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जिबरेलिन हार्मोन के तीन कार्य लिखिए , Gibberellins in hindi works uses , जिबरेलिन की खोज (Discovery of Gibberellins)

जानिये जिबरेलिन हार्मोन के तीन कार्य लिखिए , Gibberellins in hindi works uses , जिबरेलिन की खोज (Discovery of Gibberellins) ?

जिबरेलिन (Gibberellins)

जिबरेलिन दूसरा महत्त्वपूर्ण पादप हार्मोन है जो पादपों व नवोद्भिदों में दीर्घीकरण (elongation). दीर्घ दिवसीय पादपों में पुष्पन, खाद्यान्न में बीजांकुरण व अन्य अनेक प्रक्रियाओं को प्रेरित व प्रभावित करते हैं ।

जिबरेलिन की खोज (Discovery of Gibberellins)

जिबरेलिन्स का प्रभाव आज से सौ वर्ष वर्ष पूर्व भी लोगों को ज्ञात था । जापानी किसानों ने उनके धान के खेतों में पाया कि कुछ धान के पादप अन्य पादपों से लम्बे एवं बहुत पतले हो गये कि बीज बनने से पूर्व ही गिर जाते थे। इस स्थिति को बैकने (bakanae= foolish seedling disease) अर्थात् निबुद्धि नवोदभिद रोग कहा गया। कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने इस रोग का कारक एक कवक जिबरेला फ्यूजिकोराई (Gibberella fujikuroi) को बताया। यह फ्यूजेरियम मोनिलीफार्मी (Fusarium moniliforme) की लैंगिक अवस्था है। उन्होंने पाया कि इस कवक के संवर्ध निस्सार (culture extract) से भी पौधों पर रोग के लक्षण परिलक्षित हो जाते हैं। याबूटा, हायाशी एवं काहबे (Yabuta, Hayashi and Kahnbe, 1930) ने सर्वप्रथम इस वृद्धिकारी पदार्थ को कवक से पृथक कर इसे जिबरेलिन (gibberellin) नाम दिया । याबुता एवं सुमिकी (Yabuta & Sumiki, 1938) ने इसे क्रिस्टल के रूप में विलगित किया। ये सभी असल में विभिन्न यौगिक थे। बाद में क्रास (Cross, er aql, 1954) एवं ब्रिटेन से बोरो एवं साथियों (Borrow et al. 1955 ) तथा USA से स्टोडेला व साथियों (Stodola et al 1955), जापान से टाकाहाशी व साथियों (Takahashi et al. 1955) ब्रिआन एवं साथियों (Brian et al, 1955) ने शुद्ध रूप में जिबरेलिन को पृथक किया इसे जिबरेलिक अम्ल (gibberellic acid) कहा गया ।

कुल मिलाकर जिबरैला कवक से GA, GA2 , GA3, GA 4. GA7 , व GA8 , विलगित किये गये थे जिनमें से सर्वप्रथम GA3 , विलगित किया गया । आवृतबीजी पादपों में सबसे पहले मैकमिलन एवं सटर (Macmillan and Suter. 1958) ने फेसियोलस कोसिनस (Phaseolus coscineus) के अपरिपक्व बीजों से जिबरेलिन विलगित किया ।

जिबरेलिन के मुख्य लक्षण (Important characteristics of gibberellins)

1.सभी में मुख्यतः गिब्बेन वलय (gibbane ring) होती है।

2.कोशिका दीर्घीकरण (cell elongation), अमाइलेस (amylase) विकर का प्रेरण तथा द्रुतशीतन (chilling) के प्रभाव को विस्थापित करते हैं।

  1. प्राप्ति स्थान व वितरण (Occurrence and distribution) : जिबरेलिन प्रकृति में व्यापक रूप से पाये जाते हैं । ये- सभी प्रकार के उच्च पादपों, शैवाल, मॉस, फर्न तथा जीवाणु व कवक की कुछ प्रजातियों में पाये जाते हैं। जिबरेलिन की उपस्थिति पादपों के विभिन्न अंगों में जैसे जौ की बालियों, बीजों, जलकुम्भी की मूल अमलतास की दल, कुछ पादपों के पोष तथा अनेक पादपों के बीज व अंकुरित बीजों तथा नवोद्भिद में पायी गयी है।

अब तक लगभग 100 जिबरेलिन की खोज की गई है जिनमें से लगभग 15 कवक व उच्च पादप दोनों में पाये जाते है

जिबरेलिन की सर्वाधिक सान्द्रता विकास कर रहे अंगों यथा प्ररोह शीर्ष, तरुण पत्तियाँ, अंकुरित बीज इत्यादि में पायी जाती हैं तथा इनका स्थानांतरण जायलम एवं फ्लोएम द्वारा सभी दिशाओं में होता है, अतः इनका स्थानान्तरण अध्रुवीय (nonpolar) होता है ।

जिबरेलिन भी मुक्त (free) अथवा बद्ध ( bound) अवस्था में पाये जाते हैं। बद्ध अवस्था में ये सामान्यतः ग्लूकोसाइड (glucosides) के रूप में होते हैं। जिबरेलिन के अनेक प्रकार जैविक रूप से निष्क्रिय होते हैं।

रासायनिक प्रकृति (Chemical nature)

  1. सभी जिबरेलिन मूलतः जिबरेलिक अम्ल होते हैं।
  2. ये डाइटरपीनॉइडी अम्ल होते हैं जो चतुष्कसाइक्लिक डाइटरपीनॉइड हाइड्रोकार्बन (tetracyclic diterpenoid hydrocarbon) से व्युत्पन्न कार्बनिक यौगिक है। जो चार आइसो प्रिनाइड (isoprenoid) एककों से बने हैं।
  3. ये मूलतः 20 कार्बन युक्त होते हैं परन्तु कुछ जिबरेलिन 19 कार्बन युक्त भी होते हैं। इनके संश्लेषण के दौरान एक C परमाणु की हानि होती है ।

4.सभी जिबरैलिन अम्लीय प्रकृति के होते हैं तथा इनमें एक कार्बोक्सी ( – COOH) समूह होता है।

  1. 19C युक्त GA में COOH समूह की स्थिति निश्चित होती हैं जबकि 20C युक्त जिबरैलिक अम्लों में परिवर्तनीय होती हैं

6.इनमें हाइड्रॉक्सी (OH) समूह भी पाये जाते हैं।

जिबरेलिन का जैव संश्लेषण (Biosynthesis of gibberellins)

जिबरेलिन का संश्लेषण तीन चरणों में होता है जो तीन भिन्न-भिन्न कोशिकांगों हरितलवक (chloroplast), अतः प्रदव्यी जालिका (endoplasmic reticulum) तथा जीवद्रव्य ( cytosol) में होते हैं।

  1. टरपीनॉइड पूर्वगामी एवं एन्ट कॉरीन (ent-kaurene ) का संश्लेषण (Production of terpenoid precursors and ent Kaurene) यह प्रक्रिया क्लोरोप्लास्ट में होती है।
  2. आक्सीकरण अभिक्रिया द्वारा GA 12 एवं GA53 का बनना (Oxidation reaction to form GA 12 and GA53)- यह अंतद्रव्यी जालिका (ER ) में होती है।
  3. GA12 अथवा GA53 से अन्य GA का बनना तथा C20 GA से C19 , GA का बनना (Formation of C79 GA from C20 GAS )- यह प्रक्रिया सायटोसोल (cytosol) में होती है।
  4. टरपीनाइड पूर्वगामी एवं एन्ट कॉरीन का संश्लेषण (Production of terpenoid precursors and ent-kaurene)

पहले चरण में विभिन्न अभिक्रियाओं से IPPP बनाता हैं जो इस प्रकार है-

(i) एसिटिक अम्ल से मैवालौनिक अम्ल (MVA) का बनना (Formation of Mevalonic acid from Acetic acid) एसिटेट के तीन अणु मिलकर मैवालोनेट बनाते हैं।

(ii) मेवालोनेट से आइसोपेन्टीनाइल पाइरोफास्फेट (IPPP) का बनना (Formation of Isopentenyl pyrophosphate) मेवालोनिक अम्ल 5 कार्बन अणु युक्त सरल श्रृंखला (straight chain) वाले IPPP में परिवर्तित हो जाता है ।

(ii) आइसोपेन्टीनाइल पाइरोफास्फेट के चार अणुओं का संघनन होने से जिरेनाइल जिरेनाइल पाइरोफास्फेट (GGPP) नामक डाइटरपीन बनता है। जो 20 कार्बन युक्त यौगिक है।

IPP का इसके आइसोमर (isomer) डाइमिथाइल एलाइल पायरोफास्फेट (Dimethyl allyl pyrophosphate) में परिवर्तन होता है तथा इन के संघनन से गिरेनाइल पायरोफास्फेट, GPP (IOC) बनता है। GPP से फार्नसाइल पायरोफास्फेट, FPP(ISC) तथा अंत में गिरेनाइल गिरेनाइल पायरोफास्फेट GGPP (20C) बनते हैं।

(iv) गिरेनाइल गिरेनाइल पायरोफास्फेट का वलयीकरण (Cyclisation of GGPP)

GG PP अनेक टरपीन यौगिकों का पूर्वगामी होता है। GGPP का वलयीकरण पहला चरण है जो जिबरेलिन संश्लेषण के लिए विशिष्ट होता है। वलयीकरण से GGPP एन्ट- कॉरीन (ent- kaurene) में बदल जाता है। इनके लिए एन्जाइम प्ररोह विभज्योतकी कोशिकाओं के प्रोप्लास्टिड (proplastids ) में ही पाये जाते हैं, परिपक्व प्लास्टिड में नहीं। इसके आगे की प्रक्रिया अंतः प्रदव्यी जालिका (ER ) में होती है।

ऑक्सीकरण (Oxidation )

(i) ऐन्ट–कॉरीन के 19 सवें कार्बन का तीन चरणों में आक्सीकरण होता है तथा वह 7-a- हाइड्रोक्सी कॉरेनॉइक एसिड (7-a-hydroxy kaurenoic acid) में बदल जाता है।

(ii) अब 7 x हाइड्रोक्सी कॉरेनॉइक अम्ल B हाइड्रोजन को खोकर तथा कुछ फेरबदल के बाद GA 12 एलडिहाइड में तथा बाद में GA12 में बदल जाता है। GA 12 के C13 के हाइड्रोक्सीलिकरण (hydroxylation) से GA 3 बनता है

अन्य जिबरेलिक अम्लों में परिवर्तन (Conversion to other Gas)

यह प्रक्रिया साइटोसोल (cytosol) में होती है इसमें GA 12 के C20 का आक्सीकरण पहले एल्कोहल फिर एलडिहाइड समूह में परिवर्तन द्वारा होता है अंत में यह अणु CO2 के रूप में अलग हो जाता है तथा 19C युक्त GA प्राप्त होता है।

जिबरेलिन का जैव आमापन (Bioassay of giberellins)

जिबरेलिन का जैव आमापन सामान्यतः वामन नवोद्भिद परीक्षण, प्रांकुर चोल दीर्घनन तथा जौ के भ्रूणपोष परीक्षण द्वारा किया जाता है।

वामन नवोद्भिद परीक्षण (Dwarf seedling test) – जिबरेलिन वामन नवोद्भिद पौधों में दीर्घीकरण प्रेरित करते हैं। इस किस्म अथवा प्रभेद के बीजों का अंकुरित किया जाता है। मक्का के प्रथम पर्ण की जीभिका (ligule) पर GA का घोल लगाया जाता है। इससे 4-5 दिनों में ही पर्ण एवं पर्णाच्छद ( leaf sheath) की लम्बाई में तीव्रता से वृद्धि होती है। 5 दिनों के बाद पहली व दूसरी पत्ती (epicotyl) की लंबाई नापी जाती है। यह विधि अत्यंत संवेदी है।

जो का भ्रूण पोष परिक्षण barley endosperm teat ) इस विधि में जो के भ्रूण रहित आधे बीजों (de-embryonated half seeds) को जिबरेलिन के घोल में 24 घंटे के लिये रखा जाता है। जिबरेलिन एल्यूरॉन से एमाइलेज विकर की सक्रियता जो का भ्रूण पोष परीक्षण (Barley endosperm test)- इस विधिं में जौ के भ्रूण रहित आधे बीजों (de-embryonated एवं स्त्रवण को प्रेरित करते हैं इससे भ्रूणपोष में उपस्थित मंड शर्करा में परिवर्तित हो जाती हैं। यह शर्करा (ग्लूकोज) विलयन में स्त्रावित हो जाती हैं विलयन में शर्करा की उपस्थिति जिबरेलिन की उपस्थिति को दर्शाता है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न अतिसंवेदी तकनीक उपलब्ध हैं जिनसे जिबरेलिन की उपस्थिति ज्ञात की जा सकती है— गैस क्रोमेटोग्राफी एवं उच्च दक्षता तरल क्रोमेटेग्राफी (high performance liquid chromatography)।

जिबरेलिन की क्रियाविधि (Mechanism of action of gibberellin)

जिबरेलिन की ऑक्सिन के समान तने की लंबाई तथा फल के विकास में सहायक प्रवृत्ति के कारण कुछ वैज्ञानिकों ने इन्हें एक प्रकार का आक्सिन ही माना परन्तु जई के वक्रण प्रयोग में विफलता के बाद यह सिद्ध हो गया कि ऑक्सिन व जिबरेलिन भिन्न हैं। पादप पर दोनों के समान प्रभावों के कारण कुछ लोग मानते हैं कि इनकी क्रियाएं कहीं न कहीं आपस में जुड़ी हुई हैं। उन्होंने सुझाया कि GA. ऑक्सिन का स्तर बढाने में सहायता कर वृद्धि प्रेरित करते हैं। उन्होंने GA उपचार देने पर ऑक्सिन का बढ़ा हुआ स्तर देखा ।

GA के विभिन्न प्रभावों में से जल अपघटनी एन्जाइमों के संश्लेषण पर अधिक कार्य किया गया है। ऐसा माना जाता है कि GA भी ऑक्सिन के समान केन्द्रक में विशिष्ट जीन के साथ क्रिया करते हैं तथा उन्हें सक्रिय करते हैं। GA, उपचार से RNA पोलीमरेज तथा RNA का स्तर बढ़ जाता है एवं विशेष कर a एमाइलेज का संश्लेषण होता है। वे प्रोटीएज, नाइट्रेट रिडक्टेज विकरों की सक्रियता को भी बढ़ाते हैं ।

GA3 उपचार के 1–2 घंटे के भीतर ही (a एमाइलेज बनने से काफी पहले) कोशिका झिल्ली की पारगम्यता बदल जाती है व लेसिथीन तथा फास्फोलिपिड का संश्लेषण बढ जाता है। GA के इतने सारे प्रकार देखते हुए जीन स्तर पर क्रिया करने की अवधारणा सही प्रतीत होती है। संभवतः जिबरेलिन अनुलेखन (transcription) एवं अनुवादन (translation) प्रेरित करते हैं। इसके अतिरिक्त वे अन्य जल अपघटनी विकरों का संश्लेषण भी प्रेरित करते हैं ।

जिबरेलिन कोशिका विवर्धन भी प्रेरित करते हैं परन्तु यह प्रक्रिया अम्लीय pH पर आधारित नहीं होती। ये जीन के स्तर पर अभिक्रिया का कोशिका भित्ति से संबंधित एन्जाइम जायलो ग्लूकेन एन्डोट्रांसग्लाइकोसिलेज (xyloglucan endotransglyco sylase, XET) को प्रेरित करते हैं जो जायलोग्लूकान का अपघटन करते हैं। संभवत इससे कोशिका भित्ति प्रसारण क्षमता (extensibility) बढ़ जाती है ।

धान के पौधों में दीर्घीकरण कोशिका दीर्घीकरण के अतिरिक्त अंतर्वेशी विभज्योतक (intercalary meristem) में तीव्र गति से विभाजन के कारण भी होता है। यह प्रक्रिया सबसे निचली पर्वसंधि पर होती है जो पानी में डूबी रहती है। इससे O2 की कमी का सिगनल कोशिकाओं में इथाइलीन संश्लेषण प्रेरित करता है जो एबसिसिक अम्ल का स्तर कम कर देती है। इसका स्तर कम होने से ऊतक आंतरिक GA के प्रति अधिक ग्राही ( responsive) हो जाते हैं तथा कोशिका विभाजन होता है।

अधिकांश पादपों में एकलिंगी पुष्प दूसरे लिंग के अंग के विकसित न होने के कारण बनते हैं। संभवतः पर्यावरण के प्रभाव जिबरेलिन के माध्यम से होते हैं। मक्का में GA का मुख्य कार्य संभवतः नर पुष्पों के विकास को रोकना है जबकि द्विबीजपत्रियों में ये नर पुष्पों को बढ़ावा देते है । इथाइलीन (ethylene) अथवा किसी अन्य हार्मोन के साथ पारस्परिक क्रिया के माध्यम से पुष्पन पर प्रभाव डालते हैं ।

जिबरेलिन के प्रभाव एवं कार्य (Effects and role of gibberellins)

  1. पर्वदीर्घीकरण एवं उत्स्फुटन (Elongation of internode and bolting ) : पर्वों के दीर्घीकरण द्वारा जिब्रेलिन स्तम्भ की लम्बाई बढ़ाते हैं। आनुवांशिकी रूप से बौने पादपों को जिब्रेलिन देकर लम्बा किया जा सकता है। यह दीर्घीकरण मात्र कोशिका की लंबाई में बढ़त के कारण होता है। कुछ पादपों में लाल प्रकाश के कारण पादप बौने रह जाते हैं जैसे मटर की कुछ किस्मों में । जिबरेलिन लाल प्रकाश के इस संदमक प्रभाव को समाप्त कर लंबाई को 2-4 गुना तक कर सकते है। लघु स्तम्भयुक्त द्विवर्षीय पादप को यदि जिब्रेलिन दिये जायें तो इनमें वृद्धि तीव्र होती है। इस क्रिया को उत्स्फुटन (bolting) कहते हैं। उदाहरण- चुकन्दर (sugar beet) । पत्तागोभी में भी उत्स्फुटन (bolting) को प्रेरित किया जा सकता है।
  2. पुष्पन एवं लिंग विभेदन (Flowering and sex differentiation) : लैंग (Lang 1960) ने बताया कि कुछ पादपों में जिबरेलिन बाहर से देने पर वे वैसा ही प्रभाव देते हैं जैसा कि निम्न ताप उपचार ( vernalisation) अथवा दीप्तिकालिता (photoperiod) से होता है। उदाहरणतया हेनबेन, हायोसायमस नाइगर (Hyoscyamus niger) एक दीर्घ दिवसीय (long day) पादप है। जिबरेलिन की उपस्थिति में यह पादप लघु दिवसीय परिस्थिति (SD condition) में भी पुष्पित हो जाता है। पुष्पन हार्मोन का संश्लेषण GA के माध्यम से होता है ।

कुछ पादपों जैसे कुकरबिटा (Cucurbita) में नर पुष्पों के बनने (male ness) को प्रेरित करते हैं मक्का में नर पुष्पक्रम पर GA का छिड़काव करने से मादा पुष्प बन जाते हैं ।

  1. खाद्यान्नों में बीजाकुरण (Germination in cereal grains) : जिब्रेलिन के प्रभाव से खाद्यान्नों के बीजों में प्रोटीएज, लाइपेज, राइबोन्यूक्लिएज, a एवं एमाइलेज इत्यादि विकरों का निर्माण होता है। इन विकरों से भ्रूणपोष में संग्रहित खाद्य पदार्थ मंड, प्रोटीन आदि का विघटन होता है। यह विघटित खाद्य पदार्थ वृद्धि बिन्दुओं को हस्तान्तरित होते हैं जिसके फलस्वरूप वृद्धि होती है ।
  2. प्रकाश संवेदी बीजों का अंकुरण (Germination of light sensitive seeds): लेट्यूस ( lettuce). एवं तम्बाकू के बीजों के अंकुरण के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। परन्तु जिब्रेलिन से उपचारित बीज अन्धकार में भी अंकुरित हो जाते हैं ।
  3. अनिषेकफलन (Parthenocarpy) : ऑक्सिन की तुलना में जिब्रलिन सेब, नाशपाती इत्यादि अनिषेकफलन को सरलता से प्रेरित करते हैं। दृढ़ फलों (stone fruits) में अनिषेकफलन जिब्रेलिन के उपचार से ही होता है ।
  4. प्रसुप्ति का भंगीकरण (Breaking of dormancy) : कुछ परिस्थितियों में शीर्षस्थ कलिकाएं सुषुप्त हो जाती हैं। पर्णपाती (deciduous) तथा शीतोष्ण (temperate) क्षेत्रों के सदाहरित (evergreen) वृक्षों की कलिकाएं पतझड़ व ग्रीष्म काल में सुषुप्त हो जाती हैं यह सुषुप्ति जिबरेलिन व डार्मिन (dormin) के स्तर के माध्यम से नियंत्रित होती है। GA का स्तर बढ़ने पर डार्मिन का स्तर कम हो जाता है तथा सुषुप्तावस्था समाप्त हो जाती है। प्रकृति में निम्न ताप अथवा प्रकाश उद्भासन का भी यही प्रभाव होता है।
  5. बीजों में संचयी कोशिका से भोज्य पदार्थों का अभिगमन (Mobilisation of food from seed storage cells in seeds) : ये अनेक धान्य बीजों के अंकुरण के दौरान मंड, प्रोटीन वसा इत्यादि के सूक्रोज व अमिनो अम्ल अथवा एमाइड में परिवर्तन को प्रेरित करते हैं ताकि वे फ्लोएम द्वारा वांछित ( वृद्धि कर रहे ऊतक) स्थलों तक पहुंच सकें। इन बीजों में भ्रूणपोष से संलग्न एल्यूरान परत होती है जो जलअपघटनी एन्जाइम का स्त्रवण करती है। ये एन्जाइम भ्रूणपोष कोशिकाओं में संचित भोजन पर अभिक्रिया कर उनका अपघटन करते हैं ।
  6. पत्तियों का विवर्धन (Expansion of leaves) : मटर, टमाटर, पत्तागोभी जैसे कुछ पादपों में जिबरेलिन उपचार से पत्तियाँ लंबी व चौड़ी हो जाती हैं।

कृषि में उपयोगिता (Importance in agriculture)

GA के वृद्धि पर प्रभावों के फलस्वरूप इनके कृषि में विभिन्न उपयोग हैं-

  1. अंकुरण (Germination) : इनकी धान्य बीजों के अंकुरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मोरस (Morus indica) में GA से अंकुरण बढ़ जाता है।
  2. पुष्पन (Flowering) : अनेक पादपों में GA के उपयोग से प्रकाश के प्रभाव (effect of light) तथा निम्न ताप उपचार ‘(vernalisation) का प्रतिस्थापन किया गया है। मक्का में GA 19, GA 20 GA, इत्यादि नर पुष्पों को मादा पुष्पों में परिवर्तन को प्रेरित करते हैं ।

जिबरेलिन कूकूमिस सटाइवा (Cucumis sativa), भांग (Cannabis sativa) एवं पालक (Spinacca) में नर पुष्पन प्रेरित करते हैं।

  1. अनिषेकफलन (Parthenocarpy) सेब, नाशपाती, बैंगन इत्यादि में GA उपचार द्वारा अनिषेक फलन प्रेरित किया गया है। इससे फलों का आकार भी बड़ा है।
  1. आनुवांशिक बौने पादपों का दीर्घीकरण (Elongation of genetically dwarf plants)

सामान्य पौधों पर GA उपचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु आनुवांशिक स्तर पर जीनी संघटन के कारण बौने पादपों को GA उपचारित करने पर वे लंबे हो जाते हैं। उदाहरण- मटर, टमाटर, कुकम्बर, इत्यादि। गन्ने में भी लंबाई बढ़ती है परन्तु तल शाखाओं में (tillers) की संख्या कम हो जाती है।

  1. सुषुप्तावस्था समाप्त करने के लिए (For breaking dormancy) आलू में कन्द को GA उपचार से शीत काल में अंकुरण के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
  1. फलन (Fruiting) अनेक पादपों में GA उपचार से फलों का बनना बढ़ जाता है। इससे फलों का आकार भी बढ़ता है जैसे अंगूर, ग्रूइया एसिएटिका (Grewia asiatica) में ।