क्या मलिनॉस्की एक विकासवादी था ? मैलिनास्की विकासवादी था या नहीं ? does malinowski was a evolutionary in hindi

By   November 25, 2020

does Bronisław Malinowski was a evolutionary in hindi क्या मलिनॉस्की एक विकासवादी था ? मैलिनास्की विकासवादी था या नहीं ?

प्रकार्यात्मक पद्धति – मिथक अथवा वास्तविकता
आपको ज्ञात ही है कि मलिनॉस्की ने ट्रॉब्रिएण्ड द्वीपवासियों के नृजातिविवरण को सुव्यवस्थित तर्कसंगत रूप में प्रस्तुत करने के लिए ‘प्रकार्य‘ की अवधारणा का प्रयोग किया। मानव व्यवहार के विविध और जटिल विन्यासों को बोधगम्य बनाने के लिए यह एक सफल पद्धति सिद्ध हुई। इस पूरे प्रयोग ने एक चिंतन-पद्धति का रूप धारण कर लिया, जिसे प्रकार्यवाद के नाम से जाना जाने लगा। इस खंड की प्रस्तावना में पहले ही यह उल्लेख किया जा चुका है, सामाजिक विज्ञानों में प्रकार्यवाद एक जाना-माना सिद्धांत बन गया है (‘सिद्धांत‘ शब्द के लिए देखिए कोष्ठक 26.1)। मलिनॉस्की ने मानव सभ्यता की प्रगति को समझने के पूर्व-स्थापित तरीकों को अस्वीकार कर दिया और उसकी जगह आदिम लोगों के रीति-रिवाजों और विश्वासों आदि का वैकल्पिक तरीका सामने रखा। यह उसका समाजशास्त्रीय शोधकार्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान था।

अवश्य ही मलिनॉस्की की काफी आलोचना की गई क्योंकि उसने अपने क्षेत्रीय शोधकार्य पर आधारित निष्कर्षों को एकदम सीधे सम्पूर्ण मानवीयता की व्याख्या में लागू किया। ऐसा करना वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार नहीं माना जाता है। दूसरी ओर मलिनॉस्की ने हर रिवाज के उपयोग अथवा प्रकार्य को समझने में जो नेतृत्व प्रदान किया, उसे भी नकारा नहीं जा सकता। एक विश्वास अथवा कार्यकलाप को समझाने के लिए उसे अन्य कार्यकलापों के साथ इसके संबंधों को भी देखना पड़ा। इससे उसे ट्रॉब्रिएंड द्वीपवासियों के जीवन के बारे में अपने विवरण को एक सांस्कृतिक समग्रता की तरह समझने में मदद मिली। मलिनॉस्की के समकालीन विकासवादियों और प्रसारवादियों द्वारा मानव-व्यवहार के बारे में दी गई व्याख्या के असंतोष जनक स्तर को देखते हुए यह कोई कम उपलब्धि न थी।

कोष्ठक 26.1ः सिद्धांत
यह सामाजिक विज्ञानों में सामान्य रूप से प्रयुक्त होने वाला शब्द है। आम तौर पर इससे अमूर्त विचारों (ंइेजतंबज जमतउे) की व्यवस्थित रूपरेखा का पता लगता है। हर विषय विशेष में इस प्रकार के अमूर्तीकरण (ंइेजतंबजपवदे) से विचारों के समायोजन में मदद मिलती है। प्रायः मानव-समाज और मानव-संबंधों के बारे मे विचारों की अभिव्यक्ति के लिए ‘सामाजिक सिद्धांत‘ शब्द का प्रयोग होता है। ऐच्छिक पाठ्यक्रम ई.एस.ओ.-13 में हमने इस शब्दावली का प्रयोग मानव-समाज के बारे में अमूर्त अवधारणाओं की रूपरेखा बनाने के लिए किया है। यह मूलतः व्यवस्थित रूप में सुविचारित परस्पर-संबद्ध विचारों का पुंज है, जिसे सामान्य रूप से विद्वत्जनों द्वारा समझा और स्वीकार किया जाता है।

मलिनॉस्की के प्रकार्यवाद के मुख्य अभिलक्षणों को सार रूप में नीचे प्रस्तुत किया गया है।

प) उन्नीसवीं शताब्दी के विद्वानों द्वारा सामाजिक तत्वों के इधर-उधर से एकत्रित विवरण की तुलना में मलिनॉस्की ने अपने क्षेत्रीय शोधकार्य का लेखा-जोखा दिया और अपनी सामग्री को सुव्यवस्थित और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया।
पप) उसने पहले संस्कृति के केवल एक ही विशिष्ट पक्ष पर ध्यान केन्द्रित किया और धीरे-धीरे पूरी संस्कृति को इस विवरण के घेरे में ले लिया। इससे उसके प्रबंधों (मोनोग्राफों) में विषय-संबंधी एकरूपता स्थापित हुई।
पपप) मलिनॉस्की ने व्यक्तियों, उनके व्यवहार, उनकी प्रतिक्रियाओं और उनकी भाव-प्रवण स्थितियों पर विशेष बल देकर आदिम समुदाय के सांस्कृतिक विन्यास को हमारे सामने सजीव रूप में प्रस्तुत किया। व्यक्तिगत रुचियों और सामाजिक व्यवस्था के संबंध में जो उसके विचार थे उन्हीं के कारण वह मनुष्य के सामाजिक व्यवहार को संतुलित रूप से समझ सका। आज मलिनॉस्की के बहुत समय बाद भी नृशास्त्री प्रयोगात्मक मनोविज्ञान और वैयक्तिक आवश्यकताओं में उसकी रुचि के बारे में बताना प्रासंगिक समझते हैं।
पअ) मलिनॉस्की ने मनुष्य की प्रकृति के बारे में प्रतिपादित सिद्धांतों की समालोचना करते हुए लोगों की कथनी और करनी के बीच अंतर का उल्लेख किया। इससे वैयक्तिक रुचियों और सामाजिक व्यवस्था के बीच विद्यमान तनाव के प्रति उसकी जागरूकता का पता चलता है। उदाहरण के लिए उसने पुस्तक एर्गोनॉट्स ऑफ द वेस्टर्न पेसिफिक में विनिमय में पारस्परिकता के तत्व की चर्चा की है। विनिमय के सिद्धांत में उसकी अंतर्दृष्टि से प्रेरणा पाकर फ्रांसीसी विद्वान मॉस (Mauss) ने उपहार के विनिमय का विश्लेषण किया। बाद में मॉस ने लेवी स्ट्रॉस को प्रभावित किया। लेवी स्ट्रॉस के अनुसार, पारस्परिक विनिमय का यह सिद्धांत सामाजिक नियंत्रण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। विनिमयात्मक विश्लेषण (transactional analysis) की जड़ें लेवी स्ट्रॉस के इसी विचार में निहित है।

इमें यह नहीं मालूम कि आपके मन में मलिनॉस्की के प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण के बारे में कुछ प्रश्न है या नहीं। शायद आपको याद होगा कि हमने इकाई 22 के अभ्यास सोचिए और करिए 2 में आपसे कहा था कि आप मलिनॉस्की के दृष्टिकोण में दिखाई देने वाली कमियों के बारे में बताइए। हमने यहां आपको उनमें से कुछ कमियों के बारे में बताया है।

प) मलिनॉस्की ने संस्कृति के प्रत्येक पक्ष को दूसरे पक्षों के साथ जोड़ा है। प्रश्न यह उठता है कि यदि हर पक्ष प्रत्येक पक्ष के साथ जुड़ा है तो आखिर इस जुड़ने का अंत कहां होगा? यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि संबंधों की संगति (तमसमअंदबम) के इस प्रश्न की ओर मलिनॉस्की का ध्यान ही नहीं गया। उसने अपने अध्ययन में विशिष्ट समस्याओं पर शोधकार्य नहीं किया। वास्तव में उसका पूरा ध्यान एकीकृत सांस्कृतिक समग्रता के निर्माण की ओर ही रहा।
पप) उसके विवरण में विश्लेषणात्मक संगति (analytical relevance) न होने का मतलब यह है कि उसके काम में अमूर्तीकरण (abstraction) का अभाव था। यही कारण है कि उसके काम में सिद्धांत का विकास नहीं हुआ।
पपप) मलिनॉस्की का प्रकार्यवाद स्थूल (crude) उपयोगितावाद के समान है, जहां हर चीज का अस्तित्व केवल किसी न किसी प्रयोजन के लिए होता है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि उसके मन में कभी भी सामाजिक व्यवस्था (social system) का विचार नहीं आया, जो विभिन्न वर्गों के बीच संबंधों पर आश्रित है।
पअ) मलिनॉस्की (1935ः 479-81) जनजातीय समाजों को प्रभावित करने वाले परिवर्तनों की ओर भी ध्यान नहीं दे पाया। उसने यह स्वीकार किया कि अपनी पुस्तक कोरल गार्डन्स एंड देअर मैजिक में ट्रॉब्रिएंड द्वीपवासियों पर यूरोप के प्रभाव को शामिल नहीं किया । मलेनेशिया में अपने द्वारा किए गए क्षेत्रीय शोधकार्य में उसने इसे अपनी “सबसे बड़ी कमी” माना है।
अ) क्षेत्रीय शोधकार्य के महत्व पर जोर देने के बावजूद भी मलिनॉस्की विकासवाद और प्रसारवाद को पूरी तरह उखाड़ नहीं पाया। बल्कि उसने इन दोनों परंपराओं में इतना भर और जोड़ दिया कि किसी विशिष्ट समुदाय का सिंक्रानिक विश्लेषण भी किया जाए अर्थात् तात्कालिक दशाओं के संदर्भ में विश्लेषण किया जाए। वास्तव में, मलिनॉस्की (1929) ने लिखा कि “मुझे आज भी विकास की प्रक्रिया और योजनाबद्ध विकास में विश्वास है। मैं यह समझता हूँ कि विकास संबंधी प्रश्नों के उत्तर के लिए हमें उन तथ्यों और संस्थाओं के अनुभवाश्रित अध्ययन का सहारा लेना होगा, जिनके अतीत के विकास का पुनर्निर्माण करने की हमारी इच्छा है।‘‘

मलिनॉस्की के कार्य का विशिष्ट योगदान एक और ही दिशा में है। यह उसके क्षेत्रीय शोधकार्य की पद्धतियों की खोज से संबंधित है। उसके प्रकार्यवाद के सिद्धांत की खूब आलोचना हुई और आने वाले विद्वानों ने इसमें सुधार किया। परंतु शायद ही कोई अन्य समाजशास्त्री या नुशास्त्री हो जो उसके क्षेत्रीय शोधकार्य की प्रविधियों में सुधार करने का दावा कर सके। उसके द्वारा निर्धारित मानकों का उपयोग आज भी नृशास्त्र संबंधी क्षेत्रीय शोधकार्य की गुणवत्ता को मापने के लिए पैमाने का काम करता है। आज भी यदि नृशास्त्री समाज विशेष का अध्ययन करना चाहे तो उसे वहां के लोगों के बीच कम से कम अठारह महीने रहना होता है। इसके लिए उससे अपेक्षा की जाती है कि वह स्थानीय भाषा सीखे और सामग्री एकत्र करने के लिए स्थानीय भाषा का व्यवहार करे। उन लोगों के बीच रहते हुए और उनके कार्यकलापों में भागीदार बनकर मनोवैज्ञानिक तौर पर उसे अपने आपको “वे‘‘ से ‘‘हम‘‘ में बदलना होता है। दूसरे शब्दों में, उसे उस समुदाय का अंग बन जाना होता है। पाउडरमेकर (1970ः 347) जैसे कुछ लोगों का दावा है कि मलिनॉस्की द्वारा बनाए गए मार्गदर्शक आदर्श केवल मिथक हैं, जो मलिनॉस्की के अपने करिश्मों का परिणाम है। ऐसे लोगों का यह कहना है कि मलिनॉस्की इन आदर्शों तक स्वयं भी पूरी तरह से नहीं पहुंच पाया। लेकिन इसके साथ ही हमने यह भी देखा है कि इस मिथक से ही बहुत से नृशास्त्रियों का मार्गदर्शन हुआ है। अर्थात् चाहे मलिनॉस्की ने स्वयं वे सब बातें पूरी नहीं की जिन्हें उसने आदर्श की तरह स्थापित किया परंतु परवर्ती नृशास्त्रियों ने मलिनॉस्की का अनुसरण करने के नाम पर उन आदर्शों को पूरा किया।

मलिनॉस्की के योगदान के मूल्यांकन को सारांश में कहा जा सकता है कि उसने न केवल सामाजिक नृशास्त्र को नई दृष्टि प्रदान की बल्कि सामान्य रूप से मानव व्यवहार की जांच को, किसी सीमा तक व्यक्ति के अपने आचरण को, नई दृष्टि प्रदान की। इसके साथ ही उसने प्रेक्षण और सामग्री एकत्र करने की नई प्रविधियां भी निकालीं । लेकिन उसमें अमूर्तीकरण (ंइेजतंबजपवद) के स्तर पर विचार करने की योग्यता का अभाव था। वस्तुतः वह अमूर्त सिद्धांतों के बारे में बहुत ही संशयपूर्ण था। नृशास्त्र के शोधकार्य के मार्गदर्शन में सैद्धांतिक अवधारणाओं को विकसित करने का काम मलिनॉस्की के समकालीन विद्वान रैडक्लिफ-ब्राउन ने पूरा किया। कालांतर में रैडक्लिफ-ब्राउन ने सामाजिक नृशास्त्र को विज्ञान की शाखा के रूप में स्थापित किया। इस विषय में हमने इकाई के अगले भाग में चर्चा की है।

बोध प्रश्न 1
प) क्या मलिनॉस्की एक विकासवादी था? पक्ष अथवा विपक्ष में उत्तर तीन पंक्तियों में लिखिए।
पप) समाज विशेष का व्यवस्थित नृजातीय विवरण (ethnographic account) हमें उस समाज की संस्कृति की और अधिक अच्छी तरह से समझने में किस तरह सहायक होता है? अपना उत्तर तीन पंक्तियों में लिखिए।

बोध प्रश्न 1 उत्तर
प) मलिनॉस्की को विकासवादी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह अनुभवाश्रित वास्तविकता से अभिभूत था। यद्यपि वह मन से विकासवादी रहा, लेकिन व्यवहार में वह विकासवादियों के मानव-संस्कृति के बारे में अटकलबाजियों के प्रति प्रेम से दूर होता जा रहा था।
पप) सामाजिक तत्वों के इधर-उधर से एकत्रित किए गए वर्णन से संस्कृति के विभिन्न पक्षों के बीच व्यवस्थित और तार्किक सह-संबंध ढूंढ पाना संभव नहीं है। व्यवस्थित नृजातिविवरण हमेशा समाज विशेष की सामग्री पर आधारित होता है इसलिए संस्कृति के सभी पक्षों को एकीकृत समग्र रूप में समझ पाना संभव होता है।