नक्सलवाद किसे कहते हैं , परिभाषा क्या है , उदय का कारण , इतिहास Naxlism in hindi definition

By   March 24, 2022
सब्सक्राइब करे youtube चैनल

Naxlism in hindi definition नक्सलवाद किसे कहते हैं , परिभाषा क्या है , उदय का कारण , इतिहास का वर्णन कीजिये ?
नक्सलवाद (Naxlism)
नक्सलवाद आज भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। स्थिती इतनी गंभीर हो चुकी है कि इसे आतंकवाद से भी बड़ी समस्या माना जाने लगा है। इसकी विरोधाभासी प्रकृति ने इसे और भयावह बना दिया है। आज देश के अधिकांश राज्य नक्सली हिंसा से प्रभावित है।

नक्सलवाद का जन्म (Birth of Naxalism)
कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत से प्रेरित नक्सलवाद का जन्म 25 मई, 1967 को हुआ माना जाता है जब कम्युनिस्ट नंेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल के नेतृत्व में उत्तरी बंगाल के दॉजिलिग जिले में नक्सल बाड़ी गांव के कृषकों ने विद्रोह कर दिया था।
सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समानता स्थापित करने के उद्देश्य से उस दौर मे बेरोजगार युवको व किसानों को साथ लेकर
गांवों के भू-स्वामियों के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया गया था। उस दौर में ‘आमारबाडा, तुम्हारे बाड़ी नक्सलबाडी‘ भू-स्वामियों के विरोध का प्रतीक बन गए थे। तत्पश्चात् चीन में कम्यूनिस्ट राजनीति के प्रभाव से इस आन्दोलन को व्यापक बल मिला।

नक्सलवाद के उदय का कारण (Reasons for Naxalism Rise)
नक्सलवाद के उदय का कारण सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक असमानता और शोषणों को माना जाता है। बेरोजगारी, असंतुलित विकास ने नक्सली आन्दोलन को और धार दी। राज्य का अंग होने के बावजूद नक्सलवादी राज्य से संघर्ष करते हैं। नक्सलवाद के बड़े पैमाने पर फैलने का एक कारण भूमि सुधार कानूनों का सुचारू रूप से लागू न हो पाना भी है जिस कारण अपने प्रभाव का उपयोग कर जमींदारों ने गरीब किसानों की जमीन पर बलात अधिकार कर लिया। इसी का लाभ नक्सलियों ने उठाया और निरीह लोगों को रोजगार और न्याय दिलाने का विश्वास दिलाकर अपने संगठन में शामिल कर लिया। यहीं से नक्सलवाद की शुरुआत मानी जाती है।

नक्सलवाद का इतिहास (History of Naxalism)
17 अक्टूबर, 1920 को ताशकंद में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का गठन हुआ। 25 दिसंबर, 1925 को कानपुर में एक सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें देश के कई वामपंथी संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। स्वतंत्रता के पूर्व और पश्चात इसमें कई तरह के अंतर्द्वद्व, अंतर्विरोध और धाराएँ चलती रहीं। 1948 में प्रसिद्ध आंध्रा थीसिस के जरिए मांग की गई कि भारतीय शोषित जनता के लिए चीनी क्रांति के मार्ग का अनुसरण किया जाए। जून 1948 में ‘आंध्रा-पत्र‘ नामक एक वामपंथी विचारधारा वाले दस्तावेज के द्वारा माओत्से तुंग के विचारों के आधार पर क्रांतिकारी रणनीति तैयार की गई। जुलाई 1948 में तेलंगाना, केरल और त्रिपुरा में भू-स्वामियों के विरुद्ध एक हिंसक किसान आंदोलन उठ खड़ा हुआ, जिसमें लगभग 2500 गाँवों के किसान शामिल थे। इस आंदोलन को तेलंगाना संघर्ष के नाम से जाना जाता है। नक्सलवाद के बीज इसी आन्दोलन के गर्भ में छिपे थे।
1962 में जब चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में मतभेद उभरने लगे। पार्टी में कई गुट सक्रिय, हो गए। 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी औपचारिक रूप से दो हिस्सों में विभाजित हो गई-श्रीपाद अमृत डांगे के नेतृत्व वाला बम्बई गुट और कलकत्ता में पी. सुन्दरैया का गुट। कलकत्त वाले गुट ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नाम से अलग दल बना लिया।
1967 के लोकसभा चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 19 सीटें प्राप्त हुई और पश्चिम बंगाल तथा केरल में हुए विधानसभा चुनावों में यह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। इसी वर्ष 25 मई को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टरपंथी नेता चारू मजुमदार, कान सान्याल और जंगल संथाल ने नक्सल आंदोलन के शुरुआत की घोषणा कर दी। किसानों के साथ शामिल होकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भू-स्वामियों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप हिंसा भड़क उठी।
चारू मजूमदार ने चीनी विचारक माओ के विचारों का समर्थन किया और समाज के निम्न वर्ग से अपने साथ जुड़ने की अपील को ताकि उनकी निर्धनता और दीन-हीनता के लिए उत्तरदायी सरकार और शोषक वर्ग को हटाया जा सके। इस आंदोलन को निर्धन किसानों और शोषितों-वंचितों का व्यापक समर्थन मिला। नक्सलियों के इस पहले विद्रोह में 11 किसान पुलिस की गोलियों का शिकार हुए। पश्चिम बंगाल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने इस हिंसक आंदोलन का दमन कर दिया। इससे रुष्ट मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के नक्सलबाड़ी समर्थक नेताओं ने ऑल इंडिया कॉर्डिनेशन कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरी (एआईसीसीआर) का गठन किया।
आंध्र प्रदेश में भी तेलंगाना के सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करने वाले नेताओं ने अलग गुट बना लिया। 1969 में चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से त्यागपत्र दे दिया और लेनिन के जन्मदिन पर कोलकाता के शहीद मीनार से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के गठन की घोषणा कर दी और भारत में सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से क्रांति लाने का आह्वान किया। उस समय देश के.बुद्धिजीवियों और युवा वर्ग का उन्हें भारी समर्थन मिला। चारू मजूमदार और कानू सान्याल छात्रों के आकर्षण का केन्द्र बन गए थे। ये युवा पहले से वामपंथ के प्रभाव में थे और नक्सलबाड़ी के कृषक विद्रोह ने किसानों से अधिक इन युवाओं को प्रभावित किया।
1970 में कानू सान्याल और जंगल संस्थाल हिरासत में ले लिए गए और इस नक्सल आंदोलन के सैद्धांतिक पुरोधा चारू मजमूदार फरार हो गए। कानू सान्याल को गिरफ्तार कर विशाखापट्टनम की जेल में रखा गया। उन पर जो मामला चला उसे ‘पार्वतीपुरम‘ ‘नक्सलाइट षड्यंत्र‘ के नाम से जाना जाता है।
नक्सलवाद के आरंभिक दौर से ही युवा वर्ग इससे प्रभावित रहा। शोषण और दमन का विरोध करने वाले समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद जैसे शब्द इस वर्ग में पहले ही उन्माद जगाते थे। ऐसे में अन्याय के विरुद्ध शंखनाद ने उन्हें पूरी तरह उत्तेजित कर दिया। शुरुआती दौर के इस नक्सली आंदोलन में छात्र नेताओं का वर्चस्व रहा। अधिकांश क्षेत्रों में संतोष राणा, विनोद मिश्र. असीम चटर्जी, अजीजुल हक, दिलीप मुखर्जी, सुचीतल राय चैधरी, जौहर जैसे छात्र नक्सल आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे।
नक्सलबाड़ी में दमन के बाद इस आंदोलन का केन्द्र कलकत्ता शहर हो गया था। कलकत्ता की सड़कों और गलियों में पुलिस और नक्सली छात्रों के बीच खूनी संघर्षों का कम वर्षों तक चलता रहा। इस संघर्ष में हजारों नक्सली युवकों औैर सैंकड़ों पुलिसकर्मियों की जानें गई।
उधर, आध्र प्रदेश तेलंगाना, सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करने वाले वामपंथियों ने माक्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से विद्रोह कर अलग गुट बना लिया था। इन लोगों ने भी विद्रोह का बिगुल फूंक दिया और कलकत्ता के साथ नक्सल विद्रोह का एक अन्य केन्द्र आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम क्षेत्र में विकसित हुआ, जहाँ नागभूषण पटनायक, सत्यनारायण और तेजेश्वर राव नक्सली नेता बनकर उभरे।
1972 में राज्य सरकार द्वारा कलकत्ता में नक्सल आंदोलन का दमन कर दिया गया। शीर्ष नक्सल नेता चारू मजूमदार को हिरासत में लिया गया जहाँ उनको मृत्यु हो गई। चारू मजुमदार की मौत के बाद नक्सल आंदोलन में बिखराव आ गया। पुलिस के हाथ आने ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिगत हो गए। इस बीच जंगल संथाल की भी मूठभेड़ में मौत हो गई।
तात्कालिक रूप से तो नक्सल विद्रोह दबा दिया गया, लेकिन इस नक्सल विद्रोह का दमन पूर्ण रूप से नहीं हुआ था। इसने धीरे-धीरे आंध्र प्रदेश के तेलगांना क्षेत्र में अपनी जडे मजबूती से जमा ली और बंगाल बिहार और उडीसा में भी अपने पैर मजबूती से जमा लिए।
1977 होने के बाद पश्चिम बंगाल और भारत सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद कानू सान्याल को जेल से रिहा किया गया। जेल से रिहा होने के बाद कानू सान्याल का नक्सलियों से मतभेद शुरू हुआ और उन्हें अहसास हुआ कि हिंसा के रास्ते पर चलकर लक्ष्य नहीं पाया जा सकता। उन्होंने नक्सलियों के हिंसा के रास्ते पर अड़े रहने की आलोचना की। अब उन्होंने अपने नेता चारू मजूमदार की इंडिविजुअल ऐनिहीलिएशन यांनी व्यक्तिगत खात्मे की नीति को पूरी तरह असंगत करार देकर स्वयं को नक्सल आतंकवाद से अलग कर लिया और ऑर्गेनाइजिंग कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरी ओसीसीआर) की स्थापना की।
कानू सान्याल ने देश भर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर विभिन्न नक्सली गुटों के नेताओं को समझाने का प्रयास किया कि हिंसा और आतंक के सहारे कृषक-श्रमिक कम्युनिस्ट क्रांति कर पाना संभव नहीं है। ऐसी क्रांति के लिए विशाल स्तर पर जनमानस में वर्ग चेतना उत्पन्न करनी होगी।
कालांतर में कानू सान्याल ने अपनी ऑर्गेनाइजिंग कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवोल्यूशनरी (ओसीसीआर) का विलय कम्युनिस्ट ऑगेनाइजेशन आफ इंडिया (मासिस्ट-लेनिनिस्ट) में कर दिया और इसके बाद पुनर्गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के महासचिव बने। 23 मार्च, 2010 तक मृत्युपर्यंत वे इस पद पर बने रहे।

नक्सलवाद की वर्तमान दशा (Present Status of Naxalism)
नक्सलबाड़ी का विद्रोह कानू सान्याल के नेतृत्व में तो किसानों का विद्रोह था, लेकिन पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद का विकास चारू मजमूदार के विचारों के आधार पर आगे बढ़ा और गाँव से शहरों तक फैल गया। इसमें नक्सलवादियों और शासन द्वारा व्यापक हिंसा हुई। इस आन्दोलन का पश्चिम बंगाल में तो दमन कर दिया गया लेकिन इसकी जड़ें अन्य प्रदेशों में फैल गईं। 1980 में आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में पीपुल्स वार ग्रुप के नाम से नक्सलवाद का दूसरा आंदोलन शुरू हुआ जो ओडिशा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ तक फैल गया।
नक्सलवाद के जन्म से अब तक विचारधारा और रणनीति के आपसी मतभेदों के चलते उनमें अनेक गुट बने, लेकिन 21 सितम्बर, 2004 को प्रमुख गुटों-पीपुल्स वार ग्रुप और भारतीय माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ने आपसी समन्वय से एक नई पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) गठित की। नेपाल से बिहार, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ होते हुए आंध्र प्रदेश तक एक सधन क्षेत्र पर माओवादियों का नियंत्रण है जिसे लाल गलियारा (त्मक ब्वततपकवत) कहा जाता है। नक्सलवाद की अधिकांश गतिविधियाँ उन सुदूर वनवासी अंचलों में हो रही हैं जहाँ सडक और रेल की सुविधाएँ लगभग नगण्य हैं और विकास को किरण वहाँ तक नहीं पहुंची है।
नक्सलवाद आज लगभग दिशाहीन हो चुका है, रोजी-रोटी के लिए जो आदिवासी इस विचारधारा से जुड़े थे और जिन हाथों में हल और फावड़े होने चाहिए थे, उन हाथों में आज अत्याधुनिक हथियार आ चुके हैं। सीधे-साधे ये लोग इस आंदोलन से जुड़ गए और बदलते समय के साथ सब के सब अपना अधिकार पाने के लिए हिंसा पर आधारित उग्रवादी विचारधारा के साथ चलने लगे। बस इसी का नाम रह गया है नक्सलवादी आंदोलन, जो कभी आंध्र प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में फैला था, उस ‘लाल आंदोलन‘ का उग्रवाद आज 106 जिलों को अपनी लपेट में ले चुका है। इस विषैली विचारधारा ने बिहार के 22, आंध्र के 16, झारखंड के 21 छत्तीसगढ़ के 16 उड़ीसा के 19 उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के लगभग 10 जिलों में अपनी जड़ें जमा ली हैं।

नक्सली हिंसा का स्तर (Level of Naxalite Violence)
वैसे तो देश के सभी नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सली गतिविधियाँ चलती रहती हैं लेकिन 2013 की प्रथम तिमाही में झारखंड में सबसे ज्यादा नक्सली वारदात हुई। झारखंड ने नक्सली वारदातों के मामले में छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ दिया। नक्सली हिंसा के मामले में बिहार भी पीछे नहीं है। झारखंड एवं बिहार में कुल नक्सली हिंसक वारदातों का 80 प्रतिशत वारदात हुई जो चिंताजनक है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार ओडिशा में माओवादी आतको काफी थमा है। वहीं प. बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में नहीं के बराबर घटनाएं हुई।
नक्सलियों की गतिविधियों के कारण देश को भारी क्षति हो रही है। कोयला खदानों में जान प्रभावित हो रहा है। झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र एवं ओडिशा में नक्सलियों की हिंसक घटनाओं के कारण सड़कों के निर्माण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। यही वजह है कि केन्द्रीय सड़क मंत्रालय इन राज्यों में केन्द्रीय सुरक्षा बल की तैनाती चाहता है। मंत्रालय ने राज्यो तथा सुरक्षा बलों से सहयोग मांगा है क्योंकि ये सभी भारी जोखिम वाले क्षेत्र हैं। इन राज्यों में सड़को का निर्माण कराना दुरुह कार्य है, ठेकेदार इन क्षेत्रों में सड़क निर्माण के लिए निविदा नहीं भरते क्योंकि काम लेने से उन्हें जान का खतरा रहता है।

नक्सलवाद का उग्र स्वरूप (Violent Form of Naxalism)
नक्सलवादी अभियान ने अब उग्र हिंसात्मक रूप ले लिया है। कह सकते हैं कि यह अपनी राह से भटका हुआ आन्दोलन बन गया है, जिसमें हिंसा को ही एकमात्र समाधान मान लिया गया है। नक्सलवाद-मूलत आधारभूत असमानताओं के कारण उपजी एक गंभीर एवं चुनौतीपूर्ण समस्या है। रूसी क्रांतिकारी एवं कम्युनिस्ट नेता लेनिन का मानना था कि प्रत्येक क्रांति का मुख्य प्रश्न राजनीति का प्रश्न होता है। सभी राजनीतिक विचारधाराएँ जनसमर्थन जुटाती है और सत्ता प्राप्त करना चाहती है। नक्सलपथी भी यही चाहते हैं। लेकिन वे जनसमर्थन जुटाने के बजाय हिंसा हत्या के माध्यम से सत्ता पाना चाहते हैं। वे स्वयं को शोषण वर्ग से मुक्त करने के लिए हिंसात्मक गतिविधियों का सहारा लेते हैं। उन्हें लोकतंत्र एवं चुनावी प्रक्रिया पर भी विश्वास नहीं है तथा वे मानते हैं कि संवैधानिक संस्थाएँ मात्र एक दिखावा है।
पूर्व में अधिकांश नक्सली संघर्ष वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के वन संपदा संबंधी अधिकारों के संघर्ष के रूप में था। लेकिन बदलते समय के साथ धीरे-धीरे इसने राष्ट्र विरोधी स्वरूप ग्रहण कर लिया। आज नक्सलियों का न केवल वन और खनिज संपदा पर अवैध अधिकार है. बल्कि वे हर प्रकार की आपराधिक गतिविधियों में भी लिप्त हो गए हैं।
उन्होंने बड़े पैमाने पर अस्त्र-शस्त्र और आयुध जुटा लिए हैं। इसमें सुरक्षा बलों से लूटे गए हथियारों के साथ-साथ दूसरे देशों से चोरी-छिपे प्राप्त अस्त्र और उपकरण भी हैं। नक्सलियों को कुछ विदेशी शक्तियों से भी समर्थन मिलता है।
हम कह सकते हैं कि सशस्त्र नक्सल या माओवादी आतंक अब अपने तीसरे चरण में प्रवेश कर चका है, जो बीते दो चरणों के मुकाबले अधिक घातक है। पहले चरण में भू-स्वामियों और धन-स्वामियों को नक्सली अपना निशाना बनाते थे। वह शुरुआती चरण था और तब नक्सलवाद को व्यवस्था के विद्रोह में एक बुद्धिजीवी आंदोलन के तौर पर देखा जाता था। दूसरे चरण में नक्सलियों ने सशस्त्र बलों पर आक्रमण करना शुरू किया। इस चरण में नक्सली आतंक का सर्वाधिक सीमा-विस्तार हुआ। पूरे भारत में एक लाल गलियारे का निर्माण होने लगा, जो पश्चिम बंगाल से फैलकर बिहार, झारखंड, ओडीशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक पहुँच गया। जिन क्षेत्रों में निरक्षरता, निर्धनता और वंचना व विषमता अधिक थी, वहाँ नक्सलवाद अपना पैर पसारता चला गया। लेकिन यह नक्सलवाद के लिए संक्रमण काल भी रहा। क्योंकि इसकी नीतियों व सोच में दोहरापन दिखने लगा था। दूसरी ओर, सरकरों ने भी इनके प्रति सहानुभूति का त्याग कर सशस्त्र बलों को इनका सामना करने के लिए जंगलों में भेजा। ग्रेहाउंड्स फोर्स, कोबरा फोर्स जैसे सशत्र.बलों का गठन हुआ और ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसे सफल अभियान नक्सलियों के विरुद्ध चलाए गए। इसके सार्थक परिणाम भी सामने आए। आंध्र प्रदेश से नक्सली आतंक लगभग समाप्त हो चुका है। आंध्र में ग्रे-हांउड्स इतने प्रभावी सिद्ध हुए कि उन्होंने कई प्रमुख नक्सली नेताओं को मार गिराया। ग्रे-हाउंड्स के भय से लगभग सभी बड़े नक्सली नेता झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में शरण लेने को विवश हुए।
गृह मंत्रालय से प्राप्त आँकड़ों से पता चलता है कि 2009 के बाद नक्सली वारदातों में कमी आई है, लेकिन इनका स्वरुप घातक हुआ है। 2009 में 2,258 नक्सली हिंसा की घटनाएं घटीं तो 2010 में 2,213य 2011 में 1,760 और 2012 में 1,412 नक्सली वारदात हुईं। नक्सली हमलों में सुरक्षा बलों के जवानों व आम नागरिकों की मौत की संख्या भी घटी है। आँकड़े यह भी बताते हैं कि नक्सलियों का प्रभाव 220 जिलों से घटकर करीब 173 पर आ पहुंचा है।