डेविस और मूर का सिद्धांत क्या है davis and moore functionalist theory of stratification in hindi

By   December 2, 2020

davis and moore functionalist theory of stratification in hindi डेविस और मूर का सिद्धांत क्या है ?

डेविस और मूर का सिद्धांत
सामाजिक स्तरीकरण के प्रकार्यवादी सिद्धांत को किंग्सले डेविस और विल्बर्ट मूर ने और विकसित किया। ये दोनों अमेरिका के ख्यातनाम समाजशास्त्री हैं और टैलकॉट पारसंस के शिष्य रह चुके हैं। इन दोनों समाजशास्त्रियों ने अपने विचार एक लेख में विस्तार से प्रस्तुत किए थे, जिसका शीर्षक थाः “सम प्रिंसिपल्स ऑफ स्ट्रैटिफिकेशन’’ (स्तरीकरण के कुछ सिद्धांत)। यह लेख जितना लोकप्रिय हुआ इसकी आलोचना भी उतनी ही हुई। जहां प्रकार्यवादी सिद्धांतकारों ने उनके विचारों का समर्थन किया तो वहीं अन्य समाजशास्त्रियों ने उनकी कटु आलोचना की। उनके विचारों को असमानता का प्रकार्यवादी सिद्धांत का नाम भी दिया जाता है। आइए पहले हम उनकी प्रस्थापनाओं पर चर्चा करेंगे और उसके बाद हम इनकी आलोचना पर दृष्टि डालेंगे।

पारसंस ने समाज में स्तरीकरण की जरूरत पर जोर दिया था। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हर समाज में यह स्तरीकरण अपरिहार्य होता है। डेविस और मूर ने इस प्रस्थापना को विस्तार दिया और यह जानने का प्रयास किया कि समाज में स्तरीकरण किस तरह प्रभावी होता है। उन्होंने सबसे बड़ा प्रश्न यह रखा कि कुछ स्थानों की प्रतिष्ठा अलग-अलग क्यों होती है? व्यक्तियों को ये स्थान कैसे मिलते है।
राहगीरों के जूतों की मरम्मत करता हुआ एक मोची
साभार: टी. कपूर

 समाज की प्रकार्यात्मक पूर्वपेक्षाएं
दोनों लेखक पारसंस के इस विचार का समर्थन करते हैं कि समाजों के वजूद, उनके अस्तित्व का आधार व्यवस्था और स्थिरता है। हर समाज की अपनी प्रकार्यात्मक पूपिक्षाएं होती हैं जो उन्हें जीवित रहने और सुचारु रूप से चलने में सहायक होती हैं। आइए, इस बात को आगे बढ़ाते हैं। समाज व्यक्तियों का समूह, उनका जमावडा भर नहीं होता। इन व्यक्तियों को निर्दिष्ट कार्य परे करने होते हैं ताकि समाज की आवश्यकताएं पूरी हो सकें। इसलिए समाज में अनेक क्रियाकलाप चलते हैं। समाज को श्रमिकों, उद्योगपतियों, प्रबंधकों, पुलिसकर्मियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, दस्तकारों इत्यादि की जरूरत पड़ती है। विशिष्ट प्रवीणता रखने वाले विभिन्न लोग इन अलग-अलग कार्यों को अंजाम देते हैं। इसलिए किसी भी समाज की पहली प्रकार्यात्मक पूपिक्षा इन भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का प्रभावशाली ढंग से वितरण है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सही जगह सही लोग स्थित हों।

उपरोक्त प्रकार्यात्मक पूपिक्षा के चार पहलू हैं। पहला, समाज में सारी भूमिकाएं पूरी की जानी होती हैं। सभी समाजों में अलग-अलग किस्म के पेशे, व्यवसाय चलते हैं। उनके अस्तित्व के लिए ये व्यवसाय अनिवार्य हैं । इसलिए इन व्यवसायों को भी पूरा किया जाना उतना ही जरूरी है। मगर वहीं इन व्यवसायों का किया जाना ही पर्याप्त नहीं है। अगर निश्चित कार्यों के लिए ऐसे गलत लोग चुन लिए जाते हैं जिनमें इन कार्यों को पूर्ण करने के लिए अनिवार्य प्रवीणता नहीं है तो इससे समाज में अस्थिरता उत्पन्न होगी। विशेषकर तब अगर ये स्थान महत्वपूर्ण हैं । उदाहरण के लिए, बिजली का उत्पादन करने वाली कोई कंपनी अगर एक ऐसे विख्यात उपन्यासकार को नौकरी पर रख लेती है जिसे विद्युत उत्पादन की कोई जानकारी नहीं है, तो इससे कंपनी का काम प्रभावित होगा। इससे कंपनी में सिर्फ अस्थिरता ही नहीं आएगी बल्कि बिजली की आपूर्ति में भी अस्थिरता आ जाएगी। इसलिए प्रकार्यात्मक पूर्वापेक्षा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इन स्थानों को सबसे योग्य और सक्षम व्यक्तियों से भरना चाहिए। तीसरा, निर्दिष्ट कार्य के लिए सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति ही चुने जाएं। इसके लिए जरूरी है कि उन्हें इसके लिए प्रशिक्षित किया जाए। हर कार्य के लिए सबसे उत्तम व्यक्ति चुना जाए, इसे सुनिश्चित करने का सबसे प्रभावशाली उपाय प्रशिक्षण है जैसा कि हमने पीछे उदाहरण दिया है। अगर उस उपन्यासकार को विद्युत उत्पादन कंपनी का सर्वेसर्वा बनाने से पहले अगर उसे इस पद की जरूरतों, जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण मिला हो तो उसे इस पद के लिए सबसे उत्तम व्यक्ति माना जाएगा। अंततः भूमिकाओं का निर्वाह कर्तव्यनिष्ठा से होना चाहिए। भूमिकाओं के प्रभावी निर्वाह को सुनिश्चित करने के लिए यह अत्यावश्यक है। कोई व्यक्ति प्रशिक्षित, दक्ष और अपने कार्य में श्रेष्ठ हो सकता है, मगर वह अपना कार्य पूरे समर्पण और निष्ठा से नहीं करता तो इससे पूरी व्यवस्था को क्षति पहुंचेगी। इसलिए समाज की प्रकार्यात्मक पूर्वाक्षेपाओं की पूर्ति के लिए ये चारों कारक अनिवार्य है।

स्तरीकरण के प्रकार्य
डेविस और मूर कहते हैं कि विभिन्न पदों पर सबसे उत्तम व्यक्ति चुने जाएं और वे अच्छा काम करें, यह सुनिश्चित करने के लिए सभी समाजों को किसी न किसी उपाय की जरूरत पड़ती है। उनके अनुसार यह सुनिश्चित करने के सबसे कारगर उपाय सामाजिक स्तरीकरण है। यह प्रणाली इसलिए प्रभावी है कि यह समाज में अलग-अलग पदों या स्थानों के लिए असमान पारितोषिक और विशेषाधिकार देती है। सभी लोगों को अगर समान पुरस्कार दिया जाए तो उनमें कठोर श्रम करने की कोई आकांक्षा नहीं रहेगी। इसके अलावा लोगों में जिम्मेदारी भरे पदों या चुनौतीपूर्ण कार्यों से बचने की प्रवृत्ति भी हो सकती है। उन्हें यह मालूम है कि वे कितना ही उत्कृष्ट कार्य करें और कैसा ही पद या स्थान उन्हें हासिल हो, उन्हें पारितोषिक तो समान ही मिलना है। इसलिए प्रणाली को युचारु रूप से चलाने के लिए स्तरीकरण अनिवार्य है।

अभ्यास 2
समाज में स्तरीकरण की जरूरत क्यों है? अपने अध्ययन केन्द्र के सहपाठियों से इस विषय पर चर्चा कीजिए और आपको जो जानकारी मिलती है उसे नोटबुक में लिख लीजिए।

असमान पारितोषिक की इस व्यवस्था के दोहरे लाभ हैं। पहला लाभ यह है कि इससे लोग कुछ खास पदों या स्थानों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित होते हैं। पदों से जब अधिक पारितोषिक मिल रहा हो तो इन्हें पाने के लिए लोग अधिक प्रयत्न और परिश्रम करते हैं ताकि उनमें पर्याप्त योग्यता आ जाए। उदाहरण के लिए अगर लेक्चरर का पद अन्य पेशों से अधिक पारितोषिक देता हो तो मेधावी छात्र लेक्चरर बनने के लिए अनिवार्य अर्हताओं को पूरा करने के लिए प्रयत्न करेंगे। इससे समाज को अच्छे शिक्षक मिलेंगे। दूसरा, ये पारितोषिक पदों के भर जाने के बाद भी असमान रहने चाहिए ताकि जिन व्यक्तियों को इन पदों पर नियुक्त किया गया है उन्हें अपने कार्य को सुधारने की प्ररेणा मिले। लेक्चरर को अगर उनके अध्ययन और शोध कार्य के लिए पदोन्नति और वेतन वृद्धि के जरिए पुरस्कृत किया जाता है तो वे अपने कर्तव्य का निर्वाह निश्चय ही बेहतर ढंग से करते रहेंगे क्योंकि उनमें अधिक पारितोषिक पाने की लालसा रहेगी। असमान पारितोषिक पर आधारित स्तरीकरण प्रणाली इसी तरीके से समाज के लिए लाभकारी होती है।

डेविस और मूर के अनुसार स्तरीकरण की यह प्रणाली स्पर्धा पर आधारित समाज और प्रदत्त पर आधारित पारंपरिक समाज दोनों के लिए सही है। आधुनिक समाज में लोग अपनी प्रवीणता और शैक्षिक योग्यताओं के अनुसार पदों पर विराजते हैं। जो लोग अधिक योग्य और शिक्षित होते हैं उन्हें बेहतर पारितोषिक मिलते हैं और वे प्रतिष्ठित पदों पर आसीन होते हैं। पारंपरिक समाज में पद जन्म के जरिए प्रदत्त होते है। पारंपरिक रूप से जातियों में बंटे भारतीय समाज में लोगों को अपने पद या स्थान योग्यता के कारण नहीं बल्कि जन्म से मिले रुतबे या दर्जे से मिल जाते हैं। उदाहरण के लिए, एक मजदूर का बेटा मजदूर ही बनेगा भले ही उसमें अन्य प्रकार के ऊंचे काम करने की बुद्धिमत्ता हो। इसी तरह एक जमींदार का बेटा जमींदार ही बनेगा भले ही वह इस कार्य के लिए पूर्णतः अक्षम क्यों न हो। इस तरह की व्यवस्था में असमान पारितोषिक का चलन इसकी कार्यकुशलता को उन्नत नहीं कर सकता। मगर डेविस-मूर तर्क देते हैं कि इस तरह के पारंपरिक समाज में पदों से जुड़े कर्तव्यों के निर्वाह पर जोर दिया जाता है। इसलिए एक मजदूर का बेटा मजदूर ही रहेगा पर अगर वह अपने कर्तव्य, अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करता है तो उसे दूसरे तरीकों से पुरस्कृत किया जाएगा।

बोध प्रश्न 2
1) डेविस और मूर ने क्या-क्या प्रकार्यात्मक पूपिक्षाएं बताई हैं?
2) नीचे दिए गए कथनों में बताइए कि कौन गलत है कौन सहीः
प) समाज में सभी पदों या स्थानों का समान प्रकार्यात्मक महत्व है
पप) गिने चुने लोग ही प्रकार्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण भूमिकाओं से निर्वाह कर पाते हैं।
पपप) प्रकार्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण भूमिकाओं के निर्वाह के लिए किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ती।

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) किसी भी समाज की सबसे पहली जरूरत कारगर ढंग से विभिन्न भूमिकाओं का वितरण है। इसके चार पहलू हैंः
प) समाज में सभी भूमिकाएं पूरी की जानी चाहिए।
पप) इन स्थानों को सबसे योग्य और सक्षम व्यक्तियों से भरना चाहिए।
पपप) किसी कार्य की पूर्ति के लिए प्रशिक्षण जरूरी है।
पअ) भूमिकाओं को सचेतन होकर किया जाना चाहिए।
1) प) गलत
पप) सही
पपप) गलत

डेविस और मूर की बुनियादी प्रस्थापनाएं
अभी तक हमने आपको समाज की प्रकार्यात्मक आवश्यकता के रूप में सामाजिक स्तरीकरण की भूमिका के बारे में बताया है। आधुनिक समाज में स्थिति/हैसियत (स्टैटस) का आधार व्यक्ति की उपलब्धि होती है न कि प्रदत्त। दूसरे शब्दों में व्यक्ति ही हैसियत या उसका रुतबा उसकी योग्यता से तय होता है न कि उसके जन्म से। ऐसा समाज बड़ा ही गतिशील और परिवर्तनकारी है और अपनी प्रकार्यात्मक पूपिक्षाओं को पूरा करने में सक्षम रहता है। डेविस और मूर के अनुसार इसके लिए कुछ प्रस्थापनाएं हर समाज में समान रूप से विद्यमान होती हैंः

1) प्रत्येक समाज में कुछ पद या स्थान कार्य की दृष्टि से अन्य से अधिक महत्वपूर्ण होते है। इन पदों में अधिक पारितोषिक और प्रतिष्ठा मिलती है। उदाहरण के लिए, भारतीय प्रशासनिक सेवा को अन्य नौकरियों से अधिक प्रतिष्ठा हासिल है।
2) इन भूमिकाओं के निर्वाह के लिए सिर्फ गिने-चुने लोगों में अनिवार्य योग्यता या क्षमता होती है। इसका उदाहरण हम आइएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) परीक्षा में देख सकते हैं, जिसमें बैठते तो हजारों लोग हैं लेकिन कुछ ही प्रत्याशी सफल हो पाते हैं।
3) इन पदों या स्थानों के लिए अधिकतर एक लंबे और गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। जो लोग इन पदों को अर्जित करते हैं उन्हें इसके लिए बड़ा त्याग करना पड़ता है। हमारे समाज में आयुर्विज्ञान, इंजिनीयिरिंग, चार्टर्ड एकांटेसी जैसे कुछ विशेष पेशों में गहन और खर्चीले प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। तिस पर इस प्रशिक्षण में कई वर्ष लगते हैं। डेविस और मूर इसे त्याग की संज्ञा देते हैं और इसलिए ऐसे अभ्यार्थियों को अधिक आर्थिक पारितोषिक और समाज में अधिक प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।

उपरोक्त प्रस्थापनाएं इस वास्तविकता पर आधारित हैं कि आधुनिक समाजों में उपलब्धि के मूल्यों ने प्रदत्तकारी प्रतिमानों की जगह ले ली है। इन समाजों में व्यक्ति के जन्म से ज्यादा उसकी योग्यता को महत्व दिया जाता है। व्यवसाय क्रम परंपराबद्ध होते हैं और जो लोग शीर्ष पर आसीन रहते हैं उन्हें निचले स्तर के लोगों से अधिक पारितोषिक और प्रतिष्ठा मिलती है। उच्च पारितोषिक की इस व्यवस्था के साथ-साथ यह वास्तविकता लोगों को अपने दायित्व या कार्यों को उत्तम ढंग से पूरा करने के लिए प्रयत्नशील रहने के लिए प्रेरित करती है कि हर कोई इन पारितोषिकों के लिए स्पर्धा कर सकता है। परंतु इन पारितोषिकों को सिर्फ वही लोग पा सकते हैं जो सपात्र हैं. सयोग्य और सक्षम हैं। मगर इस तरह की प्रणाली के कायम रहने के लिए सबसे पहले विभिन्न व्यवसायों की महत्ता को लेकर सामाजिक सहमति अनिवार्य है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि श्रेष्ठत के क्रम में व्यवसायों का श्रेणीकरण समाज के मूल्य मतैक्य पर आधारित होता है।

बॉक्स 6.02
डेविस और मूर के अनुसार यह तय करने में कठिनाई आ सकती है कि कार्य की दृष्टि से कौन से पद अन्य पदों से अधिक महत्पपूर्ण हैं। संभव है कि जिस पद के लिए अत्याधिक पारितोषिक दिया जा रहा हो जरूरी नहीं कि प्रकार्यात्मक रूप से वह महत्वपूर्ण हो। असल में यही इस सिद्धांत की एक बड़ी कमजोरी है जिसे इस सिद्धांत के आलोचकों ने उठाया है (इस बारे में हम आगे बताएंगे)। डेविस और मूर के अनुसार कोई उच्च पद कार्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है या नहीं, इसका मूल्यांकन दो तरह से किया जा सकता है। पहला, इसका मूल्यांकन हम यह देखकर कर सकते हैं कि कार्य की। दृष्टि से अमुक पद किस सीमा तक विशिष्ट और अनूठा है। इसका यह अर्थ होगा कि इस तरह का कार्य कोई अन्य पद नहीं कर सकता।

यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि किसी कारखाने का इंजीनियर उसके साथ काम करने वाले दक्ष श्रमिक से भिन्न नहीं होता। इसलिए इंजीनियर को मिलने वाले अधिक पारितोषिक का कोई औचित्य नहीं। इसके प्रत्युत्तर में डेविस और मूर तर्क देते हैं कि कार्य की दृष्टि से इंजीनियर अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि उसमें एक दक्ष श्रमिक की प्रवीणताएं होती हैं। इसके अलावा उसमें वे प्रवीणताएं भी होती हैं जो एक दक्ष श्रमिक में नहीं होती। इसलिए एक इंजीनियर एक दक्ष कामगार तो हो सकता है मगर एक दक्ष श्रमिक इंजीनियर नहीं हो सकता। दूसरा उपाय इसका मूल्यांकन करना है कि ‘‘जिस पद (या स्थान) की बात की, जा रही है उस पर अन्य पद (स्थान) किस सीमा तक आश्रित हैं।‘‘ एक इंजीनियर मजदूरों से इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उन्हें अपने काम के लिए उसके निर्देशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

संक्षेप में डेविस और मूर ने सामाजिक असमानता के कारणों की व्याख्या देकर पारसंस के विचारों को आगे बढ़ाया। उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि असमान पारितोषिक और प्रतिष्ठा पर आधारित स्तरीकरण प्रणाली समाज में व्यवस्था बनाए रखने और उसकी उन्नति सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।

 डेविड और मूर के सिद्धांत की समालोचना
ऊपर से डेविस और मूर का सिद्धांत तर्कसंगत और यथार्थवादी लगता है । आखिर सभी समाज सामाजिक और व्यावसायिक गतिशीलता में विश्वास करते हैं। मगर यह उस समाज के ठीक उलट है जिसमें कोई गतिशीलता नजर नहीं आती क्योंकि लोगों को भूमिकाएं उनके जन्म के अनुसार निर्दिष्ट की जाती हैं। भारत का संविधान यूं सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। यह जाति, नस्ल, धर्म और सामाजिक-लिंग (जेंडर) के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को अवैध करार देता है। यह आधुनिक समाजों की तरह है जिनमें व्यक्ति की योग्यता को उसके जन्म से अधिक महत्व दिया जाता है। इसके मद्देनजर डेविस-मूर सिद्धांत यथार्थवादी दिखाई देता है क्योंकि यह समाज में व्याप्त असानताओं की व्याख्या करता है मगर इस सिद्धांत की तरह-तरह से आलोचना हुई है। असल में जब 1945 में अमेरिकन जरनल ऑफ सोशियोलॉजी में इसका प्रकाशन हुआ, तो इसने समाजशास्त्रियों को काफी आकर्षित किसा। इस दौर के अनेक विख्यात समाजशास्त्रियों ने इस सिद्धांत के समर्थन या आलोचना में लेख लिखे। इस पत्रिका ने एक विशेष अंक निकाला जिसमें उसने इन लेखों को प्रकाशित किया। ऐसा माना जाता है कि इस विशेषांक में प्रकाशित सबसे आलोचनात्मक लेखों में सबसे गहरा लेख मेल्विन ट्यूमिन का था। अब हम उन बिंदुओं पर चर्चा करेंगे जो ट्यूमिन अपनी इस मीमांसा में उठाए थे।

ट्यूमिन ने डेविस-मूर सिद्धांत की आलोचना इस बात से शुरू की कि कार्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण पदों को काफी ज्यादा पुरस्कृत किया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पारितीषिक असमान होते हैं क्योंकि कुछ को दूसरों से अधिक पारितोषिक मिलता है। मगर निश्चयपूर्वक यह नहीं कहा जा सकता है कि कार्य की दृष्टि से पद अधिक महत्वपूर्ण रहते हैं । ऐसा संभव है कि किसी कारखाने में कुछ मजदूर उत्पादन को बनाए रखने के लिए प्रबंधकों को उनसे बेहतर पारितोषिक मिलता है। ऐसी स्थिति में अगर मजदूरों को हटा दिया जाता है तो इससे उत्पादन में अवश्य ही रुकावट आएगी मगर कुछ प्रबंधकों को हटा दिया जाता है तो संभव है कि इससे उत्पादन प्रभावित ही न हो। इसलिए किसी पद की प्रकार्यात्मक महत्ता कैसे तय हो? समाज को डॉक्टरों, वकीलों, श्रमिकों और किसानों की जरूरत पड़ती है। ये सभी स्थान या पद समाज के अस्तित्व के लिए प्रकार्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण हैं। डेविस और मूर ने इन पदों की प्रकार्यात्मक महत्ता के मूल्यांकन का कोई उपाय नहीं बताया है। असल में कुछ समाजशास्त्रियों का तर्क है कि पद की महत्ता निजी मत से जुड़ी है और यह वस्तुनिष्ठ प्रतिमान नहीं हो सकती।

ट्यूमिन तर्क देते हैं कि लोगों को दिए जाने वाले असमान पारितोषिक जरूरी नहीं कि पदों की प्रकार्यात्मक महत्ता के अनुसार हों। पदों के महत्व के निर्धारण में सत्ताधिकार या शक्ति की भूमिका और इससे ऊंचे पारितोषिक हथिया लेना भी पारितोषिक को तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। उदाहरण के लिए, भारत में संगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों को असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों से बेहतर वेतन और सामाजिक सुरक्षा मिल रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि संगठित क्षेत्र के कर्मचारी मजदूर संघों में संगठित हैं और उनमें असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के मुकाबले सौदेबाजी की क्षमता अधिक होती है। असंगठित क्षेत्र के मजदूर संघों में संगठित नहीं होते और उन्हें कोई सुरक्षा हासिल नहीं होती। दोनों क्षेत्रों में काम एक ही किस्म का होता है लेकिन पारितोषिक और प्रतिष्ठा संगठित क्षेत्र में अधिक है। इसलिए उच्च पारितोषिक के निर्धारण में प्रकार्यात्मक महत्व से अधिक भूमिका सत्ताधिकार या शक्ति की होती है।

ट्यूमिन के अनुसार उच्च पारितोषिक को इस आधार पर उचित ठहराना सही नहीं है कि इन पदों के लिए भारी प्रशिक्षण शामिल होता है। वे कहते हैं कि प्रशिक्षण में जरूरी नहीं कि व्यक्ति को त्याग करना पड़ता हो क्योंकि इससे व्यक्ति नई प्रवीणताएं और ज्ञान अर्जित करके लाभान्वित होता है। इसके अलावा ऐसे मामलों में मिलने वाले पारितोषिक प्रशिक्षण के दौरान किए जाने वाले त्याग से कहीं ज्यादा होते हैं। ट्यूमिन इस प्रस्थापना को भी सही नहीं मानते कि असमान पारितोषिक लोगों को अपने काम को सुधारने के लिए प्रेरित करते हैं। यथार्थ यह है कि इस प्रेरणा से पहले कुछ अवरोध आते हैं। स्तरीकरण प्रणाली मेधावी लोगों को समान बेहतर अवसर उपलब्ध नहीं होने देती। हर समाज में सामाजिक भेदभाव किसी न किसी रूप में मौजद रहता है जो एक अवरोध का काम करता है। फिर भारतीय समाज तो भारी विषमताओं से भरा है जिसमें गरीब बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा पाना इतना कठिन है कि वह अपनी स्थिति सुधारने की कल्पना भी नहीं कर सकता। यही स्थिति अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की भी है, जहां काले और अन्य अश्वेत लोगों (इन लोगों को वहां “कलर्ड‘‘ कहा जाता है) की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है। इसलिए वे बेहतर पदोंध्स्थानों के लिए स्पर्धा नहीं कर पाते हैं।

असमान पारितोषिक प्रणाली में यह संभावना भी बनी रहती है कि जो लोग ऊंचे पारितोषिक पा रहे हैं उनका यही प्रयास रहेगा कि उनके बच्चों को भी वही पारितोषिक मिले। ये लोग अन्य लोगों को उन स्थानों/पदों में आने से रोकने का प्रयास भी करेंगे जिनमें उनके बच्चे आसीन हैं। उदाहरण के लिए एक चिकित्सक यही चाहेगा कि उसका बच्चा उसका पेशा ही अपनाए। वह सिर्फ यही प्रयास नहीं करेगा कि उसका बच्चा इस पेशे में आ जाए बल्कि वह अन्य बच्चों को इस पेशे में आने से रोकने का प्रयास भी करेगा। टी.बी, बोटोमोर ने अपनी पुस्तक एलीट्स ऐंड सोसायटीज में बताया है कि ब्रिटेन और फ्रांस जैसे विकसित देशों में भी प्राशसनिक सेवाओं में अधिकांशतः प्रशासनिक अधिकारियों के बच्चे ही हैं।

यह सच है कि जो लोग सामाजिक क्रम परंपरा में सबसे निचले क्रम में हैं उनके पास अपने ज्ञान और प्रवीणताओं को उन्नत बनाने के लिए आवश्यक साधन सुलभ नहीं होते जिससे कि वे बेहतर पद पाने के लिए सुयोग्य बन सकें। ट्यूमिन कहते हैं कि असमान पारितोषिकों के जरिए प्रेरणा एक ऐसी व्यवस्था में संभव हो सकती है ‘‘जिसमें सभी संभावित योग्य व्यक्तियों को प्रवेश और प्रशिक्षण सही मायने में समान रूप से सुलभ हो। तभी विभेदी पारितोषिकों को हम प्रकार्यात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण ठहराने की सोच सकते हैं।‘‘ लेकिन अधिकांश समाजों में ऐसा विरले ही संभव हो पाता है। इसलिए ट्यूमिन जोर देकर कहते हैं कि ‘‘स्तरीकरण प्रणाली स्पष्टतया अवसर की पूर्ण समानता के विकास के प्रतिकूल है।‘‘ ट्यूमिन तर्क देते हैं कि जो लोग विभेदी पदों/स्थानों से लाभान्वित हो रहे हैं वे निश्चय ही प्रकार्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण पदों को कुटिलता से हथिया सकते हैं। इसलिए ट्यूमिन कहते हैं कि सामाजिक स्तरीकरण का प्रकार्यवाद सिद्धांत यथार्थवादी नहीं है।