herfindahl index in hindi | herfindahl-hirschman index formula हर्फीन्डाल सूचकांक क्या है ?

By   January 21, 2021

हर्फीन्डाल सूचकांक क्या है ? herfindahl index in hindi | herfindahl-hirschman index formula ?

भारतीय उद्योग में प्रतिस्पर्धा और केन्द्रीकरण
इस भाग में, भारत में औद्योगिक प्रतिस्पर्धा की सीमा और प्रकृति पर चर्चा की गई है। विचार

दूसरा आर्थिक सुधार पश्चात् अवधि। 1990-91 अर्थात जिस वर्ष आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किए गए थे के आसपास इस तरह के विभाजन का कारण यह है कि इस तरह की सुधार नीतियों ने विलय, अधिग्रहण और सीमापार विलयों को सुगम बनाया। परिणामस्वरूप, विगत कुछ वर्षों में विलयों और अधिग्रहणों की घटनाओं में खूब वृद्धि हुई है। 1990 के दशक के आरम्भ तक भारत में लगभग सारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवाह परियोजनाओं के रूप में हुआ था जबकि इसके पश्चात् निवेश प्रवाह का मुख्य अंश अर्थव्यवस्था में विद्यमान उपक्रमों के अधिग्रहण के रूप में हुआ है।

हम निम्नलिखित उपभागों में औद्योगिक केन्द्रीकरण के अनुभवसिद्ध अनुमान के साथ चर्चा आरम्भ करते हैं और उसके पश्चात् केन्द्रीकरण के संबंध में भारतीय परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं। अंततः, अंतिम उपभाग में रणनीतिक समझौतों और विलय तथा अधिग्रहणों के कुछ उदाहरण दिए गए हैं।

 केन्द्रीकरण का हर्फिण्डाल सूचकांक
केन्द्रीकरण का हर्फिण्डाल सूचकांक बाजार हिस्सा के केन्द्रीकरण के स्तर को व्यक्त करने वाली संक्षिप्त सांख्यिकी है। सूचकांक में 0 और 1 के बीच मूल्यों को लिया गया है जिसमें 0 मूल्य फर्मों का केन्द्रीकरण बिल्कुल नहीं होने का सूचक है और मूल्य 1 से एकाधिकार की स्थिति का पता चलता है। यदि एक उद्योग में छ फर्म है, तब हर्फिण्डाल सूचकांक इन छ फर्मों के बाजार हिस्सा का निम्न समीकरण होगा:
H = s12 = s22 $ ………. $ s2N
हर्फिण्डाल सूचकांक सभी कंपनियों की सूचना का उपयोग करता है न कि कुछ ही कंपनियों तक सीमित होता है जैसा कि वैकल्पिक मापों उदाहरण के लिए छ-फर्म केन्द्रीकरण औसत के मामले में होता है।

 भारतीय उद्योगों का केन्द्रीकरण
नीचे दी गई तालिका 17.1 में भारत में तीन उद्योगों: खाद्य और बीवरेज, इलैक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल में केन्द्रीकरण माप का हर्फिण्डाल सूचकांक दर्शाया गया है। संदर्भ वर्ष 1992-93 से 1997-1998 है। खाद्य और बीवरेज भारत में विनिर्माण उद्योगों का सबसे बड़ा समूह है जिसका अनुमानित बाजार आकार 70,243.5 करोड़ रु. है। शिशु दुग्ध उत्पाद, आइसक्रीम, वेफर्स और ब्रेकफास्ट सेरीअल्स जैसे उद्योग अत्यधिक केन्द्रीकृत हैं। किंतु वनस्पति तेल, चीनी और चाय उद्योगों में घरेलू फर्म अत्यन्त ही बिखरे हुए हैं। सिगरेट उद्योग भी अत्यधिक केन्द्रीकृत है।

तालिका 17.1: भारत में चयनिता उद्योगों में फर्मों का केन्द्रीकरण
उद्योग हर्फिन्डाल सूचकांक
प्ण् खाद्य ओर बीवरेज
वनस्पति तेल 0.003
चीनी 0.002
चाय 0.061
काॅफी 0.028
बिस्कट्स 0.019
शिशु दुग्ध आहार 0.669
आइसक्रीम 0.578
ब्रेड 0.528
वेफर्स, आल चिप्स 0.513
ब्रेकफास्ट सेरियल्स 0.442
सिगरेट 0.591
शराब और लिकर 0.080
प्प्. इलैक्ट्रॉनिक्स
कम्प्यूटर्स और पेरिफेरल्स 0.082
दी वी पिक्चर ट्यूब्स 0.173
फोटो कॉपी मशीन 0.785
टेलीफोन उपकरण 0.292
प्प्प्. ऑटोमोबाइल्स
पैसेंजर कार 0.589
मोटर साइकिल 0.257
स्कूटर्स 0.336
थ्री व्हीलर्स (तिपहिया) 0.609
मोपेड्स 0.323
स्रोत: सेंटर फॉर मॉनिटरिंग दि इंडियन इकॉनॉमी

भारत में इलैक्ट्रॉनिक्स बाजार पर आयात का वर्चस्व है। कुछ मामलों में, आयात का हिस्सा 86 प्रतिशत तक ऊँचा है। फोटोकॉपी मशीन उद्योग को छोड़कर, सामान्यतया घरेलू फर्मों के बीच सामान्य प्रतिस्पर्धा अत्यधिक तीव्र है और केन्द्रीकरण अत्यन्त ही कम है।

दूसरे छोर पर ऑटोमोबाइल उद्योग है। जहाँ आयात से प्रतिस्पर्धा मामूली है। कई नए प्रवेशियों के प्रवेश के बावजूद भी उद्योग में घरेलू फर्म अत्यधिक केन्द्रीकृत हैं और केन्द्रीकरण अनुपात में कोई महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई है। दूसरी ओर, मोपेड सेक्टर में काफी हद तक केन्द्रीकरण में वृद्धि हुई है।

उद्देश्य
यह इकाई औद्योगिक प्रतिस्पर्धा का विवरण सिद्धांत रूप एवं भारतीय अर्थ के संदर्भ में प्रस्तुत करती है। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:
ऽ औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के सिद्धान्त को समझ सकेंगे;
ऽ एकाधिकार और रणनीतिक समझौतों के सिद्धान्त के बारे में जान सकेंगे; और
ऽ भारतीय उद्योगों के केन्द्रीकरण के स्वरूप को समझ सकेंगे।

 प्रस्तावना

अधिकतम लाभ अर्जित करने के प्रयास में फर्म मूल्य और निर्गत स्तरों के बारे में निर्णय लेती है कभी-कभी इस तरह के चयन का उद्देश्य इस क्षेत्र में प्रवेश की संभावना रखने वाले फर्मों के प्रवेश को अवरूद्ध कर प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना होता है। इससे फर्म बाजार में अपना वर्चस्व बनाए रखती है और सामान्य से अधिक लाभ अर्जित करती है। तथापि, इस प्रकार के आचरण के संबंध में प्रौद्योगिकी और उत्पाद की प्रकृति एवं विशेषताओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। विशेषकर, ये फर्म की बाजार शक्ति और फलतः विभिन्न बाजार संरचनाओं जैसे पूर्ण प्रतियोगी बाजार, एकाधिकारी प्रतियोगी बाजार, अल्पाधिकारी बाजार और एकाधिकारी बाजार को परिभाषित करते हैं।

रणनीतिक समझौते, जैसे संयुक्त उद्यम और अन्य सहकारी व्यवहार भी फर्म के लाभ के उद्देश्य से निर्देशित होते हैं। ये विभिन्न लागत लाभों और बड़े पैमाने की मित्व्ययिता द्वारा साझेदार फर्मों को लाभ पहुँचाते हैं और इसलिए फर्मों को ऐसे समझौते करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। विलय, अधिग्रहण और नए प्रवेशियों द्वारा विद्यमान उपक्रमों को खरीद लेना अथवा विदेशी फर्मों या बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रवेश के अन्य रूप हैं।

भारत में 1990 के दशक के आरम्भ में उदार विदेश व्यापार और निवेश नीतियों के शुरू होने के बाद संयुक्त उद्यमों, विलयों और अधिग्रहणों की घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है।

सारांश
प्रौद्योगिकी, उत्पाद के प्रकार और व्यापार तथा औद्योगिक नीतियाँ फर्म की बाजार शक्ति और इस प्रकार विभिन्न बाजार संरचनाओं जैसे पूर्ण प्रतियोगी बाजार, एकाधिकारी प्रतियोगी बाजार, अल्पाधिकारी बाजार और एकाधिकारी बाजार को परिभाषित करती है।

रणनीतिक समझौते (जैसे संयुक्त उद्यम), विलय और अधिग्रहण, अधिकार में लेना, खरीदना आदि फर्म के कुछ अन्य कार्य हैं जिनका आशय प्रतियोगिता को कम करना है। भारतीय बाजार में विदेशी फर्में विभिन्न प्रदेश स्वरूपों के द्वारा प्रवेश करती है। वस्तुतः 1990 के दशक के आरम्भ में भारत में उदार विदेश व्यापार और निवेश नीतियों के शुरू करने के पश्चात् विदेशी फर्मों द्वारा भारतीय उपक्रमों के विलय और अधिग्रहण की घटनाओं में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है।

कुछ उपयोगी पुस्तकें और संदर्भ
आचार्य, रजत और भास्कर मोइत्रा, संपा., (2001). इफेक्ट्स ऑफ ग्लोबलाइजेशन ऑन इन्डस्ट्री एण्ड एनवायरन्मेंट, लान्सर्स बुक्स, नई दिल्ली।
सी.एम.आई.ई., (1999). इण्डस्ट्री: मार्केट साइज एण्ड शेयर्स, सेंटर फोर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी, अगस्त।
कुमार, नागेश, (2000). ‘‘मर्जर्स एण्ड एक्वीजीशन बाई एम एन ई: पैटर्न एण्ड इम्पलीकेशंस‘‘, इकनॉमिक एण्ड पॉलिटिकल वीकली, अगस्त 5
ओज शाई, (1995). इण्डस्ट्रियल ऑर्गेनाइजेशन: थ्योरी एण्ड एप्लिकेशन, एम आई टी प्रेस।