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Govind Sadashiv Ghurye g s ghurye in hindi जी.एस. घुरये कौन है पूरा नाम गोविन्द सदाशिव घुर्ये हिंदी में in sociology ?

जी.एस. घुरये
सन् 1930 में जी.एस. घुरये ने जाति की व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने हर जाति को क्रम-परंपरा की श्रेणी में एक-दूसरे से पृथक माना। यह श्रेणीकरण जाति के अपने सहजगुणों से उपजा। उनके अनुसार जाति के ये गुण इस प्रकार थेः
प) सखंड विभाजनः जाति समूह की सदस्यता जन्म से अर्जित होती है और इसी के साथ अन्य जातियों के तुल्य श्रेणी-क्रम में स्थान भी मिलता है।
पप) क्रम-परंपरा: इसके अनुसार समाज श्रेणी-क्रम या श्रेष्ठता या हीनता के संबंधों में व्यवस्थित था। इस प्रकार ब्राह्मणों को क्रम-परंपरा में सर्वोच्च और अछूतों को सबसे नीचे माना जाता था।
पपप) जाति वर्जनाएंः ये वर्जनाएं हर जाति पर थोपी जाती थीं, जो अपने सदस्यों को कुछ खास समूहों से ही परस्पर-व्यवहार की अनुमति देती थी। इन वर्जनाओं में वेषभूषा, बोल-चाल, रीति-रिवाज, कर्मकांडों के अलावा खान-पान के नियम भी शामिल थे कि वे किस-किस के हाथ से भोजन स्वीकार कर सकते हैं। यह व्यवस्था समूह के सदस्यों की पवित्रता और इस तरह स्वयं जाति समूह की पवित्रता को बरकरार रखने के लिए बनाई गई थी।
पअ) जाति दूषणः इस धारणा के तहत जाति का पूरा प्रयास दूषित करने वाली वस्तुओं से अपवित्र होने से बचना था। इस श्रेणी में गंदे काम-धंधा करने वाले व्यक्ति या कह लें सबसे निम्न जाति के लोग माने जाते थे। दूषण से बचने की इस प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति जाति समूहों के आवासीय पार्थक्य में होती है।
अ) पारंपरिक पेशाः घुरये के अनुसार हर जाति का एक पारंपरिक पेशा था। पवित्र जातियां साफ-सुथरा पेशा करती थीं। जबकि मलिन और अछूत जातियां गंदा करने वाला पेशा करती थीं।
अप) सगोत्र विवाहः जातियों का यह अति विशिष्ट लक्षण था। यह उसे एक समूह के रूप में संगठित रखने के लिए जरूरी था जिससे कि उसकी अपनी विशिष्टता बनी रहे। इस का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी सदस्य अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं कर पाए।

इन छः सहज विशेषताओं के जरिए घुरये ने उस प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया था, जिसके माध्यम से एक जाति समूह अपनी पहचान को बनाए रखता था। सखंड विभाजन, क्रम-परंपरा, जाति वर्जनाओं, जाति दूषण, पारंपरिक व्यवयसाय और एक खास जाति समूह के अंदर विवाह के इन विशिष्ट लक्षणों को बरकरार रख कर जाति समूहों ने अपनी एक अलग पर एक-दूसरे से जुड़ी पहचान बनाए रखी, जिसे उन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी रखा।

अभ्यास 1
जी.एस. घुरये ने जाति की.जो विशेषताएं बताई हैं उन पर अपने सहपाठियों से चर्चा कीजिए और इस से आप को जो जानकारी मिलती है उसे अपनी नोटबुक में लिख लीजिए।

इकाई 19 जातिगत पहचानः विशेषताबोधक और अन्योन्य-क्रियात्मक सिद्धांत
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
जाति की आरंभिक व्याख्याएं
धार्मिक व्याख्या
जाति की समाजशास्त्रीय व्याख्या
जाति का विशेषताबोधक सिद्धांत
जी.एस. घुरये
जे.एच. हटन
एम.एन. श्रीनिवास
जाति का अन्योन्य-क्रियात्मक सिद्धांत
एफ.जी. बैली
ए. मेयर
एम. मैरियॉत
एल. दयुमोंत
विशेषताबोधक और अन्योन्य-क्रिया सिद्धांतों का मूल्यांकन
सारांश
शब्दावली
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
इस इकाई को पढ़ लेने के बाद आपः
ऽ जाति की आरंभिक व्याख्याओं के बारे में बता सकेंगे,
ऽ जाति के अध्ययन में अपनाए जाने वाले विशेषताबोधक सिद्धांत के बारे में बता पाएंगे,
ऽ जाति की अन्योन्य-क्रियात्मक व्याख्या पर रोशनी डाल सकेंगे, तथा
ऽ विशेषताबोधक और अन्योन्य-क्रियात्मक सिद्धांतों की कुछ सीमाओं के बारे में जान सकेंगे।

प्रस्तावना
जाति पहचान का भारत के किसी भी गांव, कस्बे या शहर के सामाजिक ताने-बाने से बड़ा घनिष्ठ संबंध है। इस इकाई में हम आपको श्रेणीकरण-क्रम की व्याख्या की दिशा में किए गए प्रमुख प्रयत्नों के बारे में बताएंगे और उनका विश्लेषण करेंगे, जो हमें जाति-संरचना में सर्वव्यापी नजर आता है। इन नजरियों से आपको परिचित कराने के लिए हम आपको जातिगत पहचानः विशेषताबोधक और जाति की आरंभिक धार्मिक और समाजशास्त्रीय व्याख्याओं के बारे में बताएंगे। इससे अन्योन्य-क्रियात्मक सिद्धांत विशेषताबोधक नजरिए के लिए आधार तैयार होगा, जो जाति क्रम-परंपरा का विश्लेषण उसके विभिन्न अपवर्तनीय विशेषताओं की रोशनी में करता है। इसके बाद हम जाति क्रम-परंपरा के अन्योन्य-क्रियात्मक नजरिए पर दृष्टिपात करेंगे। इकाई के अंत में इन दोनों नजरियों की सीमाओं पर प्रकाश डालेंगे।