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कला और साहित्य के क्षेत्र में पल्लवों की उपलब्धियों का मूल्यांकन कीजिये पल्लव कला किसे कहते हैं ? पल्लव स्थापत्य के प्राचीनतम उदाहरण क्या है ? pallava art and architecture in hindi ?
पल्लव कला
दक्षिण भारतीय स्थापत्य के प्राचीनतम उदाहरण पल्लव वंश कालीन हैं। ये आंध्र वंश के उत्तराधिकारी थे एवं कांचीपुरम इनकी राजधानी थी। पल्लव शैली का भारतीय स्थापत्य के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि इससे ही दक्षिण भारतीय स्थापत्य का प्रारंभ होता है। इसे कालक्रम एवं वास्तु सामाग्री की दृष्टि से दो भागों प्रथम काल (625-690 ई.) तथा द्वितीय काल (690-900 ई.) में बांटा गया है। प्रथम काल में मुख्यतः शैलकत्र्त-विधि से ही वास्तु निर्माण हुआ जबकि द्वितीय काल में उत्कीर्ण पाषाण खण्डों एवं सामान्य निर्माण तकनीक से मंदिरों का निर्माण हुआ। इन दोनों कालों में भी केवल दो-दो प्रमुख शासक हुए। प्रथम काल में एक महेन्द्र वर्मन समूह और दूसरा नरसिंह वर्मन समूह। सी प्रकार द्वितीय काल में एक राजसिंह समूह और दूसरा नंदी वर्मन समूह हुआ।
दक्षिण में पल्लव राजाओं ने सातवीं ई. में कई सुंदर स्मारकों का निर्माण करवाया। महेंद्रवर्मन (600-625 ई. तथा उसका पुत्र नरसिंह वर्मन 625-670 ई., जिसे महामल्ल के नाम से जागा जाता था) महान वास्तु प्रेमी थे। इन पल्लव शासकों ने पत्थरों को तराशकर तीन निर्माण करवाए। महाबलीपुरम् (मामल्लपुरम) में पत्थर काटकर गुफाएं बनाई गई हैं, जिन्हें ‘मंडप’ के नाम से जागा जाता है। इनमें अद्भुत मूर्ति शिल्प के दर्शन होते हैं। इनमें एक आदिवाराह गुफा है। (7वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में निर्मित), जिसमें राजा महेंद्रवर्मन और उसकी दो रानियों की प्रतिमाएं हैं। रानियों का छरहरा रूप देखते ही बनता है। दुग्र गुफा में महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति है। पंचपांडव गुफा में दो उभरी हुई कृतियां हैं एक में कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठा रखा है और दूसरे में उन्हें गाय दूहते दिखाया गया है।
पांच एकाश्मीय मंदिर, जिन्हें ‘रथम’ कहा जाता है, महामल्ल के शासनकाल में बना, गए थे। मण्डपों, गुफाओं तथा शैल फलकों पर रिलीफ मूर्तियों के अतिरिक्त महाबलिपुरम के एक और पक्ष, अर्थात् यहां के एकाश्म मंदिर, एक नए प्रकार की अभिव्यक्ति हैं। पश्चिमी कला समीक्षकों ने इन्हें ‘सैवन पगोडास’ नाम दिया था। इनमें से प्रत्येक एक बड़ी शिला को भीतर-बाहर से काट-तराश कर एक समूचे मंदिर का आकार प्रदान किया गया है। संभवतः इन्हें समकालीन ऐसे ही आकार के काष्ठ निर्मित मंदिरों की तर्ज पर बनाया गया है। ये भवन दक्षिण भारतीय विमान शैली के मंदिरों का प्रारंभिक स्वरूप होने के कारण महत्वपूर्ण हैं। प्रस्तर काटकर मंदिर बनाने की कला के ये आरंभिक नमूने हैं, जिनमें मंदिर के ऊपरी भाग को अलग-अलग शैलियों में उत्कीर्ण किया गया है। धर्मराज रथम सबसे ऊंचा है। इसमें स्वयं महामल्ल की प्रतिमा है। द्रौपदी रथम अत्यंत कलात्मक है। इसकी अभिकल्पना स्पष्टतः किसी फूस वाली कुटिया की अनुकृति है।
पल्लव स्मारकों की तीसरी श्रेणी तीर्थम या खुले में रखी किसी चट्टान पर उकेरकर बनाई गई आकृतियां हैं। सातवीं सदी की पल्लव मूर्तिकला गुप्तकालीन शिल्प से भिन्न है। इनमें छरहरापन है, गतिशीलता है, मुख अंडाकार है और कपोल अस्थियों में अधिक उभार है। डाॅ. कुमार स्वामी का कहना है कि पशुओं के उत्कीर्णन में यह शैली अन्य सब शैलियों से बढ़िया है। एक अन्य प्रसिद्ध तीर्थम अर्जुन का पश्चाताप है, जिसमें वस्तुतः गंगावतरण का दृश्य दिखाया गया है।
आठवीं सदी में राजसिंह (नरसिंह वर्मन द्वितीय) के शासनकाल में निर्माण की शैलकृत प्रविधि को छोड़ दिया गया और उसके स्थान पर पत्थर की चिनाई से मंदिर बना, जागे लगे।
मामल्लपुरम के तट पर बना जलशयन स्वामी का मंदिर तराशे हुए पत्थरों से बनाया गया है, जिसमें उत्कृष्ट शिल्प कौशल का प्रयोग है। उसी के शासनकाल में बना कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर भी बेजोड़ है। 700 ई. में बने इस मंदिर में तीन अलग-अलग हिस्से हैं एक गर्भगृह है, जिसमें पिरामिड के आकार का स्तंभ है, एक मंडल है और एक आयताकार प्रांगण, जिसमें कई देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर बने हुए हैं। इसे आरंभिक द्रविड़ शैली का एक उल्लेखनीय निर्माण माना जा सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि आरंभिक पल्लव मंदिरों मेंद्रविड़ शैली को निश्चित स्वरूप और अनूठापन प्राप्त हुआ।
कांजीवरम (प्राचीन कांचीपुरम) दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध नगरों में से एक है। कांजीवरम पल्लव स्मारकों से भरा पड़ा है, तथा यहां इस शैली के स्थापत्य का प्रारंभ से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक के क्रमबद्ध इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है। कैलाशनाथ यहां का सबसे प्रमुख मंदिर है। कांचीपुरम् के दूसरे प्रमुख बैकुण्ठपेरूमल मंदिर का निर्माण, कैलाशनाथ मंदिर के एक दशक बाद हुआ, एवं इसमें वास्तु संबंधी परिपक्वता अधिक है। पल्लवों की यह प्रायः अंतिम महान उपलब्धि है। यह आकार में कैलाशनाथ मंदिर से बड़ा है। कांचीपुरम के अन्य मंदिरों में एकम्बरेश्वर है, जिसमें विशाल गोपुर, पुष्करिणी तथा स्तंभ युक्त विशाल कक्ष तथा ‘एक सहस्त्र स्तंभ कक्ष है। इसके अतिरिक्त ऐरावतेश्वर, मंतगेश्वर तथा इरवानेश्वर इत्यादि पल्लव कालीन मंदिर हैं। इन सभी की छतें पिरामिडीय एवं मण्डप से घिरे हुए हैं।
इस कला आंदोलन ने यद्यपि अपनी प्रतिभा के बड़े-बड़े स्मारक नहीं छोड़े, फिर भी यह अपने अदम्य उत्साह तथा सक्रिय चेतना के लिए उल्लेखनीय है। कहना न होगा कि दक्षिण भारत में बौद्धों ने ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में अमरावती के रूप में स्थापत्य कला की जो मशाल जलाई उसे सिंह-विष्णु राजाओं ने प्रज्जवलित रखा। बाद में यही मशाल चोलों तथा अन्य परवर्ती राजाओं के हाथों में पहुंचकर और जोर से प्रकाशित हो उठी।
पल्लव शैलकत्र्त वास्तु शैली की मूर्तिकला की अपनी अलग विशेषता है जो आगे चलकर कैलाश मंदिर, एलोरा तथा एलीफैंटा तक विकसित हुई। इसमें एक ममस्पर्शी संवेगात्मक गुण विद्यमान है, जो अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। बांस रिलीफ आकृतियों में उल्लेखनीय संयम तथा परिष्कृत सादगी के दर्शन होते हैं। यहां से यह मूर्तिशिल्प अपने समस्त गुणों के साथ दक्षिण पूर्व एशिया में जावा एवं कम्बोडिया तक पहुंचा। यहां कुछ स्थानीय प्रभावों को छोड़कर इसकी मूल भावना अपरिवर्तित बनी रही।