दलीय व्यवस्था किसे कहते हैं | दलीय व्यवस्था की उत्पत्ति को परिभाषित विशेषताएं आलोचना party dal in hindi

By   November 6, 2020

party dal in hindi दलीय व्यवस्था किसे कहते हैं | दलीय व्यवस्था की उत्पत्ति को परिभाषित विशेषताएं आलोचना ?

दलीय व्यवस्था की उत्पत्ति
राजनीति शास्त्रियों ने दल-व्यवस्था की उत्पत्ति की अनेक व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। इन्हें मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है, जिनपर आगे चर्चा की जा रही हैः

 मानव प्रकृति सिद्धान्त
इस श्रेणी में दल-व्यवस्था की उत्पत्ति के विषय में तीन स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए गए हैं। प्रथम, सर हेनरी मेन जैसे विद्धानों का विचार है कि दलों की उत्पत्ति का मूल कारण मानव की झगड़ालू (संघर्ष की) प्रकृति में निहित है। दूसरे शब्दों में, अपने कठोर परस्पर-विरोधी विचारों को संगठित अभिव्यक्ति प्रदान करने के उद्देश्य से मनुष्य दल बनाते हैं।

मानव प्रकृति सिद्धान्त से संबंधित दूसरी श्रेणी के अनुसार लोगों की मानसिक प्रवृत्ति (जमउचमतंउमदज) राजनीतिक दलों की उत्पत्ति के लिए उत्तरदायी है। दूसरे शब्दों में, विभिन्न लोगों की अलगअलग प्रवृत्तियाँ उन्हें अलग-अलग राजनीतिक दलों की स्थापना के लिए प्रेरित करती हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग स्थापित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में हैं उन्हें राजनीतिक विभाजन-रेखा के दक्षिण पंथी कहा जाता है। दूसरी ओर, जो लोग व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के पक्षधर होते हैं वे प्रायः वामपंथी कहलाते हैं। अन्य शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि जो लोग परिवर्तन के पक्ष में हैं वे स्वयं को एक दल के रूप में संगठित कर लेते हैं, और जो परिवर्तन-विरोधी हैं वे दूसरा दल बना लेते हैं।

दलों की उत्पत्ति से सम्बन्धित मानव प्रकृति का तीसरा स्पष्टीकरण यह है कि दलों की उत्पत्ति राजनीतिक नेताओं के चमत्कारी व्यक्तित्त्व के कारण भी हो सकती है। जनसाधारण को अपने विचारों को स्पष्टता एवं क्रमबद्धता प्रदान करने के लिए उचित नेतृत्त्व की आवश्यकता होती है। अतः दलों की उत्पत्ति बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करती है कि ऐसा नेतृत्त्व उपलब्ध हो जोकि प्रभावी और गतिशील हो तथा जो जनसाधारण को लक्ष्य-प्राप्ति की दिशा में सक्रिय रहने के लिए प्रेरित कर सके।

परिवेश सम्बन्धी स्पष्टीकरण
उपरोक्त विचारों के अतिरिक्त, इस सम्बन्ध में काफी तथ्य उपलब्ध हैं कि पार्टी व्यवस्था के विकास में सामाजिक-आर्थिक परिवेश की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। उदाहरण के लिए आधुनिक लोकतान्त्रिक दल-व्यवस्था कम से कम दो महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं का परिणाम है। ये हैंः (क) निरंकुश राजतन्त्र में राजाओं की शक्तियों को सीमित किया जानाय तथा (ख) मतदान के अधिकार को व्यापक और सार्वभौमिक रूप देकर समस्त वयस्क जनता को प्रदान करना। अतः, यह स्वाभाविक है कि दलों की उत्पत्ति की पृष्ठभूमि में, राजा की शक्ति को सीमित करने के लिए विधायिका द्वारा किया गया संघर्ष, तथा मतदान के आधार को विस्तृत बनाने के प्रयास शामिल हैं। वर्ष 1680 तक ब्रिटिश राजनीति, राजा और संसद दोनों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन चुकी थी। तब राजतन्त्र की असीमित शक्तियों का विरोध करने वालों को व्हिग (ॅीपह), तथा राजतन्त्र के समर्थकों को टोरी (ज्वतल) कहा गया। यही आगे चलकर क्रमशः उदार, या लिबरल पार्टी तथा अनुदार अर्थात् कन्जर्वेटिव पार्टी बन गए।

 हित सिद्धान्त
ऐसा विश्वास किया जाता है कि ऊपर वर्णित सभी स्पष्टीकरण आंशिक रूप से सत्य हैं, फिर भी किसी एक को पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए मानव की झगड़ालू, या संघर्ष की, प्रकृति मानव व्यवहार का एक पक्ष मात्र है। उसी प्रकार, किसी राजनीतिक नेता की राजनीतिक प्रवृत्ति तथा उसकी गतिशीलता का कोई निश्चित कारक नहीं हो सकता है। इन स्पष्टीकरणों की कमियों के कारण दलों की उत्पत्ति के ‘हित सिद्धान्त‘ का प्रवर्तन किया गया है। इस सिद्धान्त को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया गया है। इस सिद्धान्त का आधार यह मान्यता है कि राजनीतिक दलों की स्थापना विभिन्न हितों के लिए होती है। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल, व्यक्तियों तथा समूहों के हितों की अभिव्यक्ति की सशक्त एजेंसियाँ हैं। किसी व्यक्ति की राजनीतिक गतिविधियाँ जिन हितों से प्रेरित होती हैं वे उन हितों की प्रकृति और विस्तार पर बहुत कुछ निर्भर करता है। हितों का विकास मानव के सांस्कृतिक परिवेश पर भी निर्भर करता है। किसी व्यक्ति-विशेष का जन्म, उसकी शिक्षा तथा अनुभव उसके हितों का निर्धारण करते हैंय और फिर यही उसके दल-सम्बन्धों का निर्धारण भी करते हैं।

‘हित-सिद्धान्त‘ आर्थिक हितों के महत्व को मान्यता देता है, जिनके द्वारा व्यक्ति का वह निर्णय प्रभावित होता है जिसके अनुसार वह किसी दल-विशेष या दलों के संगठन का सदस्य बनता है। फिर भी यह सिद्धान्त मार्क्सवादी वर्ग संघर्ष सम्बन्धी विचारों को स्वीकार नहीं करता। यह सिद्धान्त सामाजिक वर्गों के प्रति समर्पण पर आधारित है। वास्तव में समस्त सामाजिक व्यवस्था को धनवानों (ींअमे) और धनहीनों (ींअमदवजे) में विभाजित कर देना एक गम्भीर परिवेश को आवश्यकता से अधिक सरल बना देता है। इसलिए सार रूप में यह तर्क दिया जा सकता है कि सामान्यतया मानव

उद्देश्यों की प्राप्ति की आशा होती है।

 अर्थ और प्रकृति
राजनीतिक दल ऐसे लोगों का समूह होता है जो अपने सदस्यों को विधायिका तथा सार्वजनिक पदों पर निर्वाचित करवाने का प्रयास करते हैं। व्यक्तियों के ये समूह औपचारिक रूप से संगठित होते हैं, और उनकी अपनी (दल के नाम की) पहचान होती है। यह परिभाषा पर्याप्त रूप से व्यापक है। यह अमेरिका की जानी-मानी पार्टियों, (डेमोक्रेटिक तथा रिपब्लिकन) या इंगलैण्ड की लेबर तथा कन्जर्वेटिव पार्टियों की ही परिभाषा नहीं है। यह सभी उन संगठनों की परिभाषा भी है जो छोटे होते हैं तथा चुनावों में अधिक स्थान भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। यह दल चुनावों के लिए उम्मीदवारों को कार्यकर्ता उपलब्ध करवाते हैं, तथा उनके लिए धन की आपूर्ति भी करते हैं। यह परिभाषा इस बात का संकेत है कि पार्टियाँ तीन राजनीतिक रंगभूमियों में पाई जाती हैं। ये इस प्रकार हैंः कोई भी दल लोगों के दिमागों के एक लेबल (संइमस) के रूप में पाया जाता हैय एक ऐसा संगठन जो कि सदस्यों को स्वयं में शामिल करता है तथा उम्मीदवारों के लिए अभियान चलाता हैय तथा नेताओं का ऐसा समूह जो सरकार की विधायी एवं कार्यपालिका अंगों को संगठित और नियन्त्रित करने का प्रयास करते हैं।

‘राजनीतिक दल‘ के ऊपर बताए गए अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टियों तथा अन्य छोटे और अस्थायी संगठनों में क्या अंतर है। इसी प्रकार, दलों तथा दबाब समूहों का तथा गुटों का अंतर स्पष्ट हो जाता है। उदाहरण के लिए, खाद्यान्न मूल्य समिति (थ्ववक च्तपबम बवउउपजजमम) अथवा अकाल प्रतिरोध समिति (थ्मउपदम त्मेपेजंदबम ब्वउउपजजमम) जैसे अस्थायी राजनीतिक संगठनों की स्थापना किसी विशेष अस्थायी मुद्दे का समर्थन या विरोध करने के लिए स्थापित की जाती है। दूसरी ओर, राजनीतिक दलों में काफी हद तक स्थायित्व होता है। दूसरे, केवल राजनीतिक दल ऐसे संगठित समूह हैं जिनके द्वार (कम से कम सैद्धान्तिक रूप से) सभी के लिए खुले होते हैं, तथा जिनके हित संकीर्ण नहीं होते। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पार्टियों का उद्देश्य किसी एक विशेष समस्या पर केन्द्रित न होकर सरकार की समस्याओं को सुलझाने से सम्बद्ध होता है। उनके द्वार सब के लिए खुले होते हैं, और वे समाज के अधिक से अधिक सदस्यों एवं वर्गों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक दल, हित और दबाव समूहों से भिन्न होते हैं क्योंकि उनका (हित और दबाव समूहों का) उद्देश्य तो केवल अपने सदस्यों के हितों की अभिवृद्धि तक सीमित होता है।

तीसरे, पार्टियों के स्पष्ट और सुनिश्चित उद्देश्य होने चाहिए। दलों के उद्देश्य प्रायः तात्कालिक और

अंतिम लक्ष्यों, दोनों का समन्वय होता है। दलों के कार्यक्रमों में कानून और सरकार के विषय में उनके विचार, तथा भविष्य के राजनीतिक रूप के बारे में उनके विचार शामिल होते हैं। प्रत्येक दल अपने राजनीतिक विचारों का प्रचार करता है।

चौथे, दलों के कार्यक्रमों में उन सम्भावित भौतिक उपलब्धियों की भी व्यवस्था होती है जो सत्ता प्राप्त करने पर उन्हें मिल सकती हैं। वास्तव में, जैसा कि हम भारत में देखते हैं, अधिकांश दल किसी न किसी प्रकार सत्तारूढ़ होना चाहते हैं, चाहे वे प्रचार के लिए यही कहते हैं कि वे सम्प्रदायवाद जैसे दोषों के विरोध पर आधारित विचारधारा के माध्यम से सत्ता में आना चाहते हैं। इस अर्थ में भी राजनीतिक पार्टियाँ, दबाव अथवा हित समूहों से भिन्न होती हैं, क्योंकि हित और दबाव समूहों के तो कोई निर्वाचन क्षेत्र नहीं होते जिनका विश्वास प्राप्त करके वे सरकार बनाने के लिए एक-दूसरे का मुकाबला करें। इस प्रकार राजनीतिक दल, सामूहिक हितों का समन्वय होता है जोकि सामान्य राजनीतिक नीतियाँ लागू करवाना चाहते हैं। उधर, दबाव समूह तो दलों का समर्थन करने वाली सजीव श्जनताश् होती है।

राजनीतिक दलों से भिन्न तथा हित एवं दबाव समूहों की भान्ति श्गुटोंश् को भी किसी राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संगठित नहीं किया जाता। साथ ही, उनका कोई स्थायी संगठन भी नहीं होता। अतः गुटों को लोगों का ऐसा समूह कह सकते हैं जो दलों के भीतर रहते हुए किसी संकीर्ण हित की अभिवृद्धि के लिए प्रयास करते हैं। वे सम्पूर्ण दल को सामूहिक हितों (उदाहरण के लिए चुनाव जीतने) के लिए प्रयत्न नहीं करते हैं।

चुनावों के समय सामान्य हितों तथा राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने की सांविधानिक अपील की जाती है। अतः दल-व्यवस्था, मार्क्सवाद के वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं कर सकती। इसका अर्थ यह हुआ कि राजनीतिक दल, वर्ग-सीमाओं से ऊपर उठकर कार्य करते हैं। वे संकीर्ण गुट-हितों से भी ऊपर होते हैं। विचारधाराओं और कार्यक्रमों में अंतर होते हुए भी सभी दल सदैव प्रत्येक मुद्दे पर एक-दूसरे का विरोध नहीं करते हैं। अतः राजनीतिक दल, समाज के विविध वर्गों के संगठन होते हैं, जो न्यूनाधिक रूप से स्थायी और व्यवस्थित होते हैं। उनका उद्देश्य, संविधान के अनुकूल, उसकी सीमा में रहते हुए, अपने नेताओं का सरकार पर नियन्त्रण प्राप्त करना या बनाए रखना, तथा इस नियंत्रण के माध्यम से अपने सदस्यों को सभी प्रकार के लाभ प्राप्त करवाना होता है।

बोध प्रश्न 1
नोटः क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) दल-व्यवस्था की उत्पत्ति के मानव प्रकृति सिद्धान्त का संक्षेप में विवेचन कीजिए।
2) ‘राजनीतिक दलों‘ को परिभाषित कीजिए, तथा दलों और दबाव समूहों में अंतर स्पष्ट कीजिए।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
1) तीन प्रकार के स्पष्टीकरण दिए जाते हैंरू (क) लोगों की झगड़ालू प्रवृत्ति — लोग अपनी इस प्रवृत्ति के कारण अलग-अलग दल बनाते हैंय (ख) लोगों के अलग-अलग दृष्टिकोण उनके विभिन्न विचार एवं आस्थाएँ उन्हें उनके जैसे विचार रखने वाले लोगों के साथ मिलकर पृथक दल बनाने के लिए प्रेरित करती हैंय (ग) किसी चमत्कारी व्यक्ति का नेतृत्व जिसके पीछे लोग एकत्र हो जाते हैं।
2) राजनीतिक दल लोगों का संगठित समूह होता है, जिसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया द्वारा राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना होता है। दबाव समूह अपने हितों की अभिवृद्धि करते हैं, परन्तु वे न ही चुनाव लड़ते हैं और न सत्तारूढ़ होते हैं।