राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना के उद्देश्य और आवश्यकता क्या होती है national curriculum framework 2005 b.ed notes

By   May 30, 2021

national curriculum framework 2005 b.ed notes in hindi राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना के उद्देश्य और आवश्यकता क्या होती है ?

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 के उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए।
Explain the aims of National curriculum frame work 2005
उत्तर-राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 के उद्देश्य (Aims of National Curriculum Frame Work, 2005)- प्रत्येक योजना, कार्यक्रम एवं पाठ्यक्रम से पूर्व उद्देश्या का निर्धारण किया जाता है, जिससे कि पाठ्यक्रम का मूल्यांकन किया जा सके। इसी क्रम म राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 की संरचना से पूर्व इसके उद्देश्यों का निर्धारण किया गया। इस पाठयक्रम के प्रमुख उद्देश्यों को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
1. राष्ट्रीय विकास (National development) शैक्षिक पाठ्यक्रम में एकता का अभाव राष्ट्रीय विकास की प्रमुख बाधा मानी जाती है । राष्ट्रीय विकास उस अवस्था में सम्भव होता है, जब पाठ्यक्रम एवं शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता हो तथा एक उद्देश्य को ही प्राप्त करने स किया जाये। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना सन् 2005 का प्रमुख उद्देश्य राष्ट्र को विकसित अवस्था में पहुँचाना है क्योंकि शिक्षा ही वह मूलमन्त्र है, जो राष्ट्रीय विकास को चरम सीमा पर पहुँचा सकता है।
2. राष्ट्रीय एकता का विकास (Development of national integration) – राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना 2005 की संरचना में देश की एकता एवं अखण्डता से सम्बन्धित विषय वस्त को अधिक महत्त्व प्रदान किया है। भारत में विभिन्न भाषाएँ, धर्म एवं परम्पराएँ विद्यमान हैं। इनका प्रभाव हमारे सामान्य जन-जीवन पर पड़ता है। अनेक प्रकार की विचारधाराओं में एकता की आवश्यकता सदैव रहती है। इस क्रम में भारतीय परिस्थितियों में सदैव राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता रही है। इसलिये इस पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित विषय वस्तु को महत्त्व प्रदान किया गया है।
3. छात्र में अध्ययन के प्रति रुचि का विकास (Development of interest for study in students)- राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 की संरचना का प्रमुख उद्देश्य पाठ्यक्रम को स्तरानुकूल एवं परिस्थिति जन्य बनाना है, जिससे कि छात्र अध्ययन में रुचि लेने लगें। प्रत्येक स्तर पर छात्र की क्षमता एवं रुचि का ध्यान रखकर पाठ्यक्रम का स्वरूप निश्चित किया गया है। इन सभी तथ्यों को पाठ्यक्रम संरचना में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है।
4. अभिभावकों की आकांक्षाओं की पूर्ति (Completion of ambitions of parents)- अभिभावक शिक्षा द्वारा अपनी आकांक्षा पूर्ति छात्र के माध्यम से करना चाहते हैं अर्थात् प्रत्येक अभिभावक अपने बालक को विद्यालय में भेजने के बाद उससे कुछ अपेक्षाएँ रखता है। इन अपेक्षाओं की पूर्ति विद्यालय व्यवस्था एवं विद्यालय पाठ्यक्रम पर निर्भर करती है। अतः अभिभावकों की आकांक्षा को ध्यान में रखकर इस पाठ्यक्रम को निर्मित किया गया है।
5. मानवीय मूल्यों का विकास (Development of human values) राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 की संरचना का प्रमुख उद्देश्य छात्रों में प्रारम्भिक स्तर से ही मानवीय मूल्यों का विकास करना माना गया है क्योंकि भारतीय दर्शन एवं शिक्षा मानवता एवं नैतिकता को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करती है। इसलिये शिक्षा के लिये निर्मित पाठ्यक्रम का स्वरूप भी इस तथ्य से सम्बन्धित होगा।
6. स्तरानुकूल शिक्षण विधियाँ (Teaching methods according to level)- राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिये उसके स्वरूप पर विचार किया गया है। पाठ्यक्रम में स्तर के अनुसार शिक्षण विधियों के प्रयोग को मान्यता प्रदान की गयी है, जैसे प्राथमिक एवं पूर्व प्राथमिक स्तर पर सामान्य रूप से उन शिक्षण विधियों का प्रयोग करना चाहिए, जो कि खेल से सम्बन्धित हों तथा कथन एवं व्याख्यान विधि का प्रयोग माध्यमिक स्तर पर करना चाहिये।
7. भाषायी समस्या का समाधान (Solution of language problem) राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 में भाषा समस्या का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। भारतीय समाज में विभिन्न प्रान्तों में भाषा का स्वरूप भिन्न-भिन्न पाया जाता है। इससे राष्ट्रीय पार निर्माण में भाषा की समस्या सदैव से रही है कि किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जाये ? राष्ट्रीय पाठ्यक्रम 2005 में विभिन्न भाषाओं एवं मातृभाषा को उचित स्थान प्रदान कर भाषायी समस्या का समाधान किया गया है।
8. शिक्षकों में आत्म-विश्वास का विकास (Development of self confidence in teachers)- शिक्षक पाठ्यक्रम के क्रियान्वयन एवं उसे सफल बनाने का प्रमुख साधन है। पाठ्यक्रम को सफल रूप में क्रियान्वित करने वाले शिक्षक ही होते हैं। शिक्षकों में आत्म-.. विश्वास के विकास को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में इस तथ्य पर विस्तृत विचारविमर्श किया गया कि शिक्षकों में आत्मविश्वास की भावना को सुदृढ़ किया जाये, जिससे कि पाठ्यक्रम को प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जा सके।
9. शिक्षण साधनों में समन्वय स्थापित करना (Co-ordination establishment in teaching resources)-राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 की संरचना का प्रमुख उद्देश्य शिक्षण के मानवीय एवं भौतिक साधनों में समन्वय स्थापित करना है क्योंकि पाठ्यक्रम के निर्माण से पूर्व उपलब्ध शैक्षिक संसाधनों पर विचार किया जाता है। पाठ्यक्रम में उन सभी संसाधनों के उचित एवं समन्वय पूर्ण प्रयोग को प्राथमिकता दी गयी है, जिससे कि पाठ्यक्रम के क्रियान्वयन में कोई बाधा उपस्थित न हो।
10. छात्रों का सर्वांगीण विकास (All round development of students)- राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 का प्रमुख उद्देश्य छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है। इस पाठ्यक्रम में छात्रों को क्रियाशील रखने के लिये प्रायोगिक एवं सैद्धान्तिक पक्षों का समन्वय किया गया है । प्रायोगिक कार्यों का प्रत्येक स्तर पर स्वरूप भिन्न-भिन्न होता है, जैसे प्राथमिक स्तर पर सृजनात्मक स्तर को कार्यानुभव का नाम दिया गया है तथा माध्यमिक स्तर पर इसको प्रायोगिक कार्य के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार छात्र को क्रियात्मक एवं सैद्धान्तिक पक्ष दोनों दृष्टिकोण से सुदृढ़ बनाया जाता है।
प्रश्न 4. राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना 2005 की आवश्यकता एवं महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
Describe the need and importance of National Curriculum Frame work, 2005.
अथवा
वर्तमान शैक्षिक परिस्थितियों के आधार पर एन.सी.एफ. की आवश्यकता का विवरण दीजिए।
Describe the need of NCF on the basis of present educational situations.
उत्तर–राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 की आवश्यकता एवं महत्त्व (Need and importance of NCE 2005) राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 का निर्माण वर्तमान शैक्षिक परिस्थितियों के आधार पर किया गया है। इस पाठ्यक्रम संरचना में शिक्षा के क्षेत्र की कमी को उजागर कर, दूर करने के प्रयत्न किये गए हैं। राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना, 2005 की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं-
1. पाठ्यक्रम विकास के लिये- पाठ्यक्रम विकास की दृष्टि से राष्ट्रीय कार्यक्रम सन ना आवश्यक थी क्योंकि इससे पाँच वर्ष पूर्व राष्ट्रीय कार्यक्रम 2000 की संरचना हुई थी। इन पांच वर्षों के अन्तराल में पाठ्यक्रम में विकास की अनेक प्रबल सम्भावनाएँ थी। इसलिए पाठयक्रम विकास एवं निर्माण के लिये तत्कालीन एन.सी.ई.आर.टी. के अध्यक्ष द्वारा प्रयत्न् किया गया।
2. नवीन तथ्यों समावेश के लिये-पाठ्यक्रम शोधकार्यों के निष्कर्षों के द्वारा अनेक नवीन तथ्यों का समावेश करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि इन तथ्यों के अभाव में पाठ्îक्रम के माध्यम से शिक्षण उद्देश्यों को पूरा नहीं किया जा सकता है। जैसे शोध कार्यों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि पाठ्îक्रम में प्राथमिक स्तर की कक्षाओं में खेल विधि का समावेश होना चाहिये। इस कार्य के लिये पाठ्यक्रम में परिवर्तन अनिवार्य है। अन्यथा छात्रों के विकास की तीव्रता बाधित होंगी। अतः नवीन तथ्यों के समावेश के लिये पाठ्यक्रम संरचना सन् 2005 की आवश्यकता थी।
3. परिवर्तन के अनुरूप पाठ्यक्रम समाज एवं शैक्षिक जगत में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सम्बन्ध पाठ्यक्रम से होता है। शैक्षिक जगत में अनेक प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं, जैसे प्राचीन काल की शिक्षा में मुख्यरूप से आदर्शवादी दर्शन का प्रभाव था। धीरे-धीरे परिवर्तन के आधार पर यह अनुभव किया गया कि आदर्शों के साथ-साथ शिक्षा को उपयोगी, प्रयोजनवादी एवं अर्थ प्रधान भी होना चाहिये, जिससे कि मानव के भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास का समन्वित रूप प्रस्तुत किया जा सके। इस प्रकार अनेक परिवर्तन सन् 2000 से 2005 के बीच हुए, जिससे यह अनुभव किया गया कि नवीन राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की संरचना प्रस्तुत की जाये।
4. मानवीय मूल्यों के विकास के लिये वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों के विचार एव विकास हेतु शैक्षिक पाठ्यक्रम ही प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण साधन है। मूल्यों के पतन एवं स्वार्थपूर्ण भावना के विकास के कारण यह आवश्यकता अनुभव की गयी कि पाठ्यक्रम का स्वरूप इस प्रकार निर्धारित किया जाये, जो कि नैतिक एवं मानवीय मूल्यों के पतन को रोकते हए छात्रा में इनके विकास का मार्ग प्रशस्त करे। इस आवश्यकता की पूर्ति राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना सन् 2005 द्वारा दी गयी।
5. भाषायी समस्या के समाधान के लिये भारतीय शिक्षा में भाषा समस्या का स्वरूप पान काल से रहा है तथा इसके समाधान हेतु अनेक आयोगों एवं समितियों ने अपने विचार प्रस्तुत किय। इनके द्वारा भाषा समस्या के समाधान हेतु अनेक सुझाव प्रस्तुत किये गये जिसमें भारतीय शिक्षा आयोग 1964-66 का त्रिभाषा सूत्र प्रमख था। इसी प्रकार भाषायी समय समाधान हेतु एक नवीन राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना अनुभव की गयी, जिसे एक संरचना ने पूर्ण कर दिया।
6. कक्षा-कक्ष शिक्षण के लिये- कक्षा-कक्ष शिक्षण में पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। पाठ्यक्रम के प्रभाव का मूल्याकन कक्षा-कक्ष शिक्षण के समय ही होता है। पाठ्यक्रम छात्रों के अनुरूप अर्थात् मानसिक स्तर के अनुसार होगा तो वह प्रभावी एवं सफल माना जायेगा। कक्षा-कक्ष शिक्षण को प्रभावपूर्ण बनाने के लिये राष्ट्रीय कार्यक्रम सन् 2005 को प्रस्तुत किया गया।
7. छात्र की सन्तुष्टि के लिये- छात्र की आवश्यकता एवं रुचि को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाना चाहिये। छात्र की रुचियों एवं इच्छाएँ भी समय एवं परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप नवीन पाठ्यक्रम की आवश्यकता अनुभव की जाती है। इस क्रम में यह अनुभव किया गया कि छात्रों की आवश्यकता एवं रुचि को ध्यान में रखकर एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम तैयार किया जाये। इसके लिये राष्ट्रीय पाठ्यक्रम सन् 2005 की रचना की गयी।
8. शिक्षकों की सन्तुष्टि के लिये- शिक्षकों की सन्तुष्टि के लिये यह आवश्यकता अनुभव की जाती है कि पाठ्यक्रम निर्माण में उनका सहयोग लिया जाये तथा उनके समक्ष पाठ्यक्रम क्रियान्वयन के समय आने वाली समस्याओं को ध्यान में रखा जाये। यदि इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम का निर्माण किया जाता है तो शिक्षकों को उस पाठ्यक्रम से पूर्ण सन्तुष्टि प्राप्त होती है। सन् 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शिक्षकों की पूर्ण सहभागिता प्राप्त की गयी थी।
9. शोध परिणामों के प्रयोग के लिये- शोध कार्यों के परिणामों के व्यावहारिक प्रयोग को सम्भव बनाने के लिये एक समन्वित एवं संगठित पाठ्यक्रम की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी क्योंकि 2000 के बाद शैक्षिक क्षेत्र में अनेक शोध कार्य हुए उनका व्यावहारिक प्रयोग पाठ्यक्रम में परिवर्तन के द्वारा ही सम्भव था। इस आवश्यकता की पूर्ति राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना द्वारा नवीन शोध कार्यों को समाहित करते हुए की गयी।
10. शिक्षण विधियों के विकास के लिये- पाठ्यक्रम का निर्धारण शिक्षण विधियों, शिक्षण सहायक सामग्री के प्रयोग एवं शिक्षण में प्रयुक्त संसाधनों को ध्यान में रखकर किया जाता है। विभिन्न प्रकार की शिक्षण विधियों का प्रयोग पाठ्यक्रम के द्वारा ही होता है। इस प्रयोग में आने वाली कठिनाइयों को दूर करके इन विधियों में आवश्यक सुधार किये जाते हैं। इस प्रकार शिक्षण विधियों का पूर्ण विकास होता है। अतः शिक्षण विधियों में सुधार एवं विकास के लिये राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की आवश्यकता है।
उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना सन् 2005 की आवश्यकता सम्पूर्ण शैक्षिक व्यवस्था के विकास के लिये अनुभव की जा रही थी। दसरदार शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। इस सन्दर्भ में प्रो. एस.के. दुबे लिखते है कि ‘‘राष्ट्रीय पाठ्यक्रम संरचना सन् 2005 भारतीय परिस्थितियों में छात्रों शिक्षकों एवं अभिभावकों की आकांक्षाओं की पर्ति करने वाली महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, जो राष्ट समाज एक औशिक व्यवस्था के विकास को समन्वित रूप प्रदान करते हुए मानवीय एवं नैतिक मल्यों करती है।‘‘