आवश्यकता की परिभाषा क्या है | आवश्यकता किसे कहते है need definition in hindi प्रकार सिद्धांत

By   November 22, 2020

need definition in hindi आवश्यकता की परिभाषा क्या है | आवश्यकता किसे कहते है प्रकार सिद्धांत ?

आवश्यकताओं का सिद्धांत
आदिम संस्कृति का विश्लेषण करने के लिए अवधारणाओं की खोज के दौरान मलिनॉस्की ने सामाजिक तथ्यों को समझने हेतु विशिष्ट दृष्टिकोण विकसित कर लिया। यह दृष्टिकोण आवश्यकताओं के सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। मलिनॉस्की ने अपनी पुस्तक ए सांइटिफिक थ्योरी ऑफ कल्चर में इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया। उसके अनुसार हमारी आवश्यकताएं दो प्रकार की हैः व्यक्तिगत और सामाजिक । मलिनॉस्की (1944ः 90) ने “आवश्यकता‘‘ शब्द की परिभाषा इस प्रकार कीः

परिभाषा :  आवश्यकता से मेरा अभिप्राय मानव शरीर रचना तथा सांस्कृतिक परिवेश की दशाओं की व्यवस्था से है। प्राकृतिक पर्यावरण के संदर्भ में, किसी भी समूह तथा शरीर रचना के अस्तित्व के लिए इनका होना एक साथ पर्याप्त तथा आवश्यक है। इस प्रकार आवश्यक तथ्यों का एक सीमित दायरा है। आदतें और उनके कारण सीखी हुई प्रतिक्रयाएं एवं संगठनों के आधार ऐसे व्यवस्थित होने चाहिए कि मूल आवश्यकताएँ पूरी हो सकें। इस परिभाषा के पहले भाग में मानव शरीर की दशाओं की व्यवस्था की चर्चा है। इसका संबंध जैविक आवेगों से है, जिनकी संतुष्टि आवश्यक होती है।

 जैविक आवेग
मलिनॉस्की (1944ः 77) ने सभी संस्कृतियों में विद्यमान “स्थायी महत्वूपर्ण क्रियाओं के क्रम‘‘ की एक तालिका प्रस्तुत की। ये क्रियाएं व्यक्ति के आवेगों की पूर्ति के संबंध में हैं । तालिका इस प्रकार है।

तालिका 22.1ः स्थायी महत्त्वपूर्ण क्रियाओं के क्रम संख्या
संख्या (क) आवेग (ख) कार्य (ग) पूति
1. श्वास क्रिया ऑक्सीजन की प्राप्ति उत्तकों में मौजूद
कार्बन डाइऑक्साइड
की समाप्ति
2. भूख भोजन की प्राप्ति परितृप्ति
3. प्यास तरल पदार्थ की प्राप्ति प्यास बुझाना
4. काम-इच्छा संभोग कामतृप्ति
5. थकान आराम मांसपेशियों तथा स्नायु
की ऊर्जा की पुनप्र्राप्ति
6. बेचैनी क्रियाशीलता थकान मिटना
7. निद्रा आना सोना नई ऊर्जा लेकर जागना
8. पेशाब का दबाव निकासी तनाव मुक्ति
9. शौच का दबाव मलत्याग पेट का हल्का होना
10. भय खतरों से बचाव विश्राम
11. पीड़ा प्रभावकारी क्रिया द्वारा बचाव सामान्य स्थिति को लौटना
यह तालिका केवल व्यक्ति को आवेगों के शमन के संबंध में है। आइए, अब देखें कि मलिनॉस्की ने आवश्यकताओं के कितने प्रकार बताए।

आवश्यकताओं के प्रकार
मलिनॉस्की (1944ः91) ने वैयक्तिक आवेग की अवधारणा के साथ वैयक्तिक तथा सामूहिक अस्तित्व की अवधारणा को भी जोड़ दिया। उसने आवश्यकताओं के प्रकारों का एक नमूना विकसित किया। इसमें तीन प्रकार की आवश्यकताएँ हैं। ये हैंः मूल (basic), व्युत्पन्न (derived), तथा समाकलनकारी (integrative) आवश्यकताएं। तीनों प्रकार की आवश्यकताओं के बारे में निम्नलिखित संक्षिप्त चर्चा से आपको मलिनॉस्की के आवश्यकता के सिद्धांतों का पर्याप्त ज्ञान हो जाएगा।

प) मूल आवश्यकताएं : वे परिस्थितियां हैं, जो व्यक्ति तथा समूह के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। मूल आवश्यकताओं की सूची इस प्रकार है।
तालिका 22.2ः मूल आवश्यकताएं एवं उनकी सांस्कृतिक प्रतिक्रियाएं
मूल आवश्यकताएं सांस्कृतिक प्रतिक्रिया
चयापचय (metabolism) भोजन की आपूर्ति
प्रजनन नातेदारी
शारीरिक सुख आश्रय
सुरक्षा संरक्षण
गतिशीलता प्रशिक्षण
स्वास्थ्य स्वच्छता

मूल आवश्यकताओं की तालिका में संस्कृति का मूल्य जैविक अस्तित्व के लिए है। इसे पहले स्तर का निर्धारक तत्व (primary determinisn) भी कहा जा सकता है।

पप) व्युत्पन्न (derived) आवश्यकताएं
सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य के जीवन की कुछ गौण आवश्यकताएं भी होती है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संस्कृति कुछ अपनी जरूरते पैदा कर लेती है। मलिनॉस्की (1944ः 125) के अनुसार, ये व्युत्पन्न आवश्यकताएं अथवा आदेश है। इनका ब्यौरा इस प्रकार हैः
तालिका 22.3ः व्युत्पन्न आवश्यकताएं एवं उनकी प्रतिक्रियाएं
आवश्यकताएं प्रतिक्रिया
क) सांस्कृतिक उपकरणों के अनुरक्षण
(maintenance) की आवश्यकताएं अर्थव्यवस्था
ख) मानव आचरण का नियमन सामाजिक नियंत्रण
ग) समाजीकरण शिक्षा
घ) सत्ता का प्रयोग राजनीतिक संगठन

किन्तु इन व्युत्पन्न आवश्यकताओं अथवा आदेशों की परिधि में मनुष्यों में विकसित सभी आदेश शामिल नहीं हैं। जानवरों के बच्चों को भी इनमें से कई नियम सिखाए जा सकते हैं। परंतु मनुष्यों के सिवाए और किसी में भी इन नियमों को अपने बच्चों में प्रेषण करने की क्षमता नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बंदर अपने बच्चों को नियमानुसार व्यवहार करना सिखा सकते हैं और इस अर्थ में उनके पास भी कुछ नियम हैं। किंतु किसी चिम्पांजी-माँ के बारे में यह कल्पना करना कठिन है कि वह किसी अन्य माँ-संतति के व्यवहार का प्रेषण करके यह निष्कर्ष निकाले कि उस अन्य माँ-संतान के बीच कोई नियम नहीं है या उनका प्रशिक्षण ठीक नहीं है। ऐसा तभी संभव होता है, जब आदतें प्रथाओं के रूप ले लेती हैं। यह केवल मानवीय समाज में ही पाया जाता है।

पपप) समाकलनकारी (integrative) आवश्यकताएं
मलिनॉरकी (1944ः 125) के अनुसार, मनुष्य के सामजिक जीवन में समाकलनकारी आदेशों का महत्वपूर्ण स्थान है। इन समाकलनकारी आदेशों के माध्यम से आदतें प्रथा में, बच्चों का पालन अगली पीढ़ी के प्रशिक्षण में और आवेग मूल्यों में बदलते हैं। मलिनॉस्की के मुताबिक परम्परा, मूल्य, प्रतिमान, धर्म, कला, भाषा तथा प्रतीकवाद के अन्य रूप समाकलनकारी आदेशों की श्रेणी में ही आते हैं। इस प्रकार मलिनॉस्की मानता था कि मानव संस्कृति का मूल सार प्रतीकवाद में अथवा मूल्यों में निहित है।

इससे पता चलता है कि मलिनॉस्की का आवश्यकता का सिद्धांत गतिविधियों के जैविक आधारों को मान्यता देता है। अतः विश्व के विभिन्न भागों के सांस्कृतिक आचरणों की तुलना के लिए इसे इस्तेमाल किया जा सकता है। वह सामाजिक ढांचे को मनुष्य की मूल, व्युत्पन्न तथा समाकलनकारी आवश्यकताओं की पूर्ति का एक साधन मानता है। इस सैद्धांतिक दृष्टिकोण के बल पर ही मलिनॉस्की उच्च कोटि के क्षेत्रीय शोधकार्य से सामग्री एकत्र कर पाया। मलिनॉस्की के अध्ययन दि सेक्सुअल लाइफ ऑफ सेवेजेस इन एन.डब्ल्यू. मलनेसिया तथा उनकी शिष्या ऑड्रे रिचर्ड्स के अध्ययन हंगर एंड वर्क इन ए सेवेज ट्राइब से अच्छी तरह पता चलता है कि विभिन्न संस्कृतियां जैविक आवेगों की न केवल पूर्ति करती हैं, बल्कि उनका नियमन तथा संचयन भी करती हैं।

राल्फ पिडिंगटन (1957ः 49) ने आवश्यकताओं के सिद्धांत को मनोवैज्ञानिकों तथा समाजशास्त्रियों के बीच संभावित सहयोग का माध्यम बताया। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि मलिनॉस्की का आवश्यकताओं का सिद्धांत मानव आचरण के जैविक एवं सांस्कृतिक उपादानों के संबंध में एक सामान्य अवधारणा है। अवधारणाएँ विकसित करने की उसकी आकांक्षा बराबर बनी रही। यद्यपि उसकी अवधारणाएं अनुमानपरक नहीं थीं, लेकिन वे इतनी ठस भी नहीं थीं कि उनके आधार पर सामान्यीकरण करना कठिन हो। हमने पाया कि अवधारणाएं विकसित करने की प्रक्रिया में समाजों की व्याख्या संतुलित सांस्कृतिक समग्रता के रूप में करने के स्थान पर बाद में वह संस्थाओं के अध्ययन पर बल देने लगा। मलिनॉस्की एक संस्था को संस्कृति का अवयव या अंग मानता था। उसने समाज की विभिन्न संस्थाओं के बीच संबंधों की तलाश करनी शुरू कर दी थी। इससे वह धार्मिक अथवा राजनीतिक संस्थाओं को आर्थिक अथवा प्रौद्योगिकीय संस्थाओं से जोड़कर देखने में सफल हुआ। वह संस्थाओं को एक-दूसरे से पृथक मानता था क्योंकि उनका संगठन अलग-अलग प्रकार्य को लेकर हुआ था। प्रकार्य शब्द से उसका क्या अभिप्राय था? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए आइए हम भाग 22.6 का अध्ययन करें, परंतु पहले बोध प्रश्न 2 को पूरा करें।

बोध प्रश्न 2
प) मूल आवश्यकताओं तथा व्युत्पन्न आवश्यकताओं के अंतर को तीन पंक्तियों में स्पष्ट कीजिए।
पपप) क्या मलिनॉस्की अपने आवश्यकताओं के सिद्धांत में धर्म तथा कला को स्थान दे पाया है? यदि हां तो यह बताइए कि उसने प्रतीकवाद को मानव संस्कृति का मूल सार कैसे माना? अपना उत्तर तीन पंक्तियों में दीजिए।

 बोध प्रश्नों के उत्तर

बोध प्रश्न 2
प) मूल आवश्यकताओं से अभिप्राय उन स्थितियों से है, जो व्यक्ति और समूह दोनों के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं। दूसरी ओर, व्युत्पन्न आवश्यकताएं वे हैं, जिन्हें संस्कृति मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पैदा करती है।
पप) आदेशात्मक आवश्यकताओं के मलिनॉस्की के विचार से मालूम होता है कि वह धर्म तथा कला को आवश्यकताओं की परिधि में मानता था। धर्म तथा कला एक ओर प्रतीकवाद (symbolism) का अंग हैं और दूसरी ओर प्रतीकात्मक मूल्यों पर आधारित सामाजिक जीवन को समाकलित या आदेशात्मक आवश्यकताओं के संदर्भ में समझा जा सकता है। उसका कहना था कि जब कोई आदत प्रथा बन जाती है और सीखा हआ व्यवहार मूल्य का रूप ग्रहण कर लेता है तो वह आदेशात्मक आवश्यकता का रूप ले लेता है।

 मलिनॉस्की द्वारा विकसित प्रकार्य की अवधारणा
आपको यह स्पष्ट हो चुका है कि संस्कृति का विचार मलिनॉस्की के अवधारणा-तंत्र का केन्द्र बिन्दु रहा। इसे उसने मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन माना। आवश्यकताओं के संदर्भ में संस्कृति के प्रकार्यों की व्याख्या के फलस्वरूप मलिनॉस्की को ट्रोब्रिएण्ड द्वीप समूह में एकत्र किए गए नृजाति विवरण का सुनियोजित ढंग से संकलन एवं विश्लेषण करने में सहायता मिली (उदाहरण के लिए कोष्ठक 22.5 देखिए)।

कोष्ठक 22.5ः बलोमा पर मलिनॉस्की का निबंध
यह मलिनॉसकी के निबंध बलोमाः दि स्पिरिट ऑफ दि डैड इन दि ट्रोब्रिएण्ड आइलैंड्स (1948ः 191-3) का एक उद्धरण है। मलिनॉस्की ओमरकाना तथा पड़ोसी गांव किरीवीना (ट्रोबिएण्ड द्वीप समूह) में दस महीने रहा। वह एक टेंट में स्थानीय लोगों के बीच में रहा और उनके साथ किरीवीनियाई भाषा में ही बात करता था। इस उद्धरण में किरीवीनिया के लोगों के जीवन में जादू की भूमिका का पता चलता है। यहाँ मलिनॉस्की ट्रोब्रिएण्डवासियों को हमारे सामने किस खूबी से रखता है, यह देखते ही बनता है। वह लिखता है कि ट्रोब्रिएण्ड द्वीपवासियों में जादू-टोना बहुत प्रचलित है। उनके साथ वहां रहते हुए, मैने अकसर उन्हें अचानक ही जादू-टोना करते देखा। यदि पहले से मालूम होता तो मैं स्वयं ही वहां मौजूद होता था। ओमरकाना के ओझा, बगीदो, की झोंपड़ी मेरे तम्बू से लगभग पचास मीटर पर थी। मुझे याद है कि ओमरकाना आने के कुछ दिन बाद ही मैंने किसी के मंत्र पढ़ने की आवाज सुनी। उस समय मुझे खेती-बाड़ी से सम्बद्ध जादू-टोने के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था। बाद में तो उस ओझा ने मुझे भी जादू-टोने की जड़ी-बूटियों पर मंत्र पढ़ने की अनुमति दे दी थी। मैं अपनी इच्छा के अनुसार कभी भी इन अनुष्ठानों में मंत्र पढ़ने के अधिकार का प्रयोग कर सकता था और सचमुच ही मैंने कई बार ऐसा किया । जड़ी-बूटियों वाली कुछ सामग्री पर गाँव में खेती-बाड़ी से जुड़े मंत्र पढ़े जाते थे, कुछ पर ओझा की झोंपड़ी में पढ़े जाते थे और खेत में डालने से पहले फिर से उन पर मंत्र पड़े जाते थ। जादू-टोना करने वाले दिन ओझा अकेला ही झाड़ी में जाता और कभी-कभी जड़ी-बूटियां लाने के लिए उसे बहुत दूर भी जाना पड़ता। अक्सर उसे एक ही टोने के लिए लगभग दस प्रकार की जड़ी-बूटियां लानी पड़तीं। इनमें से कुछ तो समुद्र तट पर ही मिलती, कुछ राइबोग अर्थात् पत्थरीले मूंगा वाले जंगल में मिलती और अन्य ओडिला अर्थात् छोटी-छोटी जंगली झाड़ियों से लानी पड़तीं। जादू-टोने की सामग्री लाने के लिए ओझा को पौ फटने से पहले जाना पड़ता और सूर्य निकलने से पहले यह सब इकट्ठा करना पड़ता। यह सब सामग्री उसकी झोपड़ी में रख दी जाती और दोपहर के समय ओझा उन पर मंत्र पढ़ने शुरू करता। चारपाई पर एक चटाई बिछाई जाती व इसके ऊपर एक और चटाई बिछाई जाती। दूसरी चटाई के आधे हिस्से पर जड़ी-बूटियां रखी जाती और फिर चटाई के दूसरे हिस्से से जुड़ी-बूटियों को ढक दिया जाता। ऐसा करने के बाद ओझा जड़ी-बूटियों पर मंत्र द्वारा जादू-टोना करता। पूरे समुदाय में ओझा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। ओझा की मदद के बिना खेती-बाड़ी का कोई भी काम करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

कुछ विद्वान मलिनॉस्की के नृजातिविवरण को ‘‘सैद्धांतिक अंतदृष्टि का विषय‘‘ मानते हैं (लीच 1957ः 119)। ये सैद्धांतिक अंतर्दृष्टियाँ अब समाजशास्त्रीय अध्ययन का अभिन्न अंग बन गई हैं । लीच के अनुसार, मलिनॉस्की की नृशास्त्रीय महानता इस सैद्धांतिक विश्वास में निहित है कि क्षेत्रीय शोधकार्य में एकत्र किए सभी तथ्यों से समाज के बारे में एक पूरी तस्वीर सामने आ जानी चाहिए। एक-एक तथ्य सारी तस्वीर की कहानी बताने वाला होना चाहिए। अपनी इसी धारणा के कारण मलिनॉस्की ने सामाजिक-सांस्कृतिक पारिस्थितियों की. बारीक से बारीक जानकारी पर पूरा ध्यान दिया। इस दृष्टिकोण के कारण आदिम लोगों के नृजातिविवरण तथा उनके आचरण की व्याख्या के संबंध में स्पष्ट और जीवंत परिणाम प्राप्त करने में उसे सुविधा हुई (कोष्ठक 22.5 में यह स्पष्ट है)। प्रत्यक्ष सामग्री एकत्र करने पर मलिनॉस्की का अनुरोध (पदेपेजमदबम) ही एक प्रकार से उसकी सैद्धांतिक उपलब्धि था, कयोंकि इससे यह आवश्यक हो गया कि तथ्यों का विश्लेषण अनुभवपरक वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए।

मलिनॉस्की सूक्ष्म सिद्धांत (abstract theory) में विश्वास नहीं करता था (लीच 1957ः 134)। इसी दृष्टिकोण के कारण वह समाज के अनुभवमूलकता के साथ तथ्यों का बारीकी के साथ अध्ययन करने पर बल देता था। परन्तु वह अनुभवपरक ब्योरे के सागर में डूबने को तैयार नहीं था। अन्य समाजशास्त्रियों की भांति वह भी इन तथ्यों का अर्थ समझने के पक्ष में था। इसके लिए उसे सैद्धांतिक-तंत्र विकसित करने की आवश्यकता पड़ी। सूक्ष्म सिद्धांत का विरोधी होने के साथ-साथ वह उन्नीसवीं शताब्दी के अनुमानमूलक सिद्धांतों की त्रुटियों को दूर करने के लिए भी कृत-संकल्प था। इसी के परिणामस्वरूप वह ऐसी मध्यवर्ती अवधारणाओं के विकास में लगा रहा, जो न तो इतनी सूक्ष्म थीं कि अनुमानमूलक बन जाएं और न ही इतनी ठस के उनके आधार पर सामान्यीकरण ही न किया जा सके। इस प्रक्रिया में मलिनॉस्की ने संस्कृति को प्रकार्यात्मक भूमिका निभाने के साधन के रूप में प्रस्तुत किया। साथ ही, उसने व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति पर बल दिया। प्रकार्यवाद का उसका सिद्धांत इस बिंदु से आगे नहीं बढ़ पाया।

इवन्स प्रिचर्ड (1954ः 54) के शब्दों में, मलिनॉस्की ने अपने प्रेक्षण का विवरण देने के लिए प्रकार्य की विधि को एक साहित्यिक साधन की तरह विकसित किया। मलिनॉस्की प्रकार्यवाद को सुव्यवस्थित अवधारणा के रूप में विकसित नहीं कर पाया। यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि मलिनॉस्की के समकालीन समाजशास्त्री रैडक्लिफ-ब्राउन ने बाद में समाज का प्रकार्यात्मक अथवा आंगिक सिद्धांत विकसित किया। इस विषय की चर्चा इकाई 25 में की जाएगी। समय हो गया है कि बोध प्रश्न 3 को पूरा किया जाये।