जंगम का अर्थ क्या है | जंगम किसे कहते है परिभाषा क्या है मतलब पर्यायवाची विलोम शब्द Jangama in hindi

By   February 1, 2021

Jangama in hindi definition and meaning जंगम का अर्थ क्या है | जंगम किसे कहते है परिभाषा क्या है मतलब पर्यायवाची विलोम शब्द ?

जंगम (Jangama)
जंगम का शाब्दिक अर्थ है कोई संन्यासी जो कि गाँव-गाँव घूमता फिरता है। असल में, हालांकि वह किसी मठ में ही हर समय रह रहा हो, हो सकता है। जंगम ने सामूहिक रूप से पुजारियों के एक समूह की रचना की, जिनके काम को काफी विस्तृत ढंग से परिभाषित किया गया था। कोई जंगम ब्राह्मणवादी हिन्दुवाद के वंशानुगत पुजारी की तरह नहीं था। वह धार्मिक कार्यों, लोकप्रिय शिक्षा में लगा हुआ था और अपने जीवन-यापन के लिए कोई अन्य व्यवसाय भी कर सकता था, उदाहरण के लिए खेती, व्यापार तथा प्रशासन। बसवा के काल में जंगमों ने समुदाय में धार्मिक अनुशासन कायम रखने के कार्यभार को संभाला। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा लिंगायत धार्मिक विचारधारा की दीक्षा तथा प्रसार के उद्देश्य के लिये समर्पित किया। जंगम वीरशैववादियों के बीच एकजुटता बनाये रखने की जिम्मेदारी निभाता था। जंगमाओं की भर्ती का मुख्य तरीका धर्मान्तरण तथा गोद लेने के जरिये होता था। जंगमाओं में से कुछ कर्म संन्यासी थे व कुछ गृहस्थ थे।

चूँकि लिंग, गुरू तथा जंगम मिलकर मठ के महत्वपूर्ण घटकों का निर्माण करते थे। अतः समय के साथ-साथ जंगम अधिक से अधिक शक्तिशाली होते गये। 15वीं शताब्दी आते-जाते जगमाओं ने गुरू तथा विरक्त समूहों को संगठित कर लिया तथा लिंगायतों के बीच से इन पृथक विभाजनों के लिये अनुयायी तैयार कर लिये । आगे चलकर ये दो समूह एक तरह के वंशानुगत बन गये, जिनमें से प्रत्येक की अपनी वंशावली थी। दो भागों में बट जाने की यह प्रक्रिया ही थी, जिसके चलते जातियों से मिलते-जुलते समूहों की लिंगायत समुदाय के भीतर नींव पड़ी। यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि जंगम वंशानुगत पुजारी नहीं होता था, जो कि महज इस वजह से उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त हो क्योंकि वह एक ऐसी जाति में पैदा हुआ है जिसे उच्च कर्मकाण्डी प्रतिष्ठा प्राप्त है। वह धार्मिक तथा धर्मनिरपेक्ष दोनों तरह के कार्य संपादित करता था तथा किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक पृष्ठभूमि से चुना जा सकता था।

 सांगठनिक ढाँचा (Organisational Framework)
आमतौर पर सुधारवादी अथवा धार्मिक आन्दोलन शुरुआत में एक सामाजिक आधार का निर्माण करने में जुटते हैं। करिश्मा करने वाले नेताओं तथा समर्पित कार्यकर्ताओं से आंदोलन के विचारों का प्रचार-प्रसार करने में मदद मिलती है। इस चरण के बाद आन्दोलन के विचारों को अमल में लाये जाने पर विचार किया जाता है। इसके तहत चुने हुए रास्ते पर लोगों का मार्ग दर्शन करना, गरीबों तथा कमजोर वर्गों की सहायता करना, बीमारों की सेवा करना, अशिक्षित लोगों को शिक्षा देना आदि जैसे काम आते हैं। इन गतिविधियों को करने के लिये किसी न किसी तरह से सांगठनिक ढाँचे का होना आवश्यक हो जाता है, वीरशैववाद वैवाद के संदर्भ में मठ (भिक्षुओं के केन्द्र) तथा जंगम धार्मिक समुदाय की गतिविधियों के केन्द्र बन गये। 12वीं शताब्दी से ही वीरशैवादी सांगठनिक ढाँचे के दो महत्वपूर्ण तत्वों द्वारा की जाने वाली गतिविधियाँ थी, लिंगायत विचारधारा का प्रचार, शिष्यों की शिक्षा तथा जरूरतमंद लोगों को भोजन व आवास प्रदान करना । आइये, अब हम संक्षेप में इन भमिकाओं की व्याख्या करें।