विकासवादी विचारक किसे कहते है | समाजशास्त्र में विकास वादी evolutionary thinkers in hindi

By   November 22, 2020

evolutionary thinkers in hindi विकासवादी विचारक किसे कहते है | समाजशास्त्र में नाम बताइये ?

विकासवादी विचारक
विकासवादी उन विचारकों को कहा गया जिनका तर्क था कि कुछ समाज चूंकि अन्य समाजों से अधिक विकसित अवस्था में पाए जाते हैं, अतः सभी समाजों को विकास के कुछ निश्चित चरणों से गुजरना होता है। मानव प्रजातियों के विकास के बारे में चार्ल्स डार्विन के सिद्धांत से यह विचार और पुष्ट हुआ कि मानव इतिहास की प्रगति का अध्ययन विकासात्मक प्रक्रिया के संदर्भ में ही किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यूरोप में बखोफन, ब्रिटेन में मेन और मैक्लनन और अमरीका में मॉर्गन ने सामाजिक विकास के अनेक चरणों की परिकल्पना की। 1861 और 1871 के दौरान ऐसी पुस्तकें प्रकाशित हुई, जो आज सैद्धांतिक दृष्टि से शास्त्रीय रचनाएं (classics) मानी जाती हैं। इनमें प्रमुख हैं
ऽ हैनरी मेन द्वारा लिखित एशेंट लॉ (1861) और विलेंज-कम्युनिटिज इन दि ईस्ट एण्ड वेस्ट (1871),
ऽ जे.जे. बखोफन द्वारा रचित द मदर राइट (1861).
ऽ जे.एफ. मैक्लनन की कृति प्रिमिटिव मैरिज (1865).
ऽ ए.बी. टाइलर की पुस्तकें रिसर्चज इनटू दि अरली हिस्ट्री ऑफ मैनकाइड (1865) और प्रिमिटिव कल्चर (1871).
ऽ एल.एच. मॉर्गन की पुस्तक सिस्टम्स ऑफ काँसगुइनिटि एण्ड अफिनिटि ऑफ द ह्यूमन, फैमिली (1871).

इनमें से केवल कुछ पुस्तकें आदिम समाजों के बारे में हैं। मेन की पुस्तकें रोमन संस्थाओं तथा भारत-यूरोपीय समुदायों के संबंध में हैं। बखोफन ने यूनान तथा रोमन कालीन परम्पराओं एवं मान्यताओं के बारे में लिखा। किन्तु मैक्लन, टाइलर तथा मॉर्गन ने मुख्यतया आदिम समाजों को अपने अध्ययन का विषय बनाया। उन्होंने विभिन्न स्रोतों से आदिम समाजों के बारे में सामग्री एकत्र की और उन्हें व्यवस्थित रूप दिया।

ये सभी विद्वान अनुमानों पर आधारित ऐसे सिद्धांतों को छोड़ देने के पक्ष में थे, जिनका यथार्थ जगत में कोई आधार नहीं था। उनके पूर्ववर्ती विद्वान (अठारहवीं शताब्दी के नैतिक दार्शनिक) समाज के बारे में दृष्टिकोण बनाने के लिए अपने समाज के अंतरावलोकन (introspection) पर आश्रित थे। अपने समाज से इतर समाजों के अवलोकन का उन्हें कोई अवसर भी उपलब्ध नहीं था। उन्नीसवीं शताब्दी के विद्वान अंतर्संबधों में प्रकारांतर (अंतपंजपवदे) के माध्यम से समाज के विभिन्न भागों के बीच परस्पर संबंधों का अध्ययन करना चाहते थे। उनका मानना था कि जटिल सामाजिक पहलुओं के अध्ययन के लिए साधारण प्रकारांतरों (variables) का सहारा नहीं लिया जा सकता। सामाजिक संस्थाओं के उद्भव एवं विकास के नियमों के निर्धारण के लिए उन्होंने बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिखी। उदाहरण के लिए, उन्होंने एकलविवाह का विकास स्वच्छंद काम-संबंधों से माना, उद्योग के विकास की जड़ें खानाबदोशी में ढूंढ़ी और एकेश्वरवाद (monism) का उद्भव जीववाद (animism) में देखा। स्कॉटलैंड के वकील (1822-1888) सर हैनरी मेन का उदाहरण ही लीजिए। उसने लिखा कि सामाजिक जीवन का मूल तथा विश्वव्यापी स्वरूप पितृसत्तात्मक परिवार का है, जिसमें पिता को पूर्ण सत्ता प्राप्त है। किन्तु दूसरी ओर स्विटजलैंड के एक न्यायविद, बखोफन ने परिवार के संबंध में एकदम विपरीत विचार व्यक्त किए। उसने लिखा कि स्वच्छंद संभोग परिवार व्यवस्था का मूल स्वरूप था। उसके पश्चात् मातृवंश परम्परा, मातृसत्तात्मक व्यवस्था तथा परिवार व्यवस्था आई और फिर पितृवंश परम्परा तथा पितृसत्तात्मक व्यवस्था विकसित हुए।

स्कॉटलैंड के ही एक अन्य न्यायविद्, जे.एफ. मैक्लनन (1827-1881), ने भी सामाजिक विकास के नियमों की रचना की। उसका विचार था कि स्वच्छंद संभोग निश्चय ही सामाजिक जीवन का मूल तथा सार्वत्रिक स्वरूप रहा होगा। उसके पश्चात् मातृवंश परंपरा के परिवार तथा टोटमिक समूहों की अवस्था आई होगी और फिर बहुपति प्रथा तथा अंततः पितृवंश परंपरा प्रणाली का विकास हुआ होगा (शब्दावली में इन शब्दों को देखिए)।

अमरीकी वकील (1834-1881) एल.एच. मॉर्गन ने विवाह तथा परिवार विकास के पंद्रह चरणों की परिकल्पना की। सर एडवर्ड टाइलर (1832-1917) अकेला ऐसा विद्वान था, जिसने मानव विकास के चरणों के बारे में कुछ नहीं लिखा और केवल धार्मिक विश्वासों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। उसने कहा कि आदिम लोगों के सपनों, बीमारी, नींद जीवन, मृत्यु आदि के संबंध में गलत अनुमान ही उनके सारे धार्मिक विश्वासों तथा सम्प्रदायों का स्रोत हैं।

आज भी आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जो यह मानते हैं कि मानव समुदाय विकासात्मक दौर से गुजरते हैं। किन्तु हम जैसे लोगों को जो मानव समुदायों के बारे में आधुनिक खोजों तथा पुस्तकों का अध्ययन कर सकने की स्थिति में हैं, इस तरह का विचार प्रभावित नहीं करता है। उन्नीसवीं शताब्दी के विद्वानों के पास मानव समाजों के बारे में इतनी अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी। काफी बाद में, जब समकालीन मानव समाजों के बारे में धीरे-धीरे जानकारी काफी मात्रा में उपलब्ध हो गई तो उन्नीसवीं शताब्दी के विकासवादियों के सिद्धांतों को नए मिले प्रमाणों की कसौटी पर परखा गया। तब यह प्रमाणित किया गया कि उनके सिद्धांत केवल अनुमानमूलक थे और अनुभवपरक यथार्थ पर आधारित नहीं थे। विकासवादी विचारक यह सोच भी नहीं सकते थे कि लोगों के बारे में जिन सिद्धांतों की वे रचना कर रहे हैं, उन्हें सुव्यवस्थित ढंग से एकत्र की गई सामग्री पर आधारित करना आवश्यक है। यह कल्पना करना भी उनके लिए असंभव था कि आदिम समाजों के अध्ययन से उनके ज्ञान में कोई बढ़ोतरी हो सकती है। शायद आपने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दौर के एक प्रसिद्ध विद्वान सर जेम्स जॉर्ज फ्रेजर के बारे में प्रचलित एक किस्सा सुना हो। उसने आदिम लोगों के संबंध में द गोल्डन बाउ सहित अन्य कई पुस्तकें लिखीं (द गोल्डन बाउ के बारे में देखिए कोष्ठक 22.2)। जब उससे पूछा गया कि क्या वह उनमें से किसी आदिवासी से मिला है तो उसका उत्तर था “भगवान बचाए‘‘। इस प्रतिक्रया से स्पष्ट होता है कि फ्रेजर जैसे आरामकुर्सी पर बैठे अनुमान लगाने वाले नृशास्त्री अपने समाज को ही सबसे उन्नत मानते थे। वे समझते थे कि उनकी संस्कृति और समाज ही प्रगति के आदर्श हैं। एक तरह से ये विकासवादी विचारक प्रगति की संकल्पना मात्र से ही मोहग्रस्त थे।

कोष्ठक 22.2ः सर जेम्स फ्रेजर द्वारा रचित द गोल्डन बाउ
जब मलिनॉस्की लंबी बीमारी के कारण विज्ञान की अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाया तो उसने मन लगाने के लिए सर जेम्स फ्रेजर (1854-1940) की प्रसिद्ध पुस्तक द गोल्डन बाउ पढ़ी और वह उससे बहुत प्रभावित हुआ (दखिए कूपर 1975ः23)। 1890 में प्रकाशित हुई पुस्तक द गोल्डन बाउ के 1907 और 1915 के बीच बारह खण्ड प्रकाशित हुए। 1922 में इसका संक्षिप्त संस्करण भी निकला। इस पुस्तक में प्राचीन सम्प्रदायों तथा लोक-गाथाओं का विवेचन है।

इस पुस्तक में फ्रेजर ने जादू, विज्ञान तथा धर्म के क्रमिक चरणों के माध्यम से मानव चिंतन की पुरर्रचना की। फ्रेजर के अनुसार (1922ः 55), सर्वप्रथम सामाजिक जीवन पर जादूगरों का प्रभुत्व था और जादूगर प्रकृति के नियमों के प्रति आस्थावान थे। अधिक समझदार लोगों को धीरे-धीरे उनमें कमियां महसूस होने लगी और उनका जादू से मोहभंग हुआ। उस स्थिति में उन्होंने ऐसी आध्यात्मिक शक्तियों को कल्पना की जो प्रकृति को नियंत्रित कर सकें । फ्रेजर के अनुसार, यह धर्म का युग था। समय बीतने के साथ यह स्थिति भी भ्रामक प्रतीत होने लगीं और अंततः विज्ञान के दौर का शुभारम्भ हुआ।

हो सकता है कि हम सामाजिक नियमों के फ्रेजर के सिद्धांत से सहमत न हो पाएं परंतु इस उपलब्धि का श्रेय उसे अवश्य देना होगा कि उसने देश और काल की सीमाओं को पार करके मानव-समाजों में समानताओं का पता लगाने के प्रयास किए। इसके लिए उच्च कोटि की योग्यता, ज्ञान तथा विद्वता की आवश्यकता थी। इसी कारण मलिनॉस्की फ्रेजर से अत्यंत प्रभावित हुआ और उसे जादू, विज्ञान तथा धर्म के विषयों पर शोध करने की प्रेरणा मिली। मलिनॉस्की के इस शोध के बारे में आपको इकाई 23 में विस्तृत जानकारी दी जाएगी।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक विद्वानों ने अतीत के पुनर्निर्माण के जरिए मानव समाजों की व्याख्या करने के विकासवादी दृष्टिकोण की आलोचना करना शुरू कर दिया था। स्टाइनमज (1894), नीबो (1900), वेस्टर्मार्क (1906) तथा हॉबहाउस (1906) विकासवादी विचारकों की पीढ़ी के अंतिम विद्वान थे। इन्होंने आदिम से वैज्ञानिक चरण तक के एक ही दिशा में होने वाले मानव समाज के विचारों में विश्वास की परम्परा को जारी रखा।

इस समय विकासवादी दृष्टिकोण को भले ही चुनौती दी गई, परंतु इस बात से लगभग सभी सहमत थे कि मानव संस्थाओं के उद्भव की खोज करना समाजशास्त्रीय अध्ययन का उद्देश्य है। यही कारण है कि मलिनॉस्की भी, जिसने विकासवादियों को जी-भर कर कोसा, हदय से विकासवादी ही रहा। विकासवादियों की आलोचना तो मुख्य रूप से इसलिए की जा रही थी कि उनके निष्कर्ष अनुमानमूलक तथा मूल्यपरक थे। इस दृष्टि से उनमें तथा अठारहवीं शताब्दी के उनके पूर्ववर्ती विद्वानों में कोई अंतर दिखाई नहीं देता। यह कहा जा सकता है कि उनमें यही अंतर था कि अठारहवीं शताब्दी के नैतिक दार्शनिकों ने किसी तरह के प्रमाण की परवाह किए बिना ही अपने सिद्धांतों की रचना की। जबकि उन्नीसवीं शताब्दी के विद्वानों ने अपने सिद्धांतों की रचना किसी न किसी तरह से एकत्रित सामग्री पर आधारित करने की आवश्यकता मात्र महसूस की। इस प्रकार, विकासवादियों के पास नई-नई जगहों की खोज में निकल पड़ने वाले यात्रियों, धर्म प्रचारकों, सरकारी अधिकारियों तथा एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसने वालों से उल्टे-सीधे ढंग से प्राप्त की गई ढेर सारी प्रकाशित सामग्री इकटठी हो गई। इस सामग्री के आधार पर उन्होंने मानव समाजों के सुदूर अतीत के बारे में ऊंचे-ऊंचे सिद्धांत गढ़ लिए। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल के विद्वानों ने इस प्रमाण के औचित्य पर अनेक प्रश्न-चिन्ह लगाए।

विकासवादी सिद्धांतों की आलोचना दो प्रकार के समाजशास्त्रियों ने की। इनमें से एक वर्ग प्रसारवादी तथा दूसरा प्रकार्यवादी कहलाता है। ये दोनों ही वर्ग मानव संस्कृतियों की प्रगति की व्याख्या के लिए आदिम संस्कृतियों के अध्ययन को आवश्यक मानते हैं। दोनों ने आदिम समाजों के बारे में उल्टे-सीधे ढंग से एकत्र किए गए तथ्यों की प्रामाणिकता पर आपत्ति की। दोनों ने आदिम लोगों से संबंधित जानकारी वैज्ञानिक ढंग से एकत्र किए जाने को महत्व दिया। परंतु दोनों ने तथ्य एकत्र करने की अपनी अलग तकनीक विकसित की और दोनों में इससे भी अधिक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि उन्होंने एकत्र किए गए तथ्यों में मानव संस्कृतियों की व्याख्या के लिए अर्थ निकालने के अलग सैद्धांतिक स्वरूप विकसित किए। यहां हमने पहले प्रसारवादियों, तथ्य एकत्र करने की उनकी विधि तथा मानव संस्कृतियों के बारे में उनके सिद्धांतों का विवेचन किया है। उसके पश्चात् प्रकार्यवादियों, तथ्य एकत्र करने की उनकी विधियों तथा मानव समाजों एवं संस्कृतियों के विश्लेषण के उनके सिद्धांतों का अवलोकन किया है। चूंकि प्रसारवादियों तथा प्रकार्यवादियों दोनों ने आदिम संस्कृतियों के अध्ययन पर बल दिया, इसलिए नीचे दी गयी विवेचना आदिम वर्गों से जुड़े उनके लेखन पर आधारित है। इस बिंदु पर सोचिए और करिए 1 को पूरा करें। इस अभ्योस को करने से आपको अभी तक पढ़ी इस इकाई की पाठ्य सामग्री को समझने तथा आत्मसात करने में सहायता मिलेगी।

सोचिए और करिए 1
क्या आपका मानना है कि मानव समाज विकास के क्रमिक चरणों में से गुजरते हैं? क्या ऐसा है कि इस इकाई में हमने जिस विकासवादी चिंतन का उल्लेख किया है, उसमें समाज के बारे में भारतीय लेखन से उपजे विचार शामिल नहीं हैं? यदि हां तो आपकी क्या धारणा है कि ऐसा क्यों हैं?