ईसाई धर्म के संस्थापक कौन है | ईसाई धर्म के संस्थापक का नाम क्या है founder of christian religion in hindi

By   January 8, 2021

founder of christian religion in hindi ईसाई धर्म के संस्थापक कौन है | ईसाई धर्म के संस्थापक का नाम क्या है ?

प्रस्तावना
जैसा कि बताया जा चुका है, भारत अनेक संख्यक समाज है। इस अनेक संख्यक रूप का महत्वपूर्ण तत्व है अनेक धार्मिक विश्वास पद्धतियों और धार्मिक रीतियों का यहाँ पर पाया जाना । धर्म, समूह संरचना का एक महत्वपूर्ण आयाम है। किसी सामाजिक समूह के विश्व दृष्टिकोण और व्यवहारगत प्रतिरूपों को अधिकांशतया उनकी धार्मिक रीतियाँ और विश्वास ही रूप देते हैं। ईसाई धर्म एक महत्वपूर्ण विश्व धर्म है। भारत में इस धर्म को मानने वालों की एक अच्छी खासी संख्या है। यह समाजशास्त्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि ईसाई धर्म के बुनियादी सिद्धांतों और उसे मानने वालों के सामाजिक संगठन का विश्लेषण किया जाए और उसकी जानकारी ली जाए।
ई.एस.ओ.-12 की इकाई 17 में हमने विशेषरूप से भारत के संदर्भ में ईसाई सामाजिक संगठन पर विचार किया था। इस इकाई में हम आपको ईसाई धार्मिक विश्वास के बुनियादी सिद्धांतों की जानकारी देंगे। हम आपको भारत में ईसाई धर्म के सामाजिक, धार्मिक पहलुओं की भी संक्षेप में जानकारी देंगे। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप ईसाइयों की आस्था पद्धति के बारे में और इस लोक तथा परलोक के बारे में जानकारी हासिल कर सकेंगे। इस इकाई में हमने ईसाई जीवन-दर्शन और आदर्श ईसाई समाज पर भी विचार किया है। इस इकाई में हमने इन बिन्दुओं पर व्यापक रूप से विचार किया है कि ईसाइयों के विश्वास का पोषण कैसे होता है, और उन्हें इस दुनिया के साथ ईसाई समुदाय के सामंजस्य के परिणामों के बारे में आत्मिक प्रेरणा कैसे मिलती है। इस इकाई में भारत में ईसाई धर्म के बारे में कुछ व्यापक दृष्टिकोणों पर भी विचार किया गया है।

वैसे तो ईसाई धर्म के मानने वालों की बड़ी संख्या यूरोप और अमेरिका महाद्वीपों के देशों में ही पाई जाती है, फिर भी इस धर्म के अनुयायी दुनिया के लगभग सभी देशों में मिलते हैं। संगठन और सिद्धांत में अंतर के आधार पर ईसाइयों में विभाजन भी मिलता है। इस धर्म में अलग-अलग नाम से पंथ और संप्रदाय पाये जाते हैं। इस धर्म के लोग मुख्य रूप से तीन वर्गों में बंटे हैं: (1) रोमन कैथोलिक चर्च, (2) ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च और (3) प्रोटेस्टैंट संप्रदाय । इनमें से रोमन कैथोलिक और ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च ईसाई धर्म के शुरू के दौर से ही हैं, जबकि प्रोटेस्टैंट संप्रदायों का उदय पिछली कुछ शताब्दियों में हुआ। इनके उदय के कारण यह रहा कि कुछ चर्चों से असंतुष्ट गुटों ने अपने अलग चचे बना लिए। लेकिन इस इकाई में हमने ईसाई धर्म के जिन मूल्य तत्वों की चर्चा की है वे उपर्युक्त सभी चर्चों या संप्रदायों में समान रूप से पाये जाते हैं। इन ईसाई चर्चों के अलावा क्रिश्चिन साइंसेज, जेंहोंवाज विटनेस, मोरमोनिज्म या ‘‘लेटर डे सेंटस‘‘, द यूनीफिकेशन चर्च या ‘‘मूनिस‘‘ जैसे कुछ संप्रदाय भी हैं। ये सब संप्रदाय ईसाई धर्म के संगठन होते हुए भी बाइबिल में उल्लिखित ईसाई धर्म से अत्यधिक भिन्न हैं। समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में ईसाई धर्म का विवचेन करते समय हम इस इकाई में उन कुछ कार्यों को ध्यान में रखेंगे जिन्हें करने की अपेक्षा किसी धर्म से की जाती है, इन कार्यों में प्रमुख हैं अतिरिक्त सत्ता और संतुष्टि प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को सहायता देना, बुराई की समस्या की व्याख्या करना, भविष्य में बेहतर जीवन के लिए आशा बंधाना, उद्धार या मोक्ष के लिए कोई योजना प्रस्तुत करना, वर्तमान जीवन के स्तर को सुधारना और आदर्श समाज की रूपरेखा रखना। इस इकाई में हमने इन सभी पहलुओं पर विचार किया है।

स्रोत और विश्वास (Sources and Beliefs)
ईसाई धर्म के संस्थापक तो ईसा मसीह हैं, लेकिन इसकी जड़ें यहूदी परंपरा में मिलती हैं। यहूदी धर्म और इस्लाम की तरह ही ईसाई धर्म की गिनती भी परमेश्वर की ओर से प्रेरित धर्मों में होती है। इस प्रकार से प्रेरित धार्मिक ज्ञान का संग्रह ईसाइयों की पवित्र पुस्तक बाइबिल में मिलता है। बाइबिल के दो भाग हैं: पुराना नियम और नया नियम । बाइबिल की पुस्तकें विभिन्न लेखकों ने प्राचीन काल से ही समय-समय पर लिखी हैं। पुराना नियम की पुस्तकों में ईसा मसीह के जन्म से पहले की बातें हैं और इन्हें मूल रूप में हिब्रू भाषा में लिखा गया था । नया नियम में ईसा मसीह के जीवन से संबंधित बातें और उनके उपदेश मिलते हैं, इसके अलावा उसमें ईसा मसीह के प्रेरितों या शिष्यों के कामों का भी उल्लेख है। ईसाई धर्म के विकास काल का वर्णन करने वाली ये पुस्तकें मूल रूप में यूनानी भाषा में लिखी गई हैं। नया नियम की पहली चार पुस्तकों में ईसा मसीह के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान का वर्णन है। इन चारों पुस्तकों को समग्र रूप में सुसमाचार (ळवेचमसे) के नाम से जाना जाता है।

 ईसाई धर्म के संस्थापक (The Founder of Christianity)
ईसाई धर्म का केन्द्र उसके संस्थापक ईसा मसीह की पहचान है। ऐतिहासिक हस्ती ईसा का जन्म लगभग 2000 वर्ष पहले हुआ था। वे केवल 33 वर्ष इस धरती पर रहे और उनका सार्वजनिक जीवन अंतिम तीन वर्षों में ही सामने आया । इन तीन वर्षों में उन्होंने बीमारों को ठीक किया, आश्चर्य कर्म या चमत्कार किये, यहाँ तक कि मुरदों को जिन्दा किया और अपने शिष्यों को शिक्षा दी कि वे परमेश्वर को पसंद आने वाला जीवन कैसे जी सकते हैं। लेकिन जैसा कि ईसाइयों का विश्वास है ईसा के जीवन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि क्रूस या सलीब पर चढ़ाये जाने, मरने और कब्र में रख दिये जाने के बाद तीसरे दिन वे फिर जिन्दा हो गये और अपने शिष्यों को दिखाई दिये और फिर स्वर्ग में उठा लिए गये। यीशु अपने आपको परमेश्वर की सन्तान बताते थे और उन्होंने अपने व्यवहार में अपने इसी रूप को प्रकट किया। उन्होंने अपने अधिकार से पापियों को क्षमा किया। यहूदियों के धार्मिक गुरुओं को उनकी यही बात खटक गई। लेकिन उनके शिष्यों का विश्वास था कि वे परमेश्वर थे। इसलिए ईसाई धर्म का एक बुनियादी सिद्धांत है यह विश्वास कि ईसा मसीह सच्चे मनुष्य और सच्चे परमेश्वर हैं। अपने जीवन काल में ईसा मसीह ने अनेक शिष्य और अनुयायी बनाये। लेकिन, इन लोगों ने अपना कोई अलग समुदाय या चर्च नहीं बनाया। यह स्पष्ट था कि अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के समय तक यीशु ने अपना धार्मिक उद्देश्य पूरा नहीं किया था। वास्तव में तो, ईसा मसीह का उनके शत्रुओं के हाथों पकड़ा जाना और सलीब पर उनकी दर्दनाक मौत उनके धर्म के प्रचार के काम को आगे बढ़ाने की दिशा में अवरोधक साबित हुई। अपनी मृत्यु से एक दिन पहले जब ईसा मसीह को पकड़ा गया तो उनके साथ हमेशा बने रहने वाले उनके प्रति भयभीत हो गये और उनका साथ छोड़ गये। यहाँ तक कि उनसे कुछ दूरी रखकर चल रहा उनका प्रिय प्रेरित शिमौन पतरस भी दूसरों के तीन बार सवाल करने पर इस बात से मुकर गया कि वह ईसा मसीह को जानता था । जब ईसा मसीह अपने शत्रुओं के हाथों में शक्तिहीन दिखाई दिये तो उन्हें परमेश्वर का पुत्र मानने वाले प्रेरितों का भी मोहभंग हो गया। ईसा मसीह की मृत्यु के समय वे इस डर से छिप गये कि कहीं उन्हें पकड़ न लिया जाए।

तीसरे दिन ईसा मसीह मुरदों में से जी उठे। जैसा कि बाइबिल में लिखा है, उस दिन से लेकर, चालीसवें दिन अपने स्वर्गारोहण (स्वर्ग में उठा लिए जाने) के समय तक वे अपने प्रेरितों और अन्य शिष्यों को अनेक बार दिखाई दिये। उसी दौरान ईसा मसीह ने अपना धार्मिक उद्देश्य पूरा किया और अपने प्रेरितों को आदेश दिया कि वे उस धर्म को तमाम देशों में फैलाएं। ईसा मसीह ने उनसे कहा, ‘‘स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिए तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रात्मा के नाम से बपतिस्मा दो और उन्हें सब बातें जो मैंने तुम्हें आज्ञा दी है मानना सिखाओः और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे संग हूँ।‘‘ (मैथ्यू 28ः18-20)

 बाइबिल में परमेश्वर की अवधारणा (The Biblical Concept of God)
इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि बाइबिल में परमेश्वर की जो अवधारणा प्रस्तुत की गई है वह कुछ जटिल है। परमेश्वर एक है लेकिन बाइबिल में वह तीन रूपों में प्रकट हुआ है-पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा । परमेश्वर की इस प्रकार की अवधारणा को ‘‘त्रयी में इकाई‘‘ और ‘‘इकाई में त्रयी‘‘ का रहस्य कहकर प्रस्तुत किया जाता है। बाइबिल के अनुसार, ईसा मसीह परमेश्वर हैं-वे पुत्र हैं जिनका जन्म पवित्र आत्मा से गर्भवती हुई कुंआरी मरियम की कोख से हुआ। बाइबिल के अनुसार, ईसा मसीह का मनुष्य के रूप में जन्म इस दैवीय योजना के तहत हुआ कि मनुष्य जाति के पापों का पश्चाताप हो सके।

मनुष्य जाति के उद्वार के लिए परमेश्वर का मनुष्य के रूप में जन्म होना क्यों आवश्यक था, इसे समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि बाइबिल इस दुनिया में पाप और बुराई की उत्पति के बारे में क्या बताती है। बाइबिल यह बताती है कि परमेश्वर ने आकाश और धरती की रचना की और उसने मनुष्य जाति के आदिपूर्वज आदम (नर) और हव्वा (नारी) को अपने ही स्वरूप में बनाया। लेकिन आदम और हव्वा ने अपने सृष्टा की आज्ञा का
परिणामस्वरूप, समूची मनुष्य जाति को इस प्रारंभिक पाप की विरासत मिली और परमेश्वर की संतान कहलाने का अधिकार उनसे छिन गया। मनुष्य जाति के पापों का पश्चाताप केवल एक निष्पाप मनुष्य, यीशु के कष्ट उठाने और मारे जाने के माध्यम से ही संभव था और परमेश्वर ने मनुष्यों से इतना प्रेम किया कि उसने उन्हें पापों से छुटकारा दिलाने के लिए अपने इकलौते प्रिय पुत्र को पृथ्वी पर भेज दिया। इसलिए ईसा मसीह को मनुष्य जाति का उद्वारकर्ता कहा जाता है। बाइबिल कहती है कि जो कोई उस पर विश्वास करेगा वह मोक्ष पाएगा (जॉन 3ः16)।

 बाइबिल में शरीर, आत्मा और उद्धार की अवधारणा (The Biblical Concept of Body, Soul and Salvation)
बाइबिल बताती है कि मनुष्य के पास शरीर और आत्मा होती है, इनमें से शरीर तो नष्ट हो जाता है किन्तु आत्मा अनंत काल तक जीवित रहती है। ईसाई धर्म में उद्धार (मोक्ष) का अर्थ होता है व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात आत्मा का उत्तरजीवी होकर स्वर्ग में सुख शांति से रहना । पुनर्जन्म के विश्वास के विपरीत, ईसाई धर्म यह सिखाता है कि मनुष्य पृथ्वी पर केवल एक बार जन्म लेते हैं, इसलिए उनके पास स्वर्गीय शांति के लिए तैयारी का केवल एक ही अवसर होता है। आदम और हव्वा के प्रारंभिक पाप ने तो मनुष्य जाति को अनंत काल तक श्रापित जीवन जीने के लिए छोड़ दिया था, लेकिन ईसा मसीह ने धरती पर दुःख उठाकर उनके उद्धार का मार्ग खोल दिया है। लेकिन कोई भी मनुष्य उद्धार तभी पा सकता है जब वह यीशु को अपना उद्धारकर्ता मान ले। बाइबिल इस विषय में स्पष्ट है ईसा मसीह के ही शब्दों में: ‘‘मार्ग, सच्चाई और जीवन मैं ही हूँ, बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।‘‘ (जॉन 14रू6)। इस पाठ में उल्लिखित इस समेत अन्य सभी उद्वरण ‘‘नया नियम‘‘ की पुस्तकों से लिए गये हैं।

बॉक्स 1
ईसाई धर्म के उद्वार की योजना के स्पष्ट होने की प्रक्रिया से बाइबिल के ‘‘पुराना नियम‘‘ और ‘‘नया नियम‘‘ के बीच का संबंध भी स्पष्ट हो जाता है। “पुराना नियम‘‘ यहूदी परंपरा का एक अत्यावश्यक हिस्सा है। ईसा मसीह यहूदी ही थे। उन्होंने यहूदी परंपरा का ही पालन किया और वहीं से अपनी शिक्षाओं के लिए संदर्भ जुटाये । “पुराना नियमश् में हर कहीं उस किसी की आस मिलती है जिसके आने के बारे में बार-बार कहा गया है। उस आने वाले के बारे में कई वादे, भविष्यवाणियां और विवरण मिलते हैं और ये सबके सब ईसा मसीह के रूप में पूरे होते हैं। इस तरह, ईसाइयों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो, ‘‘नया नियम‘‘ में उस विलक्षण घटना के दर्शन होते हैं जिसकी भविष्यवाणी ‘‘पुराना नियम‘‘ में की गई थी। यही नहीं ‘‘पुराना नियम‘‘ लगातार इस बात की याद भी दिलाता रहता है कि परमेश्वर बुरे लोगों को दंड और अच्छे लोगों को उनकी अच्छाई का बदला देता है, और वह अपने विश्वासियों को कभी त्यागता नहीं है। “पुराना नियम‘‘ और ‘‘नया नियम‘‘ दोनों मिलकर एक पूरे ग्रंथ का रूप लेते हैं जिसमें परमेश्वर ने अपने। आपको एक क्रमिक ढंग से प्रकट किया है।

संगठन और प्रभु भोज (Organisation and Communion)
प्रारंभ में चर्चों का संगठन इस विश्वास पर आधारित था कि ईसा मसीह मुरदों में से ‘‘जी उठे प्रभु‘‘ हैं। प्रारंभिक दौर में तो ईसाई लोग प्रार्थना के लिए प्रतिदिन इकट्ठा होते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने सप्ताह के एक दिन को ‘‘प्रभु का दिन‘‘ (रविवार) को प्रार्थना के लिए नियत कर दिया। आज भी ईसाइयों के गिरजाघरों में यही प्रथा सामान्य तौर पर चली आ रही है। गिरजाघर में होने वाली प्रार्थना सभा में मुख्य रूप से धार्मिक निर्देश, उपदेश, प्रार्थना और रोटी तोड़ने की रस्म होती है। रोटी तोड़ने या ‘‘प्रभु भोज की इस रस्म का ईसाइयों की प्रार्थना सभा में विशेष महत्व होता है। ईसा मसीह ने अपने मारे जाने से पहले रात में अपने प्रेरितों के साथ अंतिम भोज के समय रोटी ली और प्रार्थना करने के बाद उसे तोड़ा और अपने प्रेरितों को यह कहते हुए दी: ‘‘यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिए दी जाती है: मेरे स्मरण के लिए यही किया करो।‘‘ इसी तरह भोज के बाद उसने कटोरा उठाया और कहा: “यह कटोरा मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है नई प्रसंविदा (Covenant) है ।‘‘ (ल्यूक 22ः19-20)। यह घटना ईसा मसीह के दुख और सलीब पर उनकी मृत्यु की प्रतीक है। ईसा मसीह के दुख उठाने और सलीबी मौत मरने से मनुष्य जाति के लिए पाप से मुक्ति का मार्ग खुला। गिरजाघरों में होने वाली प्रार्थना सभाओं में ‘‘प्रभु भोज‘‘ की रस्म इस विश्वास के साथ की जाती है कि उससे ईसा मसीह की मौजूदगी (अर्थात जीवित रूप) एक बार फिर उभरेगा । रोटी खाने और दाखरस पीने से ईसा मसीह के साथ सीधा और निकट का संबंध स्थापित होता है। प्रार्थना सभा में सम्पन्न होने वाली इस रस्म को प्रभु भोज भी कहते हैं।

सामान्यतया, ईसाइयों की प्रार्थना सभाओं का उद्देश्य आत्मा और सच्चाई से परमेश्वर का भजन करना (जॉन 4ः24), अर्थात ईसा मसीह के माध्यम से और पवित्र आत्मा की शक्ति से पिता (परमेश्वर) की उपासना करना है।