हरित गृह प्रभाव क्या है (greenhouse effect in hindi) हरित गृह प्रभाव किसे कहते है , कारण , दुष्प्रभाव 

By   July 26, 2020

(greenhouse effect in hindi) हरित गृह प्रभाव क्या है ? हरित गृह प्रभाव किसे कहते है , कारण , दुष्प्रभाव के दुष्परिणाम बताइए परिभाषा निबंध समझाइए ?

हरित गृह प्रभाव या ग्रीन हाउस प्रभाव पौधशाला अथवा काँच घर प्रभाव (greenhouse effect)

ग्रीन हाउस कांच के आवरण वाला घर होता है। सर्दी के दिनों में पौधों को ठंड से बचाए रखने के लिए इन घरों का सहारा लिया जाता है , सूरज का प्रकाश काँच को आसानी से पार कर लेता है।

इसलिए इन घरों में धूप का प्रवेश तो हो जाता है , लेकिन वहां से ऊष्मा जब अवरक्त किरणों के रूप में बाहर निकलने की कोशिश करती है तो काँच के आवरण द्वारा रोक ली जाती है। इस प्रकार ग्रीन हाउस के भीतर का तापमान बाह्य वातावरण के तापमान से अधिक बना रहता है। इस तथ्य का लाभ उठाकर ठंड के दिनों में भी ग्रीन हाउस में उन पौधों की खेती की जा सकती है। जिन्हें बाहर ठण्ड के दिनों में बचाए रखना मुश्किल होता है।

कार्बन डाइऑक्साइड एक उपयोगी गैस है। इसमें मौसमों में स्थायित्व लाने और फसलों में अनाज बनाने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है , लेकिन यदि वायुमण्डल में इसकी मात्रा बढ़ जाए तो यह हमारी दुश्मन साबित होगी अत: वृक्षारोपण और अन्य पर्यावरणीय मापदण्डो आदि की सहायता से इसकी मात्रा को नियंत्रित करना आवश्यक है। सचमुच कार्बन डाइऑक्साइड को यदि मौसम की कुंजी कहा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वास्तव में यही गैस हमारे मौसम को स्थायित्व प्रदान करती है।

विगत कुछ वर्षो में दुनिया के मौसम में कुछ अप्रत्याशित बदलाव आये है। वैज्ञानिक इसके पीछे इसी गैस का हाथ मानते है। कार्बन डाइऑक्साइड , मीथेन और जलवाष्प कांच के आवरण की तरह व्यवहार करती है।

वायुमण्डल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत कम केवल 0.03% होती है। इसके बावजूद धरती के ताप को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी इसी गैस पर है। उपरोक्त गैसें बहुत ही तीव्रता से वातावरण की इन्फ्रारेड या अवरक्त किरणों को पूर्णतया प्रभावकारी ढंग से अवशोषित कर लेती है और उन्हें पुनः पृथ्वी परावर्तित कर सकती है। इन किरणों का कार्बन डाइऑक्साइड और जलवाष्प द्वारा अवशोषित होने के बाद और पृथ्वी पर तथा पृथ्वी की सतह पर पुनः परावर्तित होने से पूर्णतया परिणाम यह निकलता है कि पृथ्वी की सतह उससे पूर्ण तौर पर गर्म हो जाती है। इसी प्रक्रिया को हम कहते है हरित गृह प्रभाव अथवा कांचघर प्रभाव या पौधाघर प्रभाव।

पृथ्वी पर चलने वाली अनेक प्रकार की प्राकृतिक और जैविक प्रक्रियाओं के लिए वांछित गर्मी कतिपय पृथ्वी के घटक को ग्रहण कर लेती है।

इस अतिरिक्त गैर जरुरी गर्मी की अवरक्त किरणें जब वातावरण से होती हुई गुजरती है तो अल्प मात्रा में वातावरण में रहने वाली हवाओं को (जिनकी रचना में दो से अधिक परमाणु होते है) भेद नहीं सकती।

जब ये किरणें आती है , तब छोटी तरंग लम्बाई वाली पैनी किरणें होती है जबकि प्रतिबिंबित होने वाली किरणें अधिक तरंग लम्बाई वाली मंद किरणें होती है। किसी भी प्रकाश किरण का वेधन उसके उद्भव स्थल की सतह के तापमान पर निर्भर करता है।

अधिकतर गर्म किरणें वायुमण्डल को भेदकर वापस ऊपरी वायुमण्डल में चली जाती है लेकिन गर्मी उत्पन्न करने वाली अवरक्त किरणें कार्बन डाइ ऑक्साइड को भेद नहीं पाती है तथा पृथ्वी के वातावरण को गर्म करती है। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की वर्तमान मात्रा धरती का औसत ताप 15 डिग्री सेल्सियस बनाये रखती है।

ग्रीन हाउस प्रभाव का तीन संदर्भो में विचार किया जा सकता है –

1. वातावरणीय गैस द्वारा पृथ्वी को गर्म रखना।

2. हरित गृह प्रभाव मंगल और शुक्र से किस प्रकार जुड़ा हुआ है ?

3. तापमान और कार्बन डाइऑक्साइड का सम्बन्ध।

1. वातावरणीय गैसें किस प्रकार से पृथ्वी को गर्म रखती है : आपने अनुभव किया होगा कि जब कभी भी आकाश में बादल होते है वह दिन लगभग गर्मी लिए हुए होता है और जब आकाश साफ़ होता है तो वह दिन ठंड लिए होता है। इन दिनों में हम हरित गृह प्रभाव का अनुभव कर सकते है। सूर्य द्वारा उद्भासित ऊष्मा का लगभग 70% भाग हमारे और अन्य ग्रहों द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है और 30 प्रतिशत तुरंत ही परावर्तित कर दिया जाता है। यदि हमारी पृथ्वी इस ऊष्मा को पुनः परावर्तित न करे तो क्या होगा ?

प्राकृतिक रूप से हमारी पृथ्वी क्रमशः गर्म होती रहेगी और उसका तापमान बढ़ता रहेगा। इसके अतिरिक्त इस ऊर्जा का संतुलन नहीं बनाये रखा गया तो हमारी पृथ्वी का जो तापमान है वह बढ़ता रहेगा। यदि वातावरण में हरित गृह प्रभाव की गैसें हो तो इन गैसों की उपस्थिति में हमारी पृथ्वी का तापमान 33 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाने की संभावना है।

हरित गृह प्रभाव की गैसें पृथ्वी को अधिक गर्म रखने में सहायक होती है क्योंकि उनके जो अणु होते है उनके अन्दर इन्फ्रारेड अथवा अवरक्त किरणों की अवशोषण की क्षमता होती है जो कि पृथ्वी द्वारा उद्भासित होती है। ये अणु इन किरणों को तथा इन कणों की ताप ऊर्जा को अवशोषित करने के बाद उन किरणों को पुनः पृथ्वी पर परावर्तित कर देते है। और इस तरह पृथ्वी की अथवा अन्य ग्रहों की सतह के तापमान को अधिक बढ़ा देते है। इन्फ्रारेड किरणों की यह ऊर्जा वातावरणीय गैसों द्वारा पुनः पृथ्वी पर वापस भेज दी जाती है , वैज्ञानिकों ने इसे ही हरित गृह प्रभाव कहा है।

2. मंगल और शुक्र ग्रह के सन्दर्भ में हरित गृह के प्रभाव का अध्ययन : हरित गृह प्रभाव का एक सिद्धांत जो काफी स्थापित हो चूका है। इसकी स्थापना में मंगल और शुक्र ग्रह के अध्ययन काफी काम में आये है।

हरित गृह अणुओं का प्रभाव एक दुसरे उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है – मंगल अथवा मार्स तथा शुक्र अथवा वीनस नक्षत्रों का उदाहरण लेते हुए , जो कि पडोसी नक्षत्र है। शुक्र (वीनस) में कार्बन डाइ ऑक्साइड वातावरण अधिक घना और बड़ा है जो कि पृथ्वी से लगभग 70 हजार गुना बड़ा है। शुक्र में कार्बन डाई ऑक्साइड की भारी परत के कारण इस नक्षत्र का जमीनी तापमान जो सामान्यतया -46 डिग्री सेल्सियस होना चाहिय था , वह बढ़ कर 477 डिग्री सेल्सियस हो गया अर्थात लगभग 523 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है।

इसके विपरीत , पृथ्वी की सतह पर कार्बन डाइ ऑक्साइड की अनुपस्थिति में तापमान -18 डिग्री सेल्सियस होता है जो कि 15 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है , दूसरे शब्दों में पृथ्वी के लिए हरित गृह प्रभाव 33 डिग्री सेल्सियस है। मंगल (मार्स) में कार्बन डाई ऑक्साइड का पूरा आभाव है , हालाँकि संभव है कि किसी बीते समय में इसका वातावरण काफी भिन्न रहा होगा , जिसके फलस्वरूप यह ठंडा है

3. तापमान और कार्बन डाईऑक्साइड का सम्बन्ध : हरित गृह प्रभाव को समझाने के लिए हम एक उदाहरण लेते है। जब सूर्य की किरणें पृथ्वी की ओर आती है तब दोनों वातावरण तथा पृथ्वी की सतह गर्म हो जाती है। वे एक दुसरे में इन्फ्रारेड ऊर्जा फैलाती है। जलीय वाष्प , कार्बन डाईऑक्साइड और ऑक्सीजन एवं अन्य कई अणु इस ऊर्जा का अवशोषण कर पृथ्वी की ऊष्मा को बढाते है। आज की मुख्य समस्या यह है कि सभी महत्वपूर्ण हरित गृह अणु तीव्र गति से बढ़ रहे है। 1950 से 1985 के दौरान कार्बन डाई ऑक्साइड 275 से 350 पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) बढ़ी है , CH4 700 से 1700  पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) और N2O 280 से 380  पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) तक।

इस प्रकार इसमें कोई संदेह नहीं कि औद्योगिक प्रक्रियाओं से हरित गृह गैसों के अणुओं की मात्रा किस प्रकार तीव्र दर से बढ़ रही है। कार्बन डाइऑक्साइड पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) मानक पर मौजूद रहती है। यह 1.5 पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) वार्षिक की दर से बढ़ रही है। 1.5 पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) से बढ़ने का अभिप्राय यह है कि यह सन 2030 तक दुगुनी हो जाएगी। कार्बन डाइऑक्साइड की जो मात्रा वायुमंडल में वर्ष 1950 में मात्र 290 1.5 पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) थी , वर्ष 1960 में यह 310 1.5 पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) हो गयी थी अर्थात केवल मात्र 10 वर्षो में 20 1.5 पीपीएम (भाग प्रति दस लाख ) बढ़ गयी। अगले 20 वर्षो में यह मात्रा 15 PPM के लगभग बढ़ जाने की संभावना है।

हरित गृह प्रभाव के कारण

हरित ग्रह प्रभाव मुख्यतया वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता के कारण होता है जिनके प्रमुख स्रोत आगे पढ़ रहे है। वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता के बढ़ने के निम्नलिखित मुख्य कारण है –

उष्णकटिबंधीय जंगलों का कटना और उनका दहन : हरित पादप मुख्यतया कार्बन डाइऑक्साइड को अपने अन्दर समावेश करने की क्षमता रखते है। हरित पादप क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड और जल से फोटो संश्लेषण विधि द्वारा भोजन बनाते है। ट्रॉपिकल जंगलों के कटने का अर्थ है कि उनमे से कार्बन डाइऑक्साइड का गैस के रूप में निकाल दिया जाना। UNEP की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे संसार में प्रति मिनट 1 से 38 एकड़ जंगलों का सफाया हो रहा है अर्थात वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता बढ़ रही है।

इसके अलावा जंगलों के दहन के दौरान भी कार्बन डाइ ऑक्साइड का निर्मोचन तो होता ही है साथ ही जब ट्रोपिकल क्षेत्रों में सूर्य की किरणें भूमि पर पड़ती है तो उससे भी मृदा में कार्बन उपलब्ध हो जाता है तथा ह्यूमस (भूमि) में इसके यौगिक (कार्बनिक यौगिक) ऑक्सीकृत हो जाते है।

1. उष्णकटिबंधीय देशों में इस ऊष्मा की प्रक्रिया के अतिरिक्त अन्य कारण भी सहायक है : वे है जैवखण्ड के जलने से , वनों के काटने से , धान के खेत और जंतुओं और दीमकों से। ये बड़ी मात्रा में मीथेन उत्पन्न करते है। कार्बन डाइऑक्साइड के उत्पादन के लिए जीवाश्म इंधन है। भारत के लिए कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस तथा परिवहन मुख्य सहायक रहे है तथा 1988-89 के अभिलेख से पता चलता है कि इनके द्वारा लगभग 8535.5 x 15मिलियन टन कार्बन का निक्षेप हुआ है जो कि कुल मिलाकर 140 मिलियन टन अथवा 1.4 x 1014 ग्राम प्रतिवर्ष  होता है। इस प्रकार भारत पृथ्वी का 2.8 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड ऊष्मा का सहायक है।

2. जीवाश्म इंधन का दहन और औद्योगीकरण : औद्योगिक क्रांति के बाद स्थिति में तेजी से बदलाव आया तथा जीवाश्म ईंधनों की अंधाधुंध खपत के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढती गयी। जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने स्थिति को और जटिल बना दिया। अब वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा इतनी हो गयी है कि धरती की सतह से वापस लौटने वाली ऊष्मा वायुमंडल को पार नहीं कर पाती। इससे धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह बढ़ोत्तरी जारी रहती है तो आने वाले समय में जलवायु पर व्यापक परिवर्तन हो सकते है तथा मानवता को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

मानव गतिविधियों द्वारा वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड , NO2 , मेथेन ओजोन , क्लोरोफ्लोरोकार्बन की सांद्रता बराबर बढ़ रही है तथा इसका मुख्य कारण यह है कि जीवाश्म इंधन का दहन। जीवाश्म इंधन का दहन लगभग 4 मिलियन टन प्रतिवर्ष की दर से हो रहा है। दहन की दर 4% वार्षिक की दर से बढ़ रही है। इस दर से कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 600 पीपीएम (भाग प्रति दस लाख) तक हो जाने की संभावना हो सकती है। यदि हम जीवाश्म इंधन के दहन की वृद्धि को धीमे भी कर दे (लगभग 2% वार्षिक) तो भी 15 से 20 वर्षो के अन्दर ही कार्बन डाइऑक्साइड के वातावरण में दुगुना हो जाने की संभावना है। पृथ्वी सतह का औसतन तापमान औद्योगिक समाज के शुरुआत से पहले लगभग 15 डिग्री सेल्सियस रहा।

इससे स्पष्ट है कि तीसरी दुनियाँ के देशो द्वारा अर्थात विकासशील देशों द्वारा पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का निर्मोचन काफी कम है। साथ ही समय के साथ साथ तुलनात्मक रूप से 1950 में 15 अरब मैट्रिक टन उत्पादन से 1985 में 51 खरब मैट्रिक टन तक हो गया है अर्थात मात्र 35 वर्षो में इसकी वृद्धि तीन गुनी से अधिक हो गया है।

हरित गृह गैसें (greenhouse gases)

वातावरण में हरित गृह गैसें या तो प्राकृतिक रूप से भी बनती है तथापि उनके नुकसान देय स्तर तक पहुँचने के लिए मानवीय गतिविधियों खासतौर से औद्योगिक देशों की , का ही सबसे बड़ा हाथ है। यह हरित गृह गैसें , जिनमे कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन सम्मिलित है , सूर्य की गर्मी को वातावरण में ही रोककर चूँकि धरती से वापस अन्तरिक्ष में लौट जाने से रोकती है , वे ही एक तरह से धरती की सतह को गर्म करती है।

कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) : समस्त ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाईऑक्साइड की सांद्रता वायुमंडल में सर्वाधिक (350 पीपीएम से अधिक ) है। सन 1980 में यह स्तर 280-290 पीपीएम था , जो बढ़कर सन 1988 में 350 पीपीएम पहुँचा और आंशका है कि सन 2050 तक 500 से 700 पीपीएम तक बढ़ सकता है। वायुमंडल में यह करीब 0.5 % प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है , जो पिछले 100 वर्षों (एक शताब्दी) में 35% बढ़ गयी है। यद्यपि इसकी सांद्रता अन्य सभी ग्रीन हाउस गैसों से अधिक है लेकिन इसकी गर्माहट (ऊष्मायन) क्षमता अन्य गैसों की अपेक्षा बहुत कम है। इसकी कम गर्माहट क्षमता के बावजूद वायुमण्डल में इसकी सांद्रता अधिक होने से सम्पूर्ण भौगोलिक गर्माहट में इसका सबसे अधिक योगदान (55%) है। वायुमंडल में इसकी सांद्रता काफी सीमा तक स्थिर रहती है , क्योंकि समुद्र और वायुमण्डल के मध्य आदान प्रदान होता रहता है। अगर समुद्र में इसकी सान्द्रता बढती है तो वायुमण्डल द्वारा तथा वायुमण्डल में बढ़ने से समुद्र द्वारा शोषित कर ली जाती है जिसके परिणाम स्वरूप इसकी सांद्रता काफी हद तक स्थिर रहती है लेकिन इस आदान प्रदान की भी एक सीमा होती है , अगर पृथ्वी पर किसी कारण इसकी सान्द्रता इतनी अधिक हो जाए , कि समुद्र इसे नियंत्रित करने में असमर्थ हो जाए , तो ऐसी स्थिति में वायुमण्डल में इसकी सांद्रता में वृद्धि होना अवश्यंभावी है।

कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में 30% की वृद्धि विगत दो शताब्दियों में हुई है। हाल ही के वर्षो में इस गैस का घनत्व खनिज तेल और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों के जलने से और कटिबन्धीय वर्षा वनों के विनाश के कारण बढ़ा है।

  • मौसम को स्थायित्व प्रदान करने के लिए यह आवश्यक है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड कुल मात्रा लगभग 2300 अरब टन हो।
  • वायुमण्डल में इस गैस का संतुलन ठीक रखने में सागर का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। पृथ्वी के 70% से भी अधिक भाग में फैले सागर अपने में वायुमंडल से लगभग 50 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड संचित किये हुए है।
  • सागरों तथा वायुमण्डल के मध्य प्रत्येक वर्ष लगभग 200 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड का आदान होता है। इस गैस की कुछ मात्रा तो पानी में घुली रहती है लेकिन इसका अधिकांश भाग कार्बोनेट यौगिकों के रूप में मौजूद रहता है।
  • यदि वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक हो जाए तो सागर उसका अधिकांश भाग (लगभग आधा भाग) सोख लेते है तथा यदि कम हो जाए तो सागर पुनः वायुमंडल में अधिक से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते है।
  • वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड आने का एक बड़ा स्रोत ज्वालामुखी भी है , जिससे प्रत्येक वर्ष लगभग 100 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड वायुमण्डल में आती है।
  • वायुमण्डल में स्थित कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने का सबसे बड़ा स्रोत वनस्पति जगत है क्योंकि पेड़ पौधे प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते है। वैज्ञानिकों के अनुसार पेड़ पौधे प्रतिवर्ष वायुमंडल से लगभग 60 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर लेते है। हालाँकि गैस की यह सम्पूर्ण मात्रा (60 अरब टन) वायुमण्डल को पुनः वापस मिल जाती है क्योंकि जन्तु जगत श्वसन क्रिया में कार्बन डाइ ऑक्साइड ही छोड़ते है।
  • वनस्पतियों के सड़ने से भी पर्याप्त गैस वायुमंडल में मिलती है। इस प्रकार आदान प्रदान से वायुमण्डल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा एकदम संतुलित रहती है।
  • लेकिन जब से प्राकृतिक व्यवस्था में मनुष्य ने दखल देना शुरू किया है तब से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा धीरे धीरे बढ़ने लगी है तथा इसका संतुलन बिगड़ने लगा है , इससे मौसम भी प्रभावित हुआ है।

तापमान में लगातार बढ़ोतरी के लिए मानवीय क्रियाकलापों को ही जिम्मेदार ठहराया गया है। इसके लिए कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ताप अवशोषक गैसों को जिम्मेदार माना गया है। रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि तापमान में जिस तरह की वृद्धि परिलक्षित हुई है वह केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं हो सकती तथा उपलब्ध प्रमाणों से संकेत मिलता है कि मानवीय क्रिया कलापों ने जलवायु को प्रभावित किया है।

वृद्धि का कारण

वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने के कई कारण है –

1. विभिन्न प्रकार के कारखाने तथा मोटर वाहनों का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन स्रोतों से सन 1850 से लेकर अब तक लगभग 150 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में पहुँच चूँकि है। मात्र 1960 से लेकर 1980 तक यानी 20 वर्षो में सर्वाधिक 80 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड गैस वायुमण्डल में आई है।

2. इस समय विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 5 अरब टन लकड़ी कोयला जलाया जाता है , जिससे प्रतिवर्ष 66 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड हवा में पहुँचती है तथा इसमें प्रत्येक वर्ष लगभग 4% की बढ़ोतरी भी हो रही है।

3. वनों की कटाई से पृथ्वी के जैविक पदार्थो पर तेज धूप पड़ती है , जिससे उनका तेजी से ऑक्सीकरण होता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस वजह से प्रत्येक वर्ष 2 से 4 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड हवा में पहुँच जाती है।

मीथेन : ग्रीन हाउस प्रभाव बढ़ाने वाली दूसरी गैस मीथेन की मात्रा में तो इसी अवधि में 145 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मीथेन की वृद्धि के कारण तो बहुत स्पष्ट नहीं है लेकिन उनमे मवेशियों की बढती संख्या (जिनकी आँतों से यह गैस निकलती है) , धान की खेती और वन विनाश प्रमुख है।

मीथेन भी एक महत्वपूर्ण ग्रीन हाउस गैस है। वायुमंडल में इसका उत्सर्जन कई क्रियाओं और विभिन्न स्रोतों से होता है। यह मुख्यता कार्बनिक पदार्थो की ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सड़ने , उनके जलने , दलदली और जलमग्न धान के खेतों के अलावा दीमक तथा जुगाली करने वाले पशुओं के मुंह से निकलती रहती है तथा वायुमंडल में मिल जाती है। वायुमण्डल में इसकी प्रतिवर्ष 1% की दर से वृद्धि हो रही है। इसकी ऊष्मायान क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 36 गुना ज्यादा है तथा सम्पूर्ण ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव में मीथेन का योगदान कुल 20% है। इन सभी स्रोतों में धान के खेतों और जुगाली करने वाले पशुओं का योगदान करीब 50% है। IPCC (1990) के आंकड़ो के आधार पर सम्पूर्ण पृथ्वी से कुल 361 मेगा टन मीथेन प्रतिवर्ष वायुमंडल में उत्सर्जित की जाती है।

मीथेन मुख्यतः जमीन में पड़े कार्बनिक पदार्थ के ऑक्सीजन रहित वातावरण में विशेष प्रकार के जीवाणुओं , जिन्हें मिथेनोजेन कहा जाता है के द्वारा विखण्डन के दौरान अथवा कार्बनिक पदार्थों के आधे जलने के कारण निकलती रहती है। जुगाली करने वाले पशुओं में जैसे गाय , भैंस आदि में आमाशय में पाचन के दौरान मीथेनोजेन जीवाणुओं द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड का अवकरण करने से मीथेन की दर पर बहुत से कारकों जैसे तापमान खेत में जल स्तर और रिसाव दर , मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा , धान के प्रजाति की वृद्धि दर और अवधि , वृद्धि अवस्था तथा धान के पौधों की जड़ों से स्त्रावित होने वाली शर्करा की मात्रा आदि का प्रभाव पड़ता है।

नाइट्रस ऑक्साइड अवरक्त (इन्फ्रारेड प्रकाश) किरणों को शोषित करके वायुमण्डल को गर्म करती है यह गैस मुख्यतया भूमि में नाइट्रोजनीय कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थो तथा उर्वरकों के नाइट्रिफिकेशन के दौरान बीच में बनने वाली गैस है। जो वायुमंडल में निकलती रहती है। धान के जलमग्न खेतों के सूखने और पुनः भरते सूखते रहने से अमोनिया का नाइट्रेट और नाइट्रेट का नाइट्रस ऑक्साइड में परिवर्तित होना एक प्रक्रिया है जिसे डिनाइट्रिफिकेशन , अमोनिफिकेशन और नाइट्रिफिकेशनकहते है। जमीन से जब नाइट्रेट का उत्सर्जन नाइट्रस ऑक्साइड के रूप में होता है तो इसे डिनाइट्रिफिकेशन कहा जाता है जो मुख्यतया सूखे धान के खेतों में पानी भरने के दौरान निकलती है। हालाँकि इस गैस की सांद्रता वायुमण्डल में बहुत कम होती है लेकिन इसकी गर्माहट क्षमता मीथेन से भी अधिक है तथा ग्रीन हाउस प्रभाव में इसका योगदान करीब 5% है। इस गैस की गर्माहट क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से 140 गुना अधिक होती है।

CFC : क्लोरिन , फ़्लोरिन और कार्बन के परमाणुओं के संयोग से बना क्लोरो फ्लोरो कार्बन का एक अणु कार्बन डाइऑक्साइड के एक अणु की तुलना में 14 हजार गुना अधिक गर्मी पैदा करता है तथा धरती का तापमान बढाने में इसका 20 फीसदी का योगदान है।

O3 : ओजोन , वाहनों द्वारा निकले नाइट्रस ऑक्साइड गैसों के ऑक्सीकरण द्वारा उत्पन्न होता है। यह गैस भी वायुमण्डलीय ऊष्मायान में सक्रीय भूमिका निभाती है , इसका योगदान लगभग 9% है। इसकी ऊष्मायान क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड से करीब 430 गुना अधिक है।

नोट : 1991 में फिलिपिन्स में माउन्ट पिनातुवे नामक ज्वालामुखी फटा तथा उससे निकली तीन करोड़ टन गर्द ने धरती का तापमान सैद्धांतिक रूप से प्रति वर्ग मीटर 4 डिग्री गिरा दिया और अगले दो वर्षो तक साड़ी धरती का तापमान व्यावहारिक रूप से आधा डिग्री तक कम रिकॉर्ड किया गया। इस सब से IPCC के वैज्ञानिकों ने यही निष्कर्ष निकाला कि स्थानीय प्रदूषण और ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण आंशिक रूप से ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा घटने के बावजूद अगले दो वर्षो में दुनिया का पाराडेढ़ से चार डिग्री सेल्सियस बढेगा।

हरित गृह प्रभाव के दुष्प्रभाव

1. तापक्रम में वृद्धि : धरती के गर्माने से जो विनाशकारी जलवायु परिवर्तन होंगे , वे यो तो स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों जैसे कि झीलों , पर्वतमालाओं आदि पर निर्भर करेंगे और इसी वजह से उनके बारे में अभी निश्चित भविष्यवाणी करना मुश्किल है तथापि उसके निम्नलिखित परिणाम अपरिहार्य होंगे –

  • अफ्रीका में रेगिस्तानी इलाकों का फैलाव तटवर्ती इलाकों में भारी वर्षा होगी। बाढ़े आयेंगी और औसत वर्षा वाले क्षेत्रों में सूखे की स्थिति बनेगी।
  • भूमि वाले इलाकों में भीषण गर्मी और आर्कटिक क्षेत्रों में सर्दियों में अधिकतम तापमान।
  • दक्षिण और पूर्वी एशिया के मानसून से गर्मियों में अतिवृष्टि।
  • कटिबन्धीय तूफानों के कारण लम्बे और ऊष्णतम सुखों सहित कई प्रकार की उग्र मौसमी घटनाएँ।
  • इनके अलावा सबसे अधिक प्रभावित इलाके वे होंगे जो वर्ष के कुछ अथवा पूरे समय तक बर्फाच्छादित रहते है। इन इलाकों , जिन्हें “क्रायोस्फियर” कहा जाता है , को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए भी तत्काल संख्या उपाय करना होगा क्योंकि यदि धरती का तापमान बढ़ने से आगामी 50 वर्षो में आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ पिघली तो नार्थ वेस्ट पैसेज और रूस का उत्तरी समुद्री मार्ग वर्षभर आवागमन के लिए खुल जायेंगे तथा उन इलाकों में आर्थिक विकास , तेल की खोज और पर्यटन की गतिविधियाँ बढ़ेगी एवं उनके साथ ही प्रदूषण भी , इसका तात्पर्य यह हुआ कि प्रकृति के साथ हस्तक्षेप का विनाशकारी दुष्चक्र आगे तथा गतिशील होकर अब तक अछूते रहे आर्कटिक क्षेत्र को भी प्रदूषित कर देगा।

वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों के कारण भारत , पाकिस्तान , श्रीलंका , बांग्लादेश , इंडोनेशिया , मलेशिया , वियतनाम तथा फिलिपिन्स में तापमान तथा समुद्र की सतह में वृद्धि का खतरा मंडरा रहा है। यदि ग्रीन हाउस गैसों में अधिक वृद्धि होती है तो इन देशों के समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से लेकर 3 डिग्री सेंटीग्रेड तथा मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.7 डिग्री से लेकर 4.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक वृद्धि हो सकती है।

ये सर्वेक्षण तथा मूल्यांकन एशिया के जलवायु परिवर्तन नामक ताजा रिपोर्ट के है। पिछले 10 हजार वर्षो में पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान 2 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ा है और बर्फ के पिछले युग के दौरान संभवतः आज की तुलना में तापमान लगभग 5 डिग्री कम था। अध्ययन से पता चलता है कि औसत वार्षिक तापमान में थोड़े से परिवर्तन के कारण पूरी पृथ्वी का वातावरण कैसे प्रभावित हो जाता है। उदाहरण के लिए , पिछले 5 हजार से 7 हजार वर्ष पहले जब औसत तापमान आज की तुलना में संभवतः 1 डिग्री अधिक था , तब वातावरण आज की तुलना में काफी भिन्न था। भारतीय क्षेत्र में वर्षा अधिक होती थी और सहारा संभवतः मरुस्थल नहीं था लेकिन एक शुष्क सवानाह था।

भूमण्डलीय पैमाने पर तापमान रिकॉर्ड करने का सिलसिला 1856 से आरम्भ हुआ था। तब से अब तक की अवधि में 1995 का औसत भूस्वरूपीय तापमान सर्वाधिक अंकित किया गया है। ब्रिटेन के मौसम विज्ञान कार्यालाय तथा ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय (नार्विच , यूनाइटेड किंगडम) की आरम्भिक रिपोर्टो के अनुसार वर्ष 1995 में औसत भूमण्डलीय तापमान 14.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। इससे पहले सन 1990 का औसत तापमान सर्वाधिक था लेकिन 1995 में उसमे 0.05 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो गयी।

अलबामा विश्वविद्यालय के जॉन क्रिस्टी तथा मार्शल अन्तरिक्ष उड़ान केंद्र (नासा) के राय स्पेंसर ने पिछले 17 वर्षों के जो आँकड़े एकत्र कर रखे है उनसे पता चलता है कि 1995 का वर्ष अपेक्षाकृत अधिक गर्म रहा है। पिछले 17 वर्षो में अगस्त 1995 सर्वाधिक गर्म साबित हुआ है। क्रिस्टी के अनुसार उपग्रहों के आंकडे गर्मी बढाने की जो दर प्रदर्शित करते है वह उस परास (रेंज) में पहुँच चुकी है जिसे वैज्ञानिक पूर्वानुमानों के अनुसार मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न होना चाहिए।

हरित गृह प्रभाव पूरी पृथ्वी का तापमान औसत 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ा सकता है एवं यह 3 डिग्री सेल्सियस तापमान डाइनोसौर के युग से अभी तक नहीं देखा गया है। वस्तुतः इसकी सम्भावना है कि 1 डिग्री सेल्सियस अथवा थोडा अधिक इनक्रेटर पर तथा लगभग 3 डिग्री सेल्सियस लेट्यीटयूट पर और लगभग 4.5 डिग्री सेल्सियस ध्रुवों पर बढ़ जाए। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वायुमण्डल में इसकी मात्रा 690 भाग , प्रति दस लाख भाग हो जाएगी तो विश्व का औसत ताप 3 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक बढ़ जायेगा। भूमध्य रेखा तथा उसके समीप के इलाकों का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक बढ़ जायेगा और ध्रुवों पर 4.5 डिग्री सेल्सियस से 7 डिग्री तक ताप बढ़ जायेगा। अन्य क्षेत्रों में 3 डिग्री सेल्सियस तक ताप बढ़ने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार यदि इन देशों में ग्रीन हाउस गैसों में मध्यम स्तर की वृद्धि होती है , तब समुद्री क्षेत्रों के तापमान में 0.3 डिग्री तथा मैदानी क्षेत्रों के तापमान में 0.5 डिग्री से लेकर 2.5 डिग्री तक वृद्धि हो सकती है।

मध्यम स्तर की वृद्धि की स्थिति में समुद्र की सतह 9 सेंटीमीटर से लेकर 45 सेंटीमीटर तक बढ़ सकती है। तापमान वृद्धि के अब तक के पूर्वानुमानों में एक नयी पेचीदगी यह पैदा हो गयी है कि कुछ वैज्ञानिक समुद्रों की अब तक आकलित ताप अवशोषण क्षमता को संदिग्ध बता रहे है। उनका कहना है कि समुद्रो द्वारा जितनी ऊष्मा सोखने के अनुमान लगाये गए है वे वास्तविकता से काफी अधिक है। यानी समुद्र उतनी ऊष्मा का अवशोषण नहीं कर सकेंगे जितना की फ़िलहाल अनुमानित है। ऑस्ट्रेलियास स्थित कॉमन वेल्थ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रीयल रिसर्च ओर्गेनाइजेशन में काम करने वाले ट्रेवोर मैक्डॉगल तथा उनके सहयोगियों का कहना है कि समुद्रों की ऊष्मा अवशोषण क्षमता उसकी आधी है जितना कंप्यूटर मॉडलों के आधार पर आंकलित किया गया है।

तापमान वृद्धि के पूर्वानुमान सचमुच ही चिंता तथा भय उत्पन्न करने वाले है। अगर वर्तमान प्रवृति जारी रहती है तो सन 2100 तक तापमान में 1.8 से 6.3 डिग्री सेल्सियस (औसत 3.6 डिग्री सेल्सियस) तक को बढ़ोतरी हो सकती है .इससे भीषण बाढ़ , सुखा , चक्रवात , दावाग्नि और महामारियो का एक ऐसा सिलसिला शुरू हो सकता है जो मानवता को नष्ट कर देने वाला होगा।

2. वर्षा में वृद्धि : ताप बढ़ने से पृथ्वी पर होने वाली वर्षा काफी प्रभावित होगी। एक तो पहले वर्षा के स्वरूप में परिवर्तन आयेगा तथा इन सब से ऊपर वर्षा में लगभग 7 प्रतिशत तक की वृद्धि होगी। हरित गृह का प्रभाव दक्षिणी ध्रुव की तुलना में उत्तर की ध्रुव की ओर अधिक विस्तार करेगा।

वे कुछ क्षेत्र जो आज बिल्कुल ही शुष्क है उनके हरे भरे हो जाने की भी सम्भावना है लेकिन लेकिन दूसरी तरफ सहारा रेगिस्तान जैसे इलाकों का उत्तरी ओर फैलने का भय है लेकिन कृषि क्षेत्र में इसके विपरीत प्रभाव भी हो सकते है। वातावरण के उत्तरी ओर खिसकने से बहुत से राष्ट्रों में इसका लाभकारी प्रभाव होगा लेकिन बहुत से देशों में इसके विपरीत प्रभाव भी पड़ेंगे। भारत में इसके विपरीत प्रभाव पड़ने की सम्भावना अधिक है। भारत में वर्षा की अधिक सम्भावना होगी लेकिन इसके पडोसी देशो जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में वर्षपात कम हो जायेगा। अत: भारत और सहारा रेगिस्तान के आस पास के क्षेत्रों में अच्छी वर्षा होगी।

जबकि पडोसी देशो जैसे पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में वर्षा बहुत कम हो जाएगी। पिछले 50 वर्षा में , पाँच सबसे गर्म एवं पांच सबसे ठंडे वर्षो का प्रयोग करते हुए दिलचस्प अध्ययन किये गये तथा यह पाया गया है कि अमेरिका के अधिक भाग में और यूरोप तथा सोवियत रूस के अधिकतर भागो में घनीभूतीकरण काफी कम था जबकि भारत में और पश्चिमी एशिया में घनीभूतीकरण बहुत अधिक था , यह वृद्धि भारत के पूर्वी तट पर कुछ प्रतिशत थी जो कि बढती हुई उत्तर पश्चिमी क्षेत्र में 100% थी। यद्यपि घनीभूतीकरण दक्षिण में और दिल्ली के पास के क्षेत्रों में कम था। इस अध्ययन से यह सम्भावना प्रतीत होती है कि पृथ्वी की ऊष्मा बढ़ेगी , अच्छा मानसून होगा तथा भारत के लिए बाढ़ों में वृद्धि की सम्भावना है।

3. खाद्यान उत्पादन :

  • अफ्रीका के कुछ देशों और अरब देशों में भी अधिक वर्षा के कारण खाद्यान्न उत्पादन बढ़ने की संभावना है।
  • रूस तथा चीन में भी अन्न का उत्पादन बहुत अधिक बढ़ जायेगा।
  • उत्तरी अमेरिका तथा यूरेशिया में तो खाद्यान्नों के पकने की अवधि ही बढ़ जाएगी। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि औसत ताप 1 डिग्री सेल्सियस बढने पर फसल पकने की अवधि दो तीन सप्ताह बढ़ जाएगी।
  • पृथ्वी का तापमान बढ़ने जाने से भारत और अन्य विकासशील देशो में अनाज की पैदावार में कमी आ सकती है। साथ ही दक्षिण एशियाई देशों के विभिन्न फसलों के उत्पादन में कमी आयेगी। कृषि भूमि तथा मछलियाँ घट जाएँगी तथा लोग बड़े पैमाने पर विस्थापित हो जायेंगे।

नोट : अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी की सहायता से किये गए एक अध्ययन में डॉ. सिंधिया रोसेनजिग ने लिखा है कि भारत पर इसका असर निश्चित तौर पर नकारात्मक है। डॉ. रोसेनजिग ने बताया कि पृथ्वी के वायुमंडल का अध्ययन करने वाली गोडार्ड इंस्टीट्यूट के अनुसार भारत में खाद्यान्न उत्पादन में 10 से 20% की कमी आ सकती है जबकि कनाडा , ऑस्ट्रेलिया , अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ के देशों में अनाज की पैदावार में 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि होगी।

जलवायु के बदलाव के असर के बारे में इस पहले व्यापक अध्ययन में कहा गया है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने का औद्योगिक , खासतौर से उच्च अक्षांश वाले देशों पर बिल्कुल विपरीत असर होगा , वहां अनाज का उत्पादन बढ़ जायेगा। पृथ्वी का तापमान बढ़ने के उपचार के लिए 1992 में संयुक्त राष्ट्र संधि पर हस्ताक्षर करने वाले पंद्रह देशों की जेनेवा में होने वाली बैठक के एक माह पहले यह रिपोर्ट आई थी। अध्ययन में 18 देशों के खाद्यान्न उत्पादन के आँकड़ो शामिल किये गए है जिनमे 12 विकासशील देश है। डॉ. रोसेनजिग के अनुसार भारत के मामलों में गेहूँ की फसल का अध्ययन किया गया तथा इसी से निष्कर्ष निकाला गया। उन्होंने कहा कि भविष्य में सभी फसलों का अध्ययन किया जायेगा तथा अधिक सटीक नतीजे निकाले जा सकेंगे।

4. ध्रुवों की बर्फ पर : औसत ताप बढने से ध्रुवों की बर्फ पिघलने लगेगी क्योंकि ध्रुवों का ताप 4.5 डिग्री सेल्सियस से 7 सेल्सियस तक बढ़ने की उम्मीद है। इसलिए वैज्ञानिकों का अनुमान है कि कुछ सदियों बाद ध्रुवों पर बिल्कुल बर्फ नहीं रहेगी जिसके भयानक परिणाम होंगे। 15 डिग्री सेल्सियस ताप बढ़ने पर आर्कटिक सागर की सारी बर्फ गर्मियों में पिघल जाएगी। साथ ही ग्रीनलैंड की बर्फ भी धीरे धीरे पिघल जाएगी।

इसके अतिरिक्त अंटार्कटिका की बर्फ भी धीरे धीरे पिघलकर समुद्र में आ जाएगी तथा अगले सौ वर्षो में पूरी बर्फ पिघल जाएगी।

5. जल स्तर में वृद्धि : जलवायु परिवर्तनों से आखिर खतरे कौन से है ? सबसे पहले तो ध्रुवीय क्षेत्रों की बर्फ धरती के तापमान में होने वाली वृद्धि के कारण पिघलेगी उससे समुद्र का स्तर ऊँचा उठेगा तथा तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लाखो लोगो की जिन्दगी तथा आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।

  • अनुमानत: आगामी 100 वर्षो में समुद्रों के जलस्तर में 50 सेंटीमीटर की वृद्धि होगी तथा वह निरंतर बढ़ता जायेगा कुछ खास इलाकों में यह बढ़ोतरी इससे दो तीन गुना अधिक भी हो सकती है।
  • IPCC के ताजा अध्ययनों के अनुसार यदि समुद्र स्तर में एक मीटर की भी वृद्धि होती है तो उससे 17% बांग्लादेश जलप्लावित हो जायेगा। तथा मार्शल द्वीप समूह की राजधानी माजुरो द्वीप का 80% भाग डूब जायेगा। इतना ही नहीं इसी वजह से आने वाले समुद्री तूफ़ान , कटिबंधीय क्षेत्रों के प्रवाल तटों और निचले इलाकों को खारे पानी में डुबोकर नष्ट कर देंगे। इन तूफानों से चीन की यलों और यांगत्सी नदी घाटियों और बांग्लादेश के कोई 7 से 8 करोड़ लोगो के अलावा मिश्र , भारत , पाकिस्तान , मोजांबिक और वियतनाम के भी बड़ी संख्या में लोग प्रभावित होंगे। इन इलाकों की रक्षा के लिए समुद्री दीवारों और तटबंधो के निर्माण पर अरबों रुपयों का खर्च करना होगा।
  • अगली शताब्दी तक समुद्री सतह के लगभग 5 से 7 मीटर तक बढ़ने की संभावना हो सकती है लेकिन अभी समुद्री सतह में 10 से 25 सेंटीमीटर वृद्धि हो सकती है जो कि निम्न सतह पर है जैसे होलेन्ड , वेनिस , फ्लोरिडा। इससे इनका स्थलीय क्षेत्र कम हो जाने की सम्भावना है।
  • वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसों में अधिक वृद्धि की स्थिति में दक्षिण एशिया के देशो में समुद्र की सतह 15 सेंटीमीटर से लेकर 90 सेंटीमीटर तक बढ़ सकती है। अगली सदी के अंत तक समुद्र का जल स्तर 5 से 7 मीटर बढ़ जाने की संभावना है जिससे पृथ्वी के अनेक निचले हिस्से (समुद्र तटों से 50 किलोमीटर दूर तक फैले) जलमग्न हो जायेंगे। इससे विश्व की 30% आबादी काल के गाल में समा जाएगी।
रिपोर्ट भारत समेत अन्य देशों में 2010 ईस्वी से 2070 ईस्वी तक की अवधि में ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव के बारे में अनुमान लगाती है तथा इसका यह निष्कर्ष है कि इन देशों में ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव के कारण मानसून में भारी वृद्धि हो जाएगी। निचाई पर स्थित क्षेत्र जलमग्न तथा बाढ़ के शिकार हो जायेंगे। छोटे द्वीप डूब जायेंगे तथा समुद्र तटवर्ती इलाके समाप्त हो जायेंगे।
एशियाई देशो के सर्वेक्षण के लिए कंप्यूटर के चार बड़े मॉडल का उपयोग किया गया है तथा ग्रीन हाउस गैसों की तीन स्तरीय निकासी तथा इसके आधार पर तापमान तथा समुद्र सतह की वृद्धि की एक जटिल गणना के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए है। रिपोर्ट का यह सुझाव भी है कि भारत समेत अन्य देश 15 वर्षो में कई कार्यक्रमों तथा विकास नीतियों के जरिये ग्रीन हाउस गैसों के खतरनाक प्रभाव कम कर सकते है अथवा यह भी संभव है कि ऐसे देश उच्च स्तर की बजाय निम्न स्तर पर आ सकते है।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भारत , पाकिस्तान तथा बांग्लादेश , वियतनाम तथा फिलिपिन्स बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रमों में परिवर्तन तथा फसलों में विविधता के जरिये ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव कम कर सकते है। भारत में पृथ्वी के कई प्रकार के परिवर्तनों के अध्ययन के लिए बहुत से महत्वपूर्ण प्रोग्राम बनाये गए है। इनमे ओजोन का नियंत्रण , हरित गृह अणुओं का नियंत्रण , समुद्र के व्यवहार की जानकारी , उद्योग सम्बन्धी वातावरण अध्ययन आदि सम्मिलित है।

ग्लोबल वार्मिंग और भारत पर खतरा

लम्बे अर्से से धरती के तापमान में आई वृद्धि अथवा ग्लोबल वोर्मींग को लेकर तरह तरह की आशंकाएं तथा चेतावनी प्रकट की जाती रही है तथा पिछले दिनों ब्रिटेन सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर डेविड किंग ने भी एक ऐसी चेतावनी दी जिसे सबसे गंभीर चेतावनी बताया गया। वो चेतावनी ये थी कि अगर पर्यावरण को दूषित करने वाले कारणों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो जल्दी ही वो दिन आयेगा जब धरती का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस ऊपर चला जायेगा। अमेरिकी स्थित संस्था नासा के गोड़ाई इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्पेस स्टडीज के अनुसार वर्ष 1950 में धरती का तापमान 13.8 डिग्री सेल्सियस था तथा वो वर्ष 1999 में बढ़कर लगभग 14.5 डिग्री सेल्सियस हो गया।
उष्णकटिबंधीय देशों में अपनी तरह के एकमात्र संस्थान पुणे के भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के प्रोफेसर जी बी पंत के अनुसार तीन डिग्री तापमान का बढ़ना वाकई चिंताजनक हो सकता है।
प्रोफेसर पन्त ने कहा “भारत में कई जगह गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है तथा धरती के तापमान के तीन डिग्री से ये हो सकता है कि उन गर्म स्थलों पर तापमान पांच छह डिग्री तक ऊपर जा सकता है। अगर किसी स्थान का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस हो गया हो तो वह असह्य हो जायेगा तथा इसलिए ऐसा अगर 200 साल में भी होता है तो काफी गंभीर बात होगी। “

प्रभाव

धरती के गर्म होते जाने के प्रभाव काफी खतरनाक हो सकते है।
एक खतरनाक प्रभाव तो ये बताया जाता है कि धरती के गर्म होने से पर्वतों पर ग्लेशियर अथवा हिमखण्ड पिघलेंगे फिर समुद्र के पानी का आयतन बढेगा तथा फिर ये होगा कि समुद्र जल स्तर के बढ़ने से तटीय इलाके डूब जायेंगे।
लेकिन जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम के तहत जलवायु परिवर्तन पर बनी अंतर्सरकारी समिति के अध्यक्ष डॉक्टर राजेन्द्र कुमार चौधरी पचौरी बताते है कि भारत तथा चीन जैसे विकासशील देशों में खतरें और भी है।
डॉक्टर पचौरी ने कहा “भारत चीन जैसे देशों में मुश्किल ये है कि ग्लेशियर तेजी से पिघलते जा रहे है जिससे पीने के पानी का संकट खड़ा हो सकता है तथा बाढ़ और सूखे का खतरा पैदा हो सकता है। “
“इसके अलावा स्वास्थ्य पर भी असर पड़ेगा क्योंकि ऐसे कीटाणु जो पहले जीवित नहीं रह सकते थे वे तापमान बढ़ने पर जी मकते है जिनसे बिमारियों का खतरा हो सकता है। “

कृषि पर असर

भारत में जिन क्षेत्रों पर असर पड़ा है उसका एक उदाहरण मिलता है कृषि क्षेत्र में गेहूं के उत्पादन में आई गिरावट से। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् यानी ICAR ने जलवायु परिवर्तन के खेतों पर असर का पता लगाने के लिए एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया है। आईसीएआर (ICAR) में कार्यरत सहायक महानिदेशक पी.डी. शर्मा बताते है , “अचानक गर्मी बढ़ने से गेहूं की बालियों में अन्न विकसित नहीं हो पाता है। ”  उन्होंने बताया कि गेहूं का उत्पादन एक समय में 21 करोड़ 20 लाख टन तक चला गया था लेकिन उसके बाद वो ऊपर नहीं जा रहा है बल्कि उसमे कमी आती गयी है।

जानकारों का मत है कि धरती के बढ़ते तापमान पर नियंत्रण के लिए समय रहते कार्यवाही किये जाने की आवश्यकता है तथा इसके लिए अमेरिका आदि विकसित देशों के अतिरिक्त भारत चीन जैसे देशों को भी मिलकर प्रयास करने होंगे।