अणु कक्षकों के निर्माण के लिए सामान्य नियम  , H2+ का L.C.A.B-mo सिद्धांत

H2+ का L.C.A.B-mo सिद्धांत : H2 अणु आयन (H2+) जिसमें दो प्रोटोन तथा एक इलेक्ट्रॉन होता है , इसका विवरण L.C.A.B-mo  विधि द्वारा करते हैं।
H-परमाणु की निम्न ऊर्जा का परमाणु कक्षक 1S होता है।  यदि दो नाभिकों को नजदीक लाया जाये तो देखा गया की 1 electron आण्विक कक्षक दो परमाण्वीय कक्षको के रेखीय संयोग से बना हैं।
अत: स्पष्ट है की 1S कक्षकों के रेखीय संयोग से निम्नतम ऊर्जा का आण्विक कक्षक बनता है।
H2+ आयन आण्विक तंत्र के लिए श्रोडिंगर समीकरण को हल किया जा सकता है क्योंकि H-परमाणु के समान यह single electron सिस्टम है।  अत: इसके यथार्त तरंगफलन को ज्ञात किया जा सकता है।
स्थायित्व  बंध क्रम
बंध लम्बाई  1/बंधक्रम
H2 का बंधक्रम 1 होता है परन्तु H2+ का बंधक्रम 0.5 होता है , इस कारण H2+ का स्थायित्व H2 की अपेक्षा कम होता है।
परन्तु H2+ की बंध लम्बाई का मान H2 की तुलना में अधिक होता है।
H2+ में 2H परमाणु Ha , Hb है , जिनके परमाण्वीय कक्षक 1Sa , 1Sb एवं उनके तरंग फलन Ψa , Ψहो तो H2+ के निर्देशांकों के रूप में भी दर्शाया जा सकता है।
अतः H2+ आयन में निम्न तीन प्रकार की आकर्षण व प्रतिकर्षण अंत:क्रिया होती है –
1. Ha परमाणु का नाभिक व इलेक्ट्रॉन के मध्य आकर्षण।
2. Hb परमाणु का नाभिक व इलेक्ट्रॉन के मध्य आकर्षण।
3. दोनों परमाणुओं के नाभिकों के मध्य प्रतिकर्षण
H2 अणु आयन के लिए आण्विक तरंगफलन जो की परमाण्वीय कक्षकों के रेखीय संयोग से बनता है।

अणु कक्षकों के निर्माण के लिए सामान्य नियम

आण्विक कक्षक निर्माण की आवश्यक शर्ते निम्न है –
परमाण्वीय कक्षको के अतिव्यापन से उतनी ही संख्या से आण्विक कक्षक बनते है जितने अतिव्यापन में भाग लेते है।
आण्विक कक्षकों का निर्माण परमाण्वीय कक्षकों से होता है , electrons से नही।  अत: इसमें पूर्ण रूप से भरे हुए अर्द्धपूर्ण अथवा रिक्त सभी कक्षक भाग लेते है।
अतिव्यापन में भाग लेने वाले सभी कक्षकों के समस्त electrons को आण्विक कक्षकों में आफबो व हुण्ड के नियम अनुसार भर दिया जाता है।
प्रतिबंधी अणुकक्षक व बंधी अणु कक्षक के electron के अंतर का आधा बंध क्रम कहलाता है।
बंधक्रम = (बंधि अणु कक्षकों में electron – प्रतिबन्धि अणु कक्षकों में electron) /2

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