भारतीय संगीत से संबंधित प्रमुख वाद्य एवं उनके वादक कौन कौनसे है नाम indian musical instruments and their famous players in hindi

indian musical instruments and their famous players in hindiभारतीय संगीत से संबंधित प्रमुख वाद्य एवं उनके वादक कौन कौनसे है नाम बताइए ?

तारयुक्त वाद्ययंत्र
इसे ताल वाद्य या कोडोफोन भी कहा जाता है। प्राचीन काल से इसका उल्लेख मिलता है। इसे कई श्रेणियों में बांटा जा सकता है। इनमें एक डोरी या तार होती है। एक अकेली डोरी से ही स्वर लहरी निकलती है। कुछ में कई तार होते हैं। लोक संगीत का ‘टुन टुने’ इसका अच्छा उदाहरण है। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में गोपी यात्रा, आंध्र प्रदेश में जमादिका, उड़िया संथालों में बुआंग के खेल में ‘प्रेमताल’ के नाम से इसे पुकारा जाता है। तंबूरी, एकतारा, एकनांद में एक ही तार या डोरी लगी होती है। तंबूरा या तानपुरा में चार तार लगे होते हैं। यह वाद्य यंत्र अपनी समृद्ध स्वर लहरी के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन यह जीवन या जावेरी (डोरी के नीचे ब्रिज पर लगे धागे) की स्थिति पर निर्भर करता है। इस शृंखला में ‘वीणा’ का नाम काफी प्रमुखता से लिया जा सकता है। इसका विवरण वेदों में भी मिलता है। द्रविड़ इसे ‘यज’ के नाम से इस्तेमाल करते थे। वीणा का उल्लेख प्राचीन पुस्तकों, पुराने स्मारकों तथा पुराने संगीत में मिलता है।
बक्से के आकार की वीणा का उल्लेख भी मिलता है। इनमें से सबसे प्रमुख ‘संतूर’ है। कश्मीर में इसका अधिक चलन है। इसमें एक पतली चमड़ी से कई डोरियों को कंपित किया जाता है। एक छोटा-सा स्वर मंडल भी होता है। एक तार वाले या फिंगर बोर्ड वाले वाद्य यंत्र में कंपक को फिंगर बोर्ड के नीचे लगाया जाता है। ऐसा ही एक यंत्र ‘जिथर’ है। पुराने जमाने में यह बांस का बनता था तथा इसे ‘गीतांग’ कहा जाता था। प्राचीन काल की अलापिनी वीणा, इकातंत्री, ब्रह्मवीणा, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विचित्र वीणा इसके परिष्कृत रूप हैं। मध्य युग में इसे ‘किन्नरी’ के नाम से पुकारा जाता था। इसे अब ‘रुद्रवीणा’ कहते हैं। जिथर से अलग सितार में कंपक का विस्तार फिंगर बोर्ड तक होता है। इसका छोटा आकार ‘सरोद’ कहलाता है। अली अकबर खां तथा अमजद अली खां प्रसिद्ध सरोदवादक हैं। उत्तर-पूर्व में इसे कच्चापी रबाब’ के नाम से जागा जाता है। ‘सवरबत’ तथा ‘सुरसिंगार’ भी इसी की किस्में हैं। सभी वीणाओं में ‘सरस्वती वीणा’ को सबसे प्रमुख माना गया है। कर्नाटक संगीत में इसे सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह एक ऐसा वाद्य यंत्र है, जिस पर सुर, ताल और राग तीनों को पैदा किया जा सकता है। हिंदुस्तानी संगीत में वीणा की तरह सितार (पर्सियन ‘सहतार’) को भी प्रमुख स्थान दिया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इसका आविष्कार 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने किया था। लकड़ी के सितार में राग पैदा करने के लिए धातु के पांच तार, कुछ डोरियां (इन्हें चिकारी कहा जाता है), कुछ पतली तार (इन्हें तराब कहा जाता है) लगे होते हैं। इस वाद्य से जुड़ा हुआ चर्चित नाम पंडित रविशंकर का है।
लम्बी ग्रीवा का एक सितार गोट्टु वडयम (महानाटक वीणा) के नाम से जागा जाता है। कर्नाटक संगीत से जुड़े उपकरणों में ही कंपन करने वाली डोरी ‘तराब’ लगी होती है। एक डोरी वाले वाद्य यंत्रों को भारत में ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिली। सरींदा, कमैचा तथा सारंगी में भी फिंगर बोर्ड के नीचे ही कंपक लगा होता है। सारंगी की सबसे बड़ी खासियत उसके बजागे में अंगुली का संचालन है। अंगुलियों को रोकने के लिए नाखूनों का इस्तेमाल किया जाता है। ‘वायलीन’ में फिंगर बोर्ड के ऊपर साउंड वाक्स लगा होता है। गुजरात तथा राजस्थान का रावण हट्टा या रावण हस्तवीणा, आंध्र प्रदेश एवं महाराष्ट्र का ‘किंगरी’, ओडिशा का केनरा एवं बनाम, मणिपुर का ‘वेना’ तथा केरल का ‘वीणा कुंजु’ इसी श्रेणी में आते हैं।

भारतीय संगीत से संबंधित प्रमुख वाद्य एवं उनके वादक
शहनाईः उस्ताद बिस्मिल्ला खां,शैलेश भागवत, जगन्नाथ, अनन्त लाल, भोलानाथ तमन्ना, हरिसिंह, आदि।
वायलिनः गोविन्द स्वामी पिल्लई, लाल गुड़ी जयरामन, सत्यदेव पवार, श्रीमती एन.राजम, विष्णु गोविन्द जोग, शिशिर कनाधर चैधरी, टी.एन.कृष्ण, आर.पी. शास्त्री,एल. सुब्रमण्यम तथा बालमुरली कृष्णन।
सितारः उस्ताद विलायत खां, पं. रविशंकर,शाहिद परवेज, शुजात हुसैन, बुद्धादित्य मुखर्जी, निशात खां, मणिलाल नाग, शशि मोहन भट्ट, देवव्रत चैधरी, निखिल बगर्जी, आदि।
सरोदः उस्ताद अलाउद्दीन खां, चन्दन राय, उस्ताद अली अकबर खां, अशोक कुमार राय, ब्रजनारायण, उस्ताद अमजद अली खां, आदि।
संतूरः पं. शिवकुमार शर्मा, तरूण भट्टाचार्य, भजन सोपोरी आदि।
वीणाः एस.बालचन्द्रन, असद अली, ब्रह्मस्वरूप सिंह, रमेश प्रेम, कल्याण कृष्ण भगवतार, गोपाल कृष्ण आदि।
बांसुरीः हरि प्रसाद चैरसिया, प्रकाश सक्सेना, देवेन्द्र मुक्तेश्वर, विजय राघव राय, रघुनाथ सेठ, पन्नालाल घोष, प्रकाश बढेरा, राजेन्द्र प्रसन्ना, आदि।
सारंगीः पं. रामनारायण जी, अरूण काले, आशिक अली खां, बजीर खां, धु्रव घोष, संतोष मिश्रा, रमजाग खां एवं अरूणा घोष।
गिटारः ब्रजभूषण काबरा, विश्वमोहन भट्ट, केशव तलेगांवकर, श्रीकृष्ण नलिन मजूमदार, आदि।
पखावजः गोपाल दास, इन्द्रलाल राणा, ब्रजरमण लाल, रमाकांत पाठक, प्रेम बल्लभ, तेज प्रकाश तुलसी।
तबलाः अल्ला रखा, लतीफ खां, गुदई महाराज, अम्बिका प्रसाद, सुभाष निर्वाण, जाकिर हुसैन।
हारमोनियमः अप्पा जुलगांवकर, रविन्द्र तलेगांवकर, महमूद धालपुरी, वासन्ती मापसेकर।
जल तंरगः घासीराम निर्मल, रामस्वरूप प्रभाकर, जगदीश मोहन।
मृदंगः पालधर रघु।
नादस्वरमः नीरूस्वामी पिल्लई।
सुन्दरीः पं. सिद्धराम जाधव।
इसराजः अलाउद्दीन खां।
सुरबहारः श्रीमती अन्नपूर्णा देवी, इमरत खां।
क्लेरियोनेटः एमण्वी. सोलारपुरकर, रामकृष्ण, गौरीशंकर।

ठोस वाद्ययंत्र
घनवाद्य या इडियोफोन के बारे में ऐसा माना जाता है कि मनुष्य को ज्ञात पहला वाद्य यंत्र यही था। इससे सिर्फ लय पैदा की जा सकती है। इनमें निश्चित तथा आवश्यक स्वराघातों को उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती। स्वर लहरी पैदा करने के लिए यह आवश्यक है। मटकी, गगरी, नूट, घटम इत्यादि का प्रयोग इसी रूप में होता रहा है। कर्नाटक की संगीत गोष्ठी में इसका प्रयोग होता है। ‘घटम’ एक विशेष किस्म की मिट्टी से बना होता है। जिससे विविध किस्म की आवाजें निकाली जा सकती हैं। अधिकतर आर्केस्ट्रा में प्रयोग होने वाले जलतरंग वाद्य में पानी से भरी कटोरियों को बांस की पतली छड़ी से बजाया जाता है। पैरों से बजने वाले वाद्यों की श्रेणी में ‘घुंघरू’, उत्तर भारत की ‘थाली’, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का ‘जगटे’, तमिलनाडु का ‘सेमानकलम’ केरल का ‘चेन्नाला’ राजस्थान का ‘श्रीमंडल’ तथा छड़ियों को वाद्य यंत्र की तरह प्रयोग करने वाले नृत्यों में गुजरात का ‘डांडिया’, दक्षिण भारत का कोलु, आते हैं। असम का ‘सौंगकांग’, उत्तर पूर्व का दूतरंग तथा मध्यप्रदेश का कटोला इडियोफोन की अन्य श्रेणियां हैं।
भारतीय आर्केस्ट्रा
ªयद्यपि भारत में आर्केस्ट्रा का अस्तित्व पहले कभी नहीं रहा किंतु भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में साजो-सामान से युक्त एक दल ‘कुटपा’ का उल्लेख किया है। दक्षिण भारत का मेलम (या न्यायंदी मेलम) तथा केरल के पंचवाद्य को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। वर्तमान समय में भारतीय फिल्मों का संगीत कुछ हद तक आर्केस्ट्रा की नकल है।