धातु कर्म किसे कहते हैं (Metallurgy in hindi) धातुकर्म की परिभाषा क्या है ? धातु क्रम के चरण in english

By  

धातु कर्म किसे कहते हैं (Metallurgy in hindi) धातुकर्म की परिभाषा क्या है ? धातु क्रम के चरण in english

धातुकर्म (Metallurgy) : विश्व के अधिकांश तत्व धात्विक प्रकृति के होते है। आवर्त सारणी के लम्बे रूप में बोरोन से लेकर सीढ़ीनुमा रेखाचित्र दे तो बायीं ओर के सारे तत्व (हाइड्रोजन के अतिरिक्त) धात्विक प्रकृति के होते है ये सब धातुएं अलग अलग होते हुए भी कुछ बातों में समान होती है , जैसे –

  • ये विद्युत और ऊष्मा की सुचालक होती है।
  • इन सबमे धात्विक चमक होती है।
  • ये तन्य होती है अर्थात इनके तार खींचे जा सकते है।
  • ये आघातवर्धनीय होती है अर्थात इन्हें पीटने से चादर बन सकती है जिससे इन्हें कोई भी आकार दिया जा सकता है।
  • ये इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन बनाते है अत: इन्हें धनविद्युती तत्व भी कहा जाता है।
  • इनके क्वथनांक बहुत ऊँचे होते है अर्थात अधिक होते है।
  • इनके घनत्व सामान्यतया बहुत अधिक होते है तथा मर्करी एक द्रव है , इस अपवाद को छोड़कर सामान्यतया ये बहुत कठोर प्रकृति के ठोस होते है।
  • प्रकृति में ये धातुएं मुक्त या संयुक्त अवस्था में पायी जाती है। सोने , चाँदी और प्लैटिनम जैसी कुछ उत्कृष्ट धातुएं ऐसी है जो प्रकृति में मुक्त अवस्था में पायी जाती है , शेष समस्त धातुएं उनके यौगिकों के रूप में पायी जाती है। ये यौगिक रेत और अन्य कई अशुद्धियों के साथ संयुक्त रहते है , इन्हें हम खनिज कहते है। खनिज को अंग्रेजी में मिनरल कहा जाता है।

खनिज की परिभाषा : पृथ्वी पर पाए जाने वाले ऐसे पदार्थ जिनमें रेत , पत्थर आदि अशुद्धियों के साथ विभिन्न धातुओं के कुछ यौगिक भी मिश्रित हो , खनिज कहलाते है।

  • वे खनिज जिनसे सुविधापूर्वक और कम खर्च में विभिन्न धातुओं का निष्कर्षण किया जा सके , अयस्क कहलाते है। स्पष्ट है कि प्रत्येक अयस्क तो खनिज ही होगा लेकिन प्रत्येक खनिज अयस्क नहीं हो सकता।
  • किसी धातु के अयस्क से उस धातु को प्राप्त करने की प्रक्रियाओं को धातुकर्म कहा जाता है।

धातुकर्म के मूल सिद्धान्त (basic principles of metallurgy)

विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण की विधियों को उनकी सक्रियता के आधार पर तय किया जाता है। धातुओं की सक्रियता वस्तुतः उनके परमाणुओं द्वारा त्यागे गए इलेक्ट्रॉनों की प्रवृति का माप है –

M → Mn+ + ne

एक धातु परमाणु जितनी आसानी से इलेक्ट्रॉनों को त्यागकर धनायन बना सकता है वह धातु उतना ही सक्रीय और प्रबल अपचायक होता है। इसके विपरीत जो धातु आयन आसानी से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करके धातु परमाणु बना ले वे धातु उतने ही कम सक्रीय और दुर्बल अपचायक होते है। अत: यदि किसी धातु की पत्ती को उसके आयनों के विलयन में डुबोया जाए तो निम्नलिखित साम्य स्थापित होता है –

M(S) → Mn+ + ne

अब यदि धातु की ऑक्सीकृत होने की अर्थात इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति बहुत अधिक होगी तो धातु की पत्ती अथवा इलेक्ट्रॉड पर इलेक्ट्रॉनों की संख्या कुछ बढ़ जाएगी तथा विलयन की तुलना में इलेक्ट्रोड पर कुछ ऋणात्मक विभव उत्पन्न हो जायेगा इसके विपरीत , यदि धातु आयनों की इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति बहुत अधिक होगी तो विलयन की तुलना में इलेक्ट्रोड पर कुछ धनात्मक विभव उत्पन्न हो जायेगा।

इस प्रकार धातु और उसके आयनों के मध्य उत्पन्न हुए विभव को इलेक्ट्रोड विभव कहा जाता है।

यदि इस प्रकार के दो इलेक्ट्रोडो को परस्पर जोड़ दिया जाए तो एक गैल्वेनी सेल बन जाता है। एक गैल्वेनी सेल के दोनों इलेक्ट्रोडो के विभव के अंतर को उस सेल का विद्युत वाहक बल कहा जाता है। किसी सेल के लिए EMF का जितना अधिक मान होगा उससे उतनी ही अधिक विद्युत प्राप्त की जा सकेगी।

मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड का विभव शून्य मानते है। इस सेल को बनाने के लिए 1M अम्ल (H+) के विलयन में एक प्लैटिनम की इलेक्ट्रोड डालकर उसमे 25 डिग्री सेल्सियस (298 केल्विन) ताप और एक वायुमंडल (1 atm) दाब पर हाइड्रोजन गैस प्रवाहित करते है –

2H+ + 2e → H2

E0 = 0.00V

इस मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड के साथ किसी धात्विक इलेक्ट्रोड को जोड़ने पर बने हुए सेल का जो विद्युत वाहक बल होता है , वही इस धात्विक इलेक्ट्रोड का मानक अपचयन विभव होता है। विभिन्न धातुओं के लिए बढ़ते हुए मानक अपचयन विभवों के मानों की श्रेणी को विद्युत रासायनिक श्रेणी या सक्रियता श्रेणी कहा जाता है। इस श्रेणी को आगे सारणी में दर्शाया गया है।

ऊपर की तरफ बढ़ता   हुए ↑

इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति

ऑक्सीकृत होने की प्रवृति

अपचायक के रूप में प्रबलता

तत्व अर्ध सेल क्रिया अथवा इलेक्ट्रोड क्रिया E0(V) निचे की तरफ बढ़ता हुआ ↓

इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति

अपचयित होने की प्रवृत्ति

ऑक्सीकारक के रूप में प्रबलता

Li Li(aq) + e → Li(S) -3.05
K K+ (aq) + e → K (s) -2.93
Ba Ba2+ + 2e → Ba -2.90
Ca Ca2+ + 2e → Ca -2.87
Na Na+ + e → Na -2.71
Mg Mg2+ + 2e → Mg -2.37
Al Al3+ + 3e → Al -1.66
Zn Zn2+ + 2e → Zn -0.76
Cr Cr3+ + 3e → Cr -0.74
Fe Fe2+ + 2e → Fe -0.44
Cd Cd2+ + 2e → Cd -0.40
Pb PbSO4 + 2e → Pb + SO42- -0.31
Co Co2+ + 2e → Co -0.28
Ni Ni2+ + 2e → Ni -0.25
Sn Sn2+ + 2e → Sn -0.14
Pb Pb2+ + 2e → Pb -0.13
H2 2H+ + 2e → H2 (standard electrode) -0.00
Cu Cu2+ + 2e → Cu +0.34
Hg Hg22+ + 2e → 2Hg +0.79
Ag Ag+ + e → Ag +0.80
Hg Hg2+ + 2e → Hg +0.85
Au Au3+ + 3e → Au +1.42

सक्रियता श्रेणी की मुख्य विशेषताएं अथवा लक्षण

  1. विद्युत रासायनिक श्रेणी में धातुओं की अपचयन क्षमता ऊपर से निचे की ओर जाने पर घटती जाती है।
  2. किसी धातु की अपचयन क्षमता इलेक्ट्रॉन त्यागने का माप होती है अर्थात इससे धनविद्युती लक्षण का ज्ञान होता है। अत: कहा जा सकता है कि श्रेणी में ऊपर से निचे की तरफ जाने पर धातुओं का धनविद्युती लक्षण घटता जाता है।
  3. जिन परमाणुओं या आयनों की इलेक्ट्रॉन त्यागने की शक्ति कम होती है उनकी इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की शक्ति अर्थात ऑक्सीकरण क्षमता अधिक होती है अत: ऊपर से निचे की ओर जाने पर धातुओं की ऑक्सीकरण क्षमता बढती जाती है।

सक्रियता श्रेणी के अनुप्रयोग

सक्रियता श्रेणी के अनेक अनुप्रयोग है जिनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित है –

  1. धातुओं का धनविद्युती गुण: धातु का धातु आयन में परिवर्तन धनविद्युती गुण कहलाता है। स्पष्ट है कि जो परमाणु अपने बाह्यतम कोश से सुविधापूर्वक इलेक्ट्रॉन का परित्याग करे वह उच्चतम धनविद्युती गुण (अर्थात निम्नतम ऋणविद्युती गुण) प्रदर्शित करता है। इसके विपरीत , जो परमाणु अपने बाह्यतम कोश से कठिनाई से इलेक्ट्रॉन का परित्याग करे वह निम्नतम धनविद्युती गुण (अर्थात उच्चतम ऋणविद्युती गुण) प्रदर्शित करता है। सारणी के आधार पर कहा जा सकता है कि गोल्ड निम्नतम धनविद्युती गुण और लिथियम उच्चतम धनविद्युती गुण प्रदर्शित करते है।
  2. धातुओं का विस्थापन: जिस धातु की आयन बनाने की प्रवृत्ति अधिक होगी वह अन्य धातु को उसके आयनों अवक्षेपित कर देगा। अत: इस श्रेणी में ऊपर विद्यमान तत्व अपने से निचे स्थित सभी धातु आयनों को उनके विलयनों से विस्थापित करके उन्हें धातु रूप में अवक्षेपित कर देते है। अत: AgNO3विलयन में cu छीलन डालने पर Ag अवक्षेपित हो जायेगा तथा CuSO4 में लोहे की छीलन डालने से ताम्बा अवक्षेपित होगा अर्थात

2AgNO3 + Cu → Cu(NO3)2 + 2Ag

CuSO4 + Fe → FeSO4 + Cu

धातुओं के इसी गुण का उपयोग विभिन्न धातुओं के निष्कर्षण में किया जाता है।

  1. धातुओं द्वारा अम्लों में से हाइड्रोजन गैस का मुक्त होना: जिस धातु का मानक विभव ऋणात्मक होगा उस तत्व की तनु अम्लों से हाइड्रोजन गैस मुक्त करने की प्रवृत्ति होगी। यह मान जितना अधिक ऋणात्मक होगा तनु अम्लों से हाइड्रोजन मुक्त करने की प्रवृत्ति उतनी ही अधिक होगी। यही कारण है कि लिथियम , सोडियम , पोटेशियम आदि धातुएं ठन्डे जल से ही क्रिया करके H2मुक्त करते है। मैग्नीशियम , एलुमिनियम आदि धातुएं उबलते हुए जल के साथ क्रिया करती है। आयरन की भाप के साथ क्रिया होती है। कैडमियम , कोबाल्ट आदि धातुएँ तनु अम्लों से हाइड्रोजन गैस मुक्त करते है। कॉपर , सिल्वर आदि धातुएं सान्द्र अम्लों के साथ क्रिया करती है। जबकि गोल्ड , प्लेटिनम आदि धातुएं सान्द्र अम्लों के साथ भी क्रिया नहीं करते है।
  2. धात्विक ऑक्साइडो का तापीय अपघटन:  धात्विक ऑक्साइडो का स्थायित्व धातुओं के धनविद्युती गुण बढने से बढ़ता है। उदाहरण : विद्युत रासायनिक श्रेणी में कॉपर से निचे स्थित धातुओं में धन विद्युती गुण कम होता है अत: इनके ऑक्साइड गर्म करने पर विघटित होकर ऑक्सीजन गैस मुक्त करते है। अत:

2Ag2O → 4Ag + O2

2HgO → 2Hg + O2

  1. धात्विक ऑक्साइडो का हाइड्रोजन द्वारा अपचयन: विद्युत रासायनिक श्रेणी में लोहे और इससे नीचे स्थित धातुओं के ऑक्साइड हाइड्रोजन द्वारा अपचयित होकर धातु मुक्त करते है। उदाहरण –

Fe3O4 + 4H2 → 3Fe + 4H2O

CuO + H2 → Cu + H2O

  1. धातुओं का संक्षारण: धातुओं का वायु या रासायनिक पदार्थो द्वारा क्षय होना संक्षारण कहलाता है। उदाहरण , लोहे को नम वायुमंडल में रखने पर इस पर जंग लग जाता है जो कि लोहे की परत से हट जाता है और लौहे का क्षय होता है। इस प्रक्रम को रोकने हेतु धातुओं पर उससे कम क्रियाशील धातु की परत चढ़ा दी जाती है जिससे संक्षारण रुक जाता है। लोहे पर सामान्यतया जिंक परत चढ़ाई जाती है। इस प्रक्रम को लोहे का गैल्वेनीकरण कहते है।

धातुकर्म की प्रक्रियाएँ (metallurgical processes)

किसी अयस्क से शुद्ध धातु को प्राप्त करना धातुकर्म कहलाता है। यह प्रक्रिया प्रमुख रूप से तीन पदों में संपन्न होती है –

  1. अयस्कों का सांद्रण
  2. सांद्रित अयस्क से धातुओं का निष्कर्षण
  3. धातुओं का शुद्धिकरण अथवा शोधन।

इन सब प्रक्रियाओं का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार है –

  1. अयस्कों का सांद्रण: अयस्कों को चट्टानों , खानों आदि से प्राप्त किया जाता है अत: अयस्क में मिट्टी , कंकड़ , पत्थर आदि की अशुद्धियाँ काफी मात्रा में मिली रहती है। तथा उसमे धातु यौगिक की प्रतिशत मात्रा काफी कम होती है। अयस्को में विद्यमान इन अशुद्धियों को आद्यात्री अथवा गैंग या अपद्रव्य अथवा मैट्रिक्स कहा जाता है। अयस्क को इन अशुद्धियो से मुक्त करके उसमे धातु यौगिक की प्रतिशत मात्रा को बढाने की प्रक्रिया ही अयस्कों का सांद्रण कहलाती है। अयस्कों का सांद्रण करने से पहले खदानों से प्राप्त अयस्कों के बड़े बड़े टुकड़ों को कूट पीसकर महीन चूर्ण बना लिया जाता है। इसके लिए दलित्र अथवा क्रशर और स्टैम्प मिल का प्रयोग किया जाता है।

इस प्रकार अयस्क के पिसे हुए चूर्ण का विभिन्न विधियों द्वारा सांद्रण किया जाता है। इसकी कुछ प्रमुख विधियों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार है –

(i) गुरुत्वीय पृथक्करण विधि (gravity separation method) : यह विधि इस सिद्धांत पर आधारित है कि यदि अयस्क को जल की धारा में रखा जाए तो कम घनत्व होने के कारण मिट्टी , रेत आदि तो बहकर निकल जाते है तथा उच्च घनत्व वाले भारी धातु अयस्क के कण पैंदे में एकत्रित होते जाते है।

(ii) झाग प्लवन विधि (froth flotation method) : यह विधि इस सिद्धांत पर आधारित है कि अयस्क और आद्यात्री की तेल और पानी में गिला होने की प्रवृत्ति अलग अलग होती है। आद्यात्री जल के साथ शीघ्र गीली होती है जबकि अयस्क की प्रवृत्ति तेल के साथ गिला होने की होती है। यह विधि मुख्य रूप से सल्फाइड अयस्कों के सांद्रण में प्रयुक्त की जाती है।

एक बड़े पात्र में पानी और तेल का मिश्रण लेकर उसमें बारीक चूर्ण किया हुआ अयस्क डालते है तथा फिर एक पाइप के द्वारा उसमें उच्च दाब पर वायु को प्रवाहित करते है। झाग बनते है तथा सल्फाइड अयस्क के कण झाग के साथ तैरकर ऊपर तैलीय सतह पर आ जाते है जबकि अशुद्धियाँ वाली आद्यात्री पात्र के पैंदे में एकत्रित हो जाती है।

(iii) चुम्बकीय पृथक्करण विधि (magnetic separation method) : यह विधि उन अयस्कों के सांद्रण में प्रयुक्त की जाती है जिनमें चुम्बकीय गुण पाए जाते है या अचुम्बकीय अयस्क के साथ कोई अन्य चुम्बकीय अयस्क की अशुद्धि मिश्रित होती है। इस विधि में बारीक पिसे हुए अयस्क चूर्ण को एक ऐसे पट्टे (बेल्ट) पर धीरे धीरे गिराया जाता है जो दो विद्युत चुम्बकों पर घूमता रहता है। इस प्रकार घूमते हुए पट्टे से जब अयस्क चूर्ण निचे गिरता है तो चुम्बकीय गुणों वाले कण चुम्बकीय आकर्षण के कारण पट्टे की तरफ गिरते जाते है जबकि अचुम्बकीय कण पट्टे से दूर गिरते जाते है। इस तरह अयस्क और अशुद्धियों की दो भिन्न भिन्न ढेरियाँ बनती जाती है एवं अयस्क का सांद्रण होता जाता है।