ऐतिहासिक भौतिकवाद किसे कहते हैं | परिभाषा क्या है Historical materialism in hindi की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए

By   November 12, 2020

Historical materialism in hindi of karl marx परिभाषा क्या है एतिहासिक भौतिकवाद की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए ऐतिहासिक भौतिकवाद किसे कहते हैं चर्चा कीजिये |

ऐतिहासिक भौतिकवाद
समाज के बारे में मार्क्स के सामान्य विचारों को ही उसका ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धान्त कहा जाता है। भौतिकवाद (materialism) समाजशास्त्र के चिन्तन का आधार है, क्योंकि मार्क्स के अनुसार भौतिक दशायें अथवा आर्थिक कारक समाज की संरचना और विकास को प्रभावित करते हैं। उसके सिद्धांत के अनुसार भौतिक दशायें अनिवार्यतः उत्पादन का तकनीकी साधन हैं तथा मानवीय समाज उत्पादन की शक्ति और संबंधों से बनता है। इस इकाई में तथा इसके बाद की इकाई में आपको उत्पादन की शक्तियों और संबंधों के अर्थ के बारे में भी बताया जाएगा। आइये, हम यहाँ आपको मार्क्स के समाज के सिद्धान्त के बारे में बतायें कि इसे ऐतिहासिक तथा भौतिकवादी क्यों कहा जाता है। यह ऐतिहासिक इसलिये है, क्योंकि मार्क्स ने इसके द्वारा मानवीय समाजों की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में विकसित होने की क्रिया को बताया है। इसे भौतिकवादी इसलिये कहा गया, क्योंकि मार्क्स ने मानवीय समाज के विकास की व्याख्या भौतिक अथवा आर्थिक आधारों पर की है।

सम्पूर्ण मानव समाज को समझने के अपने प्रयासों में मार्क्स ने अपने आपको किसी भी समय मानवीय समाज की मौजूदा संरचना को समझने तक ही सीमित नहीं रखा। उसने इन समाजों को मानव के भविष्य के सन्दर्भ में भी समझने का प्रयास किया। मार्क्स के लिये विश्व का विवरण देना ही पर्याप्त नहीं था, उसके पास इसमें परिवर्तन के लिये भी एक योजना है। यही कारण है कि मार्क्स के समाजशास्त्रीय चिन्तन में अधिकांशतः परिवर्तन की प्रक्रिया संनिहित है। सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिये मार्क्स ने मानव समाज की विभिन्न अवस्थाओं की परिकल्पना को जर्मन दार्शनिक हीगल से लिया है। इन अवस्थाओं के बारे में हमने इस खंड की 8 तथा 9 इकाईयों में विस्तार से चर्चा की है।

इस इकाई में मार्क्स के समाजशास्त्रीय विचारों पर ही ध्यान केन्द्रित किया गया है। ध्यान रहे कि यहाँ मार्क्सवाद के विभिन्न प्रकारों अथवा मार्क्स के विचारों की उन विभिन्न व्याख्याओं की चर्चा नहीं की जा रही है जो कि साम्यवादी राष्ट्रों की सरकारी विचारधारा बनीं।

मार्क्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धान्त को समझने के लिये हमें मार्क्स के समय के समाज में पाए जाने वाले विरोधाभासों की ओर ध्यान देना होगा। फ्रेडरिक एंजल्स के अनुसार ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धान्त मार्क्स ने प्रतिपादित किया था। जबकि मार्क्स के अनुसार इस सिद्धांत का विकास फ्रेडरिक एंजल्स ने किया था। यह कहा जा सकता है कि इन दोनों ही विद्वानों ने इस सिद्धांत को अपनी सभी कृतियों में ‘‘निदेशक सूत्र‘‘ के रूप प्रयुक्त किया है।

एंजल्स के अनुसार ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत इतिहास को समझने का एक विशिष्ट दृष्टिकोण है। इस विचार के माध्यम से ऐतिहासिक घटनाओं के पीछे छिपे मूल तत्वों को समझने का प्रयास किया गया है। कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजल्स दोनों ही इतिहास की व्याख्या की वैज्ञानिक प्रकृति पर जोर देते हैं। जर्मन आईडियोलॉजी (1845-46) नामक पुस्तक में मार्क्स तथा एंजल्स ने कहा कि इतिहास पर उनके विचार वास्तविक दशाओं के वैज्ञानिक प्रेक्षण और विवरण पर आधारित हैं। इस सिद्धांत को समझने के लिये आपको उस पृष्ठभूमि को भी समझना होगा, जिसने समाज के बारे में मार्क्स के विचारों को ताना-बाना दिया।

पृष्ठभूमि
मार्क्स का बचपन और युवा अवस्था यूरोपीय इतिहास के उस काल में बीते जब कि प्रतिक्रियावादी शक्तियां राजतन्त्रात्मक राजनैतिक व्यवस्था का समर्थन कर रही थीं। नेपोलियन के उपरांत यूरोप से फ्रांसीसी क्रांति के सभी प्रभावों और अवशेषों को मिटाने का प्रयास किया जा रहा था। दूसरी ओर जर्मनी में एक उदारवादी आंदोलन लोकप्रिय हो रहा था, जो कि व्यक्ति की स्वायत्तता और राजनैतिक तथा नागरिक स्वतन्त्रता की सुरक्षा के लिये जोर दे रहा था। इस आंदोलन को फ्रांसीसी क्रांति से बल मिला था। 1830 के दशक के अंत में, युवा हीगलवादियों ने उस समय की सामाजिक राजनैतिक दशाओं में आमूल परिवर्तन के पक्ष में आवाज उठाई थी। हीगल के दर्शन को मानने वालों को युवा हीगलवादी कहा जाता था। मार्क्स बर्लिन विश्वविद्यालय में कानून तथा दर्शन का अध्ययन करते समय इन लोगों के साथ औपचारिक रूप से जुड़ गया था। हीगल तथा उसके दर्शन के बारे में जानने के लिये कोष्ठक 6.1 तथा 6.2 देखिए।

यद्यपि युवा हीगलवादियों में मार्क्स सबसे कम आयु का था, उसे इन लोगों के बीच जल्दी ही सम्मान और प्रशंसा मिले। इन लोगों ने मार्क्स में एक नये हीगल को या यों कहें कि एक शक्तिशाली हीगल-विरोधी को देखा।
कोष्ठक 6.1ः गियोग विल्हेल्म फ्रीडरिश हीगल
गियोग विल्हेल्म फ्रीडरिश हीगल का जन्म स्टुटगार्ट में 27 अगस्त, 1770 में हुआ तथा उसकी मृत्यु बर्लिन में 14 नवम्बर, 1831 को हुई। वह एक राजस्व अधिकारी का पुत्र था। उसने ट्यूबिर्गन विश्वविद्यालय में साहित्य, धर्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। 1805 में, वह 35 वर्ष की आयु में, जेना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गया। उसकी मुख्य कृतियां हैं, द फिनॉमेनॉलॉजी ऑफ माइंड (1807), द साइंस ऑफ लॉजिक (1812), द फिलॉसॉफी ऑफ राइट (1821), और द फिलॉसॉफी ऑफ हिस्ट्री (1830-31)।

मार्क्स पर हीगल के प्रभाव के संदर्भ में आपके लिये यह जानना आवश्यक है कि मार्क्स हीगल के इतिहास के दर्शन तथा तर्क के विज्ञान से प्रभावित था (हीगल के सिद्धांतों के इन दोनों पक्षों के लिए देखिए कोष्ठक 6.2)।

मार्क्स को प्रभावित करने वाले अन्य विद्वानों में बी. द स्पिनोजा (1632-1677) और ए. ह्यूम (1711-1776) का नाम लिया जा सकता है। इन दोनों की कृतियों के गहन अध्ययन ने मार्क्स को प्रजातंत्र की सकारात्मक अवधारणा विकसित करने में सहायता दी। मार्क्स की यह अवधारणा जर्मनी में उस समय के क्रांतिकारियों (तंकपबंसे) द्वारा मान्य विचारों से कहीं आगे थी। ये क्रांतिकारी (तंकपबंसे) एक ऐसे राजनैतिक समूह के सदस्य थे जो आमूल परिवर्तन की नीतियों, क्रियाओं और विचारों से जुड़े थे।

 लोकतंत्र में मार्क्स का विश्वास
प्रारंभिक एवं मध्य उन्नीसवीं शती यूरोप में प्रचलित अनेक विचारधाराओं की बौद्धिक विरासत से मार्क्स को अपनी अन्तर्दृष्टि, अभिवृत्तियों, तथा अवधारणाओं को विकसित करने का अवसर मिला। इसमें लोकतान्त्रिक आस्था की मूल मान्यतायें तथा फ्रांसीसी क्रांति के नारे भी शामिल थे।

 लोकतंत्र तथा साम्यवाद
लोकतंत्र पर मार्क्स के क्रांतिकारी विचार अमरीका, इंग्लैंड और फ्रांस की क्रांति जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के अध्ययन पर आधारित थे। इन ऐतिहासिक घटनाओं के अध्ययनों से उसने यह निष्कर्ष निकाला कि सर्वहारा समूह (proletarian) के लोकतंत्र की अवस्था अस्थाई व परिवर्तनशील होती है। इस अवस्था को सामान्यतया तथा अनिवार्यतया साम्यवाद में बदल जाना पड़ता है। मार्क्स के अनुसार साम्यवाद एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें सभी वस्तुओं पर सभी का सामूहिक स्वामित्व होता है और वे सभी को प्राप्त होती हैं। साम्यवादी विचारों में विश्वास बढ़ जाने के बाद मार्क्स ने अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन प्रारंभ किया। इस दौर में वह एक उदारवादी (liberal) से साम्यवादी (communist) के रूप में विकसित हो रहा था। उसने बी. द स्पिनोजा, एल. फायरबाख, एलेक्सिस द टॉकविल जैसे यूरोपीय चिन्तकों से बहुत कुछ सीखा (देखिये शब्दावली 6.6 तथा कोष्ठक 6.3)।

कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोटोमोर, टॉम, 1975. मार्क्सवादी समाजशास्त्र, अनुवादकः सदाशिव द्विवेदी, मैक्मिलन कम्पनीः नई दिल्ली
सांस्कृतायन, राहुल, 1954. कार्ल मार्क्स, किताब महलः इलाहाबाद

शब्दावली
ए. ह्यूम ह्यूम एक अनीश्वरवादी (agnostic) दार्शनिक था जो यह मानता था कि अन्तिम यथार्थ अज्ञात है।
एलेक्सिस द टॉकविल अलेक्सिस द टॉकविल को 19वीं शताब्दी के फ्रांस का महान् राजनीतिक चिन्तक माना जाता है। उसने दो प्रमुख पुस्तकें लिखी प) डेमोक्रेसी इन अमेरीका पप) द ओल्ड रेजीम एण्ड द फ्रेन्च रिवोल्यूशन अपनी पहली पुस्तक में उसने एक विशिष्ट समाज, अर्थात् अमरीकन समाज, का चित्रण दिया और दूसरी पुस्तक में एक ऐतिहासिक घटना, अर्थात् फ्रांसीसी क्रांति, का विश्लेषण दिया । मार्क्स लोकतंत्र पर टॉकविल के विचारों से बहुत अधिक प्रभावित था।
बी. द स्पिनोजा स्पिनोजा सत्रहवीं शताब्दी का डच दार्शनिक था। उसने यह प्रतिपादित किया कि यथार्थ की अनेक विशेषतायें होती हैं, जिनमें से चिन्तन और विस्तारण को ही मानव मस्तिष्क द्वारा समझा जा सकता है।
वर्ग मूलभूत सामाजिक समूह अथवा वह सामूहिकता जिसमें एक ठोस सामाजिक शक्ति के रूप में कार्य करने की क्षमता हो। इसे भौतिक उत्पादन के साधनों के स्वामित्व अथवा अस्वामित्व के संदर्भ में देखा जा सकता है।
वर्ग संघर्ष दो परस्पर विरोधी सामाजिक वर्गों के मध्य संघर्ष जो इतिहास की गतिशील शक्ति है उत्पादन के साधनों की शक्तियां भौतिक वस्तुओं के उत्पादन में प्रयुक्त कच्चा माल, उपकरण तथा तकनीक। भौतिक तकनीकी पक्षों को उत्पादन के सामाजिक संबंधों में भ्रमित नहीं करना चाहिये, इनमें अन्तर है।
अधोसंरचना समाज के सन्दर्भ में उत्पादन के तरीकों को मूल सैद्धान्तिक प्राथमिकता देने के लिये प्रयुक्त उपमा। इसमें उत्पादन के संबंध तथा उत्पादन के साधन शामिल होते हैं।
उदारवादी जो प्रगति, व्यक्ति की स्वायत्तता तथा मानव मात्र के भले स्वभाव में विश्वास करता है
उत्पादन की प्रणाली उत्पादन के संबंध और उत्पादन की शक्तियों के बीच पाए जाने वाले संबंध
सर्वहारा (प्रोलिटेरियन) किसी भी समुदाय के निम्नतम सामाजिक आर्थिक वर्ग के प्रतिनिधि
उत्पादन के संबंध जीवन की भौतिक दशाओं के उत्पादन के फलस्वरूप प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से उभरने वाले सामाजिक संबंध
अधिसंरचना अधिसंरचना के अस्तित्व की सामाजिक दशाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली उपमा। इसके अन्तर्गत राज्य, विद्यालय, धार्मिक संस्थायें, संस्कृति, विचार, मूल्य तथा दर्शन आते हैं।
राज्य संस्थाओं तथा उपकरणों का वह समूह जो कि प्रभुत्वशील वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है तथा उनके हितों की परिपूर्ति करता है यह अधिसंरचना का भाग है और अपेक्षाकृत रूप में इसे अधोसंरचना से अलग ही समझना चाहिए।

बोध प्रश्न 2
प) उत्पादन के संबंधों और उत्पादन की शक्तियों को तीन पंक्तियों में परिभाषित कीजिये।
पप) अधिसंरचना के विभिन्न घटकों को दो पंक्तियों में सूचीबद्ध कीजिये।
पपप) राज्य की परिभाषा दीजिये। राज्य का संबंध किससे है ?
अ) अधोसंरचना से अथवा
ब) अधिसंरचना से?

बोध प्रश्न 2 उत्तर
प) शब्दावली देखिये।
पप) राज्य, शिक्षा, धर्म, मूल्य, विचार एवं दर्शन आदि
पपप) शब्दावली देखिये।

बोध प्रश्न 1
प) सही उत्तर पर निशान लगाइये।
मार्क्स ने जिससे दार्शनिक प्रेरणा प्राप्त की उस विद्वान का क्या नाम है ?
अ) कॉम्ट
ब) स्पेंसर
स) हीगल
द) अरस्तु
इ) कन्फ्यूशस
पप) निम्न में से कौन से कथन ऐतिहासिक भौतिकवाद के लिये स्वीकार्य नहीं हैं ?
अ) सभी प्राणियों में मानव प्राणीशास्त्रीय रूप से सर्वाधिक निर्धारित जीव है।
ब) मानव प्रकृति मूलतरू दुष्ट है।
स) वर्ग समाज में जीवन व्यतीत करने में मनुष्य सदैव प्रसन्न रहते हैं।
पप) निम्न में से कौन-सा कथन ऐतिहासिक भौतिकवाद की अनिवार्य विशिष्टता है ?
अ) समाज प्राणियों की भांति ही जन्म लेता है, बढ़ता है तथा परिवर्तित होता है।
ब) समाज में अनिवार्यतः परिवर्तनघील आन्तरिक विरोधाभासों के फलस्वरूप परिवर्तन होते हैं।
स) समाज एक छोटी इकाई के रूप में प्रारम्भ होता है तथा समय के साथ आकार में बढ़ता है।
द) समाज अपने वैज्ञानिकों के विकास के साथ-साथ विकसित होता है।

 बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
प) स)
पप) अ), ब), स)
पपप) ब)