मोहम्मद इकबाल कौन थे ? muhammad iqbal poems in hindi मोहम्मद इकबाल जीवनी , कवितायेँ

By   September 6, 2020

द सीक्रेट्स ऑफ़ द सेल्फ मुहम्मद इक़बाल (muhammad iqbal poems in hindi) मोहम्मद इकबाल कौन थे ?  जीवनी , कवितायेँ राजनितिक विचार क्या थे ? पुस्तकें और गजल नाम |

मोहम्मद इकबाल
मोहम्मद इकबाल ने भारतीय मुसलमानों के राजनातिक विचार एक व्यवस्थित आधार पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया। उन्होंने मुस्लिम राजनीतिक विचारों के संदर्भ में उदारवादी प्रजातंत्र के राजनीतिक चिंतन की समीक्षा की। उनके राजनीतिक चिन्तन को समझने के लिए इस्लाम तथा अहं के संबंध में उनके दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है।

इस्लाम तथा
इकबाल की मान्यता थी कि मध्यकालीन मनोवृत्ति के फलस्वरूप इस्लाम आधुनिक मनुष्य के लिए महत्वहीन हो गया है। ऐसी स्थिति इस्लाम की कमियों के कारण नहीं हुई है. बल्कि वास्तविकता यह है कि लोग इस्लाम की सच्ची भावना को समझते ही नहीं हैं। उन्होंने इस्लाम की संकीर्ण व्याख्या करने के लिये रूढ़िवादी एवं स्वार्थपरायण सफियों पर दोषारोपण किया। इकबाल की मान्यता थी कि मध्यकालीन रहस्यवाद ने इस्लाम के अनुयायियों को इसकी लाभप्रद सहजवृत्ति से वंचित रखा तथा इसके संबंध में केवल अस्पष्ट विचार मुहैया करवाये । उनका विश्वास था कि विश्व के कल्याण के लिए वास्तविक इस्लाम का पुर्नरुत्थान अत्यन्त आवश्यक था। उनके अनुसार इस्लाम को एक सार्वभौमिक तथ्य के रूप में सार्थकता प्रदान करने वाले एक सचेष्ट अध्ययन की अत्यधिक आवश्यकता थी। एक ‘‘सक्रिय शक्ति’’ बनने के लिये इस्लाम में अन्तःशक्ति थी।

इकबाल का समाज, राज्य तथा राजनीति से संबंधित दर्शन उनके इस्लाम से संबंधित दृष्टिकोण पर आधारित था। इकबाल के अनुसार इस धरती (विश्व में) पर आदर्श समाज मुसलमानों द्वारा स्थापित किया जायेगा-इनको खुदा (ईश्वर) द्वारा चुना गया है, ये पूर्व (पर्व दिशा) में खुदा के प्रतिनिधि हैं। मुसलमान असाधारण मनुष्य (टाइटन अर्थात भीमकाय मनुष्य) नहीं हैं, किन्तु एक सामान्य मनुष्य और एक ‘‘संपूर्ण विश्वहित का साकार रूप है।’’ उसमें ‘‘न्याय और परोपकारिता’’ की विशेषतायें हैं। इकबाल का मत था कि केवल ‘‘आत्मस्वीकरण, आत्मभिव्यक्ति और आत्मविकास द्वारा ही मुसलमान अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं।’’ ये तीन चरण (पड़ाव) हैं जिनके द्वारा अहं की विलक्षणता प्राप्त की जा सकती है।

इकबाल का ‘‘अहंवाद’’ अथवा ‘‘आत्मन् (आत्मका का स्व) का दर्शन (सिद्धान्त) उनके राजनीतिक विचारों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है समाज की आर्थिक तथा राजनीतिक व्यवस्था से इकबाल सन्तुष्ट नहीं थे। समाज ने संस्थाओं का सर्जन किया और संस्थाओं ने मनुष्य को गुलाम बना लिया। इससे धार्मिक तथा नैतिक सिद्धांतों को क्षति पहंुचती है। अतः इकबाल ने एक उच्च आदर्श प्रस्तुत किया है, जिसका उत्साहपूर्वक अनुसरण किया जा सकता है। ‘‘अहं‘‘ को समुचित सीमाओं में (प्रतिबन्धों के अधीन) रखना चाहिए। ऐसा केवल आज्ञापालन तथा अनुशासन से ही संभव है। अन्ततः यही ईश्वर के प्रतिनिधित्व हेतु मार्ग प्रशस्त करेगा। इकबाल की मान्यता थी कि जिन मुसलमानों का मार्गदर्शन करान अथवा ‘‘ज्ञानग्रन्थ‘‘ (दि बुक ऑफ विजडम) करता है वे इस लक्ष्य को पूरा कर सकेंगे।

 इकबाल के राजनीतिक चिन्तन के आधारभूत सिद्धान्त
पूर्व और पश्चिम के मध्यम संघर्ष अथवा इस प्रकार कहें कि स्नेह (भावना) एवं तर्क (कारण) के मध्य संघर्ष ही इकबाल के राजनीतिक चिंतन के आधारभूत सिद्धांतों की संरचना करता है। इकबाल ने पश्चिम तथा पश्चिमी सभ्यता के प्रति दृढ़ विश्वास प्रकट किया। उनके अनुसार पश्चिम भौतिकवादी मूल्यों का प्रतीक है तथा यह पूर्व के आध्यात्मवाद तथा धार्मिकता के उच्च मूल्यों का खंडन करता है। पश्चिम का आधार तर्क (कारण) है, जबकि पूर्व की संस्कृति का आधार स्नेह (भावना) है।

इकबाल ने एक आदर्श समाज के सृर्जन की आवश्यकता अनुभव की। वे पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन की कई अवधारणाओं जैसे राष्ट्र राज्य, राष्ट्रवाद, समानता, स्वतंत्रता, प्रजातंत्र, इतिहास की व्याख्या, पश्चिम का समाजवादी आन्दोलन आदि के आलोचक थे। उन्होंने मत व्यक्त किया कि राजनीतिक चिन्तन का आविर्भाव पूँजीवाद के आविर्भाव के साथ-साथ हुआ है। पूँजीवादी समाज भौतिक संस्कृति की उपज है। इकबाल के मतानुसार समाज का उद्देश्य इसके प्रत्येक सदस्य के जीवन को सखी तथा अच्छा बनाना होना चाहिए। समाज के प्रत्येक सदस्य को अपने ‘‘अहं‘‘ तथा व्यक्तित्व के विकास के लिए अवसर मिलना चाहिए। उनका विश्वास था कि पंूजीवादी समाज लोगों के अच्छे जीवन को सुनिश्चित नहीं करता। इसका आधार ही मुट्ठी भर लोगों का हितसाधन है। विज्ञान, दर्शन, प्रजातंत्र, संविधान तथा समानता एवं स्वतंत्रता के मूल अधिकार आदि सब शोषक वर्गों के सहायक हैं।

उपराष्ट्रवाद
इकबाल के अनुसार राष्ट्रवाद, राष्ट्र-राज्य के लिए मनोवैज्ञानिक एवं राजनीतिक औचित्य प्रदान करता है। राष्ट्र राज्य के आविर्भाव के लिए पूँजीवाद उत्तरदायी था। यह क्षेत्र के तर्क (विचार) पर आधारित है। राष्ट्रीयता केवल एक व्यक्ति को एक क्षेत्रता से सम्बद्ध करती है। इकबाल के अनुसार, देश भक्ति राष्ट्रीयता से भिन्न है। देश-भक्ति ‘‘एक पूर्णत नैसर्गिक विशिष्टता (सद्गुण) है और इसका एक मनुष्य के नैतिक जीवन में स्थान है।’’ लेकिन उनके अनुसार, राष्ट्रीयता एक राजनीतिक धारणा है तथा इसका इस्लाम की भावना से सामंजस्य नहीं है। उनका मानना था कि यदि राष्ट्रीयता को इसके आदर्श रूप में स्वीकार कर लिया जाता है तब इस्लाम एक सक्रिय तत्व के रूप में नहीं रहेगा। राष्ट्रीयता का इस्लाम से उस समय टकराव प्रारम्भ हो जायेगा जब राष्ट्रीयता एक राजनीतिक धारणा के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाहन करने लगेगी तथा इसके परिणामस्वरूप इस्लाम पष्ठभूमि में चला जायेगा तथा यह केवल व्यक्तिगत मान्यता का एक तत्व मात्र रह जायेगा और राष्ट्रीय जीवन में एक सक्रिय भूमिका निभाने वाले तत्व के रूप में लुप्त हो जायेगा। हालांकि इकबाल उस राष्ट्रीयता के विरुद्ध नहीं थे जिसमें कि एक निश्चित देश के लोगों को स्वतन्त्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से एकजुट करने की अन्तःशक्ति निहित हो। राष्ट्रीयता की इस प्रकार की धारणा इस्लाम की भावना से असंगत नहीं थी। किन्तु लोगों को एकजुट करने के लिए राष्ट्रीयता की बजाय धर्म ज्यादा उपयुक्त माध्यम है। उनका विश्वास था कि पाश्चात्य लोग राष्ट्रीयता का प्रयोग इस्लाम की धार्मिक एकता को छिन्न-भिन्न करने के लिए करना चाहते हैं। इकबाल राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध नहीं थे लेकिन उनके विचार में राष्ट्रीयता राजनीति में एक शांति भंग करने वाला तत्व था।

इकबाल का मानना था कि आधुनिक विश्व में मुसलमानों के ‘‘अ-इस्लामीकरण‘‘ का खतरा उत्पन्न हो गया है। राष्ट्रीयता ऐसे ही खतरों में से एक थी। इकबाल भारत में राष्ट्रीयता के संभावित विकास से भयभीत थे। अतः उन्होंने सर्वप्रथम यही धारणा व्यक्त करना प्रारम्भ किया कि भारत एक राष्ट्र ही नहीं है। उनके मतानुसार, राष्ट्रीयता तथा मुसलमानों में समरूपता नहीं थी, क्योंकि मुसलमान अल्पसंख्यक थे। जिन देशों में मुसलमान अधिसंख्यक हैं वहां इस्लाम ने राष्ट्रीयता को स्थान दे दिया है। भारत में मुसलमान एक सांस्कृतिक सत्व (अस्तित्व, तत्व) हैं।

क्या मुसलमान एक पृथक राष्ट्र का निर्माण करते हैं? आचार्य मोइन शाकिर के मतानुसार, इकबाल के पास इस प्रश्न का सुस्पष्ट उत्तर नहीं था। उनका मत था कि मुसलमान जातिगत, भाषाई अथवा भौगोलिक बंधनों से नहीं बंधे हुए हैं, बल्कि वे तो अपने साम्प्रदायिक (धार्मिक) भ्रातृत्व से बन्धे हुए हैं। उन्होंने सार रूप में यह व्यक्त किया कि भारत केवल एक राष्ट्र नहीं था। राष्ट्रीयता का विचार भिन्नताओं का विरूपण करेगा, जोकि इकबाल के मतानुसार, पूर्णरूप से अवांछित था। लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि इकबाल एकीकृत भारत के पक्ष में नहीं थे। वे मानते थे कि भारत में विभिन्न वर्गों का विलयीकरण संभव नहीं था। इसकी बजाय विभिन्न वर्गों (समुदायों) में परस्पर सामंजस्य एवं सहयोग हेतु प्रयास किये जाने चाहिए। उनके विचार में एक राष्ट्र की बातें ‘‘निर्थरक’’ थी। विभिन्न वर्गों (संप्रदायों) को पृथक-पृथक अस्तित्वों (तत्वों) के रूप में मान्यता देते हुए उन्हें अनुरक्षण प्रदान करने के इकबाल के अनुरोध से मुस्लिम राष्ट्रीयता को बढ़ावा मिला। इसी के फलस्वरूप वे पाकिस्तान के विचार के जनक बने।

आचार्य मोइन शाकिर के अनुसार मुस्लिम लीग अपने तार्किक हित साधन के लिए जिन भावनाओं का इकबाल की मुस्लिम राष्ट्रीयता की अवधारणा के रूप में वहन (प्रचार) कर रही थी, वह उचित (वैध) नहीं था। अर्थात् मुस्लिम लीग इकबाल के नाम का झूठा प्रचार – करते हुए फायदा उठाकर अपनी स्वार्थ सिद्धि करना चाहती थी। इकबाल ने भारत के विभाजन की बात कभी नहीं सोची थी। इसके विपरीत, सन् 1928 ई. में मुस्लिम लीग को दिये गये अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने उत्तरी भारत में मुसलमानों के लिए एक अलग राज्य का सुझाव दिया था। उन्होंने केवल ‘‘राज्य के अन्दर राज्य’’ (अर्थात् देश के अन्दर एक राज्य) की मांग की थी न कि एक पृथक राज्य (अर्थात् पथक देश जैसे पाकिस्तान) के लिए मांग की थी। आचार्य मोइन शाकिर आगे कहते हैं कि ‘‘इस प्रकार इकबाल की योजना का लीग द्वारा की गई विभाजन की मांग से किसी प्रकार का संबंध प्रतीत नहीं होता है। लेकिन लीग के नेतृत्व ने पाकिस्तान की मांग को बल तथा औचित्य (पवित्रता) प्रदान करने के लिए इकबाल के नाम का अनुचित लाभ उठाया। यहां तक कि जब जिन्ना तथा अन्य मुस्लिम नेतागणों द्वारा इस प्रकार के प्रयास किये जा रहे थे कि द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त में विश्वास करने वाले सक्रिय दलों में से हिन्दू-विरोधी शक्तियों को एकजुट किया जाये, इन प्रयासों को भी इकबाल की बजाय रहमत अली ने ज्यादा प्रोत्साहित किया। इकबाल गैर मुस्लिम समुदायों के प्रति अत्यधिक सम्मान रखते थे। राजत्व (राज्यतंत्र) के आधार के रूप में संकीर्ण एवं कट्टर पंथी राष्ट्रीयता के वे भारत के अन्दर तथा बाहर विरोधी थे। भारत की स्वतंत्रता के लिए उनमें भारी उत्साह था।

प्रजातंत्र
इकबाल के अनुसार, प्रजातंत्र आधुनिक पाश्चात्य व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता थी। यह प्रजातंत्र इस्लामी प्रजातंत्र पश्चिम का आविष्कार है। यह जनता की प्रभुसत्ता तथा स्वतंत्रता एवं समानता की अवधारणा में आस्था रखता है। पाश्चात्य प्रजातंत्र युरोप की भूतकालीन सामंती प्रभुत्व वाली संरचना के विरुद्ध प्रतिक्रिया का परिणाम था। इकबाल ने अनुभव किया कि प्रजातंत्र के इन लक्षणों (विशेषताओं) का इस्लाम के सिद्धान्तों से सामंजस्य नहीं है। पाश्चात्य प्रजातन्त्र की भांति इस्लामी प्रजातंत्र में प्रभुसत्ता जनता में अन्तर्निहित नहीं है। इस्लाम के अनुसार, प्रभुसत्ता ईश्वर (खुदा) में विद्यमान होती है। न कि जनता (लोगों) में। इकबाल के मतानुसार, पाश्चात्य अवधारणा के अन्तर्गत प्रजातंत्र समाज में मुट्ठीभर लोगों के लिए ही सार्थक होगा। यह अवधारणा शोषण के सिद्धान्तों पर आधारित है। पाश्चात्य प्रजातंत्र की बहुमत की अवधारणा हमेशा ही विवेकपूर्ण नहीं हो सकती। इकबाल के अनुसार, पाश्चात्य प्रजातंत्र की समानता और स्वतंत्रता वास्तविक नहीं है। प्रजातंत्र साम्राज्यवाद का साम्य (के समान) है, जो कि शोषकों के हितों को सहारा देता है। अतः जनता के शासन के रूप में यह कभी चरितार्थ नहीं हो सकता। इकबाल के मतानुसार, प्रजातंत्र के देश में ‘‘तानाशाही का दानव‘‘ क्रियाशील हो जाता है। पूंजीवाद के अन्तर्गत स्वतंत्रता एवं अन्य तथाकथित अधिकार केवल दिखावा मात्र है। प्रजातंत्र भूतकालीन अधिकारवादी शासन का ही विस्तारण है।

इस्लामिक प्रजातंत्र
इकबाल के पाश्चात्य प्रजातंत्र की अवधारणा को दोषपूर्ण बताया तथा इस्लामिक प्रजातंत्र को स्वीकार करने के लिए लोगों से आग्रह किया। इस्लामिक प्रजातंत्र ‘‘आर्थिक अवसरों के विस्तार से विकसित’’ नहीं हुआ है। यह उस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक मानव प्राणी प्रच्छन्न शक्ति का केन्द्र है। और इस शक्ति को एक निश्चित प्रकार से चरित्र के परिष्कार द्वारा विकसित किया जा सकता है। इस्लामिक प्रजातंत्र में नैतिक उद्देश्यों को अधिक महत्व दिया जाता है। इकबाल का प्रजातंत्र जनता (प्रजा अथवा लोगों) का प्रजातंत्र नहीं है, बल्कि इसका संबंध एकल व्यक्तियों से है। अर्थात् यह प्रजातंत्र व्यष्टि पर आधारित है न कि समष्टि पर। इसमें प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग है। प्रकारान्तर से यह प्रजातंत्र इस मान्यता पर आधारित है कि एक-एक व्यक्ति के हित में संपूर्ण समाज का हित है। उनको विश्वास था कि इस्लामिक प्रजातंत्र निरंकुश एकतंत्र के रूप में विकृत नहीं होगा। इस्लामिक प्रजातंत्र का आधार ‘‘आर्थिक शोषण के स्थान पर बेहतर आध्यात्मिक शुद्धिकरण एवं बेहतर आर्थिक समायोजन’’ है। इकबाल की मान्यता थी कि पाश्चात्य पद्धति के प्रजातंत्र की बजाय एकेश्वर की अवधारणा पर आधारित सरकार अधिक उपयक्त रहेगी। इस्लामिक प्रजातंत्र के सिद्धान्त इस प्रकार होंगे-(1) ईश्वर का एकत्व (केवल एक ही ईश्वर में विश्वास करना), (2) विधि की अनुपालना, तथा (3) सहिष्णुता एवं सर्वमुक्तिवाद । इकबाल ने पाश्चात्य देशों में अंगीकृत प्रजातांत्रिक संस्थाओं की। सराहना की। लेकिन वे चाहते थे कि इन संस्थाओं को इस्लाम के सिद्धान्तों के अनुरूप होना चाहिए। भारत के संदर्भ में भी इकबाल की मान्यता थी कि पाश्चात्य प्रजातंत्र यहां के लिए उपयुक्त नहीं था। उनका मत था कि यदि भारत में प्रजातंत्र अंगीकृत किया जाता है तो यहां ‘‘प्रजातंत्र की आड़ में साम्प्रदायिक कुलीन तंत्र’’ प्रबल होगा। अतः उन्होंने प्रजातांत्रिक संस्थाओं में सुधार हेतु आग्रह किया। वे चाहते थे कि धार्मिक एवं नैतिक विधान द्वारा नियंत्रित एक शासक को शासन स्थापित करना चाहिए। तथा आध्यात्मिक आदर्शों को एक मानव संगठन के माध्यम से कार्यान्वित करवाना इस शासन का लक्ष्य होना चाहिए।

समाजवाद
इकबाल कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित समाजवाद की अवधारणा से इसलिए प्रभावित हुए, क्योंकि इस अवधारणा के अन्तर्गत पूंजीवाद, प्रजातंत्र तथा राष्ट्रवाद को अस्वीकृत किया गया है। उन्होंने इस्लाम तथा मार्क्सवादी विचारधारा में अनेक बिन्दुओं पर समानतायें अनुभव की। उन्होंने मत प्रकट किया कि इस्लाम तथा मार्क्सवाद दोनों के ही उद्देश्य विश्व में एकतन्त्र का विनाश करना तथा पूंजीवाद के प्रति विमुखता का दृष्टिकोण रखना है। दोनों ही परोहिताई तथा चर्च को एक संस्था के रूप में अस्वीकृत करते हैं। उनका मानना था कि इस्लाम एक प्रकार का समाजवाद है जिसका कि मुसलमान प्रयोग नहीं करते हैं। उनके अनसार, मार्क्सवाद का संबंध केवल भौतिक पदार्थों से है तथा यह आत्मा एवं आध्यात्मिकता की उपेक्षा करता है। उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या को भी अस्वीकृत किया। उनके मतानुसार, यह पाश्चात्य प्रज्ञावाद की उपज है। उनकी मान्यता थी कि मार्क्सवाद की सबसे बड़ी कमी इसके द्वारा ईश्वर तथा आध्यात्मिक मूल्यों का प्रतिवाद किया जाना है। उनके अनुसार, यह मार्क्सवाद का बुरा तथा बिगड़ा हुआ पक्ष था। इकबाल राज्य तथा शासन की मार्क्सवादी अवधारणा से भी सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि वर्गहीन समाज की स्थापना नहीं हो सकती तथा राज्य शिथिल नहीं होगा।

व्यक्ति (व्यष्टि)
एक व्यक्ति समाज से अपृथकरणीय है। उसके वास्तविक अहं को समाज में पूर्णता प्राप्त होती है। व्यक्ति का सर्वोच्च उद्देश्य समाज से संयोजन स्थापित करना है। वह अपने शरीर तथा आत्मा के लिए समाज का ऋणी होता है। व्यक्ति का समाज तथा समुदाय उसके लिए सर्वोच्च सत्ता है। समाज तथा व्यक्ति के हित परस्पर विरोधी नहीं हैं। वे पारस्परिक एवं एक दूसरे के संपूरक हैं। इस्लाम व्यक्ति के महत्व को मान्यता देता है तथा उसे ईश्वर (खुदा) की सेवार्थ सर्वस्व न्यौछावर करने हेतु अनुशासित करता है। अनियंत्रित अहं अथवा अनुशासन की कमी अथवा स्वार्थपरायणता से युक्त व्यक्तिवाद से अराजकता का पथ प्रशस्त हो सकता है। अच्छाई मनुष्य तथा ईश्वर के एकाकार होने से प्राप्त हो सकती है। मनुष्य तथा ईश्वर के एकाकार (संयोजन) से मनुष्य को गढ़ शक्तियां उपलब्ध हो जाती हैं। ईश्वर के साथ एकाकार होने की अवधारणा भाईचारे की भावना को पोषित करती है। इस्लामिक समाज ऐसा समाज नहीं है जो कि मानव निर्मित विधान से अनुशासित होता है, बल्कि वह कुरान द्वारा प्रतिपादित ईश्वरीय विधान द्वारा अनुशासित होता है। इसके शब्द गूढ़ तथा शाश्वत हैं। यदि एक व्यक्ति सामुदायिक (साम्प्रदायिक) हितों के विरुद्ध जाता है तो उसे स्वतंत्रता नहीं मिल सकती। इकबाल के अनुसार, आज्ञापालन एक व्यक्ति का सर्वोच्च गुण है। इकबाल ने संपूर्ण रूप से अधिकारों का विवेचन नहीं किया है। व्यक्ति उन्हीं अधिकारों का उपभोग कर सकता है जिनके लिए कुरान का विधान अनुमति देता है।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणीः 1) नीचे दिये गये स्थान का अपने उत्तर के लिए प्रयोग करें।
2) अपने उत्तर को इस इकाई के अन्त में दिये गये उत्तर के आधार पर जाँचें।
1) राष्ट्रवाद के संबंध में इकबाल के दृष्टिकोण का विवेचन कीजिये।
2) पश्चिमी प्रजातंत्र के साथ-साथ इस्लामी प्रजातंत्र पर इकबाल के दृष्टिकोण की तुलना कीजिये।