अनिश्चित काल के लिए स्थगन’ क्या होता है | लोकसभा का विघटन कौन कर सकता है | parliament Adjournment in hindi

By   January 16, 2022
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संसद के सत्रावसान में राष्ट्रपति विशेष परिस्थितियों में जो आदेश जारी करता है उसे क्या कहते हैं अनिश्चित काल के लिए स्थगन’ क्या होता है | लोकसभा का विघटन कौन कर सकता है | parliament Adjournment in hindi

अनिश्चित काल के लिए स्थगन या विघटन
राष्ट्रपति समय समय पर दोनों सदनों का या किसी एक सदन का सत्रावसान कर सकता है और लोक सभा को भंग कर सकता है।
अध्यक्ष को सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने की शक्ति प्राप्त है। सदन को एक बार अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने के पश्चात उसे फिर से बुलाने की शक्ति भी अध्यक्ष को प्राप्त है। परंतु सत्रावसान हो जाने पर केवल राष्ट्रपति ही सदनों की बैठक आमंत्रित कर सकता है।
सामान्यतया, सदन के अनिश्चित काल के लिए स्थगित किए जाने के पश्चात उसका राष्ट्रपति द्वारा आगामी कुछ दिनों के भीतर सत्रावसान कर दिया जाता है । सदन के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने पर उसके समक्ष लंबित किसी कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परंतु लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमों के नियम 335 के अनुसार, सदन का सत्रावसान हो जाने पर, विधेयक पेश करने की अनुमति के लिए प्रस्ताव की सूचनाओं के सिवाय अन्य सब लंबित सूचनाएं व्ययगत हो जाती हैं और आगामी अधिवेशन के लिए नये सिरे से सूचनाएं देनी पड़ती हैं।
लोक सभा अपनी प्रथम बैठक के लिए निर्धारित तिथि से पांच वर्षों तक चलती रहती है। यदि उसे कार्यावधि पूरी होने से पूर्व भंग नहीं कर दिया जाता या उसकी कार्यावधि बढ़ाई नहीं जाती है तो राष्ट्रपति द्वारा उसे भंग करने का औपचारिक आदेश जारी न किए जाने पर भी सदन पांच वर्षों की अवधि की समाप्ति पर अपने आप भंग हो जाती है।
विघटन के परिणाम सदन को विघटित किए जाने से वर्तमान सदन का जीवन समाप्त हो जाता है और उसके बाद नये सदन का गठन किया जाता है। एक बार जब सदन को विघटित कर दिया जाता है तो वह विघटन अपरिवर्तनीय होता है । संविधान के अधीन केवल लोक सभा को ही विघटित किया जा सकता है, और इसके विघटित हो जाने पर इसके समक्ष या इसकी किसी समिति के समक्ष लंबित सब कार्य व्ययगत हो जाता है। विघटित सदन के रिकार्ड का कोई भी भागआगे नहीं ले जाया जा सकता और नये सदन के रिकार्ड में या रजिस्टर में समाविष्ट नहीं किया जा सकता।
संक्षेप में, विघटन के समय लोक सभा में लंबित कार्य की विभिन्न मदों की स्थिति इस प्रकार होती है:
(1) विघटन के समय लोक सभा में लंबित सब विधेयक, चाहे वह इस सदन में पेश हुए हों या राज्य सभा द्वारा इसके पास भेजे गए हों, व्ययगत हो जाते हैं; और
(2) लोक सभा द्वारा पास किए गए विधेयक, परंतु जो राज्य सभा द्वारा निबटाये न गए हों और विघटन की तिथि को वहां लंबित हों व्ययगत हो जाते हैं;
(3) राज्य सभा में पेश किए गए विधेयक, जो लोक सभा द्वारा पास न किए गए हों परंतु अभी राज्य सभा में लंबित हों, व्ययगत नहीं होते।
(4) जिस विधेयक पर दोनों सदनों में असहमति हुई हो और विघटन से पूर्व उस पर विचार करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे को राष्ट्रपति ने अधिसूचित कर दिया हो वह विधेयक व्ययगत नहीं होता और दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने के अपने इरादे को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किए जाने के बाद विघटन हो जाने के बावजूद, दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में उसे पास किया जा सकता है।
(5) दोनों सदनों द्वारा पास किए गए और राष्ट्रपति की अनुमति के लिए उसके पास भेजे गए विधेयक लोक सभा के विघटिल हो जाने पर व्ययगत नहीं होते।
(6) राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए वापस भेजे गए विधेयक व्ययगत नहीं होते और नये सदन द्वारा उन पर पुनर्विचार किया जा सकता है। लोक सभा मेंलंबित अन्य सब कार्य,अर्थात, प्रस्ताव,संकल्प,संशोधन,अन की अनुपूरक मांगें, इत्यादि चाहे वे किसी भी अवस्था में हों, विघटन हो जाने पर व्ययगत हो जाते हैं।
(8) सभा के समक्ष पेश की गई याचिकाएं जो याचिका समिति को निर्दिष्ट की गई हों, वे भी विघटन हो जाने पर व्ययगत हो जाती हैं।
(9) लोक सभा द्वारा पास किए गए सांविधिक नियमों के अनुमोदन या रूपभेद के लिए प्रस्ताव जो राज्य सभा की सम्मति के लिए उसके पास भेजे गए हों या इसी प्रकार राज्य सभा से लोक सभा के पास भेजे गए हों, वे भी लोक सभा के विघटित हो जाने पर व्ययगत हो जाते हैं।
(10) लंबित आश्वासन व्ययगत नहीं होते और नयी लोक सभा की सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति उन पर विचार करती है।
संदर्भ
1. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, धारा 73
2. अनु. 99 और तीसरी अनुसूची; निर्देश
3. अनु. 85
4. नियम 3
5. नियम 17
6. नियम 18
7. नियम 20
8. नियम 247
9. नियम 7(1) –
10. नियम 7(2)
11. नियम 7(9) और (4)
12. अनु. 94
13. नियम 12
14. मंत्री के अलावा अन्य प्रत्येक सदस्य गैर-सरकारी सदस्य कहा जाता है, चाहे वह किसी भी दल का हो। मंत्री सरकारी सदस्य कहलाता है।
15. नियम 26
16. नियम 15
17. सुभाष काश्यप, हिजोल्यूशन आफ द लोक सभा, द पार्लियामेटेरियन, 57, जनवरी 1, 1977
18. अनु. 108

कार्य-संचालन तथा सामान्य प्रक्रिया
प्रत्येक सदन अपनी प्रक्रिया का स्वामी है और वह संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए अपनी प्रक्रिया तथा अपने कार्य-संचालन के विनियमन के लिए नियम बना सकता है (अनुच्छेद 118)। संसद की किसी कार्यवाही की विधिमान्यता को प्रक्रिया की किसी अभिकथित अनियमितता के आधार पर न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता और संसद का कोई अधिकारी या सदस्य संसद में प्रक्रिया या कार्य-संचालन के विनियमन के मामले में किन्हीं शक्तियों के प्रयोग के संबंध में न्यायालयों की अधिकारिता के अधीन नहीं है (अनुच्छेद 122)।
प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन के कुछ आधारभूत नियम संविधान में ही अधिकथित हैं। अतः, अनुच्छेद 100 में उपबंध है (1) कि इस संविधान में यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय (यथा संवैधानिक संशोधन, राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग, पीठासीन अधिकारियों, न्यायाधीशों को हटाया जाना आदि) प्रत्येक सदन की बैठक में या सदनों की संयुक्त बैठक में सभी प्रश्नों का अवधारण पीठासीन अधिकारी को छोड़कर, जो केवल मत बराबर होने की दशा में निर्णायक मत का प्रयोग करेगा, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा और (2) प्रत्येक सदन की सारी कार्यवाही सदस्यता में कोई रिक्तियां अथवा वाद विवाद या मतदान में किसी अनधिकृत सहभागिता के होने पर भी विधिमान्य होंगी।
सदन में गणपूर्ति सदन की किसी बैठक के लिए कोरम अथवा गणपूर्ति, अध्यक्ष या अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे व्यक्ति सहित कुल सदस्य संख्या का दसवां भाग अथवा 55 सदस्यों से होती है । प्रत्येक दिन बैठक के आरंभ में, अध्यक्ष के पीठासीन होने से पहले, यह सुनिश्चित किया जाता है कि सदन में गणपूर्ति है। यदि किसी दिन 11.00 बजे म. पू. पर यह देखा जाए कि सदन में गणपूर्ति नहीं है तो गणपूर्ति घंटी बजायी जाती है और अध्यक्ष भी पीठासीन होता है जब गणपूर्ति हो गई हो । मध्याह्न भोजन के पश्चात या स्थगित होने के पश्चात जब सदन पुनः समवेत होता है तब भी इसी प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता है। बैठक के शेष समय के दौरान एक प्रथा-सी है कि किसी सदस्य द्वारा गणपूर्ति का प्रश्न सामान्य तौर पर नहीं उठाया जाता । विशेष रूप से बैठकों के बढ़े हुए समय में, मध्याह्न भोजन के दौरान या 5.00 बजे म.प. के बाद, यह प्रश्न नहीं उठाया जाता । परंतु यदि एक भी सदस्य किसी समय गणपूर्ति के अभाव का प्रश्न उठा देता है तो कार्यवाही रोकनी पड़ती है और गणपूर्तिघंटी बजानी पड़ती है और सदन की कार्यवाही गणपूर्ति हो जाने पर ही पुनः शुरू की जा सकती है।

मतदान की प्रक्रिया: किसी प्रश्न पर सदन का निर्णय किसी सदस्य द्वारा पेश किये गये प्रस्ताव के द्वारा लिया जा सकता है। अधिकांश मामलों में निर्णय ध्वनि मत द्वारा किया जाता है। यदि किसी प्रश्न के संबंध में ध्वनि मत को चुनौती दी जाती है तो अध्यक्ष आदेश देता है कि लाबी को खाली कर दिया जाये । लगभग साढ़े तीन मिनट बीतने के बाद, अध्यक्ष प्रश्न पर दूसरी बार मत लेता है तथा घोषणा करता है कि क्या उस की राय में ‘हां‘ पक्ष वालों की जीत हुई या ‘ना‘ पक्ष वालों की जीत हुई है। यदि इस प्रकार घोषित राय को पुनः चुनौती दी जाती है तो अध्यक्ष आदेश देता है कि या तो स्वचालित मत अभिलेखन उपकरण को चालू करके या सदन में ‘हां‘ या ‘ना‘ की पर्चियों का प्रयोग करके या सदस्यों द्वारा लाबियों में जाकर मत अभिलिखित किए जाएं। मत अभिलिखित करने के प्रयोजन के लिए लाबियों में जाने का व्यवहार अब कई वर्षों से चलन में नहीं है।
अब अध्यक्ष द्वारा मतविभाजन का आदेश दिया जाता है तब विभाजन घंटियां सामान्यतया साढे तीन मिनट के लिए बजती हैं । घंटियों का बजना बंद होने के ठीक बाद, चैंबर की भीतरी लाबी के सभी बाहरी दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं ताकि मतविभाजन संपन्न होने तक कोई भी अंदर प्रवेश न कर सके।
स्वचालित मत अभिलेखक प्रणाली के अंतर्गत, प्रत्येक सदस्य उसे आवंटित स्थान से इस प्रयोजन के लिए लगाए गए अपेक्षित बटन को दबाकर अपना मत देता है । प्रत्येक सदस्य की सीट पर एक ही पुश बटन सेट लगाया गया है जिसमें एक मार्गदर्शी बत्ती तथा तीन पुश बटन हैं । हरे रंग का बटन ‘हां‘ पक्ष के लिए, लाल रंग का बटन ‘ना‘ पक्ष के लिए और काले रंग का बटन ‘मतदान के अप्रयोग‘ का है। इनके साथ तार के साथ लटकता हुआ एक पुश स्विच भी लगाया गया है। मतदान का परिणाम संसूचक पट पर आने के बाद, अध्यक्ष द्वारा मतविभाजन के परिणाम की घोषणा की जाती है। जब स्वचालित मत अभिलेखक खराब होता है या जब स्थान या विभाजन संख्याएं वंटित न की गई हों तब पर्चियों के वितरण की विधि को प्रयोग में लाया जाता है । सदस्यों को अपने मत अभिलिखित करने के लिए उनकी सीटों पर हां पक्ष/ना पक्ष की छपी हुई पर्चियां सप्लाई की जाती हैं । पर्ची एक ओर ‘हां पक्ष‘ के लिए अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों में हरे रंग में और दूसरी ओर ‘ना पक्ष‘ के लिए लाल रंग में छपी होती है। सदस्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे समुचित स्थानों पर अपने हस्ताक्षर करके तथा अपने नाम, विभाजन संख्याएं और तारीखें साफ साफ लिखकर अपनी पसंद के अनुसार मत अभिलिखित करें। जो सदस्य मतदान का प्रयोग नहीं करना चाहते वे अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों में पीले रंग में छपी ‘मतदान अप्रयोग‘ की पर्ची भरें । यदि किसी सदस्य को सीट/विभाजन संख्या आवंटित न की गई हो तो वह अपने हस्ताक्षर के नीचे अपना नाम, निर्वाचन क्षेत्र, राज्य और तारीख साफ साफ लिख दे। सभा पटल पर तैनात अधिकारी हां पक्ष/ना पक्ष और ‘मतदान अप्रयोग‘ की पर्चियों की छानबीन करता है तथा उन पर अभिलिखित मतों की गिनती करता है तथा परिणाम का संकलन करता है। इस प्रकार संकलित परिणाम की सभापीठ द्वारा घोषणा की जाती है। पीठासीन अधिकारी को पहली बार में मतदान करने का अधिकार नहीं है किंतु मतों की संख्या बराबर होने पर वह मत दे सकता है जो निर्णायक होता है।

कार्यवाही का अभिलेख: संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही का एक पूर्ण शब्दशः अभिलेख तैयार तथा प्रकाशित किया जाता है । जबकि वाद विवाद की असंशोधित तथा साइक्लोस्टाइल्ड प्रतियां सदस्यों को अगले दिन उपलब्ध करा दी जाती हैं। वाद विवाद की छपी हुई प्रतियां सामान्यतया बैठक के बाद एक मास के अंदर उपलब्ध करा दी जाती हैं । कतिपय ऐसे शब्दों या वाक्यों को, जिन्हें पीठासीन अधिकारी द्वारा असंसदीय घोषित कर वाद विवाद में से निकाल दिया जाता है तथा उसके आदेशों के अंतर्गत अभिलिखित न किये गये भागों को कार्यवाही के आधिकारिक अभिलेख में सम्मिलित नहीं किया जाता।
कार्यवाही को टेप रिकार्ड किया जाता है। इसके अलावा संसदीय रिपोर्टर कार्यवाही को पांच पांच या दस दस मिनट की बारी से शार्टहैंड में भी लिख लेते हैं। रिपोर्टर अपने अपने हिस्सों का लिप्यंतरण करने के बाद अपनी शंकाओं का टेप रिकार्ड किये गये पाठ से समाधान करते हैं। वाद विवाद के अधिवेशनवार छपे हुए खंड हिंदी तथा अंग्रेजी पाठ में उपलब्ध होते हैं।

संसद की भाषा
संविधान द्वारा की गई घोषणा के अनुसार संसद के कार्य का संचालन करने की भाषाएं हिंदी तथा अंग्रेजी हैं। किंतु पीठासीन अधिकारी किसी ऐसे सदस्य को, जो हिंदी में या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता हो, अपनी मातृ-भाषा में संसद को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकते हैं (अनुच्छेद 120)। दोनों सदनों में 12 भाषाओं का सदन की भाषाओं अर्थात हिंदी तथा अंग्रेजी में साथ साथ भाषांतर करने की सुविधाएं विद्यमान हैं।

संसद तथा प्रचार माध्यम (मीडिया)
संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता के लिए अभिव्यक्त रूप से कोई उपबंध नहीं किया गया है, किंतु न्यायिक निर्णयों द्वारा यह तय पाया गया है कि बोलने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है।
संसद के किसी भी सदन की कार्यवाही के प्रकाशन से संबद्ध सभी व्यक्तियों को संविधान के अंतर्गतं किसी भी न्यायालय में कार्यवाही से पूर्ण उन्मुक्ति प्रदान की गई है, किंतु शर्त यह है कि इस तरह का प्रकाशन सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अंतर्गत किया जाये (अनुच्छेद 105 (2)) । संसद के किसी सदन की किन्हीं कार्यवाहियों के सारतया सही विवरण के किसी समाचारपत्र में प्रकाशन या बेतार तारयांत्रिकी द्वारा प्रसारण के संबंध में भी सांविधिक संरक्षण प्रदान किया गया है बशर्ते कि रिपोर्ट जनहित के लिए हों तथा विद्वेष रहित हों (संविधान का अनुच्छेद 361 क)। यह संरक्षण इस समग्र परिसीमा के अंतर्गत प्रदान किया गया है। सदन कोअपने वाद विवाद या अपनी कार्यवाहियों पर नियंत्रण करने तथा यदि आवश्यक हो तो, उनके प्रकाशन का प्रतिषेध करने और अपने वाद विवादों तथा अपनी कार्यवाहियों के उल्लंघन के लिए दंड देने तथा अपने आदेशों के उल्लंघन लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है। सामान्यतया सदन की कार्यवाहियों को रिपोर्ट करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाए जाते।
संसद को इसके कार्यकरण पर या इसके सदस्यों या इसकी समितियों के कार्यकरण पर आक्षेप करने या लांछन लगाने वाले किसी विद्वेषपूर्ण लेखन, भाषण आदि के लिए कार्यवाही करने का हक है। किंतु, यदि आलोचना निष्पक्ष तथा निष्कपट है तो कोई कार्यवाही नहीं की जाती।
संसद में प्रेस को प्रदान की गई सुविधाओं में प्रेस दीर्घा, प्रेस कक्षों, संसदीय पत्रों तथा जारी की गई प्रेस विज्ञप्तियों की सप्लाई. लाबियों तथा केंद्रीय कक्ष में आने जाने ग्रंथालय तथा संदर्भ सेवाओं आदि का उपयोग करने की सुविधाएं सम्मिलित हैं।

कार्यवाहियों का प्रसारण: संसद को लोगों के निकट लाने के विचार से, दोनों सदनों के सदस्यों के समक्ष राष्ट्रपति के अभिभाषण का सीधा प्रसारण करके 1989 में एक शुरुआत की गई थी । दिसंबर, 1991 से, दोनों सदनों में प्रश्नकाल का, आवश्यक संपादन करने के बाद, अगले दिन दूरदर्शन पर प्रसारण किया जा रहा है। आकाशवाणी पर प्रश्न-काल का प्रसारण 1992 में शुरू किया गया। 1992 से रेल बजट तथा सामान्य बजट की प्रस्तुति जैसे महत्वपूर्ण अवसरों का भी दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण किया जा रहा है। समय समय पर महत्वपूर्ण भाषणों को भी दूरदर्शन पर प्रसारित किया जाता है तथा संग्रहालय के प्रयोजनों तथा भावी उपयोग के लिए समूची कार्यवाही की टेलीफिल्में भी बनाई जा रही हैं। तथापि, दिसंबर, 1994 से संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही का दूरदर्शन तथा आकाशवाणी पर सीधा प्रसारण किया जा रहा है। किंतु, जबकि लोक सभा तथा राज्य सभा में प्रश्न-काल का एक सप्ताह छोड़कर बारी बारी-एक सप्ताह लोक सभा तथा दूसरे सप्ताह राज्य सभा-दूरदर्शन के प्राथमिक चैनल पर प्रसारण किया जाता है, दोनों सदनों की अन्य कार्यवाहियों का दो अलग अलग कम शक्ति के चैनलों पर प्रतिदिन प्रसारण किया जाता है, जिसे केवल 15 किलोमीटर की परिधि के भीतर देखा जा सकता है।