कारण प्रत्येक फर्म वस्तु की भिन्न-भिन्न किस्में प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि प्रत्येक फर्म का उत्पाद के अपने किस्म अथवा ब्रांड पर एकाधिकार होता है। इस तरह की एकाधिकार शक्ति के बावजूद भी, वे शून्य अधिसामान्य लाभ से अधिक अर्जित नहीं कर सकते हैं। ऐसा इसलिए कि यदि प्रत्येक फर्म अपने किस्म के लिए औसत लागत से अधिक मूल्य वसूल करता है और सकारात्मक लाभ अर्जित करता है, तो नए फर्म नए किस्मों के साथ बाजार में प्रवेश करेंगे। चूँकि सभी किस्म निकट स्थानापन्न हैं, कुछ उपभोक्ता इन नई ब्रांडों, यदि उनका मूल्य विद्यमान ब्रांडों से कम है, को खरीदने लगेंगे, परिणामस्वरूप विद्यमान फर्म भी अपनी ब्रांडों का मूल्य कम करते हैं। सन्तुलन बिन्दु पर, सभी मूल्यों को औसत लागत के बराबर होना चाहिए और परिणामस्वरूप सभी लाभ शून्य होना चाहिए। पूर्ण प्रतियोगी सन्तुलन से एक मात्र अंतर यह है कि इस मामले में सन्तुलन मूल्य निश्चित रूप से सीमांत लागत से अधिक होगा। इसका समाज कल्याण पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है जिसे कि हम बाद में देखेंगे।

क्या उपर्युक्त चर्चा का अभिप्राय यह है कि प्रतिबंधित प्रवेश से विद्यमान फर्मों को निश्चयात्मक लाभ प्राप्त होगा? यह आवश्यक नहीं है। एक ऐसे बाजार पर विचार कीजिए जिसमें आरम्भ में दो एक-से फर्म हैं तथा फर्मों का और प्रवेश निषिद्ध है। यदि विद्यमान फर्म एक-सी वस्तु का उत्पादन करती हैं और मूल्यों में बराबरी करती हैं, तब बाजार मूल्य उनके (साझा) सीमांत लागत के बराबर होगा और तद्नुरूप दोनों शून्य लाभ अर्जित करेंगी। यह सजातीय-वस्तु बर्टेªण्ड द्वयाधिकार (अथवा अल्पाधिकार, यदि दो से अधिक फर्म बाजार में हैं) की स्थिति है। उदाहरण के लिए, फर्म-1 प्रति इकाई 20 रु. लेती है और फर्म-2 प्रति इकाई 15 रु. लेती है। चूंकि वे एक-सी वस्तु का ही उत्पादन करते हैं, ‘‘सभी‘‘ उपभोक्ता फर्म-2 से वस्तु खरीदेंगे। इस प्रकार, फर्म-2 संपूर्ण बाजार की आवश्यकता पूरी करती है, बशर्ते कि इसे उस मूल्य पर बाजार माँग पूरी करने में कोई क्षमता बाधा नहीं है। तद्नुरूप फर्म-1 निश्चयात्मक राजस्व और लाभ नहीं अर्जित कर सकती है। इतना ही नहीं दोनों ही फर्म का तब तक निश्चयात्मक बाजार हिस्सा नहीं हो सकता है जबतक कि वे बराबर मूल्य नहीं लेते हैं। अब मान लीजिए कि सीमांत लागत स्थिर है और दोनों के लिए समान है। मान लीजिए यह 10 रु. है। यदि, जो बराबर मूल्य दोनों लेते हैं वह इससे अधिक है, उनमें से कोई भी एक संपूर्ण बाजार की माँग पूरी कर सकती है और अभी भी दूसरे से थोड़ा कम मूल्य लेकर निश्चयात्मक लाभ अर्जित कर सकती है। इस तरह का प्रोत्साहन दोनों के लिए 10 रु. से अधिक किसी भी मूल्य पर विद्यमान है। इसलिए संतुलन मूल्य सीमांत लागत के बराबर होना चाहिए। इस पर फर्मों की संख्या का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अतएव, एक-सी प्रौद्योगिकी (अर्थात् एक-सी सीमांत लागत), की सहायता से एक-सी वस्तु का उत्पादन कर रही फर्मों के बीच मूल्य प्रतिस्पर्धा पूर्णतः प्रतियोगी समाधान का मार्ग प्रशस्त करता है। इसे ‘‘बर्टेªण्ड विरोधाभास‘‘ (Bertrand Paradox) के नाम से जाना जाता है। यदि प्रवेश प्रतिबंधित हो और फर्म के पास बाजार शक्ति है, प्रत्येक फर्म जो लाभ अर्जित कर सकता है वह अधिक से अधिक शून्य है।

इस परिणाम की तीन विशेषताएँ संभव हैं। पहली, यदि फर्म विभेदित उत्पादों का उत्पादन करते हैं, जैसे आई बी एम और हेवलेट-पैकार्ड द्वारा ‘‘कम्प्यूटर सिस्टम‘‘ का उत्पादन किया जाता है, वे अलग-अलग मूल्य, जो उनके सीमांत-लागतों से ऊपर हैं, वसूल कर सकती हैं, और इस पर भी उनका बाजार हिस्सा और लाभ निश्चयात्मक हो सकता है। इस बाजार संरचना को विभेदित बर्टेªण्ड अल्पाधिकार (ffDierentiated Bertrand Oligopoly) कहा जाता है। निःसंदेह, प्रवेश के अप्रतिबंधित होने पर भी फर्म निश्चित रूप से निश्चयात्मक लाभ अर्जित कर सकती हैं, बशर्ते कि प्रवेश करने वाली फर्म उन किस्मों का उत्पादन करे जो बाजार में विद्यमान किस्मों का निकट स्थानापन्न नहीं है।

दूसरा, एक-से उत्पादों के होने पर भी, अल्पाधिकारी फर्मों को निश्चयात्मक लाभ हो सकता है यदि उनकी प्रौद्योगिकी अलग-अलग हो और इस प्रकार सीमांत लागत भी अलग हो। मान लीजिए, हमारे पूर्व उदाहरण में, फर्म-2 की सीमांत लागत कम (स्थिर) है जो 8 रु. के बराबर है। यदि यह फर्म-1 के सीमान्त लागत अर्थात् 10 रु. से थोड़ा कम मूल्य रखे तो फर्म-1 का किसी भी अन्य मूल्य पर निश्चयात्मक बाजार हिस्सा नहीं हो सकता है और फलतः यह बंद हो जाती है। इस प्रकार फर्म-2 संपूर्ण बाजार पर कब्जा कर लेता है और निश्चित रूप से निश्चयात्मक लाभ अर्जित करती है।

तीसरा, यदि फर्म मूल्य के बदले, निर्गत स्तरों (अथवा बाजार हिस्सों) में प्रतियोगिता करता है और अपने कुल उत्पादन तथा पूर्ति के अनुरूप बाजार निकासी मूल्य (Market Clearing Price) पर वस्तु बेचती हैं तो दोनों फर्मों को निश्चित रूप से निश्चयात्मक लाभ होता है। निःसंदेह फर्म अपना निर्गत स्तर एक साथ अथवा क्रमिक रूप से चयन कर सकते हैं। अगस्टिन कूर्नो ने 1838 में अल्पाधिकारी बाजार का अध्ययन किया जिसमें फर्म अपने निर्गत स्तर का चयन एक साथ करती हैं। यह प्रतिस्पर्धी के निर्गत के दिए गए स्तर के लिए सर्वोत्तम प्रत्युत्तर है। इसी प्रकार प्रतिस्पर्धी भी अपने सर्वोत्तम प्रत्युत्तर पर विचार करता है। दूसरी ओर, जब एक फर्म, प्रतिस्पर्धी फर्म द्वारा निर्गत स्तर के चयन से पहले अपने निर्गत स्तर का चयन कर लेता है, तब हमारे सामने नेता-अनुयायी बाजार संरचना होती है। स्टैकेलबर्ग ने यह अध्ययन किया था। किसी भी स्थिति में, चाहे यह कूर्नो प्रतिस्पर्धा हो अथवा स्टैकेलबर्ग का नेता-अनुयायी बाजार संरचना, फर्म सदैव ही निश्चित तौर पर निश्चयात्मक लाभ अर्जित करती है। कूर्नो प्रतिस्पर्धा में, फर्मों को यदि वे समानुपातिक हैं, बराबर फायदा होता है और जैसे ही फर्मों की संख्या अनंत की ओर बढ़ती है मूल्य के सीमांत लागत के बराबर होने की प्रवृत्ति रहती है जबकि स्टैकेलबर्ग के (निर्गत) नेतृत्व मॉडल में, नेता (अर्थात् पहले कदम बढ़ाने वाला) अनुयायी (अर्थात् बाद में कदम बढ़ाने वाला) की अपेक्षा अधिक लाभ अर्जित करता है। इस प्रकार, मात्रा प्रतिस्पर्धा के अन्तर्गत प्रतिबन्धित प्रवेश विद्यमान फर्मों के लिए बाजार शक्ति और सकारात्मक लाभ का सृजन करता है।

उपरोक्त चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि क्या प्रतिबंधित प्रवेश का अभिप्राय सीमान्त लागत से ऊपर बाजार मूल्य और फर्मों के लिए परिणामी निश्चयात्मक लाभ होगा, यह निम्नलिखित पर निर्भर करता है: (प) उत्पाद की प्रकृति, विभेदित अथवा एक-सा, (पप) प्रतिस्पर्धा की प्रकृति, मूल्य अथवा निर्गत; और (पपप) प्रौद्योगिकी का प्रकार।