तत्वमीमांसा क्या है | परिभाषा जानकारी तत्व मीमांसा मीनिंग इन हिंदी अर्थ इतिहास Metaphysics in hindi

By   October 30, 2020

Metaphysics in hindi  तत्वमीमांसा क्या है | परिभाषा जानकारी तत्व मीमांसा मीनिंग इन हिंदी अर्थ इतिहास का शिक्षा में योगदान ?

शब्दावली
अनिवार्य सहयोग लोगों के बीच ऐसा सहयोग जो सत्ता पक्ष द्वारा अनिवार्य रूप से उन पर थोपा जाता है।
गतिशील कोई वस्तु या बल जो गतिशील अवस्था में हो। यह समाज में सामाजिक परिवर्तन का द्योतक है।
विकास एक दीर्घ समयावधि में हुए धीमे परिवर्तनों की प्रक्रिया जैसे अमीबा यथा कोशकीय प्राणी से जटिल बहुकोशिकीय प्राणी, यथा मानव के रूप में विकसित होता है।
तत्वमीमांसीय शाब्दिक अर्थ में, तत्वमीमांसा दर्शनशास्त्र की वह शाखा होती है जो प्रकृति तथा चिंतन के प्रथम सिद्धांतों का अन्वेषण करती है। कॉम्ट के लिए यह मस्तिष्क के विकास की एक अवस्था है जिसमें मस्तिष्क किसी घटना को अमूर्त अस्तित्वों या शक्तियों जैसे प्रकृति के माध्यम से विवेचना करता है। इस अवस्था में मानव प्राणी इस विश्व का अर्थ सार तत्वों आदर्शों आदि के रूप में विवेचित करते हैं।
पद्धति किसी सामाजिक घटना के बारे में सामग्री या तथ्य इकट्ठा करने का तरीका, जैसे प्रेक्षण, साक्षात्कार, सर्वेक्षण आदि की पद्धति।
सकारात्मक शाब्दिक रूप से सकारात्मक का अर्थ है कोई भी चीज जो हाँ में हो। कॉम्ट के लिए यह मस्तिष्क के विकास की अंतिम अवस्था है। यहां पर मानव के अस्तित्व के मूल स्रोतों अंतिम साध्य की खोज बंद हो जाती है। इसकी बजाय मानव घटनाओं को देखना तथा इन घटनाओं के बीच विद्यमान नियमित कड़ियों को स्थापित करना प्रारंभ कर देते हैं। इस प्रकार, सकारात्मक अवस्था में मानव तथ्यों के बीच कड़ी स्थापित करने वाले तथा सामाजिक जीवन को नियंत्रित करने वाले सामाजिक नियमों की खोज करने लगते हैं।
विज्ञान प्रेक्षण, अध्ययन तथा परीक्षण से हासिल हुआ व्यवस्थित ज्ञान। वैज्ञानिक ज्ञान का परीक्षण किया जा सकता है, प्रमाणित अथवा सिद्ध किया जा सकता है।
स्थैतिक कोई भी वस्तु या बल जो सामंजस्य में है या जो गतिशील नहीं होता। समाज में यह स्थिति समाज की संरचना की धारणा पर लागू होती है।
धर्मशास्त्रीय इसका शाब्दिक अर्थ है धर्म का अध्ययन किंतु कॉम्ट के लिए यह मस्तिष्क के विकास की पहली अवस्था है। इस अवस्था में मस्तिष्क घटनाओं को मानव प्राणी के तुलनीय प्राणियों या शक्तियों के द्वारा विवेचित करता है। यहां सभी विवेचन प्रेतात्माओं तथा दैविक शक्तियों से संबंधित मिथकों के रूप में होते है।
एकीकृत करना विज्ञान का व्यापक स्वरूप जो अस्तित्व के सभी पहलुओं का विवेचन करता स्वैच्छिक सहयोग लोगों के बीच ऐसा सहयोग जो उन पर आरोपित नहीं होता अपितु उनके द्वारा स्वैच्छिक रूप से स्वीकार किया जाता है।
यूटोपियाई वह जो आदर्श परंतु अव्यवहारिक सुधार के बाद ऐसे समाज की कल्पना करे, जिसमें एक आदर्श सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था है।

प्रस्तावना
यूरोप में समाजशास्त्र के विकास के बारे में इकाई 1 में आपने पहले ही पृष्ठभूमि के तौर पर काफी पढ़ा है। अब आपको समाजशास्त्र के प्रवर्तक विद्वानों से परिचित करवाया जाएगा। इस इकाई में हमने केवल ऑगस्ट कॉम्ट तथा हर्बर्ट स्पेंसर पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किया है। अगली इकाई में आपको कुछ अन्य समाजशास्त्रियों जैसे जॉर्ज जिमेल, थोर्टीन वेब्लेन तथा विल्फ्रेडो परेटो से अवगत करवाया जाएगा।

इस इकाई में समाज से संबंधित विषयों के बारे में समाजशास्त्रियों के विचारों को प्रस्तुत किया गया है। भाग 2.2 में समाजशास्त्र के प्रारंभिक उद्भव को वर्णित किया गया है। भाग 2.3 में ऑगस्ट कॉम्ट के सामाजिक परिवेश, उसके मुख्य विचारों और उस समय के समाजशास्त्र पर उसके विचारों के प्रभाव की चर्चा की गई है। भाग 2.4 में हर्बर्ट स्पेंसर के सामाजिक परिवेश, उसके मुख्य विचारों तथा समकालीन समाजशास्त्र में उसके विचारों के महत्व को दर्शाया गया है। अंत में 2.5 में इस इकाई का सार संक्षेप में दिया गया है।

 प्रारंभिक उद्भव
इससे पहले की इकाई (इकाई 1, ई.एस.ओ.-13) में आपने यूरोप में समाजशास्त्र के उद्भव के बारे में जानकारी प्राप्त की थी। इस इकाई में हमने समाजशास्त्र के संस्थापकों की सामाजिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करने के लिए समाजशास्त्र के प्रारंभिक उद्भव का वर्णन किया है। समाजशास्त्र के सैद्धांतिक विकास की कहानी जानने हेतु हमें प्रवर्तक समाजशास्त्रियों के मुख्य विचारों को अवश्य जानना चाहिए। उनकी रचनाएं समाजशास्त्र के सामाजिक महत्व को प्रतिबिंबित करती हैं और उनके विचार ही समाजशास्त्र के मूल आधार हैं।

यह सभी को मालूम है कि मनुष्य की हमेशा से अपने व्यवहार के स्रोतों के बारे में जानने को उत्सुकता रही है। आपने अपना कुछ न कुछ समय समाज के आश्चर्यजनक ढंगों को जानने में अवश्य खर्च किया होगा। आपने यह उत्सकता अवश्य जाहिर की होगी कि किसी एक प्रकार का व्यवहार क्यों किया जाता है? हमारा समाज दूसरे लोगों के समाज से इतना भिन्न क्यों है? ये प्रश्न जिस तरह आज हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं, वैसे ही ये हमारे पूर्वजों के ध्यान को भी आकर्षित करते रहे होंगे।

लोगों ने इन प्रश्नों के उत्तर हँढने के प्रयास किए हैं। लेकिन स्वयं को और समाज को समझने के उनके प्रयास उन चिंतनधाराओं पर निर्भर रहे जो उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी मिली थीं। ये चिंतन प्रायरू धार्मिक विचारों के रूप में व्यक्त हुए थे।

मानव व्यवहार और मानव समाज का व्यवस्थित अध्ययन अपेक्षाकृत अभी हाल में ही प्रारंभ हुआ है। इसका प्रारंभ अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के यूरोपीय समाज में देखा जा सकता है। इस नए दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि क्रांतिकारी परिवर्तनों से जुड़ी हुई है। ये परिवर्तन प्रबोधन (म्दसपहीजमदउमदज), फ्रांसीसी क्रांति तथा औद्योगिक क्रांति द्वारा लाए गए थे। पारंपरिक जीवन पद्धति के ध्वस्त हो जाने के कारण उन्हें सामाजिक तथा प्राकृतिक दोनों ही प्रकार की दुनिया को समझने के लिए नए तरीकों को विकसित करना पड़ा।

प्राकृतिक वैज्ञानिकों ने जिस तरह जीवन तथा प्रकृति के रहस्यों को उद्घाटित करने का प्रयत्न लिया उसी प्रकार समाजशास्त्रियों ने सामाजिक जीवन की जटिलताओं का विवेचन करने का प्रयत्न शुरू किया और इस प्रकार समाज विज्ञान का जन्म हुआ। इसके आरंभ का दिग्दर्शन करने के लिए हमने ऑगस्ट कॉम्ट (1798-1857) से शुरुआत की है। कॉम्ट को समाजशास्त्र का संस्थापक माना जाता है, उसने ही इस विज्ञान को समाजशास्त्र की संज्ञा प्रदान की। इसके पश्चात् हमने समाजशास्त्र के दूसरे प्रवर्तक और अंग्रेज विद्वान हर्बर्ट स्पेंसर (1820-1903) के बारे में चर्चा की है।

कॉम्ट के विचारों पर चर्चा करने के पीछे एक ही लक्ष्य है कि समाजशास्त्र के आरंभिक प्रमुख तत्वों और प्रवृत्तियों के बारे में आपको स्पष्ट जानकारी हासिल हो।

 समकालीन समाजशास्त्र पर कॉम्ट के विचारों का प्रभाव
अब आपको यह महसूस हो गया होगा कि समाज के विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र का आरंभ और विकास का श्रेय ऑगस्ट कॉम्ट के योगदानों को जाता है। उसके विचारों ने सोरोकिन, जे एस मिल, लेस्टर वार्ड, मैक्स वेबर, दर्खाइम तथा अन्य प्रमुख समाजशास्त्रियों को प्रभावित किया।

कॉम्ट के तीन अवस्थाओं के नियम को समकालीन समाजशास्त्रियों ने कमोबेश अस्वीकार सा ही कर दिया है। लेकिन विचारों तथा संस्कृति के विकास में अवस्थाओं की अनिवार्य धारणाओं को कुछ संशोधित रूप में स्वीकार किया गया है। इसको सोरोकिन जैसे समाजशास्त्रियों की कृतियों मे देखा जा सकता है।

कॉम्ट के विचारों में उन अधिकांश प्रवृत्तियों को पहले ही देखा जा सकता है जो आजकल के समाजशास्त्र में दृष्टिगोचर होती हैं। उसके समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र तथा पद्धतियों विषयक विचारों को बाद के समाजशास्त्र में भी देखा जा सकता है। अगले भाग में एक अन्य समाजशास्त्री, हर्बर्ट स्पेंसर, के बारे में बताया गया है। कॉम्ट के विचारों की तरह स्पेंसर के विचार समाजशास्त्र के इतिहास में काफी महत्वपूर्ण हैं।

सारांश
इस इकाई में आपने समाजशास्त्र के उदय के बारे में पढ़ा। आपने यह जाना कि मानव व्यवहार तथा मानव समाज का व्यवस्थित अध्ययन अपेक्षाकृतं अभी हाल में शुरू हुआ है। हमने ऑगस्ट कॉम्ट (1798-1857) के जीवन और उसके सामाजिक परिवेश के बारे में भी बताया। वह समाजशास्त्र का प्रवर्तक माना जाता है। उसने समाज के विज्ञान को समाजशास्त्र की संज्ञा दी। हमने कॉम्ट के मुख्य विचारों के बारे में भी बताया। ये मुख्य विचार इस प्रकार हैं
ऽ तीन अवस्थाओं का नियमः धर्मशास्त्रीय अवस्था, तत्वमीमांसीय अवस्था तथा सकारात्मक अवस्था
ऽ विज्ञानों का श्रेणीक्रम
ऽ स्थैतिक तथा गतिशील समाजशास्त्र

हमने समकालीन समाजशास्त्र में कॉम्ट के विचारों के महत्व पर भी चर्चा की।
इसी इकाई में हमने अंग्रेज समाजशास्त्री, हर्बर्ट स्पेंसर, के जीवन और उसके सामाजिक परिवेश के बारे में चर्चा की।
स्पेंसर को समाजशास्त्र का दूसरा प्रवर्तक माना जाता है। स्पेंसर के निम्नलिखित मुख्य विचारों पर भी हमने चर्चा की।
ऽ विकासवादी सिद्धांत
ऽ जैविक अनुरूपता
ऽ समाजों का विकास, पहले संघटन के रूप में सरलता से सम्मिश्रता की ओर। दूसरा सैन्य समाज से औद्योगिक समाज में परिवर्तन के रूप में।

अंत में हमने समकालीन समाजशास्त्र में स्पेंसर के विचारों के महत्व पर चर्चा की।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
कोजर, लुइस ए. 1971. मास्टर्स आफ सोशियोलॉजिकल थॉट आइडियाज इन हिस्टॉरिकल एण्ड सोशल कॉनटेक्स्ट. हरकोर्ट ब्रेस जोवोनोविकः न्यूयार्क
हयूबर्ट, रेने 1963. ऐनसाइकलोपीडिया आफ सोशल साइंसिज. वाल्यूम प्-प्ट, पृष्ठ 151-142, मैकमिलन कम्पनीः न्यूयार्क
टिमाशेफ, निकोलस एस. 1967. सोशियोलॉजिकल थियरीरू इटस नेचर एण्ड ग्रोथ. रैंडम हाउसः न्यूयार्क

इकाई 2 समाजशास्त्र के संस्थापक – I
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
प्रारंभिक उद्भव
ऑगस्ट कॉम्ट (1798-1857)
जीवन परिचय
कॉम्ट का सामाजिक परिवेश
मुख्य विचार
समकालीन समाजशास्त्र पर कॉम्ट के विचारों का प्रभाव
हर्बर्ट स्पेंसर (1820-1903)
जीवन परिचय
स्पेंसर का सामाजिक परिवेश
मुख्य विचार
समकालीन समाजशास्त्र पर स्पेंसर के विचारों का प्रभाव
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

 उद्देश्य
इस इकाई में समाजशास्त्र के दो संस्थापकों के मुख्य विचारों पर चर्चा की गई है। इस इकाई के अध्ययन के पश्चात् आपके द्वारा संभव होगा
ऽ ऑगस्ट कॉम्ट तथा हर्बर्ट स्पेंसर के जीवन परिचय की रूपरेखा देना
ऽ उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि की व्याख्या करना
ऽ काम्ट तथा स्पेंसर के मुख्य विचारों की विवेचना
ऽ समकालीन समाजशास्त्र में इन प्रारंभिक चिंतकों के विचारों के प्रभाव को दर्शाना।