J.H. Hattan in hindi जे.एच. हटन कौन है ? कास्ट इन इंडिया (भारत में जाति) पुस्तक के लेखक रचनाकार

By   December 8, 2020

J.H. Hattan in hindi जे.एच. हटन कौन है ? कास्ट इन इंडिया (भारत में जाति) पुस्तक के लेखक रचनाकार का नाम क्या है ?

जे.एच. हटन
अपनी पुस्तक कास्ट इन इंडिया (भारत में जाति) में जे.एच. हटन ने जाति के ढांचे के बारे में बताया है। हटन के अनुसार सगोत्र-विवाह या अंतर्विवाह वर्ण-व्यवस्था की सबसे मुख्य विशेषता थी। इसी के इर्द-गिर्द नाना प्रकार की वर्जनाओं और प्रतिबंधों का ताना-बाना बुना गया था। विभिन्न जातियों पर जो वर्जनाएं थोपी गई हैं, उनका परस्पर व्यवहार में उल्लंघन कदापि नहीं होना चाहिए। वर्ण-व्यवस्था की एक और बड़ी विशेषता यह थी कि अपनी जाति से बाहर के व्यक्ति के हाथ से बना खाना खाने पर प्रतिबंध था। इन वर्जनाओं से इस तरह के प्रश्न उठते हैंः
1) भोजन कौन बनाता है?
2) किस तरह के बर्तन में भोजन बनाया गया है?
3) क्या भोजन ‘कच्चा‘ (पानी में पका) यानी कच्ची रसोई का है या ‘पक्का‘ (तेल में पका) यानी चोखी रसोई का है। चोखी रसोई का भोजन अन्य जातियों के हाथ से भी स्वीकार्य होता है।
4) भोजन के मामले में भी एक क्रम-परंपरा बनी हुई है, जिसमें शाकाहार को मांसाहार से ऊंचा दर्जा दिया गया है। ब्राह्मण आम तौर पर शाकाहारी होते हैं, मगर सभी जगह नहीं। जैसे कश्मीर और बंगाल में ब्राह्मण मांसाहारी भी होते हैं।

ये सभी वर्जनाएं जातिगत पहचान की रचना की प्रक्रिया को दर्शाता हैं। ये जाति समूहों के बीच मौजूद पार्थक्य और क्रम-परंपरा को प्रतिबिंबित करती हैं। इसलिए भोजन को अन्य जाति के व्यक्ति से स्वीकार नहीं करना सामाजिक श्रेणी की श्रेष्ठता को दिखाता है। इस शुचिता को बनाए रखने और श्अपवित्रताश् से दूर रहने की धारणा लोगों के आपसी व्यवहार में भी देखने को मिलती है।

उदाहरण के लिए दक्षिण भारत वे कुछ भागों में अपवित्र होने का भय शारीरिक दूरी में परिलक्षित होता है, जिसे श्रेष्ठ और निम्न जातियों के बीच कायम रखा जाता है। श्रेणी क्रम में निम्न समझी जाने वाली जातियों को गांव के मंदिर और कुओं से दूर रहना होता है और ऊंची जाति के लोगों से बातचीत करते समय उन्हें शारीरिक दूरी बनाए रखना होता है। हटन जातिगत पारस्परिक-व्यवहार को अंतर्विवाह, शुचिता और अपवित्रता की धारणा और सहभोजिता संबंधी वर्जनाओं के रूप में नजर आने वाली विशेषताओं रोशनी में व्याख्या करते हैं। यहां पर आप ने देखा होगा कि घुरये और हटन के सिद्धांतों में कुछ बातें समान हैं।

जाति की आरंभिक व्याख्याएं
जाति की उत्पत्ति को लेकर अनेक प्रकार की व्याख्याएं दी गई हैं। उसकी आरंभिक व्याख्या अक्सर जाति के ‘नैसर्गिक‘ गुणों या ‘देय‘ लक्षणों की अवधारणा के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इनमें से कुछ व्याख्याओं का हम यहां विश्लेषण करने जा रहे हैं, इसलिए उससे पहले इन वेशेषताओं के बारे में जान लेना उचित रहेगा। जाति की ये विशेषताएं हमें धार्मिक सिद्धांतों और पंथ निरपेक्ष समाजशास्त्रीय व्याख्याओं से मिली हैं। आइए सबसे पहले धार्मिक सिद्धांत जाति के बारे में क्या कहते हैं, यह जानें ।

धार्मिक व्याख्याएं
हिंदू धर्म में जाति की उत्पत्ति को लेकर जो व्याख्या दी गई है वह दैवी उत्पत्ति सिद्धांत है। इस सिद्धांत की धारणा ऋग वेद से लेकर समकालीन भगवद्गीता में उद्धृत श्लोकों से विकसित हुई है। मगर यहां यह कहना जरूरी है कि यह ब्राह्मणवादी व्याख्या है जिसे कई समुदाय नहीं मानते।

बॉक्स 19.01
कहा जाता है कि परम पुरुष ने अपनी नररूपी काया से विभिन्न वर्गों की ‘सृष्टि‘ की। इसके उसके अनुसार मस्तक से ब्राह्मण स्थल से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। ‘श्रेणी क्रम का आवास या क्रम-परंपरा के अनुसार उनका क्रम निर्धारण उस कार्य से जुड़ा था, जो प्रत्येक वर्ण को मूल करना होता था। ब्राह्मणों को सर्वोच्च दायित्व या कार्य सौंपे गए। उनका काम ज्ञान को संजोना और पुरोहित संबंधी कार्यों को पूरा करना था। क्षत्रिय का कर्तव्य बाहरी आक्रमणों से समाज की शिक्षा, प्रशासन में स्थायित्व लाना और आम प्रजा की रक्षा करना था। वैश्य का कार्य व्यापार और वाणिज्य का सच्चाई और निष्ठा से संचालन करना था। इस क्रम-परंपरा में सबसे निचले पायदान पर माने जाने वाले शूद्र सेवा-चाकरी वर्ण थे, जिनसे अपने से सभी ऊंचे वर्णों की जरूरतों की पूर्ति करने की अपेक्षा की जाती थी।

यह एक चतुर्वर्ण-व्यवस्था है। दैवी उत्पत्ति के सिद्धांत के अनुसार ये वर्ण आगे चलकर जातियों या जाति समूहों में बंट गएँ जिनके अपने विशिष्ट नैसर्गिक गुण थे। पहले तीन जाति-समूहों को ‘द्विज‘ श्रेणी में रखा गया और उन्हें यज्ञोपवीत संस्कार, जिसे हम बोलचाल की भाषा में जनेऊ धारण कहते हैं, उस के द्वारा अपनी-अपनी जाति में प्रवेश मिलता था। प्रत्येक समूह एक खास किस्म का पेशा अपना कर उसमें महारत हासिल करने लगा। वह अन्य जाति के काम को नहीं कर सकता था। इस क्रम-परंपरा की अभिव्यक्ति नैसर्गिक-गुणों और परस्पर-व्यवहार दोनों तरह से होती थी।

जाति की दूसरी धार्मिक व्याख्या गुण सिद्धांत पर आधारित है, जो हमें भगवद्गीता सहित कई धार्मिक ग्रंथों से जानने को मिलता है। यह सिद्धांत मनुष्य में पाए जाने वाले विशिष्ट नैसर्गिक गुणों की बात करता है। इस सिद्धांत के अनुसार मनुष्य के ये तीन गुण हैंः

प) ‘सत्व‘ यानी सत्य, ज्ञान, सहृदयता, सद्गुण और स्फूर्ति का गुण
पप) ‘राजस‘ यानी कर्मठता, साहस, शौर्य, बाहुबल, सत्ताधिकार और उमंग का गुण
पपप) ‘तामस‘ यानी उदासी, नीरसता, मूर्खता और अकर्मण्यता का गुण ।

क्रम परंपरा में ब्राह्मणों को सात्विक, तो क्षत्रियों को ब्राह्मणों से नीचे ‘राजसिक‘ श्रेणी में रखा गया था। इसके सबसे निचले पायदान पर ‘तामसिक‘ शूद्रों को रखा गया था।