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Evaluation in hindi definition meaning of assessment मूल्यांकन किसे कहते हैं | मूल्यांकन की परिभाषा क्या है प्रकार अर्थ विशेषताएं ?

मूल्यांकन
विकास के प्रति अपनाया गया दृष्टिकोण निर्धनता दूर करने में कोई अहम सफलता नहीं प्राप्त कर पाया और न ही गरीबी के दुष्चक को तोड़ पाया। इस परम्परागत दृष्टिकोण के विफल होने के तीन प्रमुख कारण बताए गए हैं – पहला तो यह कि औद्योगीकृत देशों के अनुभव और ज्ञान को जबरदस्ती इस क्षेत्रा में स्थानांतरित कर लागू किया गया, दूसरे, इसमें निर्धन समुदायों को सौहार्दपूर्ण समुदाय मान कर ग्राम में वर्चस्व, निर्भरता और लिंग व समानता विवादों जैसी कड़वी वास्तविकताओं की अनदेखी की गई जिससे सुपुर्दगी प्रणाली के प्रभावी होने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अंत में, आय वितरण के मुद्दे की भी इसमें उपेक्षा की गई। जब संचयी लाभों से गरीबी दूर करने में कोई सफलता नहीं मिली तो हर प्रकार के राज्य तंत्रा को उपयोग में लाया गया जिसने इसकी ओर विस्तृत ध्यान नहीं दिया। सुपुर्दगी दृष्टिकोण की यह विफलता नौकरशाही प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता के कारण हुई।

गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों को राज्य तंत्रों के माध्यम से चलाए जाने के कारण गरीबी दूर नहीं की जा सकी। वास्तव में, वस्तुएँ और सेवाएँ निर्धन लोगों तक पहुंचाने के मार्ग में नौकरशाही ही सबसे बड़ी बाधा बनी। प्रणाली में जवाबदेही नहीं थी, कई खामियाँ थीं और क्षमता निर्माण नहीं था। सभी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के निचले वर्ग के लोगों के सशक्तिकरण के लिए नगण्य प्रयास किए गए।

ज्यों-ज्यों समस्या बढ़ती गई, गरीबी उन्मूलन के लिए व्यष्टि स्तर के कई जागरूकता अभियान और गैर-सरकारी हस्तक्षेप आरम्भ हुए। इन कार्यक्रमों को चलाने की राज्य तंत्रा की जटिल प्रक्रिया से सीख लेते हुए नई प्रणाली विकसित होने लगी थी और धीरे-धीरे समष्टि हस्तक्षेप से ध्यान हटकर सहभागिता व्यष्टि विकास की ओर केन्द्रित होने लगा। व्यष्टि विकास संस्थाओं, अधिकांशतः गैर-सरकारी संगठनों ने स्थानीय नेतृत्व, स्थानीय संसाधनों के उपयोग, सशक्तिकरण और क्षमता निर्माण पर अधिक बल दिया है। दक्षिण एशिया में गरीबी उन्मूलन में व्यष्टि स्तर की सफलता की सभी कहानियों जैसे बांग्लादेश की ग्रामीण विकास समिति, पाकिस्तान के आगा खान ग्रामीण सहयोग कार्यक्रम, नेपाल के लघु किसान विकास कार्यक्रम, भारत के स्वः रोजगार प्राप्त महिला संघ, श्रीलंका के जनशक्ति बांकु संगम और भूटान की मोंगर जिला स्वास्थ्य परियोजना से इस बात का पता चलता है कि जहाँ “निर्धन विकास प्रक्रिया के कर्ता के रूप में, न कि कर्म के भागीदार होते हैं, वहाँ वृद्धि, मानव विकास और समता संभव है।‘‘

गरीबी उन्मूलन तथा ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की सफलता की अधिकांश कहानियां सहभागिता और सामुदायिक प्रयासों पर टिकी हैं, “इनसे विकास संभव है क्योंकि वे सामाजिक अनुभवों, संस्मरणों तथा जागरूकता प्रणालियों पर विश्वास करते हैं और उनके लिए बाह्य संसाधन सीमान्त हैं। यह बंगलादेश के ग्रामीण बैंक तथा भारत में पंचायतों के संबंध में उचित है।‘‘ जब-जब स्थानीय समुदाय अपने समुदायों के नियंत्राण और प्रबंध में शामिल होते हैं, तब-तब पर्यावरण की रक्षा करना और इसकी पुनरोत्पादकता विकसित करना संभव हो पाता है।

दक्षिण एशिया में गैर सरकारी संगठनों के कार्यों से बार-बार यह बात सिद्ध हुई है कि सामुदायिक स्वः अभिशासन के कारण शहरी संदर्भ में कराचीय भारत में सुखोमाजरी, नादा, सीड, भूसाड़िया और रालेगांव, सिद्धि गांव तथा बांग्लादेश में बाढ़ प्रभावित मैदानी भागों में ग्रामीण बैंक से सुधरी पर्यावरणीय परियोजना तैयार हुई हैं। नेपाल में ग्रामीण समुदाय आज भी अस्थायी हिमालयी पर्यावरण का प्रबंध सावधानी और श्रम से करते हैं। पर्यावरण प्रबंध में निर्धनों के अत्यधिक श्रम निवेश जैसे-हिमालय क्षेत्रा में रहने वाले किसानों के अपने खेतों को सीढ़ीनुमा बनाने में श्रम निवेश सरकारी व्यय की तुलना में, चाहे वह राष्ट्रीय निधि से हो या फिर विदेशी सहायता से, लगभग नगण्य ही दृष्टिगोचर होता है।

सारांश
इस अध्याय में हमने देखा कि दक्षिण एशिया की अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती हैं और कृषि पर निर्भर करती हैं। एक तिहाई से लेकर आधी ग्रामीण जनसंख्या निर्धन है और इस प्रकार से दक्षिण एशिया में गरीबी अधिकांशतः ग्रामीण जीवन की विशेषता है। इन सबके बावजूद १९७० के दशक में ही गरीबी उन्मूलन के उद्देश्य से विशेष नीतियाँ और कार्यक्रम बनाए गए। तब तक यह माना जाता रहा था कि आर्थिक विकास और विशेषकर कृषि में विकास से विकास का नया दौर आरम्भ होगा और इससे जनसंख्या गरीबी के स्तर से ऊपर उठ जाएगी परन्तु जैसे ही दक्षिण एशियाई देशों ने वर्ग और क्षेत्रा विशेष पर लक्षित गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम तैयार किए तो ग्रामीण विकास और सेवा क्षेत्रा पर उनका व्यय एक ओर ऋण संकट तथा दूसरी ओर प्रतिकूल बाह्य व्यापार पर्यावरण के कारण आई आर्थिक अस्थिरता के कारण कम हो गया। इन परिस्थितियों में कई गैर-सरकारी एजेन्सियाँ गरीबी उन्मूलन तथा ग्रामीण विकास कार्यक्रमों से जुड़ गईं।

जैसाकि हमने देखा कि दक्षिण एशिया में ग्रामीण विकास तथा गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की सफलता न केवल इस बात पर निर्भर थी कि देश ने इन कार्यक्रमों पर कितना व्यय किया है अपितु जिस रूप में वे संगठित थे तथा जिस सीमा तक लक्षित लाभ प्राप्तकर्ता इन्हें तैयार करने और इनके कार्यान्वयन में जुड़े हैं, इस पर भी निर्भर थी। जहाँ-जहाँ ग्रामीण विकास के संदर्भ में प्रतिभागिता दृष्टिकोण अपनाया गया है, उससे निर्धनों को लक्षित करने और उन्हें टिकाऊ आजीविका के साधन उपलब्ध कराने की दिशा में आशाजनक परिणाम सामने आए हैं।

 कुछ उपयोगी पुस्तकें
महबूब उल-हक ह्यूमन डेवलपमेंट सेंटर (कई वर्ष), ह्यूमन डेवलपमेंट इन साउथ एशिया, कराची, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।
सिंह, के के एवं एस अली, (२००१) रूरल डेवलपमेंट स्ट्रेटिजीस इन डेवलपिंग कंटरीज, नई दिल्ली, सरूप एंड संस।
लामा पी महेन्द्रा (२००१), ग्लोबलाइजेशन एंड साउथ एशियाः प्राइमरी कन्सर्न्स एंड वलनरेबिल्टिज इन इंटरनैशनल स्टडीज,खंड ३८(२), सेज पब्लिकेशन।
बेस्ले, टी एवं आर वर्गीस (१९९८) लैंड रिफार्म, पावर्टी रिडक्शन एंड ग्रोथः एविडेंस फ्रोम इंडिया सं १३, लंदन, लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स।
कृष्णा ए एवं अन्य (१९९७) रीजन्स फोर होप, इन्सट्रक्टिव एक्सपीरियेन्सिज इन रूरल डेवलपमेंट, वेस्ट हार्टफोर्ड, कुमारियन प्रेस।
सेन, अमर्त्य (१९९६) इकोनोमिक रिफोर्स, एम्प्लॉयमेंट एंड पावर्टीट्रेंड्स एंड आप्शन, इकोनॉमिक एवं पोलीटिकल वीकली, विशेषांक।