नई औद्योगिक नीति 1991 की विशेषताओं । नई औद्योगिक नीति की विशेषताएँ क्या है new industrial policy 1991 in hindi

By   January 14, 2021

new industrial policy 1991 in hindi features नई औद्योगिक नीति 1991 की विशेषताओं । नई औद्योगिक नीति की विशेषताएँ क्या है ?

नई औद्योगिक नीति की विशेषताएँ
नई औद्योगिक नीति की अनेक विशेषताएँ हैं जिन पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है। इनमें विशेषकर, नियंत्रणों को समाप्त कर औद्योगिक अर्थव्यवस्था के अधिक से अधिक बाजारीकरण की ओर उठाए गए कदम, अर्थव्यवस्था के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों की ओर औद्योगिक कार्यकलापों का विकेन्द्रीकरण सुनिश्चित करना, सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यकलापों की पुनःपरिभाषा करना और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अनुकूल वातावरण का सृजन करना सम्मिलित है।

निजी क्षेत्र का सुदृढ़ीकरण
औद्योगिक अर्थव्यवस्था के अधिक से अधिक बाजारीकरण की ओर एक महत्त्वपूर्ण कदम बड़ी संख्या में और अनेक प्रकार के उद्योगों के लिए लाइसेन्सिंग प्रणाली को समाप्त करना है। नई औद्योगिक नीति निजी क्षेत्र की अधिक भूमिका की दिशा में देश में विद्यमान व्यवस्था में परिवर्तन करता है।

क) व्यापक क्षेत्र
निजी क्षेत्र में विद्यमान उद्योगों के अलावा नीति में कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिनसे निजी क्षेत्र के कार्य संचालन का क्षेत्र और व्यापक होता है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यसंचालन के क्षेत्रों के सिकुड़ने से निजी क्षेत्र को कार्य संचालन के लिए अधिक क्षेत्र प्राप्त होता है। अनेक कार्यकलाप, जो अभी तक अनन्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के क्षेत्राधिकार में रहे हैं, अब निजी क्षेत्र के लिए खुले छोड़ दिए गए हैं। अब सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सिर्फ छः आरक्षित उद्योग हैं तथा शेष ग्यारह को निजी क्षेत्र के लिए खुला छोड़ दिया गया है।। इसमें विमानों का विनिर्माण, विमान परिवहन, जहाज निर्माण, अलौह धातुओं का प्रसंस्करण, लौह तथा इस्पात, विद्युत का उत्पादन और वितरण, टेलीफोन और टेलीफोन केबुल, तार और बेतार (ॅपतमसमेे) उपकरण, लौह तथा इस्पात के भारी कास्टिंग्स एवं फोर्जिंग्स, लौह तथा इस्पात उत्पादन, खनन तथा भारी विद्युत संयंत्रों में उपयोग के लिए भारी संयंत्र तथा मशीन और विशाल हाइड्रोलिक एवं भाप (ैजमंउ) टर्बाइन। इन पुराने उद्योगों के साथ-साथ, नए उद्योग भी होंगे जो निजी क्षेत्र में स्थापित होंगे। इसके अतिरिक्त, उद्योगों-जिनमें विदेशी निवेश अथवा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अब अनुमति दी गई है की संख्या बढ़ने के कारण निजी। क्षेत्र का विकास होगा। उद्योगों के ऐसे समूहों की संख्या 34 है जिसमें होटल और पर्यटन। उद्योग, सभी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सम्मिलित हैं।

ख) नियंत्रणों की समाप्ति
निजी क्षेत्र और अधिक सबल हो गया है क्योंकि अब यह अपने कार्यसंचालन के मामले में सरकारी प्रतिबंधों से लगभग मुक्त हो गया है। 15 विनिर्दिष्ट समूहों को छोड़कर सभी परियोजनाओं के लिए औद्योगिक क्षमताओं के सृजन अथवा निवेश हेतु औद्योगिक लाइसेन्सिंग (अनुज्ञप्ति) की आवश्यकता समाप्त कर दी गई है। इन क्षेत्रों में सुरक्षा और रणनीतिक संस्थापनाओं से जुड़े उद्योग, सामाजिक उद्देश्यों, खतरनाक रसायन, पर्यावरण से संबंधित मामलों और संभ्रान्त वर्ग के उपयोग की वस्तुओं से जुड़े उद्योग सम्मिलित हैं। लाइसेन्सिंग से छूट विद्यमान इकाइयों के व्यापक विस्तार पर भी लागू है। यहाँ पुनः जब तक संयंत्र और मशीनों में अतिरिक्त निवेश करने की आवश्यकता नहीं है, श्रेणी विस्तारण अथवा किसी भी उत्पाद के उत्पादन पर प्रतिबन्ध नहीं है। परिणामस्वरूप, उद्योगों को सरकार के पास पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें सिर्फ नई परियोजना और व्यापक विस्तार के लिए सूचनाज्ञापन देने की आवश्यकता है। इसी तरह की सुविधाएँ अन्य उद्योगों और यदि विदेशी प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण में मुक्त विदेशी मुद्रा के व्यय की आवश्यकता नहीं है तो संबंधित समझौतों को भी उपलब्ध हैं। देश में 51 प्रतिशत तक इक्विटी हिस्सा के साथ विदेशी निवेशकों के प्रवेश को बिना किसी सीमा के अनुमति प्रदान की गई है। यह सभी व्यावसायिक निर्णय लेने में सरकारी प्रशासनिक निर्देशों की अपेक्षा बाजार से संबंधित मूल्यों और प्रोत्साहनों के उपयोग के समान है। इस प्रकार निजी क्षेत्र का विस्तार तथा क्रियाकलापों का बाजारीकरण हुआ है।

 उद्योगों का प्रसार
नई औद्योगिक नीति की एक अन्य विशेषता, जो कि अर्थव्यवस्था के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, नए उद्योगों की अवस्थिति के बारे में है। इस पहलू के मामले में उपबंध भौगोलिक रूप से औद्योगिक कार्यकलापों का विकेन्द्रीकरण सुनिश्चित करने के लिए है।

इस नीति का जोर उद्योगों को सघन आबादी वाले बड़े नगरों से हटाकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में ले जाना है। उदाहरण के लिए, एक मिलियन से अधिक आबादी वाले नगरों से भिन्न अन्य अवस्थितियों पर उद्योग स्थापित करने के मामले में उद्योगपति को अनिवार्य लाइसेन्सिंग (अनुज्ञप्ति) के अध्यधीन उद्योगों को छोड़कर केन्द्र सरकार से औद्योगिक अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। तथापि, उन नगरों (अर्थात् 1 मिलियन से अधिक जनसंख्या वाले नगर) के संबंध में जिसके लिए औद्योगिक पुनर्योजन की आवश्यकता है, एक लचीली अवस्थिति नीति अपनाई जाएगी। एक मिलियन से अधिक आबादी वाले बड़े नगरों में प्रदूषण रहित उद्योगों जैसे इलैक्ट्रॉनिक्स, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर और मुद्रण को छोड़कर अन्य उद्योगों को 25 कि.मी. की परिधि से बाहर, नामनिर्दिष्ट औद्योगिक क्षेत्रों को छोड़ कर, स्थापित करने की अनुमति होगी। गांवों और पिछड़े प्रदेशों की ओर उद्योगों को आकृष्ट करने के लिए साधन के रूप में प्रोत्साहनों (सस्ती भूमि और ऋण के रूप में) पर भी विचार किया गया।

नई औद्योगिक नीति कृषि क्षेत्रों के नजदीक कृषि आधारित उद्योगों के विस्तार का भी समर्थन करती है। लघु उद्योगों और ग्रामीण उद्योगों के क्षेत्र में छोटे शहरों और गांवों में उनका विकास सुनिश्चित करने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं।

 सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को सीमित करना
अनेक कारणों से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पी एस यू) निवेश की गई पूँजी पर प्रतिलाभ की अत्यन्त कम दर, उत्पादकता में अपर्याप्त वृद्धि, खराब प्रबन्धन इत्यादि की समस्याओं से ग्रस्त रहते हैं। इसके मद्देनजर नई औद्योगिक नीति में, अर्थव्यवस्था में उनके स्थान पर पुनर्विचार करने की बात कही गई है। एक व्यापक रूपरेखा का भी आभास दिया गया है जिसके अन्तर्गत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को कार्यसंचालन करना है।

क) अनुपयुक्त क्षेत्र
इस नीति में उन क्षेत्रों की ओर इंगित किया गया है जो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए उपयुक्त नहीं हैं और इसलिए उन्हें इन क्षेत्रों से निकल जाना चाहिए। उनमें से एक उन रुग्ण औद्योगिक इकाइयों का समूह है जिन्हें सार्वजनिक क्षेत्र ने अधिग्रहण किया था और जो सार्वजनिक क्षेत्र के केन्द्रीय उपक्रमों के कुल घाटे की लगभग एक तिहाई के लिए जिम्मेदार है। सार्वजनिक उपक्रमों का एक अन्य समूह ऐसा है जिसकी संख्या बहुत अधिक है और जो उपभोक्ता वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में लगे हुए हैं। ये सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की मूल अवधारणा में फिट नहीं होते हैं, जिन्हें अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय स्थिति में होना चाहिए। इसके अलावा नीति साथ ही सार्वजनिक निवेश पोर्टफोलियो की अधिक वास्तविक समीक्षा का वचन देती है। यह उल्लेख किया गया है कि यह समीक्षा साधारण प्रौद्योगिकी पर आधारित उद्योगों, लघु क्षेत्र और गैर-महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों, अकुशल और अनुत्पादक क्षेत्रों जिनमें निजी क्षेत्र ने पर्याप्त विशेषज्ञता तथा संसाधन जुटा ली है, के मामले में होगी।

ख) उपयुक्त क्षेत्र
इसके साथ ही, इस नीति में भविष्य में सार्वजनिक क्षेत्र के विकास के लिए कतिपय प्राथमिक क्षेत्रों की भी पहचान की गई है। इन क्षेत्रों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं; अनिवार्य आधारभूत संरचना वस्तुएँ तथा सेवाएँ, तेल और खनिज संसाधनों की खोज और दोहन, अर्थव्यवस्था के दीर्घकालीन विकास के लिए महत्त्वपूर्ण और जहाँ निजी क्षेत्र का निवेश अपर्याप्त है उन क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी विकास और विनिर्माण क्षमताओं का निर्माण और रणनीतिक महत्त्व के क्षेत्रों, जैसे रक्षा उपकरण, में उत्पादों का विनिर्माण।

इसे देखते हुए, इस नीति ने छः उद्योगों को सूचीबद्ध किया है जिन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित किया जाना है। ये हैं: रक्षा उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, कोयला और लिग्नाइट, खनिज तेल, रेल परिवहन और परमाणु ऊर्जा से संबंधित खनिज। यद्यपि कि ये क्षेत्र आरक्षित हैं परंतु इस नीति में यह भी कहा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्रों पर इसके लिए विशेषरूप से आरक्षित नहीं किए गए क्षेत्रों में प्रवेश पर प्रतिबन्ध नहीं होगा।

ग) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कार्य कुशलता में सुधार
औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए जो सबसे बड़ी चिन्ता प्रकट की गई वह उनका खराब कार्य निष्पादन और कुशलता का निम्न स्तर रहा है। तद्नुरूप, इसमें इन उपक्रमों को अधिक विकासोन्मुखी तथा तकनीकी रूप से गतिशील बनाने के लिए उपायों पर बल दिया गया है। ऐसी इकाइयाँ जो इस समय तो लड़खड़ा रही हैं किंतु संभवतया लाभप्रद हैं का अवश्य ही पुनर्गठन करना चाहिए तथा उन्हें नया जीवन प्रदान करना चाहिए। इस बात पर भी बल दिया गया कि सरकार आरक्षित क्षेत्रों अथवा उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में कार्य संचालन कर रहे सार्वजनिक उपक्रमों अथवा अत्यधिक या पर्याप्त मुनाफा कमा रहे। सार्वजनिक उपक्रमों को सुदृढ़ करेगी। यह प्रावधान किया गया कि समझौता ज्ञापन की पद्धति के माध्यम से ऐसे उपक्रमों को ज्यादा से ज्यादा प्रबन्धन स्वायत्तता दी जाएगी जिसमें उपक्रमों और सरकार के अधिकारों तथा दायित्वों को विनिर्दिष्ट किया गया है। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि यह भी परिकल्पना की गई कि इन कार्यकलापों में निजी क्षेत्र को भी भाग लेने की अनुमति प्रदान करके इन क्षेत्रों में भी प्रतिस्पर्धा शुरू की जाएगी। चयनित उपक्रमों के मामले में, इक्विटी में सरकार के हिस्से के अंश का विनिवेश किया जाएगा जिससे सार्वजनिक उपक्रमों के कार्यनिष्पादन में और अधिक बाजार अनुशासन लाया जा सके।

घ) एम आर टी पी अधिनियम का विस्तार
अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, नई नीति में एम आर टी पी अधिनियम का क्षेत्राधिकर बढ़ा दिया गया और इसके दायरे में सार्वजनिक उपक्रमों को भी ले आया गया। यह एकाधिकारवादी, प्रतिबन्धात्मक और अनुचित व्यापार व्यवहारों के मामले में जनहित में बाधक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कार्यकरण के विरुद्ध कानूनी सुरक्षात्मक उपाय होगा।

 विदेशी निवेश का उदारीकरण
नई नीति में निवेश, व्यापार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विदेशी उद्यमियों के महत्त्वपूर्ण योगदान की आशा की गई है। इसके लिए, देश के औद्योगिक क्षेत्र में उनके सुगम प्रवेश के लिए उदार प्रावधान किए गए हैं।
प्रत्यक्ष/इक्विटी निवेश के रूप में विदेशी निवेशकों के प्रवेश को परियोजना में कुल निवेश के 51 प्रतिशत (जो पहले 40 प्रतिशत था) की अनुमति दे दी गई है। इस बहुमत स्वामित्व से विदेशी उन उपक्रमों जिसमें वे निवेश करते हैं के कार्यकरण पर नियंत्रण कर सकेंगे। जिन क्षेत्रों में इन निवेशों को आकृष्ट करना है वे उच्च प्राथमिकता वाले उद्योग हैं जिसमें अत्यधिक संसाधनों एवं उच्च प्रौद्योगिकी की आवश्यकता पड़ती है। इन परियोजनाओं के मामले में विदेशियों और भारतीयों के बीच समझौतों को सरकार से स्वतः स्वीकृति मिल जाएगी। इन उद्योगों में अभी तक विदेशी निवेशकों को प्रवेश (सिर्फ 40 प्रतिशत इक्विटी हिस्सेदारी तक) की अनुमति दी गई थी किंतु यह प्रत्येक मामले के गुण-दोष के आधार पर था और यह भी सरकार के विवेकाधीन था। अब प्रवेश में कोई बाधा नहीं है। यह विदेशी निवेश के संबंध में भारत की नीति को पारदर्शी बनाएगा तथा यह आशा की गई कि इस तरह का ढाँचा कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए आकर्षित करेगा।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अलावा, नई नीति में भारत से निर्यात के क्षेत्र में विदेशी ट्रेडिंग (व्यापारिक) कंपनियों से सहायता प्राप्त करने का लक्ष्य भी है। इस नीति में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय उत्पादों के निर्यात के संवर्धन के लिए विश्व बाजारों के व्यवस्थित ढंग से खोज की आवश्यकता है जो सिर्फ गहन और अत्यधिक पेशेवर विपणन कार्यकलापों के माध्यम से ही संभव है। इस नीति में आगे कहा गया है कि उस सीमा तक जब तक भारत में इस प्रकार की विशेषज्ञता का अच्छी तरह से विकास नहीं कर लिया जाता है, सरकार हमारे निर्यात कार्यकलापों में हमारी सहायता करने के लिए विदेशी ट्रेडिंग कंपनियों को प्रोत्साहित करेगी। विश्व बाजार में अपनी पहुँच बनाने के लिए तथा विदेशी निवेश और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को आकृष्ट करने के लिए सरकार एक विशेष बोर्ड का गठन करेगी जो विश्व की सबसे बड़ी विनिर्माण तथा विपणन कंपनियों से बातचीत करेंगी। जिन उद्योगों में विदेशी निवेश और विदेशी प्रौद्योगिकी की स्वतः स्वीकृति की अनुमति दी गई है वे भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण उद्योग हैं। ये उद्योग इस प्रकार हैं: धातुकर्म उद्योग, बॉयलर्स एण्ड स्टीम जेनरेटिंग संयंत्र; विद्युत उपकरण; दूर संचार उपकरण; परिवहन; औद्योगिक मशीनें; कृषि संबंधी मशीनें; औद्योगिक उपकरण और रसायन; अन्य उर्वरक। ये उद्योग मुख्य रूप से पूँजीगत वस्तुओं और बुनियादी सामग्रियों का उत्पादन करने वाले हैं, जो अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षमता को सुदृढ़ करने और नई तथा अत्याधुनिक उत्पादों को लाने में संगत हैं। इनके लिए अत्यधिक निवेश और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता पड़ती है।

 विदेशी प्रौद्योगिकी
नई औद्योगिक नीति में विदेशी प्रौद्योगिकी के प्रवेश को भी सरल बना दिया गया है। इसके अंतर्गत प्रावधान है जो उच्च प्राथमिकता उद्योगों से संबंधित प्रौद्योगिकी समझौता के लिए स्वतः स्वीकृति की अनुमति प्रदान करता है। अन्य उद्योगों के लिए भी इसी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध होंगी यदि इस तरह के समझौतों में मुक्त विदेशी मुद्रा के व्यय की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसके अलावा इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि विदेशी तकनीशियनों की सेवा भाड़े पर लेने और देश में ही विकसित प्रौद्योगिकियों के विदेश में परीक्षण के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी। यह आशा की गई कि सरकार के बिना किसी हस्तक्षेप के भारतीय व्यवसाय निरंतर आधार पर विदेशी प्रौद्योगिकी के आपूर्तिकर्ताओं (और विदेशी निवेशकर्ता भी) के साथ संबंध विकसित करेगा और अपने निर्णय वाणिज्यिक चिन्तन के आधार पर करेगा। यह भी आशा की गई कि भारतीय व्यवस्था अनुसंधान और विकास पर अधिक निधियाँ खर्च करके विदेशी प्रौद्योगिकी को आत्मसात् करने के लिए आवश्यक प्रयास करेगा।

 एकाधिकार पर नियंत्रण लगाना
एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापार व्यवहार (एम आर टी पी) अधिनियम जो जून 1970 से प्रवृत्त है में निहित एकाधिकारों के कार्यकरण संबंधी प्रतिबन्धों को समाप्त कर दिया गया है। इसके बदले में अब अवांछित एकाधिकारवादी कार्यकलापों पर नियंत्रण करने पर जोर है।

क) परिसम्पत्ति सीमा को समाप्त करना
उन कंपनियों जिनकी परिसम्पत्तियाँ 100 करोड़ अथवा इससे अधिक थी को अपने अनेक कार्यकलापों के मामले में सरकार से पूर्वानुमति लेने की आवश्कता पड़ती थी। ये कार्यकलाप विद्यमान फर्मों के विस्तार, नए उपक्रमों की स्थापना, विलय, समामेलन और अधिग्रहण से संबंधित थे। उन्हें इन कंपनियों के कतिपय निदेशकों की नियुक्ति के लिए भी सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। इन कंपनियों के शेयरों के अभिग्रहण और हस्तांतरण के मामले में भी प्रतिबंध विद्यमान थे। नई औद्योगिक नीति ने परिसम्पत्ति सीमा की अवधारणा को ही खत्म कर दिया है। इसने विस्तार, नए उपक्रमों इत्यादि से संबंधित कार्यकलापों के मामले में केन्द्र सरकार की पूर्वानुमति की आवश्यकता को समाप्त कर दिया है। इस परिवर्तन से सिर्फ प्रक्रिया संबंधी विलम्ब समाप्त हो गया है क्योंकि विगत में एम आर टी पी कंपनियों को नई परियोजना स्थापित करने अथवा विद्यमान कंपनी के विस्तार इत्यादि के लिए शायद ही कभी मना किया गया हो। इस प्रकार यह परिवर्तन वास्तविकता की पुष्टि करता है। किंतु ऐसा करते हुए, कंपनियों को अधिक समय लेने वाली प्रक्रियाओं, जिसमें अपने प्रस्तावों के लिए अनुमति माँगने तथा लेने के लिए काफी खर्च भी करना पड़ता था, से छुटकारा मिल गया है।

ख) समाज-विरोधी कार्यकलापों पर रोक
अब एकाधिकारों की ओर से एकाधिकारवादी, अवरोधक और अनुचित व्यापार व्यवहारों के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने पर बल दिया गया है। इन प्रमुख उपक्रमों अथवा एकाधिकारों के रूप में उनकी पहचान की गई है जिनका बाजार के 25 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पर नियंत्रण है। वस्तुतः, इस दृष्टि से नई औद्योगिक नीति ने एम आर टी पी अधिनियम के उपबंधों और एकाधिकार आयोग के माध्यम से उनके कार्यान्वयन को और अधिक व्यापक तथा सुदृढ़ बना दिया है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम जो अभी तक इस अधिनियम की सीमा से बाहर थे, अब इस कानून की परिधि में लाए गए हैं। शेयरों को भी ‘‘व्यापारिक वस्तुओं‘‘ की परिभाषा में सम्मिलित किया गया है। इसके अलावा ‘‘चिट फंड‘‘ और अचल सम्पत्ति (भूमि भवन) के कारोबार को भी सेवा की परिभाषा में शामिल किया गया है। इस तरह से इन क्षेत्रों में कदाचारों के हल करने का नियमित अदालतों के अलावा अन्य साधन भी उपलब्ध होगा। नई नीति में एम आर टी पी आयोग को और अधिक सुदृढ़ बनाने का प्रावधान किया गया है ताकि यह स्वयं अथवा औद्योगिक उपभोक्ता अथवा अन्य प्रकार के उपभोक्ताओं से प्राप्त शिकायतों पर कदाचारों की जांच अधिक प्रभावशाली तरीके से कर सके।

लघु क्षेत्र के उद्योगों का संवर्धन
लघु क्षेत्र के उद्योगों के लिए 6 अगस्त, 1991 को घोषित नई औद्योगिक नीति में लघु उद्योगों को सुदृढ़ और लाभप्रद इकाई बनाने के लिए पुरानी नीति में कई परिवर्तनों पर विचार किया गया।

इस संबंध में लघु क्षेत्र के घटकों के बारे में जानना उपयोगी होगा। ये भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं किंतु ये एक साथ एक शीर्ष ‘‘लघु क्षेत्र के उद्योग‘‘ के अन्तर्गत रखे गए हैं। कभी कभी इन्हें लघु क्षेत्र, खादी और ग्रामोद्योगों के अन्तर्गत रखा जाता है। इस क्षेत्र के घटक इस प्रकार हैंः लघु औद्योगिक इकाइयाँ (संयंत्र और मशीनों में 60 लाख रु. के निवेश तक), अनुषंगी इकाइयाँ (संयंत्र और मशीनों में 75 लाख रु. के निवेश तक); अत्यन्त लघु औद्योगिक इकाइयाँ (संयंत्र और मशीनों में 5 लाख रु. के निवेश तक); हथकरघा; हस्त शिल्प, खादी और ग्रामोद्योग।

इस नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता लघु उद्योग क्षेत्र को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए चार-सूत्री योजना है। सर्वप्रथम, यह इन उद्योगों को उनकी संपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मानक (छवतउंजपअम) आधार पर अर्थात् , उनकी आवश्यकताओं की दृष्टि से, ऋण के पर्याप्त प्रवाह की आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। यह सस्ता ऋण उपलब्ध कराने पर ध्यान केन्द्रित करने की पुरानी नीति से हटने का सूचक था। औद्योगिक इकाइयों को ऋण आवश्यकताएँ उपलब्ध कराने के साथ, इस प्रावधान में बड़े समूहों में चयनित उद्योगों की पहचान करना भी सम्मिलित है जिन्हें भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) द्वारा वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

दूसरा, नई औद्योगिक नीति लघु उद्योग क्षेत्र में अन्य अथवा गैर लघु उद्योग क्षेत्र (दवद.ैैप्) द्वारा कुल शेयर धारिता में 24 प्रतिशत तक की इक्विटी भागीदारी की अनुमति प्रदान करता है। यह लघु उद्योगों को पूँजी बाजार में प्रवेश योग्य बनाने और उनके आधुनिकीकरण एवं तकनीकी उन्नयन, उन्हें अनुषंगी बनाने (अर्थात् गैर लघु उद्योग फर्मों के लिए उत्पादन करने) और उप ठेका (अर्थात् , मुख्य ठेकेदार से ठेका आधार पर किसी कार्य के अंश को लेना) के लिए किया जा रहा है।

तीसरा, सीमित साझेदारी को अनुमति प्रदान करना है जिससे नए और असक्रिय साझेदार/उद्यमी का वित्तीय दायित्व निवेश की गई पूँजी की सीमा तक ही सीमित होगा। इससे लघु उद्योग क्षेत्र को जोखिम पूँजी की आपूर्ति बढ़ेगी।

चैथा, लघु उद्योग क्षेत्र के उत्पादों की बिक्री के बाद शीघ्र भुगतान सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान किए गए हैं। इस तरह के एक प्रावधान जिसे फैक्टरिंग सेवाएँ (अढ़तिया अथवा लेनदारी लेखा क्रय सेवाएँ) कहा जाता है जिसमें सिडबी और/अथवा वाणिज्यिक बैंकों द्वारा संचालित एजेन्सियों द्वारा लघु उद्योगों को इन एजेन्सियों द्वारा खरीदारों से वसूली से पहले ही भुगतान की व्यवस्था है। यह, बहुत हद तक, बड़ी इकाइयों द्वारा लघु क्षेत्र को विलम्ब से भुगतान की समस्या का हल कर देगा।

नई नीति लघु उद्योगों के लिए कच्चे मालों की आपूर्ति और विपणन सुविधाओं का भी प्रावधान करता है। जहाँ तक देश में ही उपलब्ध कच्चे मालों का संबंध है सरकार इन कच्चे मालों का आबंटन करते समय लघु उद्योगों को प्राथमिकता देगी। यह भी सुनिश्चित किया जाना है कि देश में ही उपलब्ध तथा आयातित कच्चे मालों में लघु क्षेत्र को पर्याप्त और उचित हिस्सा मिले। तथापि, यह देखा जाएगा कि ऐसा करने में लघु क्षेत्र में नई इकाइयों के प्रवेश पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े । विपणन के लिए, इस नीति में सहकारी क्षेत्रों, सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं और अन्य पेशेवर एजेन्सियों द्वारा उनके उत्पादों के बाजार संवर्धन की बात कही गई है।

 हथकरघा, हस्तशिल्प, खादी और ग्रामोद्योग के लिए विशेष उपाय
पहली बार लघु उद्योगों के इन क्षेत्रों के लिए विशेष उपाय किए गए हैं। एक पैकेज के रूप में इसमें अनेक योजनाएँ और सुविधाएँ सम्मिलित हैं। उदाहरण स्वरूप, हथकरघा क्षेत्र के लिए विद्यमान योजनाओं में निम्नलिखित तीन प्रमुख शीर्षों के अन्तर्गत संशोधन करने का प्रस्ताव है: परियोजना पैकेज स्कीम, जिसके अंतर्गत प्रौद्योगिकी और विपणन सुविधा में सुधार के लिए क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, कल्याण पैकेज स्कीम, जिसके अंतर्गत कल्याण स्कीमों की संख्या बढ़ाई जाएगी और उनके लिए निर्धारित निधियों में भारी वृद्धि की जाएगी; बेहतर प्रबन्धन व्यवस्था देने के लिए शेयर पूँजी में भागीदारी के लिए स्कीम की रूपरेखा फिर से तैयार की जाएगी।

इसी तरह से ‘‘हस्त शिल्प क्षेत्र‘‘ के लिए इस नीति में निम्नलिखित सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए क्राफ्ट डेवलपमेंट सेण्टरों की स्थापना की बात कही गई है: कच्चे मालों की आपूर्ति, डिजायन और तकनीकी मार्गदर्शन, विपणन समर्थन, प्रशिक्षण और समेकित तथा क्षेत्र आधारित तरीके से संबंधित आदानों की खरीद। नए विपणन चैनलों जैसे ट्रेडिंग कंपनियों, डिपार्टमेण्टल स्टोरों इत्यादि के माध्यम से हस्त शिल्पों का निर्यात बढ़ाने के लिए भी उपाय प्रस्तावित हैं। खादी और ग्रामोद्योगों के मामले में, इस नीति में अनुसंधान और विकास से संबंधित कार्यकलापों और वित्तीय संस्थाओं से ऋण के बेहतर प्रवाह को प्रोत्साहित करने के उपाय करने का वायदा किया गया। इन सभी कार्यकलापों को बढ़ावा देने में इस नीति में मात्र छूट और राज सहायता (सब्सिडी) की अपेक्षा उपभोक्ताओं की पसंद के अनुरूप गुणवत्ता और उत्पादों के विपणन पर अधिक जोर दिया गया है।

बोध प्रश्न 2
1) सही उत्तर पर ( ) निशान लगाइए:
क) नई औद्योगिक नीति में विदेशी निवेशक को इक्विटी-हिस्सेदारी की अनुमति दी गई है।
प) 51 प्रतिशत तक
पप) 40 प्रतिशत तक
पपप) 31 प्रतिशत तक
ख) नई औद्योगिक लाइसेन्सिंग (अनुज्ञप्ति) निम्नलिखित में से किसे छोड़कर सभी परियोजनाओं के लिए समाप्त कर दी गई है?
प) 25 विनिर्दिष्ट समूहों
पप) 15 विनिर्दिष्ट समूहों
पपप) 5 विनिर्दिष्ट समूहों

2) नई औद्योगिक नीति ने 1970 के एम आर टी पी अधिनियम के प्रावधानों को आपके विचार से कैसे व्यापक और सुदृढ़ बनाया है?

3) बताएँ, निम्नलिखित कथन सही हैं अथवा गलत:
क) नई औद्योगिक नीति ने निजी क्षेत्र के सुदृढ़ीकरण और उद्योगों के प्रसार पर बल दिया।
ख) सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका को उद्योग के केवल कुछ अनिवार्य क्षेत्रों तक ही सीमित
कर दिया गया है।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) (क) प (ख) पप
2) उपभाग 9.3.5 देखिए।
3) (क) सही (ख) सही