मानवाधिकार की अवधारणा क्या है | मानवाधिकार की अवधारणा और इसका महत्व किसे कहते है human rights in hindi

By   October 10, 2020

human rights information in hindi  मानवाधिकार की अवधारणा क्या है | मानवाधिकार की अवधारणा और इसका महत्व किसे कहते है ?

मानवाधिकारो का अर्थ
‘मानवाधिकार‘ शब्द की अवधारणा के अंतर्गत मानव जाति के वे सभी मौलिक दावे आते हैं जो उसे मनुष्य होने के नाते प्राप्त हैं। वे ऐसे अधिकार हैं जिन पर सभी मानवों का दावा मानव होने के नाते है। ये अधिकार मात्र राष्ट्रीय न होकर सार्वभौमिक होते हैं और कानूनी अधिकारों से भिन्न होते हैं। वे ऐसे दावे होते हैं जो कानूनी अधिकारों से भिन्न होते हैं। वे ऐसे दावे होते हैं जो सभी के होते हैं भले ही किसी राज्य ने अपने यहाँ उनका प्रावधान किया हो या न किया हो। वे सामान्य तथ्य पर आधारित होते हैं कि कोई भी मनुष्य किसी सरकार द्वारा उनसे वंचित न रखा जाए। वे समाजों या राज्यों के बजाय व्यक्तियों में होते हैं। वे ‘मानवाधिकार इसीलिए कहलाते हैं क्यों कि वे किन्हीं प्राकृतिक कारणों से होने वाली संक्रियाओं से नहीं अपितु स्वयं मानव से उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति कुपोषण, यातना, अनुचित कारावास, निरक्षरता या नियमित सवैतनिक ‘अवकाशों के अभाव से पीड़ित है तो उसे मनुष्य के रूप में उपयुक्त जीवन जीने से वंचित रहना पड़ रहा है। मानवाधिकार (के उल्लंघन) की धारणा का उदय यहाँ से होता है। मॅक्फरलेन के अनुसार मानवाधिकार वे नैतिक अधिकार हैं जिन पर हर पुरुष या स्त्री का स्वामित्व केवल इसलिए हैं कि वह ‘मानव‘ है। इसी प्रकार एक अन्य लेखक ने लिखा है कि मानवाधिकार वे अधिकार हैं जिन पर मानव जाति का स्वामित्व केवल मानव होने के नाते है, चाहे उनका राज्य, समाज, जाति या धार्मिक विश्वास कोई भी क्यों न हो।

 लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवाधिकारों में अंतर
सामान्य शब्दों में कहा जाए तो ‘अधिकार‘ सामाजिक जीवन की वे दशाएँ हैं जिनके बिना कोई मनुष्य श्रेष्ठता को प्राप्त नहीं कर सकता। वे ऐसे समग्र अवसर हैं जो मनुष्य के व्यक्तित्व को समृद्ध करते हैं। यूरोप में उदार लोकतंत्रीय राज्यों के उदय के साथ, अधिकार, प्रबुद्ध नागरिकता के अभिन्न अंग हो गए। वैयक्तिक अधिकारों के प्रावधान, प्रवर्तन तथा संरक्षण किसी राज्य की वैधता को आँकने के मापदंड बन गए थे। किन्तु विधिक एवं संवैधानिक राज्यों के उदय के साथ अधिकारों के कानूनी पक्ष पर अधिक जोर दिया जाने लगा। अभिप्राय यह कि श्अधिकार राज्य द्वारा सर्जित होते हैं तथा व्यक्ति उन्हें राज्य के नागरिक की हैसियत से ही प्राप्त करता है। जो कुछ कानून प्रदत्त हो वहीं अधिकार है। अधिकार नैसर्गिक या अंतर्निहित नहीं होते वरन् इस अर्थ में कृत्रित होते हैं कि राज्य द्वारा निर्धारित एवं सुरक्षित किए जाने पर ही उन्हें ‘अधिकार‘ की संज्ञा प्राप्त होती है। राज्य ही अधिकारों को परिभाषित एवं निर्धारित करता हैय राज्य ही उस कानूनी ढाँचे का प्रावधान करता है जिसके आधार पर उन अधिकारों का आश्वासन प्राप्त होता है क्योंकि राज्य ही अधिकार की सर्जना करता और लगातार बनाए रखता है, अतः और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अधिकारों में भी परिवर्तन हो जाता है। अतः अधिकार सार्वभौमिक नहीं होते वरन् वे उस राज्य की प्रकृति और उसके प्रकार के सापेक्ष होते हैं जिसने उन अधिकारों को प्रदान किया है। उदाहरण के लिए अमेरिका के नागरिकों को प्राप्त अधिकार ठीक वे ही नहीं हैं जो भारत या रूस के नागरिकों को प्राप्त हैं। दूसरी और मानवाधिकारों में अधिकारों के सार्वभौम लक्षणों पर जोर दिया जाता है – ऐसे अधिकार जो मनुष्यों को राज्य, समाज, जाति एवं धार्मिक विश्वास से निरपेक्ष रूप में केवल मनुष्य होने के नाते प्राप्त हैं। वे उस शपथ पर आधारित होते हैं जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों को दिलाई जाती है कि वे ‘मानवाधिकारों एवं मौलिक स्वतंत्रताओं पर निरीक्षण रखने के लिए सार्वभौमिक आदर की भावना‘ का समर्थन करेंगे। संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र की प्रस्तावना में कहा गया है कि ‘मानवाधिकार का प्रयोजन सभी लोगों तथा सभी राष्ट्रों में समान उपलब्धियों को वहाँ तक स्थापित करना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति तथा समाज का प्रत्येक अंग इस घोषणा को निरंतर मन में रखते हुए सदस्य राज्यों के लोगों तथा अधिकार क्षेत्र के राज्यों के लोगों के बीच शिक्षा तथा संदेशों के द्वारा अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के प्रति आदर भावना को समर्थन देने के लिए राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के प्रगतिशील उपायों से प्रयास करेगा।

बोध प्रश्न 1
नोटः क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) ‘मानवाधिकार‘ का अर्थ क्या होता है?
2) ‘लोकतांत्रिक अधिकारों‘ तथा ‘मानवाधिकारों‘ में अंतर स्पष्ट कीजिए?

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
1) मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को मनुष्य होने के नाते प्राप्त हैं चाहे वह किसी भी राज्य, जाति, समुदाय, धर्म या समाज से सम्बन्ध रखता हो। (विस्तार के लिए भाग 27.2देखें)

2) लोकतांत्रिक अधिकार कानूनी अधिकार हैं जो कि राज्य द्वारा विधिक एवं संवैधानिक रूप से मान्य हैं। मानवाधिकारों पर मनुष्यों द्वारा दावा किया जाता है चाहे उन्हें राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त हो या नहीं। ये सार्वभौमिक होते हैं। (विस्तार के लिए भाग 27.2 देखें)

 मानवाधिकार आन्दोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
‘मानवाधिकार मद का प्रयोग पहली बार बीसवीं शताब्दी में किया गया था। उससे पहले की शताब्दियों में इन अधिकारों को ‘नैसर्गिक अधिकार या ‘मनुष्य के अधिकार कहा जाता था। ‘नैसर्गिक अधिकार के सिद्धान्त का प्रथम उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के लेखकों क्रोशियस, हॉब्स, लौक आदि के लेखन में मिलता है जिन्होंने ‘नैसर्गिक नियम‘ को समझते हुए कहा था कि ‘किसी को भी अन्य किसी के जीवन, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता या स्वामित्व को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए और इसी को ‘नैसर्गिक अधिकार‘ का आधार माना गया था। इस नियम के आधार पर माना गया कि हर व्यक्ति को जीवन, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता और संपत्ति का नैसर्गिक अधिकार है। इसी नियम से प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य भी बनता है कि उसे दूसरों के जीवन स्वतंत्रता और संपत्ति के प्रति सम्मान रखना चाहिए। इस सिद्धान्त की प्रतष्ठित अभिव्यक्ति जॉन लौक की पुस्तक ‘द टू ट्रीटीज ऑन गवर्नमैण्ट‘ में हुई है। लौक ने ‘जीवन, स्वतंत्रता तथा संपत्ति‘ के अधिकारों को नैसर्गिक अधिकार कहा है। उसने आगे कहा है कि राज्य स्थापना के पीछे मूल धारणा ही इन अधिकारों को बेहतर संरक्षण प्रदान करना है और यदि कोई सरकार इन अधिकारों का उल्लंघन करती है तो लोगों को उसके विरुद्ध विद्रोह करने का अधिकार है। इसी प्रकार 1776 में अमरीकी स्वतंत्रता की घोषणा में इन ‘स्वतः सिद्ध सत्यों को प्रतिपादित किया गया था कि ‘सभी मनुष्य बराबर बनाए गए हैं और सृष्टा ने उनको जीवन, स्वतंत्रता एवं प्रसन्नता की खोज जैसे अविच्छेद्य अधिकार दान में दिए हैं। आगे उसमें जोर देकर कहा गया है कि सरकारों का गठन इन अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है जिससे कि वे (सरकारें) अपनी न्यायोचित शक्ति, शासितों की सहमति से प्राप्त कर सकें। जो सरकारें इन अधिकारों को नष्ट करने का प्रयत्न करें उनका उन्मूलन किया जा सकता है। 1789 में मनुष्य एवं नागरिक के अधिकारों के संबंध में फ्रांसीसी घोषणा में भी ‘नैसर्गिक अधिकारों‘ को अनिर्धारणीय एवं अविच्छेद्य अधिकारों के रूप में गिनाया गया है। संक्षेप में इन सभी घोषणाओं में इस तथ्य को रेखांकित किया गया है कि मनुष्य के कुछ अधिकार उसके मनुष्य होने के कारण होते हैं न कि किसी राज्य का नागरिक होने के कारण। वह ही मानवाधिकार कहलाते है।

मानवाधिकारों के संबंध में उन्नीसवीं शताब्दी में प्रारंभिक अन्तर्राष्ट्रीय संधियाँ दासता उन्मूलन से संबद्ध रही हैं, जैसे 1862 में वाशिंगटन की संधिय 1867 में बसेल्स तथा 1885 में बर्लिन सम्मेलन, युद्ध संबंधी नियम जैसे, 1856 की पेरिस घोषणा, 1864 का जेनेवा सम्मेलन, 1899 का हेग अधिवेशन, 1864 में रेड क्रॉस की अन्तर्राष्ट्रीय समिति का गठन आदि।

 मानवाधिकार आन्दोलन
संयुक्त राष्ट्र घोषणा के अंगीकार किए जाने के तुरन्त बाद ही पूरे विश्व में मानवाधिकार के मुद्दे को सशक्त ढंग से उठाया जाना प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे इसने एक आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। जहाँ पाश्चात्य लोकतांत्रिक देशों को मानवाधिकारों में उदार पूँजीवादी विचारधारा का औचित्य एवं शीत युद्ध के विरुद्ध लड़ने का हथियार दिखाई दिया वहीं एशिया और अफ्रीका के भूतपूर्व उपनिवेश देशों को उनमें पुरानी सामंती व्यवस्था से मुक्ति प्राप्त करने के अवसर एवं अपने विकास के लिए आवश्यक उपकरण दिखाई दिए। उदाहरण के लिए अफ्रीका में रंगभेद नीति के विरुद्ध संघर्ष में मानवाधिकार की अवधारणा प्रभावकारी हथियार के रूप में सिद्ध हुई थी। भूमंडल के विभिन्न भागों में संयुक्त राष्ट्र, महाद्वीपीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तरों पर अनेक संगठन मानवाधिकारों का समर्थन और उन्हें संरक्षण देने के लिए अस्तित्व में आए। जहाँ संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकारों को संरक्षण प्रदान करने के लिए अनेक संगठन बनाए और कानून पारित किए वहीं अनेक देशों की सरकारों ने अपने यहाँ मानवाधिकार आयोगों की स्थापना की। इसके साथ ही अनेक ऐसे गैर सरकारी संगठन भी अस्तित्व में आए जो सरकारों पर मानवाधिकार – उल्लंघन के विरुद्ध निगरानी रखते थे।

हमें यह जान लेना चाहिए कि हम जब मानवाधिकारों की बात एक आन्दोलन के रूप में करते हैं तो हमारा अभिप्राय अनेक संगठनों एवं व्यक्तियों के उस सामूहिक प्रयत्न से होता है जो मानवाधिकारों को समर्थन देने और उनके संरक्षण के लिए किया जाता है। ऐसे आन्दोलन में विधायक एवं कार्यपालक नीतिनिर्मातागण, पत्रकार एवं सम्मतिदाता नेतागण, शिक्षा शास्त्री तथा अन्य वर्ग भागीदार होते हैं। उनमें (अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या स्थानीय) गैर सरकारी संगठन तथा अन्य अनेक प्रकार के बहुत से संघय जैसे, श्रमिक संघ, चर्च, व्यावसायिक संघ, जनता और ऐसे संगठन जिन्होंने मानवाधिकार हेतु संघर्ष में सक्रिय चिंता तथा भागीदारी व्यक्त की हो, भी सम्मिलित होते हैं। ये संगठन समस्त भूमंडल पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का भंडा फोड़ने एवं सार्वजनिक रूप से विरोध करने, सरकारों की घेराबंदी करने और उत्पीड़ितों को कानूनी एवं मानवीय सहायता प्रदान करने, सरंक्षणकारी वैधानिक प्रारूपण में सहायता करने, कानूनी उपचारों की युक्ति बताने, सरकारों तथा समुदायों को मानवाधिकारों के स्तरों के विषय में जानकारी देने तथा एकात्मता के सूत्र जोड़ने का कार्य करते हैं। ऐसे संगठनों का नेतृत्व मानवाधिकार सक्रियतावादियों या मानवाधिकार रक्षकों में से कुछ ऐसे व्यक्तियों के द्वारा किया जाता है जो औरों के मानवाधिकारों की सुरक्षा एवं सरंक्षण के प्रति अपनी खुली निष्ठा तथा सक्रिय कार्रवाई का प्रमाण देते हैं। मानवाधिकारवादी और गैर सरकारी संगठन तथा मानवाधिकार – पोषक व्यक्ति ही उस मानवाधिकार आन्दोलन के अग्रणी नायक रहे हैं जो 1970 के बाद एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरकर आया। इससे पूर्व कि मानवाधिकारों के प्रोत्साहन एवं सरंक्षण में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका पर विचार किया जाए, यह उपयुक्त है कि इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए कार्य पर दृष्टिपात कर लिया जाए।

बोध प्रश्न 4
नोटः क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) ‘मानवाधिकार‘ एक आन्दोलन किस प्रकार कहा जा सकता है?

बोध प्रश्न 4 उत्तर
1) मानवाधिकारों को एक आन्दोलन के रूप में बनाने के लिए संगठनों, व्यक्तियों, राज्यों और अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों ने सामूहिक प्रयत्न किए। इस सामूहिक प्रयत्न ने मानवाधिकार को भूमंडलीय आन्दोलन बना दिया। (विस्तार के लिए भाग 27.5 देखें)

क्षेत्रीय समझौते एवं प्रसंविदाएँ
मानवाधिकारों के समर्थन एवं संरक्षण की दिशा में दूसरा बड़ा प्रयत्न यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका तथा दक्षिण-पूर्व-एशिया के क्षेत्रीय संगठनों के द्वारा किया गया। इन संगठनों ने मानवाधिकारों , को लागू करने के लिए समझौतों तथा तंत्रों का प्रावधान किया और संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए कार्य में रहे रिक्त स्थानों की पूर्ति की।

 यूरोपीय समझौता
मानवाधिकारों के पक्ष में अधिक उल्लेखनीय कार्य यूरोप में देखा गया। इसके दो स्पष्ट कारण थे। एक तो वहाँ नाजी और फासी शासकों के अत्याचारों की याद ताजा थीय दूसरे लोकतांत्रिक यूरोप के निकट ही साम्यवादी सोवियत संघ था जिसने मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा की पृष्ठभूमि में निहित दर्शन के निष्कर्षों को ही नकार दिया था। मई 1948 में हेग में आयोजित यूरोपीय देशों की महासभा ने, ‘विचार, सभा एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आश्वासन के साथ मानवाधिकार पर एक अध्याय जोड़ने की इच्छा प्रकट की थी। इसके बाद मानवाधिकारों एवं मौलिक स्वतंत्रताओं के संरक्षण के लिए नवंबर 1950 में यूरोपीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते में, लोगों के जीवन, स्वतंत्रता, सुरक्षा, उचित जाँच, किसी के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन, घर एवं पत्राचार के प्रति सम्मान, विचार करने और घर बसाने आदि के अधिकार प्रदान करने और यदि इनमें से किसी अधिकार का उल्लंघन किया जाए तो उसके लिए समुचित एवं प्रभावकारी उपाय करने का सुनिश्चित आश्वासन प्रदान किया गया। उत्पीड़न, अमानवीय व्यवहार या अमानवीय दंड से मुक्तिय दास प्रथा एवं दास व्यापार से छुटकाराय विचार, अभिव्यक्ति, अंतःकरण एवं धर्म की स्वायत्तता तथा सभा एवं साहचर्य की स्वतंत्रता का आश्वासन दिया गया। कालान्तर में, संपत्ति एवं निष्पक्ष चुनाव का अधिकार माता पिता को अपनी आस्था के अनुरूप अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने का अधिकार, ‘ऋण के लिए कारावास के दंड विधान‘ से मुक्तिय देश निकाले से मुक्ति तथा विदेशियों के सामूहिक निष्कासन पर प्रतिबंध आदि विषय भी इस समझौते में सम्मिलित किए गए। संयुक्त राष्ट्र घोषणा से यह समझौता इस अर्थ में भिन्न था कि इसमें उक्त घोषणा के कुछ अधिकारों को लागू करने का प्रथम प्रयत्न किया गया था। इस समझौते की महत्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित थींः

प) इसने संबंद्ध पक्षों को प्रतिबद्ध किया कि वे इन अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं को अपने नागरिकों के लिए सुरक्षित करें।
पप) इस (घोषणा) से अनुप्रयोग की सार्वभौमिकता के सिद्धान्त पर जोर दिया।
पपप) इस समझौते के लाभ केवल अनुबंधित पक्षों तक ही सीमित नहीं रखे गए।
पअ) इसमें किसी प्रकार की क्षेत्राधिकार संबंधी सीमाएँ नहीं हैं।

अतः संरक्षण का मापदंड अधिक विस्तृत है। लगभग सभी यूरोपीय देशों ने इस समझौते की उस धारा को स्वीकार कर लिया है जिसके अनुसार किसी नागरिक को यूरोपीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष सीधे ही याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की गई है। इस समझौते का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह अधिकारों का संरक्षण तीन अंगों के द्वारा करता है। ये अंग हैं – यूरोपीय मानवाधिकार आयोग, यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय तथा मंत्रियों की समिति। इस समझौते ने किसी व्यक्ति को अपनी ही सरकार के विरुद्ध भी आयोग से शिकायत करने की अनुमति दी है। यद्यपि यह व्यवस्था स्पष्टवादिता से दूर है और अनेक पक्षों में समस्यामूलक भी है फिर भी यह दावा किया गया है कि यूरोपीय समुदाय में समाविष्ट किए गए कानूनी परिवर्तनों के संदर्भ में, इस समझौते ने राज्यों को इस बात के लिए स्वच्छंद नहीं छोड़ा है कि वे अपने नागरिकों से मनचाहा व्यवहार कर सकें।

 लैटिन अमेरिका
इसी प्रकार अंध महासागर के पार लैटिन अमेरिकी राज्यों ने 1959 में राज्यों के अमेरिकी संगठन की स्थापना की। इस संगठन के (लिखित) अधिकार पत्र में मानवाधिकारों की रक्षा का दायित्व राज्यों का माना गया है। मानवाधिकारों के अमेरिकी समझौते पर चिल्ली, कोलंबिया, कोस्टा रिका, इक्वेडोर, ग्वाटेमाला एवं सेल्वेडोर, होण्डुराज, निकारागुआ, पनामा, पैरागजे यूरूग्वे तथा वेनीजुएला ने 1969 में हस्ताक्षर किए और यह समझौता 1978 में लागू हुआ। इस समझौते की धारा 1 के द्वारा नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार प्रदान किए गए और उनको लागू करने में राज्यों की अभिन्न भूमिका बताई गई। इस समझौते की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि इसमें एक ही साधन से, नागरिक-राजनीतिक अधिकार तथा आर्थिक-सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार, दोनों को समेटा गया था। इसमें आयोग भी था और न्यायालय भी।

आयोग, सदस्य राज्यों के व्यक्तियों और समुदायों से संदेश ग्रहण करता है, उनकी समीक्षा करता है, स्थितियों का अध्ययन करता है, विशिष्ट राज्यों में सत्रों एवं सार्वजनिक सुनवाइयों का आयोजन करता है और संबद्ध राज्य या राज्यों को अपनी सिफारिशें भेजता है। आयोग ने, 1965 में डोमिनिकन रिपब्लिक के सामाजिक संघर्षों में निर्दोषों की जिंदगियों को बचाकरय बंदियों के अधिकारों को सुरक्षित कराकरय ब्राजील, चिली, हैती एवं क्यूबा में मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों की जाँच कराकर उल्लेखनीय प्रयास किए थे। इसने एल सेल्वेडोर तथा होण्टुराज के बीच हुए युद्ध में अत्यंत उपयोगी मानवीय कार्य भी किए थे।

अफ्रीका
सातवें दशक में जब पूरे अफ्रीका में परिवर्तन की लहर चल रही थी जब (दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर) शेष सभी अफ्रीकी देशों के नेताओं ने अफ्रीकी एकता संगठन बनाया था और उन्होंने लोगों के आत्म निर्णय के अधिकार की उद्घोषणा की थी। इस संगठन ने 1981 में ‘मानवाधिकारों एवं जनाधिकारों के अफ्रीकी अधिकार पत्र‘ का प्रारूप तैयार किया था और मानवाधिकारों का प्रावधान करने, उन्हें समर्थन देने और उनका संरक्षण करने के लिए निकायों की स्थापना करने वाला एक आयोग भी है इस (आयोग) में जनाधिकार, सामुदायिक अधिकार या सामूहिक अधिकार के नाम से समाविष्ट हैं। यह आयोग राज्यों के विभिन्न पक्षों से प्राप्त शिकायतों के आवर्ती प्रतिवेदनों का अधिकार पत्र के प्रावधानों के अंतर्गत परीक्षण करता है तथा संबद्ध राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद स्थापित करके उनको मानवाधिकार संबंधी दायित्वों के पालन के लिए प्रोत्साहित करता है। अफ्रीकी एकता संगठन वर्णभेद को समाप्त करने में सफल रहा है।

दक्षिण पूर्व एशिया
यूरोपीय, लैटिन अमेरिका एवं अफ्रीकी देशों के अनुभवों ने दक्षिण-पूर्व एशियायी देशों के लिए भी प्रोत्साहन दायक उदाहरण का काम किया। किन्तु कुछ ऐसे कारक थे कि इस दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हो सकी। ऐसे कारकों में राजनीतिक अधिकारों एवं नागरिक स्वतंत्रताओं का अभाव, लोकतंत्रीकरण एवं बहुदलीय पद्धति का अभाव, आत्मसेवी संवैधानिक पद्धति, राष्ट्रीय सुरक्षा के अत्यधिक कानून, निवारक नजरबंदी एवं नियत वैधानिक पद्धति पर नियंत्रण, विचार, अभिव्यक्ति एवं सम्मिलन की स्वतंत्रता पर व्यापक प्रतिबंध, मध्यमार्गी एवं दोषपूर्ण आपराधिक – न्यायिक पद्धति, असंतुलित विकास, अनुपयुक्त सामाजिक सुरक्षा तंत्र, आदि को गिनाया जा सकता है। फिर भी, गुट निरपेक्ष आन्दोलन (नैम), दक्षिण पूर्व एशियायी राष्ट्र संघ (आसेआन), एशिया-प्रशान्त संयुक्त आर्थिक सामाजिक आयोग (ऐस्कैप) तथा दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) आदि के रूप में क्षेत्रीय स्तरों पर कुछ पहले हुई हैं। आसेआन की युगान्तकारी उपलब्धि, 1980 में, ई.ई.सी. के साथ हुई उसकी संधि थी, जिसमें आसेआन ने क्षेत्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के सुधार की इच्छा व्यक्त की थी। भारत के निकट सार्क की स्थापना, मानवाधिकार के प्रति जागरूकता का हद संकेत था। यह संगठन आतंकवाद और मानवाधिकार उल्लंघन के विरुद्ध संघर्ष करता रहा है और इसे आशा है कि यह उक्त चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकेगा। साथ ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोगों एवं समितियों की स्थापना का प्रारंभ भी हो चुका है। फिलीपीन्स, इंडोनेशिया, श्री लंका और भारत इसके उदाहरण हैं।

 मध्य पूर्व
मध्यपूर्व के मुस्लिम देशों ने आपस में मानवाधिकार संबंधी कोई समझौता नहीं किया है। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य होने के नाते उन सबने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा पर हस्ताक्षर किए हैं किन्तु वे मात्र कागजी हस्ताक्षर हैं क्योंकि इन देशों में घटित घटनाएँ उत्साहवर्धक नहीं रहीं। इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि लोगों और उनकी सांस्कृतिक विरासत की कुछ नैतिकताएँ, स्वतंत्रता और समानता की पश्चिमी अवधारणा का बलपूर्वक निषेध करती हैं। उनके लिए शरीयत ही अंतिम सत्य है। उनके संविधानों में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि उनका शासन तंत्र उनके पवित्र ग्रंथ के शब्दों पर आधारित है। सऊदी अरब, कुवैत, जोर्डन, कतार, सीरिया, इराक आदि के संविधान अपने अपने राज्य में इस्लाम को राज्य का धर्म मानते हुए उस पर जोर देते हैं और शरीयत (कानून बनाने की कला और विज्ञान) को विधान का मूल स्रोत मानते हैं। अभिप्राय यह है कि शरीयत के स्वर से भिन्न किसी भी कानून को बनने से रोकना तथा धर्म के शिकंजे से बाहर किसी भी प्रकार के स्वतंत्र सामाजिक या राजनीतिक आन्दोलन को निष्फल करना उनका उद्देश्य है। इस्लाम की उदारतावादी व्याख्या करने वालों का कथन है कि मानवाधिकार इस्लाम की मूल भावना में ही अंतर्विष्ट हैं। इन देशों में मानवाधिकार संबंधी कुछ महत्वपूर्ण आन्दोलन भी हुए हैं।

बोध प्रश्न 6
नोटः क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए। .
1) मानवाधिकार के विकास में यूरोपीय समझौते की क्या भूमिका है? .

 गैर सरकारी संगठन तथा मानवाधिकार आन्दोलन
ऊपर कहा जा चुका है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद और सरकारी संगठन ही थे जिन्होंने मानवाधिकारों के प्रति चिंता व्यक्त करना प्रारंभ किया था। छठे और सातवें दशक में उनकी संख्या काफी कम थी लेकिन आठवें दशक से पूरे विश्व में गैर सरकारी संगठनों की एक बड़ी संख्या अस्तित्व में आई जिनका एक काम तो राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किए जा रहे किसी भी प्रकार के मानवाधिकार उल्लंघन पर निगरानी रखना था और दूसरा काम मानवाधिकारों का संरक्षण तथा उनके प्रति जागरूकता पैदा करना था। गैर सरकारी संगठन एक निजी संघ होता है जो न तो सरकारी होता है न सरकारी नियंत्रण में होता है वरन् एक स्वतंत्र संगठन होता है जो किसी एक अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार (या अनेक मानवाधिकारों) के समर्थन एवं संरक्षण हेतु गठित किया जाता है और उसी के लिए निरंतर संलग्न होता है। मानवाधिकार के ये गैर सरकारी संगठन ही मानवाधिकार आन्दोलन में अग्रमी होते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के कुछ गैर सरकारी संगठनय अन्तर्राष्ट्रीय न्यायविद् आयोग (जेनेवा) अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (पेरिस), अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संघ (न्यूयॉर्क) तथा अल्पसंख्यक अधिकार समुदाय (लंदन) आदि हैं। संयुक्त राष्ट्र के साथ ये सभी संगठन विशिष्ट परामर्शदाताओं के रूप में संबंध रखते हैं। इनके अतिरिक्त सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत अन्य अनेक संगठन हैं जिनमें श्रमिक संघों, चर्चों और व्यावसायिक संगठनों के नाम लिए जा सकते हैं। इनमें से कुछ संगठन देश विशेष से संबद्ध हैं तो कुछ किसी न किसी खास मुद्दे के लिए हैं अतः मानवाधिकार के संबंध में उनके दृष्टिकोण समान नहीं हैं। इन संगठनों को एक आन्दोलन की हैसियत प्रदान करने वाला लक्षण यह है कि वे सभी अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के एक ही समुच्चय – अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणा- के आधार पर विभिन्न राष्ट्रों की संख्याओं को उनके व्यवहार के प्रति उत्तरदायी ठहराने का कार्य करने का आग्रह करते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के और अधिक महत्वपूर्ण दो अन्य गैर सरकारी संगठन ऐमनेस्टी इंटरनेशनल (अन्तर्राष्ट्रीय सर्वक्षमा संगठन) तथा युमन वाच ग्रुप (मानव सतर्कता समुदाय) हैं। ऐमनैस्टी इंटरनेशनल की स्थापना 1961 में की गई थी। इसका जोर इस बात पर रहता है कि राजनीतिक कैदियों का न्यायोचित विचारण तत्काल किया जाए। उत्पीड़न, प्राणदंड, विलोपन, मनमाने ढंग से हत्याएँ, बंधकीकरण तथा इसी प्रकार के अमानवीय, क्रूर या निम्नस्तरीय व्यवहारों एवं दंडों को समाप्त करने का, यह संगठन आग्रह करता है। कैदियों से मिलना और उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए संबंद्ध सरकारी अधिकारियों से बातचीत करना उनका निरंतर चलने वाला कार्यक्रम रहता है। इस संगठन ने 42000 कैदियों के मामलों में जाँच की है और उनमें से 38000 को सुलझाया है। इस संगठन को 1981 का नोबल शान्ति पुरस्कार दिया गया था। विशेष धर्म और आस्था की स्वतंत्रता के संरक्षण, राजनीतिक बंदियों के अधिकार रक्षण और उत्पीड़न एवं भेदभाव के विरुद्ध इस संगठन की अथक गतिविधियाँ प्रशंसनीय हैं।

मानवाधिकार सतर्कता समुदाय (ह्युमन वाच ग्रुप) की स्थापना 1987 में न्यूयार्क में की गई थी और इसके सदस्यों की संख्या 8000 है। यह संगठन सरकारों की मानवाधिकार संबंधी कार्य पद्धतियों का मूल्यांकन अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों, समझौतों एवं संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के मानकों के आधार पर करता है। यह संगठन मानवाधिकारों के सरकारी दुरुपयोग की पहचान, गैर सरकारी संगठनों के कार्यों के अनुवीक्षण के द्वारा करता है। यह संगठन संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पूरे विश्व में तथा अपने घरेलू मामलों में भी मानवाधिकारों के समर्थन, विशेषकर अमेरिका आने वाले परिदर्शकों एवं शरणार्थियों के प्रति व्यवहार, का मूल्यांकन करता है।

आठवें दशक के परवर्ती भाग में मानवाधिकार संगठनों के दबाव के फलस्वरूप राष्ट्रों की सरकारों में मानवाधिकारों के समर्थन तथा उनके अन्तर्राष्ट्रीय साधनों एवं मानकों के प्रारूपण पर ही ध्यान केन्द्रित न रखकर मानवाधिकारों के संरक्षण एवं उनके परिपालन और क्रियान्वयन पर जोर देना प्रारंभ किया। क्रमशः विभिन्न राष्ट्रीय सरकारों ने अपने अपने देश में मानवाधिकार आयोगों की स्थापना करना प्रारंभ कर दिया। ऑस्ट्रेलिया और भारत के मानवाधिकार आयोग इसके उदाहरण हैं।

मानवाधिकार प्रणाली को प्रभावी ढंग से चलाने और गैर सरकारी संगठनों को विशेष भूमिका प्रदान करने के लिए संयुक्त राष्ट्र अधिकार पत्र ने इन संगठनों के साथ अपना एक औपचारिक संबंध स्थापित किया है। संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक-सामाजिक-परिषद् (एकोसॉक) ने गैर सरकारी संगठनों के विषय में सूचना प्राप्त करने के लिए एक समिति गठित की है। गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक सामाजिक परिषद् के परामर्शदाताओं का स्तर दिया गया है और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोगों एवं उपायोगों की बैठकों में भाग लेने की उन्हें अनुमति दी गई है। वियना (1993) में हुए विश्व मानवाधिकार सम्मेलन में मानवाधिकार आन्दोलन के गैर सरकारी संगठनों की जोरदार भूमिका पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया था। गैर सरकारी संगठन, सामान्य लोगों से संपर्क साधने, जागरूकता फैलाने, विभिन्न स्तरों पर तरह तरह से मानवाधिकारों के उल्लंघन का अनुवीक्षण करने तथा मानवाधिकारों के समर्थन एवं संरक्षण में भागीदारी आदि की अपनी सामर्थ्य के कारण विशेष रूप से चर्चित हो चुके हैं।

मानवाधिकार
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
मानवाधिकारों का अर्थ
लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवाधिकारों में अंतर
मानवाधिकार आन्दोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानवाधिकारों की माँग
मानवाधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र घोषणा
मानवाधिकार आन्दोलन
संयुक्त राष्ट्र एवं मानवाधिकार
क्षेत्रीय समझौते एवं प्रसंविदाएँ
यूरोपीय समझौता
लैटिन अमेरिका
अफ्रीका
दक्षिण पूर्व एशिया
मध्य पूर्व
गैर सरकारी संगठन तथा मानवाधिकार आन्दोलन
भारत में मानवाधिकार आन्दोलन
मानवाधिकार आन्दोलन का मूल्यांकन
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
सामाजिक आन्दोलनों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत इकाई के अंतर्गत बीसवीं शताब्दी के मानवाधिकार आन्दोलन के अर्थ, प्रकृति, लक्षण तथा औचित्य पर एतत्संबंधी संयुक्त राष्ट्र घोषणा के विशेष संदर्भ के साथ विचार किया गया है। इस इकाई के अध्ययन के बाद आपः
ऽ मानवाधिकार की अवधारणा को समझ सकेंगे,
ऽ लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवाधिकारों में अंतर जान सकेंगे,
ऽ मानवाधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र घोषणा तथा अन्य विविध प्रसंविदाओं के विषय में ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे,
ऽ जान सकेंगे कि राज्यों के संविधानों में उल्लिखित अधिकारों के बावजूद मानवाधिकारों की आवश्यकता क्यों है,
ऽ मानवाधिकारों के विकास को विश्व व्यापी आन्दोलन के रूप में जान सकेंगे,
ऽ मानवाधिकारों के संरक्षण एवं प्रोत्साहन में संलग्न विभिन्न क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, स्थानीय एवं गैर सरकारी संगठनों का ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे।

 प्रस्तावना
अधिकारों के महत्व को रेखांकित करने के लिए उनके विकास के संबंद्ध इतिहास में उनके साथ किसी न किसी विशेषण, जैसेः ‘स्वाभाविक‘, ‘नैसर्गिक‘, ‘मौलिक‘, ‘मानव‘ का प्रयोग किया गया है।

बीसवीं शताब्दी को मानवाधिकार की शताब्दी कहा गया है क्योंकि उदार लोकतंत्रात्मक एवं समाजवादी राष्ट्रों के साथ विकासशील राष्ट्रों में भी ‘मानवाधिकार की अवधारणा का महत्व निरंतर बढ़ता ही गया। दो विश्व युद्धों के बाद, विशेष रूप से नाजियों और फासियों के दमन चक्र, तथा स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों के परिणामस्वरूप मानवाधिकारों के लिए विविध प्रकार के आन्दोलनों का प्रारंभ हो गया था। आज प्रायः सभी राज्य हर मामले में किसी न किसी प्रकार के मानवाधिकार संबंधी सिद्धान्त में विश्वास रखते हैं। साथ ही समाज एवं राजनीतिक संस्थाओं के विविध प्रकारों के औचित्य को सिद्ध करने के लिए मानवाधिकार संबंधी एक सामान्य राजनीतिक सिद्धान्त भी बना है। मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा तथा परवर्ती मानवाधिकार प्रसंविदाओं (1966) में यह स्वीकार किया गया है कि अपने अपने न्यायिक एवं प्रशासनिक तंत्रों द्वारा प्रदत्त अधिकारों एवं दायित्वों के अतिरिक्त लोगों के कुछ वैयक्तिक दायित्व एवं अधिकार भी होते हैं। घोषणा में यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि कुछ ऐसे स्पष्ट अवसर होते हैं जब किसी व्यक्ति के नैतिक दायित्व इन दायित्वों से अलग होते हैं जो उसे किसी राज्य के नागरिक के रूप में निभाने हैं। अभिप्राय यह है कि नागरिकता द्वारा दिए गए अधिकारों एवं कर्तव्यों तथा अन्तर्राष्ट्रीय कानून द्वारा प्रदत्त नए प्रकार की स्वतंत्रताओं एवं दायित्वों (अथवा बाध्यताओं) के बीच एक अंतर दिखाई देता है। इसी को समझने के लिए हम आगे मानवाधिकारों के अर्थ, उनकी प्रकृति और उनके संरक्षण एवं प्रोत्साहन हेतु हुए आन्दोलनों पर विचार करेंगे।