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liberalism in hindi उदारवाद क्या है का अर्थ बताइए उदारवाद की विशेषताएं सिद्धांत परिभाषा किसे कहते है |

महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन
(Important Political Philosophies)
’’’(वर्ष 2013 में संघ लोक सेवा आयोग ने सामान्य अध्ययन (मुख्य परीक्षा) के लिए जो नया पाठ्यक्रम लागू किया है, उसमें प्रश्नपत्र-1 के टॉपिक-5 के अंतर्गत एक उप-शीर्षक है- ‘राजनीतिक दर्शन जैसे साम्यवाद, पूंजीवाद, समाजवाद उनके रूप और समाज पर उनका प्रभाव‘। यद्यपि पाठ्यक्रम में यह टॉपिक विश्व इतिहास के साथ रखा गया है, पर ‘दृष्टि‘ द्वारा वर्गीकृत पाठ्यक्रम में इसे राजव्यवस्था का हिस्सा मानते हुए भाग-5 में स्थान दिया गया है। संदर्भ के लिए भाग-5 के टॉपिक-13 को देखें।

उदारवाद (Liberalism)
उदारवाद एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन है जिसका गहरा संबंध पूंजीवाद के साथ है। पूंजीवाद एक आर्थिक प्रणाली है जिसे वैचारिक समर्थन देने वाला दर्शन उदारवाद है। उदारवाद का आरम्भ 17वीं शताब्दी के अंतिम चरण में हुआ और जो कई परिवर्तनों के साथ आज तक एक प्रमुख राजनीतिक विचारधारा बना हुआ है। उदारवाद ‘लिब्रलिज्म‘ (Liberalism) शब्द का हिन्दी अनुवाद है। इसे उदारवाद (Liberalism) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह व्यक्ति के लिए अधिकतम स्वतंत्रता (Liberty) की मांग करता है।
उदारवाद का उद्भव 17वीं शताब्दी में हुआ। उस समय बहुत सी ऐसी परिस्थितियाँ थी जिन्होंने इस विचारधारा के विकास में योगदान दिया। पुनर्जागरण और धर्म सुधार आदोलन ने धर्म के भीतर तार्किकता को बढ़ावा दिया जिससे मनुष्य और उसके सांसारिक हितों को महत्व मिलना शुरु हुआ। इसी समय वैज्ञानिक क्रांति के कारण पूंजीवाद का विकास शुरु हुआ। पूँजीवादी प्रणाली में जिस बुर्जुवा (पूंजीपति) वर्ग ने सामंत वर्ग के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की, उसी बुर्जुवा वर्ग के पक्ष में उदारवादी विचारधारा की स्थापना हुई। बुर्जुवा वर्ग ने सामंतों को मिलने वाले विशेषाधिकारों को चुनौती दी। स्वतंत्रता और समानता जैसे राजनीतिक आदर्शों की मांग उठाई तथा अनुबंध की स्वतंत्रता (थ्तममकवउ व िब्वदजतंबज) जैसे आर्थिक विचारों को प्रस्तुत किया। ये सभी विचार वस्तुतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक स्थितियाँ निर्मित करने वाले विचार थे। इसलिए राजनीति दर्शन में प्रायरू माना जाता है कि उदारवाद पूंजीवाद का वैचारिक तर्क है।

उदारवाद के विभिन्न रूप (Various forms of Liberalism)
उदारवाद का विकास कई चरणों में हुआ है। इसके विकास के प्रमुख चरणों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-
1. ‘पारम्परिक‘ या ‘नकारात्मक‘ उदारवाद (Classical or ‘Negative Liberalism)
यह उदारवाद का आरम्भिक चरण है जो 17वीं शताब्दी के अंत से शुरु होकर लगभग 1850 ई. तक चलता रहा। इस वर्ग के प्रमुख विचारक हैं- जॉन लॉक, एडम स्मिथ, जेरेमी बेंथम तथा हर्बर्ट स्पेंसर। जॉन लॉक को उदारवाद का जनक भी कहा जाता है। इन विचारकों को ‘पारम्परिक उदारवादी‘ इसलिए कहते हैं क्योंकि उदारवाद के विचारों की आरम्भिक धारणा इन्होंने प्रस्तुत की थी। इन्हें ‘नकारात्मक उदारवादी‘ इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्होंने स्वतंत्रता और समानता जैसे राजनीतिक आदर्शों की परिभाषा नकारात्मक पद्धति से की। नकारात्मक उदारवाद के प्रमुख विचार इस प्रकार हैं-
(प) मनुष्य एक तार्किक प्राणी है तथा अपने जीवन के संबंध में सर्वश्रेष्ठ निर्णय वह स्वयं ही ले सकता है।
(पप) व्यक्ति के वैयक्तिक तथा सामाजिक हितों में कोई अन्तर्विरोध नहीं है। व्यक्तिगत हित की साधना से ही व्यक्ति सामाजिक हित में सहायक होता है।
(पपप) प्रत्येक व्यक्ति को कुछ मूल अधिकार प्राकृतिक रूप से ही प्राप्त हैं जिनमें स्वतंत्रता का अधिकार, जीवन का अधिकार तथा व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार प्रमुख हैं।
(पअ) सभी व्यक्तियों के आपसी संबंध एक दौड़ के समान हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमताओं के साथ इस दौड़ में भाग लेता है। राज्य का काम सिर्फ यह देखना है कि कोई भी व्यक्ति दौड़ के नियमों का उल्लंघन न करे। अंतिम रूप से किसकी हार होती है तथा किसकी जीत-यह तय करना राज्य का काम नहीं है। दौड़ में होने वाली हार और जीत न्यायोचित है, न कि अनैतिक।
(अ) राज्य प्राकृतिक (छंजनतंस) या दैवीय (क्पअपदम) संस्था नहीं है बल्कि व्यक्तियों द्वारा अपने हित में बनाया गया एक कृत्रिम यंत्र है। राज्य का निर्माण सिर्फ इसलिए किया गया है कि सभी व्यक्ति शाति के साथ रह सकें। उसका कार्य सिर्फ यह देखना
है कि कोई व्यक्ति कानूनों का उल्लंघन न करे। राज्य की इस धारणा को रात्रिरक्षक राज्य (छपहीज-ॅंजबीउंद ैजंजम) या प्रहरी राज्य कहा जाता है।
(अप). अर्थव्यवस्था के संबंध में यह विचारधारा ‘अहस्तक्षेप के सिद्धांत‘ (स्ंपेेम्र थ्ंपतम) की समर्थक है। इसके अनुसार अर्थव्यवस्था मांग और पूर्ति के नियम के अनुसार स्वतः चलने वाली व्यवस्था है जिसमें राज्य की ओर से कोई भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
(अपप) ‘स्वतत्वमूलक व्यक्तिवाद‘ (च्वेेमेेपअम प्दकपअपकनंसपेउ) इस विचारधारा का प्रमुख सिद्धांत है जिसके अनुसार प्रत्येक
व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में निहित शारीरिक और बौद्धिक क्षमताओं का स्वामी है। चूंकि वह इन क्षमताओं का स्वामी है, इसलिए इन क्षमताओं से अर्जित होने वाले सभी लाभों पर उसका नैतिक अधिकार है जिसे उससे छीना नहीं जा सकता।
(अपपप) ‘अनुबंध की स्वतंत्रता‘ (थ्तममकवउ व िब्वदजतंबज) इनके आर्थिक विचारों का एक और महत्वपूर्ण अंग है। इसके अनुसार
किसी भी व्यक्ति से जबरन कोई कार्य नहीं कराया जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति कोई भी कार्य करने या न करने हेतु स्वतंत्र है। यदि रोजगार देने वाले तथा उसे स्वीकार करने वाले व्यक्तियों के मध्य सहमति बनती है तो उनकी सहमति की शर्ते अनुबंध के रूप में होंगी। अनुबंध करने तक व्यक्ति पूर्णतः स्वतंत्र है किंतु अनुबंध स्वीकार करने के पश्चात् वह उसकी शर्तों से बंध जाता है।
(पग) सम्पत्ति का अधिकार इनकी आर्थिक मान्यताओं में प्रमुख है। लॉक का मानना था कि सम्पत्ति का अधिकार प्राकृतिक अधिकार है जिसे कोई भी राज्य या सरकार नहीं छीन सकती मानव के अधिकारों का सारतत्व है।
(ग) जहाँ तक समाज का प्रश्न है, ये चिन्तक आधुनिक दृष्टिकोण के समर्थक हैं। इनका स्पष्ट मानना है कि व्यक्ति को सभी प्रकार की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यह तभी संभव होगा जब उसे धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक रूढ़ियों इत्यादि से भी पर्याप्त
स्वतंत्रता मिले।
2. आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद (Modern Or Positive Liberalism)
उदारवादं का दूसरा चरण आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद है जिसे मोटे तौर पर 1850 ई. से 1950 ई. के मध्य माना जाता है। इस विचारधारा के उदय के पीछे कुछ ठोस परिस्थितियाँ जिम्मेदार थीं। नकारात्मक उदारवाद में अहस्तक्षेप तथा अनुबंध की स्वतंत्रता पर आधारित जिस मुक्त बाजार प्रणाली का समर्थन किया गया थाय उसमें मजदूरों को औपचारिक रूप से चाहे समानता व स्वतंत्रता मिली हो किंतु वास्तविक रूप से पूंजीपति उनका शोषण करने में समर्थ थे। मजदूरों की दयनीय स्थिति का परिणाम यह हुआ कि बहुत सारे विचारक समानता व स्वतंत्रता के सकारात्मक विचार प्रस्तुत करने लगे जिसका तात्पर्य था कि समानता और स्वतंत्रता के वास्तविक वितरण के लिए राज्य को पर्याप्त स्थितियाँ जुटानी चाहिए ताकि साधारण व्यक्ति भी इन आदर्शों का लाभ सचमुच उठा सके। इस समय समाजवाद के आरम्भिक विचारक सेंट साइमन, चार्ल्स फ्यूरिए तथा रॉबर्ट ओवन भी अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। इन्होंने मजदूरों की दुर्दशा दूर करने के लिए पूंजीपतियों की अन्तरात्मा से अपील की। ये तीनों विचारक ‘स्वप्नदर्शी समाजवादी‘ (Utopian Socialists) कहलाते हैं। इनके तुरंत बाद समाजवाद का आक्रामक रूप सामने आया जिसे मार्क्सवाद कहते हैं। मार्क्सवाद ने मजदूरों को पूंजीपतियों के विरुद्ध हिंसक क्रांति करने के लिए प्रेरित किया। इन स्थितियों में उदारवादी चिंतकों को महसूस हुआ कि मुक्त बाजार प्रणाली पर आधारित उनकी विचारधारा अब नहीं चल सकती है। इसलिए उदारवाद में कुछ नए विचारकों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कुछ सीमित करते हुए नई व्याख्याएँ प्रस्तुत की। यही व्याख्याएँ सम्मिलित रूप में आधुनिक या सकारात्मक उदारवाद कहलाती हैं। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक थे- जे.एस. मिल (अंतिम दौर में) तथा लास्की।
सकारात्मक उदारवाद की प्रमुख मान्यताएँ इस प्रकार हैं-
पण् ये चिंतक भी व्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थक हैं, किंतु ये व्यक्ति को निरपेक्ष स्वतंत्रता नहीं देते हैं। जे.एस. मिल ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति की स्वतंत्रता उसके स्व-विषयक (Self regarding) कार्यों तक ही सीमित है। उसके जो कार्य अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करते हैं, उनमें वह पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है।
पपण् स्वतंत्रता और समानता सिर्फ औपचारिक रूप से दिए जाने वाले सिद्धांत नहीं हैं। इनका वास्तविक महत्व तभी है..जब इनके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ भी विद्यमान हों।
पपपण् समाज के वंचित वर्ग ‘तात्विक‘ (Substantive) रूप से समानता और स्वतंत्रता को उपलब्ध कर सकें, इसके लिए आवश्यक है कि उनके लिए संरक्षणात्मक भेदभाव (च्तवजमबजपअम क्पेबतपउपदंजपवद) की नीति अपनाई जाए। इस नीति को ‘सकारात्मक कार्यवाही‘ (Affirmative Action) भी कहा जाता है और इसी से सामाजिक न्याय की स्थिति उत्पन्न होती है।
पअण् स्वत्वमूलक व्यक्तिवाद का सिद्धांत इन्हें पूर्णतः स्वीकार्य नहीं है। इसका मानना है कि व्यक्ति अपनी सभी क्षमताओं को स्वयं अर्जित नहीं करता, इसलिए वह अपनी क्षमताओं से उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण लाभ का अकेला स्वामी नहीं हो सकता।
अण् अर्थव्यवस्था के संबंध में इन्होंने ‘अहस्तक्षेप सिद्धांत‘ का विरोध किया और ‘न्यूनतम हस्तक्षेप‘ का सिद्धांत प्रस्तुत किया। बाजार अर्थव्यवस्था को ‘नियमित‘ करने हेतु स्वतंत्र है, किन्तु वह उसे ‘नियंत्रित‘ नहीं करेगा। राज्य इतना हस्तक्षेप अवश्य करेगा कि मुक्त बाजार के नियम वंचित वर्ग की मानवीय गरिमा का उल्लंघन न कर सकें।
अपण् सम्पत्ति के अधिकार को इन्होंने भी महत्व दिया किन्तु उतना नहीं जितना नकारात्मक उदारवादियों ने। जे.एस. मिल ने कहा कि सम्पत्ति का अधिकार सीमित होना चाहिएय विशेष रूप से भू-सम्पत्ति के स्वामित्व पर सीमा आरोपित की जानी चाहिए। मिल और लास्की दोनों ने सम्पत्ति के हस्तांतरण पर भारी कर लगाने की वकालत की।
अपपण् जहाँ तक राज्य का प्रश्न है, इन विचारकों ने ‘रात्रिरक्षक राज्य‘ के स्थान पर ‘कल्याणकारी राज्य‘ (Welfare State) की धारणा प्रस्तुत की। इससे राज्य की शक्तियाँ-बढ़ गईं। इनके अनुसार, राज्य का कार्य सिर्फ कानून व्यवस्था बनाए रखना नहीं है बल्कि विभिन्न वर्गों के मध्य अन्तराल.कम करना, चंचित वर्गों को बुनियादी जरूरतें मुहैया कराना इत्यादि भी है। यहाँ राज्य की सकारात्मक भूमिका है।
3. स्वेच्छातंत्रवाद (Libertarianism)
1950 ई. के बाद विश्व की स्थितियाँ बदलने के कारण पुनः उदारवाद के स्वरूप में संशोधन हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व बैंक और आई.एम.एफ. जैसी संस्थाएँ निर्मित हुई और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में निजीकरणय उदारीकरण तथा । भूमंडलीकरण की शुरुआत हुई। इस समय नकारात्मक उदारवाद की विचारधारा एक बार पुनः नए रूप में उभरी जिसे स्वेच्छातंत्रवाद (Libertarianism) कहा गया। इस सिद्धांत के समर्थकों में चार दार्शनिक प्रमुख हैं- आइजिया बर्लिन, एफ.ए. हेयक, मिल्टन फ्रायडमैन तथा रॉबर्ट नॉजिक। इनके सामान्य विचार इस प्रकार हैं –
(प) व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए-धर्म से, समाज से, परम्परा से और परिवार सेय ताकि वह अपनी नियति स्वयं निर्धारित कर सके।
(पप) ‘मुक्त बाजार प्रणाली‘ न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करने के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है। व्यक्ति समाज के लिए कितना योगदान करता है। इसका सटीक मूल्यांकन करके बाजार उसे उतना ही लाभ प्रदान करता है। अतः वितरणमूलक न्याय प्रदान करने हेतु एकमात्र निष्पक्ष प्रणाली बाजार व्यवस्था है।
(पपप) ये चिंतक सामाजिक न्याय के विरोधी हैं। इनका स्पष्ट कहना है कि जब भी राज्य सामाजिक न्याय का प्रयास करता है, तब राज्य की शक्तियों बढ़ने से व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है। फिर जिन व्यक्तियों से कुछ छीनकर अन्य वर्गों को
वितरित किया जाता है। उनको ‘अधिकारिता‘ (Entitiemit) का भी उल्लंघन होता है।
(पअ) जहाँ तक राज्य का प्रश्न है, ये राज्य को अधिक शक्तियाँ देने के विरोधी हैं। इनके अनुसार राज्य के मुख्य कार्य है-
(क) कानून व्यवस्था बनाए रखना।
(ख) वे नियम बनाना जो अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में माने जाएंगे तथा यह देखना कि उन नियमों का पालन होता रहे।
(ग) जो व्यक्ति मुक्त बाजार प्रतिस्पर्धा में चलने के काबिल न हों, उनके लिए कल्याणकारी उपाय करना।
(घ) वे सभी कार्य करना जिन्हें बाजार प्रणाली करने में असमर्थ है।
4. समतावाद (Egalitarianism / Eaualitarinism)
समकालीन उदारवाद की दूसरी शाखा ‘समतावाद‘ कहलाती है। यह शाखा सकारात्मक उदारवाद का विकसित रूप है, जिसने 1950 ई. के बाद स्वेच्छातंत्रवाद के विरुद्ध अपने कई तर्क प्रस्तुत किए। इस वर्ग में मुख्यतः दो विचारक शामिल हैं- सी.बी. मैक्फर्सन तथा जॉन रॉल्स। इन दोनों की मूल मान्यता यह है कि राज्य को कल्याणकारी कार्य तब तक करते रहना चाहिए जब तक निम्न वर्ग भी वैसी स्थितियाँ प्राप्त नहीं कर पाता जैसी उच्च वर्ग की हैं। जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सिद्धांत में एक काल्पनिक युक्ति का प्रयोग करते हुए साबित किया कि वर्तमान समय में उच्च और निम्न वर्ग के जितने अंतराल हैं, वे इतिहास की अतार्किक स्थितियों से पैदा हुए हैं और उन्हें न्यायोचित मानकर नहीं चलाया जा सकता। मैक्फर्सन ने साबित किया कि पूंजीविहीन श्रमिकों के लिए मुक्त बाजार प्रणाली अत्यंत विषमतामूलक है।